निशाने पर आदिवासी

.#आदिवासी_दिवस_के_बहाने

उत्तम मुखर्जी

महारानी राज तुन्दु जाना , अबुआ राज एते आना…ख़ून की उल्टी कर रहे थे बिरसा मुंडा । फ़िर भी उनकी जुबां पर यह नारा गूंज रहा था । रानी विक्टोरिया के शासन का नाश होगा । अबुआ राज आएगा । राज तो मिला लेकिन जो सपने का हिंदुस्तान बनाने का ख़्वाब बिरसा मुंडा, सिद्धो , कान्हों, चांद भैरव… ने देखा था, वह सपना टूटकर बिखर गया । एक ऐसी व्यवस्था बनी जहां आर्थिक विषमता तेज़ी से बढ़ी।सबसे अधिक खाई 1990 के बाद बनी । देश की पूंजी पांच प्रतिशत लोगों के हाथों सिमटकर रह गई है । आबादी का शीर्ष हिस्सा आज भी भूख़ ग़रीबी , अभाव से रोज त्रस्त है । नई व्यवस्था में बिरसा को भगवान बना दिया गया । भगवान होते ही पुजे जाने के लिए , सो उनका नाम ख़ूब ज़पते हैं लोग । आज़ादी के सात दशक बाद भी जल, जंगल ज़मीन के लिए आदिवासी संघर्षरत हैं । आज भी ट्राइबल विस्थापन का बेइंतहां दर्द झेलने को मज़बूर हैं । सिर्फ़ झारखण्ड या भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में इस दौर में आदिवासी निशाने पर हैं । विकास का ग़ुलाब किसी के हिस्से में चला जा रहा है और आदिवासी कांटों से लहूलुहान होकर विकास की क़ीमत चुकाने को बाध्य हैं । शासन, प्रशासन , सरकार..कभी सीधे तौर पर ट्राइबल को टार्गेट कर रहे हैं , तो कभी परोक्ष रूप से पॉलिसी बनाकर उन्हें तबाह कर रहे हैं ।

दरअसल ब्रिटिश हुक़ूमत के समय से ही आदिवासियों का दमन शुरू हुआ है । ट्राइबल को इस दौर की दौड़ से अलग किए बिना आज के रहनुमा विकास की लहलहाती फ़सल काट नहीं सकते हैं , सो आदिवासियों के अस्तित्व के साथ खिलवाड़ करने का काम निरंतर ज़ारी है । ऑस्ट्रेलिया व उत्तर अमेरिका सहित कई मुल्कों में ट्राइबल पहले बहुसंख्यक रहे , आज अपनी ही माटी में वे माइनॉरिटी बन गए हैं तथा बेहद कष्ट और तकलीफ़ के बीच ज़िन्दगी बचाने के ज़द्दोज़हद में लगे हुए हैं । 26 जनवरी को अंग्रेज़ ऑस्ट्रेलिया को अपना उपनिवेश बनाया था। आज भी लोग अंग्रेजों के ऑस्ट्रेलिया से ही वाकिफ़ हैं । मूल आदिवासियों की संख्या दो प्रतिशत के आसपास पहुंच गई है । अंग्रेजों ने आदिवासियों के सामाजिक तानेबाने को तहस-नहस कर दिया । उनकी संस्कृति पर लगातार हमले किए जाते रहे । उनके बच्चों को स्कूलों में भेजकर मातापिता से अलग कर दिया गया। उनकी आबादी घटे , इसलिए ब्रिटेन से ले जाकर गर्म कपड़े देने लगे । उस समय यूरोपीय मुल्क़ों में जानलेवा मलेरिया का प्रकोप था। गर्म कपड़े पाकर ठंड में ठिठुरते आदिवासी बेहद खुश हुए , लेकिन यह ख़ुशी तुरन्त काफ़ूर हो गई । इसी गर्म कपड़े से मलेरिया का संक्रमण बढ़ा और ट्राइबल की आबादी तेज़ी से घटी । जो आदिवासी बच गए हैं , आज भी वे बेहद लाचार , परेशान और तबाह हैं । वहां की सरकार को महसूस हुआ कि इस सदी का यह सबसे बड़ा ज़ुल्म था , सो बारह साल पहले 26 मई को राष्ट्रीय खेद दिवस.. नैशनल सॉरी डे मनाने का निर्णय लिया ताकि ट्राइबल पर हुए अत्याचार का कुछ प्रायश्चित्त तो हो । भारत का आदिवासी भी कमोबेश इसी तरह की साज़िश का शिकार है । यहां भी ट्राइबल के लिए धर्म से अधिक मानवीय मूल्य का महत्व अधिक है। यही वज़ह है सनातन , सरना , ईसाइयत के इर्द-गिर्द समाज को दिखाने की पूरी कोशिश होती है , लेकिन धर्म के इतर यह समुदाय ज़ुल्म और शोषण के खिलाफ़ मुखर प्रतिवाद करता है और मानव धर्म को सर्वोपरि मानता है। अब तो माओवाद के नाम पर भी ट्राइबल के अंदर स्पेस बनाने की होड़ मची हुई है । छल-प्रपंच से ये कोसों दूर रहते हैं सो आसानी से इन्हें ग़ुमराह भी लोग करते हैं । आदिवासी हितों के नाम पर झारखंड और छत्तीसगढ़ बने लेकिन यहां भी ट्राइबल महफूज़ नहीं हैं। पत्थलगढ़ी की प्रथा इस समुदाय में बहुत पुरानी है लेकिन इसके नाम पर पहले लोगों को परेशान किया गया । फ़िर हिंसा भड़की तो चिह्नित लोगों के खिलाफ़ कार्रवाई न कर दस हज़ार आदिवासियों पर देशद्रोह का मुकदमा ठोक दिया गया ।

विश्व में एकसाथ इतने लोगों को ख़ुद के ही मुल्क़ में राष्ट्रद्रोही बता देना अज़ीब मामला है । झारखण्ड की नई सरकार ने इसे वापस लेने का निर्णय लिया है । आदिवासी कभी अन्याय , ज़ुल्म और लूट बर्दाश्त नहीं करते हैं । वे प्रतिवाद करते हैं तो उन्हें नक्सली बता दिया जाता है । प्रतिवाद और विरोध के स्वर को दबाने का यह अचूक फॉर्मूला है । खूंटी से लेकर पारसनाथ तक कई लोगों की शासन ने हत्या कर दी। पारसनाथ की घटना में तो हद हो गई । निरीह आदिवासी की हत्या की ख़ुशी में पूर्व की सरकार ने ज़श्न मनाया । सरकारी खज़ाने से एक लाख रुपये ख़र्च किया गया। स्वयं राज्य के तत्कालीन डीजीपी हत्या के इस उत्सव में पहुंचे। मीडिया ने भी बैनर स्टोरी बनाई। बाद में पता चला एक बेगुनाह आदिवासी युवक मारा गया है। वह मारंग बुरू के आयोजन की तैयारी के बाद लौट रहा था। उत्सव की तैयारी में था वह , लेकिन शासन ने उसकी हत्या कर सरकारी खर्च से उत्सव मनाया , किसी आज़ाद मुल्क़ ऐसा हो सकता है, यह जो सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं । छत्तीसगढ़ के बस्तर के जंगल के गांवों में 1.71 लाख लोगों की आबादी है । ट्राइबल ही मेजोरिटी में थे, लेकिन अब वहां सरकार द्वारा बसाई गई बांग्लादेशियों की जनसंख्या एक लाख पार कर गई है । आदिवासियों की संस्कृति, परम्परा , भाषा..सबकुछ बुरी तरह से प्रभावित हुई है । एक सर्वे में सामने आया है कि भारतीय जेलों में बन्द मुज़रिमों में सबसे अधिक ट्राइबल हैं । कुछ को तो मालूम भी नहीं कि उनके गुनाह क्या है ? तक़रीबन आठ हज़ार ऐसे लोग ज़ेलबन्दी हैं । झारखण्ड के संथाल स्थित राजमहल इलाका कभी अंग्रेज़ों की राजधानी था । अंग्रेजों ने वहां आदिवासियों पर ज़ुल्म ढाना शुरू किया । सूदखोर-महाज़न ब्रिटिश हाकिमों के साथ हो लिए थे । अंग्रेज़ ने क़ानून बनाकर ट्राइबल को बोर्न क्रिमिनल बता दिया था।वे छोटे बटखरे से आदिवासियों को सामान देते थे , जबकि बड़े बटखरे से उनसे उनके उत्पाद लेते थे । अंग्रेज़ के क़ानून के खिलाफ़ आदिवासियों ने विद्रोह शुरू कर दिया । सेना पहुंचकर आदिवासियों का दमन कर सके , इसलिए देश की दूसरी बड़ी रेल लाइन हावड़ा-दानापुर बिछाई जाने लगी । इसी रूट पर महर्षि देवेन्द्रनाथ ने अपने बेटे रवींद्रनाथ टैगोर को जनेऊ के लिए ले आए थे । दामिन-ई-कोह..उस समय संथाल परगना को इसी नाम से पुकारा जाता रहा उस इलाके में रेल पटरियों के स्लीपर के लिए वनों की कटाई के लिए मुस्लिम लोगों को लाया गया , क्योंकि जल जंगल, ज़मीन के रक्षक कभी पेड़ काट नहीं सकते हैं । फ़िर पेड़ काटने के बहाने साम्प्रदायिक तनाव कराए गए । महिलाओं पर अत्याचार अलग से हो रहे थे । संथाल में ही सिद्धो-कान्हो चांद- भैरव , फूलो-झानो ने बड़ा विद्रोह कराया ।

