सामुदायिक सदभाव का सही आधार

शंकर शरण

दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम मौलाना वस्तानवी के गुजरात सम्बन्धी बयान को दूसरी तरह भी देखा जा सकता है। अब दो राय नहीं रह गई है कि पिछले नौ वर्ष में उस राज्य की सामाजिक-आर्थिक प्रगति स्पृहणीय है, कि हिन्दू-मुस्लिम दोनों उससे संतुष्ट हैं और अपने-अपने काम-धंधे लगे हैं। सामुदायिक सहयोग की यही भावना पूरे देश में बने, और स्थाई रूप ले, यह सभी चाहते हैं। वस्तानवी की बातों का यह भी अर्थ निकलता है। यदि ऐसा है, तो वह पाने का  मार्ग क्या है?  

कविगुरू रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 1923-24 ई. के बीच कुछ व्याख्यानों में इस समस्या पर विस्तार से विचार किया था। संदर्भ थाखलीफत और असहयोग की विफलता और उस के परिणाम। यह व्याख्यान समस्या, समस्या का समाधान, स्वराज साधन, शीर्षकों से उपलब्ध हैं। प्रथम व्याख्यान में टैगोर एक वास्तविक दृष्टांत देकर कहते हैं, मेरे मित्र सीमाप्रांत [अब पाकिस्तान] में नियुक्त थे। वहाँ पठान आक्रमणकारी कभी-कभी हिन्दू बस्तियों पर टूट पड़ते और स्त्रियों को पकड़ ले जाते। एक बार ऐसी ही किसी घटना के बाद मेरे मित्र ने एक स्थानिक हिन्दू से पूछाः ऐसा अत्याचार तुम कैसे सहते हो?’ उसने अत्यंत उपेक्षा से उत्तर दियाः वह तो बनिए की लड़की थी। बनिए की लड़की हिन्दू है, उसके अपहरण के प्रति उदासीन व्यक्ति भी हिन्दू है। दोनों में शास्त्रगत योग हो सकता है लेकिन प्राणगत योग नहीं है। एक पर आघात होता है तो दूसरे के मर्म तक आवाज नहीं पहुँचती।”   

टैगोर द्वारा वर्णित सौ वर्ष पहले की यह दुरअवस्था क्या बदली है? उपर्युक्त प्रसंग हिन्दू समाज में जाति भेद की दुर्बलता दर्शाता है। किंतु दुर्बलता केवल जाति-गत नहीं थी। गैर-बनिए हिन्दू भी मन में जानते थे कि वे भी सुरक्षित नहीं। यह भी जानते थे कि उनका ईश्वर और अंग्रेज पुलिस के सिवा कोई सहारा नहीं। फिर भी, जब तक बनिए की लड़की उठाई जाती रही, वे मुँह छिपा कर अपनी प्रतिष्ठा बचाने की भंगिमा बनाते थे। इस प्रकार, स्वयं भी धोखे में रहते थे। अंततः 1947 में सभी मारे गए, भागे या धर्मांतरित होकर खत्म हुए। 

क्या आज भी कश्मीर, केरल या असम के हिन्दुओं के लिए शेष भारत के हिन्दुओं की मनःस्थिति उससे कुछ अच्छी है? कश्मीर से पूरी हिन्दू जनता को सामूहिक नरसंहार, खुली चेतावनी, असह्य अपमान आदि द्वारा मार भगाया गया। पूरा भारत इसे देखता रहा। बल्कि देख कर अनदेखा करता रहा। जबकि देश स्वतंत्र है। लाखों की सेना, अत्याधुनिक सैन्य शक्ति है। किंतु संग्रामपुरा, पुलवामा, नंदीमर्ग, ऊधमपुर, रजौरी जैसे अनगिन स्थानों पर सामूहिक हिंदू नरसंहार होते रहे। इस ने शेष भारत के हिन्दुओं को उद्वेलित नहीं किया। वे अपने को समझाते रहे कि यह तो आतंकवाद है, हम क्या कर सकते हैं। यहाँ तक कि एक बार देश के गृह-मंत्री तक ने बयान दिया कि सरकार कश्मीर में अब भी बचे हिंदुओं की सुरक्षा की गारंटी कैसे कर सकती है?’ यह एक हिन्दूवादी कहे जाने वाले मंत्री का बयान था!

