जिन्दा हैं परम्परायें सौ साल से

डा. अरविन्द कुमार सिंह

उदय प्रताप कालेज के राजर्षि जयन्ती पर यदि कुछ लिखना हो तो मैं समझता हूॅं – कठोपनिषद् में यमराज और नचिकेता के बीच सम्पन्न हुयी बातचीत से बेहतर उध्दहरण और कुछ नहीं हो सकता ।

          नचिकेता के प्रश्न पर यमराज का चैकना स्वाभाविक था। इन्सान और देवलोक के देवता, आज भी संशयपूर्ण है कि इस मरणधर्मा शरीर से निकलकर आत्मा कहाॅ जाती है? यह प्रश्न था नचिकेता का। यमराज ने नचिकेता को, जो महज सात या आठ साल का बच्चा था – सहज प्रलोभन देते हुये कहा – हे नचिकेता ! तुम मुझसे हजार वर्षो की अपनी आयु माॅग लो । हजार वर्षो की अपने नाती पोतो की आयु माॅग लो पर इस प्रश्न को छोड दो। नचिकेता ने प्रलोभन को सहज ठुकराते हुये इस प्रश्न के उत्तर के लिये यमराज से पुन निवेदन किया। हर जतन कर चुकने के बाद आखिरकार यमराज ने कहाॅ – हे नचिकेता! तुम परम वैराग्य को उपलब्ध हो तथा सच्चे अर्थो में आत्म तत्व को जानने के अधिकारी हो – अतः मैं तुमसे कुछ बाते कहता हूॅ –

           सम्पूर्ण सृष्टी के मानव दो हिस्सो में बटे है।  वे दो तरह से अपना जीवन यापन करते है। एक प्रेय के अन्र्तगत जीवन यापन करते है तो दूसरे श्रेय के अन्र्तगत। दोनो ही शब्द महत्वपूर्ण हंै। अतः इन्हे समझ लेना जरूरी है। प्रेय अर्थात जो प्रिय है, आनन्दपूर्ण है, प्यारा है और जिसमें कार्य के पूर्ण होने का आश्वासन मिलता है। दूसरी तरफ श्रेय – जो श्रेष्ठ है, सुन्दर है, सच्चा है,शुभ है और शंकर है। अर्थ को स्पष्ट करते हुये यमराज आगे कहते है – प्रेय के अन्र्तगत सम्पन्न होने वाले कार्य में पहले सुख की प्राप्ती होती है पुनः दुख की अनुभूति। वही श्रेय के अन्र्तगत सम्पन्न होने वाले कार्य में पहले दुख और बाद में सुख की अनुभूति होती है। प्रेय मन की विषय वस्तु है वही श्रेय आत्मा की विषय वस्तु । प्रेय के अन्र्तगत जीवन यापन सांसारिक व्यक्ति करता है तथा श्रेय के अन्र्तगत जीवन यापन अध्यात्मीक व्यक्ति करता है।

             यमराज और नचिकेता की इस बातचीत को यदि हम पुरातन भारतीय  जीवन शैली के सन्र्दभ में देखने का प्रयास करे तो एक अद्भूत साम्य दिखाई देता है। पुरातन जीवन शैली – चार भागो में विभाजित थी। बह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। जहाॅ श्रेय के अन्र्तगत जीवन यापन करना पडता था। पहले दुख और बाद में क्रमशः सुख।

राजर्षि उदय प्रताप सिंह जू देव, सोमाया जी का जन्म 3 सित्मबर 1850 को बहराईच के भिनगा नामक स्टेट में हुआ था। विद्यालय की स्थापना के वक्त वो सन्ंयास आश्रम के अन्र्तगत काशी प्रवास कर रहे थे। अग्रेजो का जमाना था। पूरे भारतीय दर्शन में ऐसा अद्भूत व्यक्ति खोजना बडा मुश्किल है जिसने अंहकार से विरत रह, विद्यालय शिलान्यास के लिये आये हुये काशी प्रान्त के तात्कालिन गर्वनर सर हिवेट के नाम पर विद्यालय का नामकरण कर दिया हो। साथ ही इच्छा व्यक्त की हो कि मेरा नाम विद्यालय से ताजिन्दगी न जोडी जाय। यह अलग बात है उनकी मृत्यु के बाद 1921 में उनका नाम विद्यालय से जोड दिया गया।

           सर हिवेट क्षत्रिया हाई स्कूल जो बाद में चलकर उदय प्रताप इण्टर कालेज के रूप में तब्दील हो गया उसकी बुनियाद की ईटे अंहकार से रहित हैं। एक संन्यासी द्वारा विद्यालय की स्थापना निश्चीत तौर पर मूल्यों और परम्पराओं का भारतीय समाज में रोपण था। जिसका मूल केन्द्र विद्यालय का सूत्र वाक्य दृढ राष्ट्रभक्ति पराक्रमश्च हैं। यदि दृढ राष्ट्र की स्थापना करनी है तो राष्ट्र की नौजवान पीढी को पराक्रम की भट्टी से गुजरना ही होगा।

            यदि संन्यास के विन्दू पर विद्यालय की स्थापना पूज्य राजर्षि के द्वारा हुयी तो उसका प्रारम्भ बह्मचर्य से था। जो विद्यालय की स्थापना के वक्त से ही स्थापित परम्पराओं के अन्र्तगत दिखाई देता है। गुरूकुल छात्रावासीय परम्परा की नीव जो 1909 में डाली गयी वो आज भी बादस्तूर जिन्दा है। अभी कल की ही बात है मैं विद्यालय मैदान पर बैठा हुआ था।

