ट्रंप और मेक्रों की नोक-झोंक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मेक्रों के बीच आजकल जैसी नोक-झोंक चल रही है, वैसी चार्ल्स दिगाल के जमाने में भी नहीं चली थी। सारी दुनिया के गोरे देशों में यह माना जाता है कि फ्रांस अपने आप को सबसे ऊंचा और सबसे अच्छा मानता है लेकिन डोनाल्ड ट्रंप, जो कि अपने बेलगाम बयानों के लिए कुख्यात हो चुके हैं, आजकल मेक्रों पर सीधे प्रहार कर रहे हैं। ट्रंप और मेक्रों के बीच साल भर पहले तक जबर्दस्त मैत्री और अनौपचारिकता देखने को मिलती थी लेकिन इधर प्रथम विश्व युद्ध के शताब्दि समारोह में दोनों नेताओं के बीच काफी अप्रिय शब्दों का आदान-प्रदान हुआ। डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के राष्ट्रपति बनते ही घोषणा कर दी थी कि उनकी नीति है, ‘‘पहले अमेरिका’’ याने अमेरिकी राष्ट्रहित के खातिर वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। किसी भी राष्ट्र का वे हाथ छोड़ सकते हैं और किसी का भी हाथ पकड़ सकते हैं। उन्होंने नाटो के सदस्य यूरोपीय राष्ट्रों से कई बार कह दिया कि अमेरिका आप लोगों की रक्षा के लिए यूरोप में नाटो की फौजों पर पैसा क्यों बहाए ? आप अपना खर्च खुद क्यों नहीं उठाते ? ट्रंप जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल से तो पहले ही खफा थे अब मेक्रों ने भी उन पर हमला बोल दिया है। मेक्रों ने कहा है कि यूरोपीय देशों को अपनी फौज खुद खड़ी करनी चाहिए। यूरोप को रुस, चीन और अमेरिका से खतरा है। द्वितीय महायुद्ध के बाद ऐसी बात पहली बार दुनिया के कानों में पड़ी है कि यूरोप को अमेरिका से खतरा है। ट्रंप ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए जर्मनी और फ्रांस के साझा रवैये की काफी मजाक उड़ाई है। दशकों तक एक-दूसरे के दुश्मने रहे जर्मनी और फ्रांस के आपसी युद्धों की ट्रंप ने याद दिलाई है। ट्रंप ने मेक्रों के इस कथन की भी मजाक उड़ाई है कि जो राष्ट्रवादी होगा, उसकी देशभक्ति भी संदेहास्पद होगी। ट्रंप आजकल अमेरिकी राष्ट्रवाद की प्रतिमूर्ति बने हुए हैं। मेक्रों का तर्क है कि जो राष्ट्रवादी होते हैं, वे संकीर्ण, स्वार्थी और अल्पदृष्टि होते हैं। वे आखिरकार अपने राष्ट्र का ही नुकसान करते हैं। इस पर ट्रंप ने ट्वीट किया है कि फ्रांस से ज्यादा राष्ट्रवादी और कौनसा-राष्ट्र है। उन्होंने यह भी कहा है कि इसीलिए ताजा जनमत संग्रह में मेक्रों को फ्रांस में सिर्फ 26 प्रतिशत लोगों का समर्थन बचा है। उनका कहना है कि बढ़ती बेरोजगारी, गिरते जीवन-स्तर और मंहगाई तो मेक्रों संभाल नहीं पा रहे हैं और दूसरों को उपदेश देने पर तुले हुए हैं। पता नहीं, ट्रंप और मेक्रों की यह नोक-झोंक यूरोप को किधर ले जाएगी ?

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