इसी तरह, असम के हिन्दू अपने को लुप्त होने वाली जाति समझने लगे हैं, जिन्हें बंगलादेश से आने वाले मुस्लिम घुसपैठिए धीरे-धीरे खदेड़ रहे हैं। इसे रोकना तो दूर, स्वयं सत्ताधारी नेता उन्हीं घुसपैठियों के सरपरस्त बनने की प्रतियोगिता कर रहे हैं। नेताओं में अधिकांश हिन्दू हैं। यही स्थिति बंगाल, केरल, बिहार जैसे अनेक प्रांतों में है। 

स्पष्ट है कि हिन्दू समाज आज भी विखंडित और दुर्बल है। बाहरी दुनिया भारतीयऔर हिन्दू में अंतर नहीं करती।  क्योंकि भारत व्यवहारतः हिन्दू समाज ही है। और यही समाज बुरी तरह  विखंडित, दुर्बल और आत्महीन है। इस मनोगत दुर्बलता का उपाय सेना से नहीं हो सकता। हिन्दुत्व की दार्शनिक श्रेष्ठता के अपने मुँह बखान से और नहीं। क्योंकि इन सबके रहते भारत भौगोलिक रूप से संकुचित, अतिक्रमित हो रहा है। आतंक से आक्रांत हो रहा है। अंदर-बाहर से चौतरफा आक्रमण हो रहे हैं। हिंसक और वैचारिक-सांस्कृतिक आक्रमण भी। किंतु इनसे लड़ने की कोई इच्छा राजनीतिक, बौद्धिक वर्ग में नहीं है। बनिए की बेटी की तरह वे किसी न किसी बहाने इसकी चर्चा तक से कतराते हैं। आक्रमणकारियों का मुकाबला तो दूर रहा। ले-देकर सरकार की जिम्मेदारी कह दी जाती है।

किंतु यह सीधा भगोड़ापन है। क्योंकि जिस कष्ट से हमें सचमुच चिंता होती है, उसके लिए हम बयान देकर या निवेदन कर बैठ नहीं जाते। उसके लिए दौड़-भाग, सिफारिश और चीख-पुकार तक सब कुछ करते हैं। यह केवल वैयक्तिक नहीं, सामाजिक मामलों में भी होता है। पिछड़े वर्गों का आरक्षण या विरोध, बेस्ट बेकरी के अपराधियों को सजा दिलाना, आदि कई मामलों में देखा गया कि जिस लक्ष्य को हम सचमुच पाना चाहते हैं, उसके लिए स्वयं उठते हैं। केवल निवेदन कर चुप नहीं रहते।

अतः यह कटु सत्य है कि कश्मीरी या असमी हिन्दुओं के मान-सम्मान या जीवन-रक्षा के लिए शेष भारत में कोई प्राणगत योग नहीं है। यह अनैक्य हिन्दू समाज की मूल दुर्बलता है। इसे रवीन्द्रनाथ ने ही नहीं, स्वामी विवेकानंद, शरतचंद्र, श्री अरविन्द प्रभृत अनेक मनीषियों ने देखा था। यह दुर्बलता स्वतंत्र भारत में दूर होने के बदले बढ़ी है। स्वयं जाँच लें। परतंत्र भारत में सामाजिक समस्याओं पर जो बातें हमारे मनीषियों ने कही थी, आज उन्हें उद्धृत करना भी मना हो गया है। स्वामी दयानंद, बंकिमचंद्र, विवेकानंद, श्रीअरविन्द, शरतचंद्र, रवीन्द्रनाथ, लाला लाजपत राय, सावरकर – यहाँ तक कि महात्मा गाँधी और डॉ. अंबेदकर – तक की अनेक सुचिंतित बातें अब छिपाई  जाती हैं। वह बातें आज भी प्रासंगिक हैं, किंतु उनके उल्लेख पर अघोषित प्रतिबंध है। इसके पीछे हिन्दुओं की वही भीरुता है जिसे मिटाने का उन मनीषियों ने निरंतर आह्वान किया था।

उदहरणार्थ, रवीन्द्रनाथ उसी व्याख्यान में कहते हैं, विशेष प्रयोजन न होने पर भी हिन्दू एक-दूसरे पर आघात करते हैं, और प्रयोजन होने पर भी किसी परकीय पर आघात नहीं करते। इसके विपरीत मुसलमान प्रयोजन न होने पर भी अपनी रक्षा के लिए एक हो जाते हैं और प्रयोजन हो तो दूसरों पर तीव्र आघात कर सकते हैं। इसका कारण यह नहीं कि मुसलमान का शरीर ताकतवर है, हिन्दू का शरीर कमजोर; कारण यह है कि मुसलमानों का समाज शक्तिशाली है, हिन्दुओं का नहीं। एक पक्ष आभ्यंतरित रूप से प्रबल है, दूसरा निर्जीव। क्या आज कोई बुद्धिजीवी या नेता टैगोर की यह बात उद्धृत कर सकता है?

