दक्षिण में हिन्दी-विद्वेष की राजनीति कब तक?

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– ललित गर्ग-

दक्षिण भारत में हिन्दी का विरोध करके राजनीति चमकाने की कुचेष्टाएं होती रही हैं। वहां राजनीतिज्ञ अपना उल्लू सीधा करने के लिये भाषायी विवाद खड़े करते रहे हैं और वर्तमान में भी कर रहे हैं। यह देश के साथ मजाक है। यह मुद्दा जब-तब सिर उठाता देखा जाता है। ताजा मामला तमिलनाडु में दही के पैकेट पर प्रमुखता से ‘दही’ लिखे जाने के निर्देश को लेकर उठा है। वहां के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने अपने ट्विटर पर लिखा है कि इस तरह हमारे ऊपर हिंदी थोपने का प्रयास किया जा रहा है। दरअसल, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने कर्नाटक मिल्क फेडरेशन को निर्देश दिया है कि दही के पैकेट पर प्रमुखता से ‘दही’ मुद्रित किया जाए। इसी को लेकर विवाद छिड़ गया है। अब सुझाव आए हैं कि तमिल में दही के पर्यायवाची को कोष्ठक में लिखा जाना चाहिए। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने इस सुझाव को स्वीकार करते हुए पैकेट पर कर्ड के साथ तमिल और कन्नड़ भाषा के स्थानीय शब्द जैसे ‘मोसरू’ और ‘तायिर’ को ब्रैकेट में इस्तेमाल करने के निर्देश दे दिये हैं। भले ही राजनीतिक कारणों से यह सुझाव स्वीकार किया गया हो, लेकिन प्रश्न है कि जब तक राष्ट्र के लिये निजी-स्वार्थ एवं राजनीतिक नफा-नुकसान के गणित को विसर्जित करने की भावना पुष्ट नहीं होगी, राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक उन्नयन एवं सशक्त भारत का नारा सार्थक नहीं होगा। हिन्दी को सम्मान एवं सुदृढ़ता दिलाने के लिये केन्द्र सरकार के साथ-साथ प्रांतों की सरकारों को संकल्पित होना ही होगा।
मुख्यमंत्री ने एक सोची-समझी राजनीति के तहत एक बार फिर हिंदी और दक्षिण की भाषाओं के बीच विद्वेष की आग सुलगा दी है। हालांकि हिंदी को लेकर दक्षिण में अस्वीकार की भावना को शांत या सहज करने की कोशिशें हो चुकी हैं, खूब सारे तर्क दिए जा चुके हैं, मगर जो लोग इसे राजनीतिक रंग दिए रखना चाहते हैं, उनके सामने सारे तर्क बेमानी हो जाते हैं। ताजा विवाद भी उसी राजनीतिक नजरिए का नतीजा है। नई बनती दुनिया में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कारोबार आदि वजहों से लोगों की देश के विभिन्न हिस्सों में आवाजाही बढ़ी है। जिसमें भाषायी संकीर्णता विकास में बड़ी बाधा है। महानगरों में बड़े पैमाने पर दूसरे प्रांतों के लोग जाकर बसने लगे हैं, बस गए हैं, उसमें भाषा संबंधी ऐसी संकीर्णता मायने नहीं रखती। वैसे भी जहां तक हिंदी की बात है, बेशक उसे राष्ट्रभाषा के तौर पर देश के सभी नागरिकों के लिए अनिवार्य बना दिया गया हो, लेकिन उसे व्यवहार की भाषा बनाने में अनेक दिक्कते खड़ी है। राजनीतिक उद्देश्यों से हिन्दी को उपेक्षित करने की कोशिशें लगातार हो रही है, जबकि हिन्दी विश्व की तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा बन गयी है। कोई भी कारोबारी अब यह नहीं कह सकता कि वह केवल अपनी मातृभाषा में कारोबार करेगा, हिंदी का सहारा बिल्कुल नहीं लेगा। पर्यटन उद्योग से जुड़े लोग भी ऐसी जिद नहीं पाल सकते। पालते भी नहीं। दक्षिण के राज्यों में हिंदीभाषी लोग बड़ी सहजता से अपनी भाषा में बात रख लेते हैं, वहां के लोग उनकी बात समझ भी लेते हैं। इस सच्चाई से वहां के राजनेता और प्रशासक भी अपरिचित नहीं। फिर यह समझना मुश्किल है कि वे ऐसे भाषा-विद्वेष को जिंदा ही क्यों रखना चाहते हैं? निश्चित ही संकीर्ण एवं स्वार्थ की राजनीति के कारण ऐसा हो रहा है।
तमिलनाडु में हिंदी को लेकर विरोध कोई नया नहीं है, यह विरोध तो 1937 से ही है, जब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की सरकार ने मद्रास प्रांत में हिंदी को लाने का समर्थन किया था पर द्रविड़ कषगम (डीके) ने इसका विरोध किया था। तब विरोध ने हिंसक झड़पों का स्वरूप ले लिया था और इसमें दो लोगों की मौत भी हुई थी। लेकिन साल 1965 में दूसरी बार जब हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने की कोशिश की गई तो एक बार फिर से ग़ैर हिंदी भाषी राज्यों में पारा चढ़ गया था। तमिल इतिहासकार एआर वेंकटचलापति का कहना है कि आज भी वहां हिन्दी के उपेक्षित होने का एहसास बना हुआ है। वे कहते हैं, ‘सभी भाषाओं को बराबरी का दर्जा देकर ही सांस्कृतिक एकता को मजबूत किया जा सकता है। तमिलनाडु के दूरदराज के इलाके में अगर किसी को बैंक के एटीएम पर कुछ काम होता है तो उसे अंग्रेज़ी या फिर हिंदी का सहारा लेना होता, लेकिन उसके पास तमिल का विकल्प नहीं होता। बावजूद इन स्थितियों के हिन्दी का विरोध समझ से परे हैं। निश्चित रूप से कोई भी भाषा अपनी संस्कृति की वाहक और संरक्षक होती है, उसे विकृत करने की कोशिशों का विरोध होना ही चाहिए। मगर भाषाई खुलेपन की वजह से अगर कारोबारी विस्तार हो रहा है, तो ऐसी जिद भी नहीं पाली जानी चाहिए। फिर भाषाएं चुपके से अपनी सहवर्ती भाषाओं से न जाने कितने शब्द, मुहावरे, प्रतिमान ग्रहण कर अपने को समृद्ध करती रहती हैं, उनके इस सहज स्वभाव में राजनीतिक अवरोध भी क्यों पैदा किया जाना चाहिए।
  किसी भी प्रांत को अपना समग्र विकास करना है तो भाषायी आग्रह एवं संकीर्णताएं त्यागनी होगी। भाषा, जाति, धर्म आदि को राजनीति का आधार मानने की स्थितियां अब उतनी प्रभावी नहीं रही है, अब देश एक हो रहा है तो उसकी भाषा भी एक होनी ही चाहिए। हिन्दी को दबाने की नहीं, ऊपर उठाने की आवश्यकता है। हमने जिस त्वरता से हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की दिशा में पहल की, उसी त्वरा से राजनैतिक कारणों से हिन्दी की उपेक्षा भी की है, यही कारण है कि आज भी हिन्दी भाषा को वह स्थान प्राप्त नहीं है, जो होना चाहिए। राष्ट्र भाषा सम्पूर्ण देश में सांस्कृतिक और भावात्मक एकता स्थापित करने का प्रमुख साधन है। भारत का परिपक्व लोकतंत्र, प्राचीन सभ्यता, समृद्ध संस्कृति तथा अनूठा संविधान विश्व भर में एक उच्च स्थान रखता है, उसी तरह भारत की गरिमा एवं गौरव की प्रतीक राष्ट्र भाषा हिन्दी को हर कीमत पर विकसित करना हमारी प्राथमिकता होनी ही चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासन में हिन्दी को राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा के रूप में स्कूलों, कॉलेजों, अदालतों, सरकारी कार्यालयों और सचिवालयों में कामकाज एवं लोकव्यवहार की भाषा के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने के प्रयास हो रहे हैं, फिर दक्षिण में हिन्दी विरोध के बादल छटने ही चाहिए।