             सर्य देवता धीरे धीरे अस्ताचल गामी हो रहे थे । तभी कही दूर से घन्टा बजने की आवाज आयी – देखते देखते विभिन्न छात्रावासों के बाहर श्वेत धवल कुर्ता धोती में छात्र पक्तिवत खडे होते चले गये । बहुत ही नयनाभिराम दृश्य था। प्रत्येक दिशाओं से चलकर छात्रो की पंक्ति विद्यालय स्थित सन्ध्या हाल की तरफ पहुॅच रही थी। मैं अपनी उत्सुकता न रोक सका – यू ही एक छात्रावास के छात्रो के साथ चलते हुये मैने एक छात्र से अपनी बातचीत शुरू की –

  •  क्या नाम है आपका?

          जी मेरा नाम मनीष है।

  •  आप किस छात्रावास से है?

           मैं छात्रावास आठ से हूॅ।

  •  आपने हाथ में यह क्या ले रखा है?

          पंचपात्र,आचमनी तथा आसनी।

  •  आचमनी से आप क्या करते है?

          आचमनी में हम जल ले कर आचमन शुध्दी करते है।

  • पंचपात्र से आप क्या करते है तथा इसे पंचपात्र क्यों कहा जाता है?

पंचपात्र जल संग्रह का साधन है, यह ताॅबे से निर्मित है, ताॅबा सूर्य का धातु है और संध्या के वक्त हम सूर्य की ही उपासना करते है।बच्चे संध्या पूजन के उपरान्त अपने छात्रावासेंा को रवाना हो चुके थे। संध्या कराने के उपरान्त जब विद्यालय धर्म गुरू का आगमन हुआ तो मैने उनके चरणो में अपना प्रणाम निवेदन करने के उपरान्त, इस सौ सालीय विद्यालयी परम्परा का आधुनिक वैज्ञानिक परिवेश में उपादेयता की जिज्ञासा उनके समक्ष रखी?

               धर्म गुरू ने धीर गम्भीर आवाज में मुझे सम्बोधित करते हुये कहा – ‘‘ शरीर मात्र साधन है, संसार का भी और सत्य का भी। शरीर न शत्रु है और न मित्र है। शरीर मात्र साधन है। आप चाहे तो इससे पाप करे, चाहे तो संसार में प्रविष्ट हो जाये और चाहे तो परमात्मा में प्रवेश पा लें। हमें व्यक्तित्व परिष्कृत करने हेतु शरीर, विचार एवं भाव के धरातल पर शुध्दीकरण की प्रक्रिया से गुजरना होगा। हमारा शरीर ग्रन्थियो से भरा हुआ है, भाव अशुध्द है और विचार नकारात्मक हैं।

                शरीर शुध्दी का पहला चरण है, शरीर की ग्रथियों का विर्सजन। पूज्य राजर्षि एक अध्यात्मिक व्यक्ति थे ।  राम और बुध्द उनके आर्दश थे । उनकी मान्यता थी । अध्यात्मिक चेतना की मजबूती के बगैर एक छात्र दृढ राष्ट्रभक्ति एवं पराक्रमश्च के विन्दू तक नही पहुॅच सकता। अतः विद्यालय की स्थापना के समय से ही इस विन्दू को दृष्टीगत रखते हुये विद्यालय में संध्या उपासना की परम्परा प्रारम्भ की गयी।

               25 नवम्बर 1909 को विद्यालय की स्थापना हुयी तथा 1909 में ही  इस संध्या हाल का निर्माण हुआ। अब आप ही बताईये – युग पुरातन या समय नया हो। शरीर, विचार और भाव के धरातल का शुध्दीकरण क्या जीवन यापन के लिये आवश्यक नहीं है? शारिरीक शुध्दता क्या स्वास्थय के लिये आवश्यक नहीं है।

               छात्रावास पाॅच हमारा अगला पडाव था। अभी शायद कुछ और परम्पराओ से मुलाकात होनी थी। गृहपति महोदय ने जानकारी दी – आज भी बच्चे भूमि पर बैठ कर भोजन करते है। भोजन के पूर्व गो ग्रास ( गाय माता को पहला ग्रास ) निकाला जाता है। कृतिम अग्नि का प्रयोग नही होता । भोजन लकडी पर बनता है। मसाला सिल बट्टे पर पिसा जाता है। इन जानकारियों के साथ हम छात्रावास से बाहर आये।

               शाम गहराने लगी थी। आकाश में तारें निकल आये थे। सूर्य देवता कब के जा चुके थे। मैं आकाश में ध्रुव तारे को देखता हुआ सोच रहा था – हमारी परम्परायें और संस्कृतियाॅ शायद ध्रुव तारे की तरह है, जो हमें हमारी मंजिल का पता देती है। जो राष्ट्र अपनी संस्कृतियों को विस्मृत करता है, उसकी दास्ता तक नहीं होती है इतिहास के पन्नो में। पूज्य राजर्षि को इन बातो का इल्म था। तभी तो उन्होने विद्यालय में इतनी पुख्ता परम्पराओं की नीव डाली जो आज 100 साल बाद भी जिन्दा है। शायद इस सन्देश के साथ की बच्चो ! परम्परायें, संस्कृतियाॅ तुम्हे सम्बल देगी और तुम इस देश को रखना मेरे बच्चो सम्भाल के!

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