अर्थात, सौ वर्ष पहले वाली मनःस्थिति आज भी यथावत है। कश्मीर और गुजरात पर हिन्दुओं और मुसलमानों के समाज की क्रिया-प्रतिक्रिया इसका जीवंत उदाहरण है। हिन्दू समाज का एक हिस्सा निर्बल, उद्देश्यहीन हिन्दू संगठनों पर जितना आधात करता है, उसका शतांश भी कश्मीर के जिहादियों-अलगाववादियों पर नहीं। अभी श्रीनगर में राष्ट्रीय झंडा फहराने वाले प्रसंग में भी हिन्दू बौद्धिकों का मौन उसी का उदाहरण था। दूसरी ओर, उदारवादी मुस्लिम भी इस्लामी आतंकवादियों तक को किसी न किसी प्रकार ढाल देने में संकोच नहीं करते। क्या यह रवीन्द्रनाथ वाली बात ही नहीं है?

यह परिदृश्य हमारे सत्ताधीशों का मनोबल भी गिराता है। किसके बल पर वे कठोर कदम उठाने की सोचें? तीखा शोर-शराबा करने वाला छोटा सा गिरोह किसी मंत्री को अपदस्थ करवा सकता है। सुप्रीम कोर्ट से अपना फैसला संशोधित करवा सकता है। इसीलिए हर तरह के उग्रवादी अपने दाँव बढ़ा रहे हैं। कश्मीर, असम को भारत से अलग करने के मंसूबे तेज होते हैं। अंदर-बाहर भारत सरकार को नसीहतें और निर्देश देने वाले बढ़ते हैं।

राष्ट्रीय राजनीति समर्पण की मुद्रा में चलती दिखती है। देश की नीति-निर्मात्री समितियों में नक्सली समर्थक पहुँचे हुए हैं। एक लश्करे-तोयबा द्वारा मुंबई में किए आतंकी हमलों को हिन्दुओं द्वारा किया बताता है। दूसरे एक समुदाय विशेष का देश के संसाधनों पर पहला अधिकार बताते हैं। तीसरे हिन्दू संगठनों को प्रतिबंधित करने की माँग करते हैं। चौथे राम-सेतु को तोड़कर पैसा बनाने की योजना गढ़ते हैं। पाँचवें असम और बंगाल में बाहरी घुसपैठियों को संवैधानिक अधिकार देने का प्रबंध करते हैं। छठे मदरसों के हानिकारक पाठ को भी शिक्षा की डिग्रियों जैसी मान्यता देते हैं। उपर्युक्त कोई भी माँग या कार्य पाँच दशक पहले नहीं हो सकता था। तब आज क्या बदल गया है? जो बदला है उसे संसद में किसी राष्ट्रवादी-सेक्यूलर दल की दो सौ सीट होने या कई राज्यों में सरकार रहने से भी कुछ फर्क नहीं पड़ता। यह भारतीय राजनीति में उभरने वाला एक नया, प्रबल, किंतु चिंताजनक तत्व है। यह यहाँ के दो प्रमुख समुदाय के सामाजिक बल में आया बदलाव है।

खिलाफत-असहयोग आंदोलन के समय गाँधीजी ने एक वर्ष में स्वराज्य पा लेने का दावा किया था। जब वह बुरी तरह विफल हुआ, तो कैफियत दी गई कि विफलता का कारण हिन्दू-मुस्लिम एकता का अभाव था। इसकी आलोचना करते टैगोर ने कहा था कि यह तो कोई कैफियत नहीं हुई, यह तो समस्या को ही दूसरे रूप में रख देना हुआ। यह तो सब जानते हैं कि एकता हो तो स्वराज स्वतः आ जाएगा। फिर टैगोर ने समझाया कि उपरी प्रसाधन, वार्ता या मुस्लिम माँगों की मनमानी पूर्ति आदि से एकता नहीं बन सकती। उन्होंने बल देकर कहा कि जब तक हिन्दुओं का सामाजिक बल मुस्लिमों के सामाजिक बल की तुलना में कमजोर रहेगा, तब तक दोनों में वास्तविक समानता का संबंध नहीं बन सकता। एक हिन्दू को मार भगाने, अपमानित करने पर दूसरे हिन्दू को वह चोट नहीं लगती, जो बिना किसी चोट के भी हरेक मुस्लिम को दूसरे मुस्लिम के लिए एक बनाए रखती है। जब तक यह विषम स्थिति है, तब तक हिन्दू सामाजिक बल में मुस्लिमों से दुर्बल रहेंगे। तब तक वास्तविक सामुदायिक मैत्री नहीं बनेगी।