महात्मा गांधी ने अपनी अन्तर्वेदना प्रकट करते हुए कहा था कि भाषा संबंधी आवश्यक परिवर्तन अर्थात हिन्दी को लागू करने में एक दिन का विलम्ब भी सांस्कृतिक हानि है। मेरा तर्क है कि जिस प्रकार हमने अंग्रेज लुटेरों के राजनैतिक शासन को सफलतापूर्वक समाप्त कर दिया, उसी प्रकार सांस्कृतिक लुटेरे रूपी अंग्रेजी को भी तत्काल निर्वासित करें।’ लगभग साढे सात दशक के आजाद भारत में भी हमने हिन्दी को उसका गरिमापूर्ण स्थान न दिला सके, यह विडम्बनापूर्ण एवं हमारी राष्ट्रीयता पर एक गंभीर प्रश्नचिन्ह है। पूर्व उपराष्ट्रपति वैंकय्या नायडू के मन में हिन्दी को लेकर जो दर्द एवं संवेदना है, वही स्थिति सरकार से जुडे़ हर व्यक्ति के साथ-साथ जन-जन की होनी चाहिए। हिन्दी के लिये दर्द, संवेदना एवं अपनापन जागना जरूरी है। कोई भी देश बिना अपने राजभाषा के ज्ञान के तरक्की नहीं कर सकता है। क्षेत्रीय भाषाओं की आपसी समावेशी एवं समन्वयकारी सोच से ही वे समृद्ध होती गयी है। इसलिये इस बात को लेकर झगड़ा ही क्यों होना चाहिए कि किस भाषा में दूध, दही या किसी और वस्तु को क्या कहते हैं। बहुत सारे उत्पादों के नाम विदेशी भाषाओं से लिए गए हैं, मगर इससे तो कभी किसी ने ऐसा महसूस नहीं किया कि उस भाषा की संस्कृति हमारे ऊपर थोप दी गई है। फिर हिन्दी को लेकर ही यह दुराग्रह क्यों?

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