शिव शरण त्रिपाठी
 २४/२५ नवम्बर को अयोध्या में एक बार पुन: रामभक्तों का सैलाब भले ही शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के आगमन व बड़ी संख्या में शिव सैनिकों की उपस्थित और विहिप, संघ जैसे हिन्दू संगठनों के आवाहन पर उमड़ा पर इसमें क्या किसी को शंका है कि जनसैलाब सिर्फ  दिखावे के लिये एक जुट था!पर यह भी सच है कि अयोध्या में जमावड़ा कर सरकार को ललकारने की बजाय, सुप्रीम कोर्ट की उदासीनता की निंदा करने की बजाय संसद का घेराव किया गया होता, सुप्रीम कोर्ट पर प्रदर्शन किया गया होता तो उक्त ताजे जमावड़े का संदेश और असरकारी होता और वांछित व सकारात्मक परिणाम मिलने की स्थिति बनती।निश्चित ही शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे २४ नवम्बर को परिवार व अपने समर्थकों की भीड़ के साथ पहली बार तब अयोध्या में दाखिल हुये जब २०१९ के आम चुनाव नजदीक है।वर्तमान में राममंदिर आंदोलन के एक प्रमुख पैरोकार सम्प्रति रामजन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपालदास की उपस्थित में केन्द्र सरकार को ललकारने में उन्होने कोई चूक नहीं की। गरजे कि सरकार बताये कि वो कब तक राम मंदिर का निर्माण करेंगी। पूर्ण बहुमत से सत्ता मेंं आई सरकार को चार साल बीत गये पर मंदिर क्यों नहीं बना? यदि केन्द्र सरकार मंदिर के लिये संसद में विधेयक लाती है तो शिवसेना उसका समर्थन करेंगी आदि-आदि।हिन्दुत्व का राग अलापकर महाराष्ट्र में अपनी ताकत बढ़ाने व सत्ता में भागीदारी निभाने वाले शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे कभी भी अयोध्या की धरती पर नहीं आये और उनके सुपुत्र उद्धव ठाकरे भी अब आये जब २०१९ का चुनाव सिर पर है।सवाल यह है कि जब उन्हे सरकार से सिर्फ  तारीख ही पूंछनी थी तो यह कार्य तो वह दिल्ली में रैली कर, कर सकते थे। या  फि र अपने अखबार सामना के माध्यम से भी इस सवाल को उठा सकते थे और यदि उन्हे रामलला के दर्शन ही करने थे तो चार साल पहले या दौरान कभी भी आकर कर सकते थे। ऐसे में वो भाजपा को घेरते-घेरते खुद सवालों के घेरे में आ गये।
२४ नवम्बर के बाद २५ नवम्बर को विश्व हिन्दू परिषद, संघ व अन्य अनुषागिंक संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित धर्म सभा में साधु संतों के जमावड़े व लाखों राम भक्तों की भीड़ के बीच जहां सरकार पर आम चुनाव के पूर्व हरहाल में राम मंदिर बनाने का दबाव बनाया गया वहीं मुस्लिम समुदाय व बाबरी मस्जिद के पक्षकारों को चेताया गया कि वे स्वैच्छा से राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ  कर दें। यदि अध्यादेश लाकर मंदिर निर्माण की नौबत आई तो फि र अयोध्या ही नहीं काशी, मथुरा भी लेगें। यहां भी वही प्रश्न उठता है कि आखिर धर्म सभा उस दिल्ली में क्यों नहीं आयोजित की गई थी जहां सरकार व सुप्रीम कोर्ट दोनो मौजूद हैं या फि र ऐसा दबाव उसी समय से क्यों नही बनाया गया जिस दिन से भाजपा पूर्ण बहुमत से केन्द्र की सत्ता में आई थी।