वह स्थिति भारत में आज भी यथावत है। क्या गुजरात उसका अपवाद है? क्या इसीलिए नरेंद्र मोदी पर स्थाई निशाना सधा हुआ है? और, क्या इसीलिए वहाँ वास्तविक सामुदायिक शांति बनी हुई है? क्या इसलिए भी हर क्षेत्र के बुद्धिमान लोग अतीत को भूल कर आगे की सुध लेने की बात कर रहे हैं? हम नहीं जानते, किन्तु गुजरात के प्रसंग से पूरे भारत के लिए बहुतेरी सीख है। सभी के लिए समान अवसर वाले विकास के लिए भी, और सच्चे सामुदायिक सहयोग के निर्माण के लिए भी। 

3 thoughts on “सामुदायिक सदभाव का सही आधार

  1. “एक हिन्दू को मार भगाने, अपमानित करने पर दूसरे हिन्दू को वह चोट नहीं लगती, जो बिना किसी चोट के भी हरेक मुस्लिम को दूसरे मुस्लिम के लिए एक बनाए रखती है।”
    शकर शरण जी ने मरनोंमुखी हिन्दू समाज की दुर्दशा का यथार्थ चित्रण कर दिया है अत्यंत खेद का विषय है की हिन्दू समाज का शिक्षित वर्ग हिन्दुओं के आसन्न विनाश की ओर से ऐसा उदासीन है जैसे उसका इस से कोई सरोकार न हो . पाकिस्तान तथा बंगलादेश में हिन्दुओं की जो परिणति हुई उसकी तरफ हम देखते तक नहीं. “पश्यन्नपि न च पश्यति मूढ़”
    देश की जनसँख्या का ८५ प्रतिशत हिन्दू होते हुए भी सत्ता हिन्दूद्रोहिओं के हाथ में है और देश का सूचना तंत्र, शिक्षा तंत्र भी वही चलाते हैं मूल baat यह है की aaj का हिन्दू अपने आप को हिन्दू समाज का अंग नहीं समझता और कोई राजनेता, समाज् नेता या dharmaacharya ऐसे मुद्दों को uthata ही नहीं

    प्रश्न यह है हम इस दशा को किन कारणों से प्राप्त हुए और उस से भी अधिक महतवपूर्ण यह है की संकट का प्रतिकार करने के लिए हमें क्या करना आवश्यक है इस विषय पर एक देशव्यापी चर्चा होनी चाहिए हम शंकर शरण जी के आभारी हैं जिन्हों ने यह लेख भेज कर इस आवश्यक परिचर्चा के आरम्भ की भूमि प्रस्तुत कर दी हम हिंदी मनिशिओन से आशा रखते हैं की वे इस चर्चा को आगे barhayenge

  2. बहुत बहुत आभार
    शक्ति शोर्य पराक्रम जितने शारीरिक शक्ति पर निर्भर करते है उससे कही ज्यादा बीते इतिहास पर निर्भर करते है क्योंकि हाथी में शारीरिक शक्ति होते हुए भी उसका इतिहास उसके उपयोग की प्रेरणा नहीं देता
    ठीक इसी द्रष्टान्त को ध्यान में रखकर अंग्रेजो ने जो भारत का इतिहास बनाया वो भारतीयों की कायरता पराधीनता सहनशीलता का एक प्रारूप है वो इतिहास पढ़कर किसी भारतीय(हिन्दू ) में रक्त का उबाल उठे ये असंभव है
    और इस असंभव को संभव करने के लिए पहले वास्तविक इतिहास को सामने रखना होगा ……
    धन्यवाद

Leave a Reply

%d bloggers like this: