एक अंतहीन इंतजार…

बंशीधर जी रोजना रेलवे स्टेशन जाते है। स्टेशन पर ना तो उनकी नौकरी है और ना ही वहां पर वे वेण्डर है। फिर भी स्टेशन जाना इनका रोज का काम है। वे दोपहर 3 बजे आने वाली ट्रेन के आने से पहले स्टेशन पर आ जाते हैं, अपने बेटे को लेने के लिए। वो बेटा जो कभी नहीं आयेगा। बंशीधर जी का इकलौता बेटा पढ़ाई करने के लिए कुछ साल पहले शहर गया था। उनका बेटा सेमेस्टर पूरा कर ट्रेन से इसी सयम पर आता था। बंशीधर जी अपने बेटे को लेने के लिए हमेशा खुद ही आते थे। लेकिन पिछले साल उनका बेटा नहीं लौटा। क्यों कि पिछले साल एक बस दुर्घटना में कई यात्री जिंदा जल गए थे, उनमें बंशीधर जी का बेटा भी था। शिनाख्त भी नहीं हो पाई थी, उसके डाॅक्यूमेंट और निजी चीजों से ही पता चल पाया था। बंशीधर जी यह सुनते ही बेसुध हो गए, उन्हें बिल्कुल भी यकीन नहीं हुआ और सदमें में रहने लगे। तब से अपने बेटे के आने की चाह में रोजना स्टेशन आकर बैठ जाते हैं। घर परिवार वालों ने लाख समझाने की कोशिश की, पर बेसुध पिता इस सदमें से उबर नहीं पाया। अब हर रोज उनकी यही दिनचर्या रहती है। स्टेशन पर बैठे बैठे टक टकी लगाकर ट्रेन के आने का बेसब्री से इंतजार करते हैं। जैसे ही ट्रेन के आने का पता चलता है बंशीधर जी की उत्सुकता और बैचेनी बढ़ने सी लग जाती है। ट्रेन के नजदीक आने पर मन में थोड़ी सी उमंग भी जगती है, ‘‘कि आज मेरा बेटा इस ट्रेन से आएगा, तो उसका कान पकड़कर खूब डांटूंगा उसको। और पूछुंगा ‘‘तूने इतना इंतजार क्यों करवाया मुझसे?‘‘ ट्रेन के नजदीक आते ही, बंशीधर जी सदी निगाहों से हर डिब्बे को निहारना शुरू कर देते है। ट्रेन के रूकते ही वे अपने बेटे को तलाशते हैं, पूरी ट्रेन पर अपनी नजर दौड़ाते हैं, पर उनका बेटा कहीं पर भी नजर नहीं आता। ट्रेन चलने लगती है, चलती ट्रेन को भी बड़ी कौतूहलता से निहारते हैं पर उनका बेटा कहीं नजर नहीं आता। ट्रेन चली जाती है। हर बार की तरह बंशीधर जी का बेटा आज भी नहीं आया। बंशीधर जी अत्यन्त निराश, उदास हो जाते हैं, कुछ देर तक चिर मुद्रा में बैंच पर बैठे रहते हैं। फिर अपने आप को संभालते हुए, ढांढस बांधते हुए बेमन से घर की ओर चल पड़ते है। उनके मन में बस एक ही विचार रहता है ‘‘कि आज मेरा बेटा नहीं आया तो क्या हुआ? मैं कल फिर आउंगा, शायद कल वो आ जाए।” भारी मन से लौटते हुए भी वे जाते जाते स्टेशन पर आखिरी बार नजर दौड़ाते है, पर उन्हें उनका बेटा नजर नहीं आता। कल फिर स्टेशन आने और अपने बेटे को अपने साथ ले जाने के विचार के साथ वे अपने घर की ओर चल पड़ते हैं। उनका इंतजार ऐसा है जो कभी भी खत्म नहीं होगा। एक अंतहीन इंतजार।

लेखक धर्मेन्द्र मूलवानी 

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