आदिवासी जन्मजात डेमोक्रैट होते हैं , सो अन्य जातियों को भी इस आंदोलन से जोड़ा । अभावग्रस्त , लाचार, संसाधनविहीन आदिवासियों ने हर तरह से मज़बूत अंग्रेज़ों से इस देश के लिए लोहा लिए। हजारों लोगों ने वलिदान दिया । कार्ल मार्क्स ने कहा भी 1856 का आदिवासी-विद्रोह ही भारत की पहली जनक्रांति है , लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इसके एकसाल बाद 1857 के ग़दर को पहली क्रांति बताया गया । इस लड़ाई को भी मैं कमतर नहीं आंकना चाहता , लेकिन ज़रा तुलना कीजिये इस लड़ाई में संसाधन से भरपूर रजवाड़ों की भूमिका रही । लक्ष्मी बाई से कुछ भी कम वलिदान फूलो-झानो बहनों ने नहीं दिया , लेकिन इस आंदोलन को अंडरप्ले कर दिया गया । सिद्धो, कान्हो , चांद, भैरव समेत उनके साथियों को कभी राष्ट्रीय फ़लक पर चमकने नहीं दिया गया। फूलो-झानो का तो लोग नाम भी नहीं सुने हैं। अभाव, भूख़ और ग़रीबी से दो-चार होते हुए इन आदिवासी संतानों ने ज़िन्दगी की आहूति दी है। खनिज़ सम्पदा के खज़ाने पर ही ट्राइबल बैठे हैं । दोलामाइट, मैंगनीज, लौह अयस्क के दोहन के नाम पर आदिवासियों पर बहुत अत्याचार हुए हैं । कोयले के दोहन के नाम पर फ़िर एकबार ट्राइबल निशाने पर हैं। इसबार विदेशी कम्पनियों की दैत्याकार मशीनें गरजेंगी । पूरी दुनियामें कोल रिज़र्व के नाम पर भारत पांचवें स्थान पर है। फ़िर भी कोल माइनिंग हमारे यहां अधिक होती है। अन्य देश ऊर्जा के इस स्रोत को आनेवाली पीढ़ी के लिए छोड़ रहे हैं , लेकिन ज़रूरत का कोयला हमें मिलने के बावज़ूद एफडीआई के ज़रिए दरवाज़े खोल दिए गए हैं । झारखण्ड , ओडिशा और छत्तीसगढ़ के ट्राइबल एरिया में कोयले का यह भंडार है । कभी गंगा को धरा पर लाने के पहले भगीरथ दामोदर का ही चरण पघारने आए थे , आज उसी दामोदर के तट से लेकर ओडिशा स्थित चैतन्य की लीलाभूमि और छत्तीसगढ़ के दण्डकारण्य जहां श्रीराम चन्द्र के वनवास का बड़ा हिस्सा बीता था निशाने पर है ।

सबसे अधिक कोयला इसी इलाके में है । कोयले के इस दोहन में फ़िर एकबार विस्थापन का खतरा मंडराना स्वाभाविक है । आदिवासी कभी भीख नहीं मांगते । वे हाड़तोड़ मिहनत कर गुज़ारा करते हैं । आदिवासी कभी छल भी नहीं करते । वे अन्याय, ज़ुल्म , आबरू पर आंच के खिलाफ़ हल्ला बोलते हैं । वे बग़ावत करते हैं । महाश्वेता देवी की भाषा में बात करें तो इस व्यवस्था से वे सिर्फ़ दो वक़्त भोजन में घाटो और ढिबरी जलाने के लिए महुआ का तेल मांगे थे । वे जल-जंगल का अधिकार मांगे थे । अरण्य का अधिकार…जो ट्राइबल का हक है । वे कभी देश के खिलाफ़ नहीं रहे । पहली जनक्रांति में उनका नारा था, ‘ जुमीदार , महाज़न , पुलिस , राजदेन-आमला को गुज़ुकमाड़ ‘ अर्थात जमींदार, महाज़न , भ्रष्ट पुलिस और सरकारी अमलों का नाश हो…अपनी ही धरती पर वे असहाय बनते जा रहे हैं । कभी दलाल बरगलाते हैं तो कभी नक्सली…आदिवासी दिवस पर सत्ता से यह सवाल पूछा जाना ज़रूरी है कि सबकुछ उनके विस्थापन की कीमत पर ही क्यों ? प्रश्न पूछा जाना चाहिए व्यवस्था से कि क्या उन्हें उनका हक़ मिलेगा ? सवाल पूछा जाना चाहिए समाज से भी..असहाय ट्राइबल को देखने का नज़रिया आख़िर कब बदलेगा ? पूछा जाना चाहिए मानसिक नपुंसकता के शिकार कथित बौद्धिक समाज और मनोरंजन कराती मीडिया से भी … अब तक ज़वाब देनेवाले सवालों की सलीब पर टंगते आ रहे हैं ।

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