क्या विहिप, संघ व हिन्दू संगठनों के साथ रामजन्म भूमि के पैरोकारों को मालूम नहीं था/है कि चाहे भाजपा, चाहे कांग्रेस व चाहे अन्य दल रहे हो उन्हे राम मंदिर से कहीं अधिक सत्ता प्यारी रही है। यदि ऐसा न होता तो भाजपा सत्ता में आते ही अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण करा चुकी होती। यदि ऐसा न होता तो कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट मेें मंदिर मामले की सुनवाई २०१९ के आम चुनाव तक टालने का बार-बार दबाव नहीं बनाती।राम मंदिर को  लेकर लड़ाई तो उसी दिन शुरू हो गई थी जिस दिन सिद्ध संत व राम लला मंदिर के मुख्य पुजारी मंहत श्याम नंद जी के शिष्य बने विश्वासघाती जलाल शाह ख्वाजा ने मीरबाकी को उकसाकर राम मंदिर ध्वस्त कर व मजिस्द बनाने का ताना-बाना बुना था। इतिहास गवाह है कि १५२८ में मीरबाकी के मंदिर पर हमला बोलने के पहले ही महंत श्याम नंद जी राम लला की मूर्तियां सरजू नदी में प्रवाहित कर कदाचित हिमालय पर तपस्या हेतु चले गये थे। इसके बाद मीरबाकी ने हमला कर मंदिर के बचे चार पुजारियों के सिर काटकर रक्त की धारा बहा दी थी। संयोग वश इस मार्मिक घटना का पता चलते ही भीटी के राजा महताब सिंह अपनी सेना व राम भक्तों के साथ मीरबाकी की सेना से भिड़ गये। बताते है कि यह युद्ध ७० दिनों तक चला था जिसमें राजा साहब महताब सिंह सहित १,७४००० लोगों की जाने गई थी और उसके बाद ही मीरबाकी ने तोपों से मंदिर ध्वस्त कर मंदिर के अवशेष पर ही मस्जिद तामिर करवा दी थी।राममंदिर ध्वस्त होने के बाद १८५७ की क्रांति तक हिन्दुओं ने दर्जन से अधिक बार राममंदिर कब्जे को लेकर भीषण लड़ाईयां लड़ी जिसमें भी लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी। इन लड़ाइयों में जहां साधू संतों की अगुवाई रही वहीं वीरागंनायें भी अपने प्राणों की आहुति देने में पीछे नहीं रही। कू्रर मुगल शासक औरंगजेब के शासन में उसकी शाही सेना को चिमटाधारी संयासियों ने परास्त ही नहीं किया था वरन् उसके सेनापति को भी मार गिराया था। कई अवसर आये जब हिन्दुओं ने रामलला मंदिर पर कब्जा कर लिया पर ताकतवर आतताई मुगल शासकों के सामने कब्जा स्थाई न रह सका। फ लत: मंदिर निर्माण का सपना अधूरा ही रह गया।राम मंदिर विवाद को अंग्रेजों ने उलझाने का ही काम किया। अंग्रेज चाहते तो यह मामला १८८५ में अदालत में पहुंचने के पहले ही हल हो गया होता। इतिहास का निर्मम सत्य तो यह है कि एक समय जब अंग्रेजों ने यह देखा कि यह मंदिर विवाद मंदिर के पुजारी व मस्जिद के मुतवल्ली की समझदारी से कभी भी निपट सकता है तो उन्होने संगीन आरोप मढ़कर पुजारी व मुतलवल्ली को  पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी ताकि दुबारा इस विवाद में कोई पड़े ही नहीं।  उधर १८८५ में महंत रघुबरदास द्वारा फैजाबाद की अदालत में बाबरी मस्जिद से लगे राम मंदिर निर्माण की इजाजत के लिये जो मुकदमा दायर किया गया वो मामला अदालती लड़ाई में ही  फंस कर रह गया। भला अंग्रेज न्यायाधीश मंदिर के हक में कहां  फैसला सुनाने वाले थे सो यह मामला अधर में लटका रहा।उम्मीद थी कि देश आजाद होने के बाद अदालत के  फैसले  की जरूरत ही न रह जायेगी और सरकार स्वयं राम मंदिर का भव्य निर्माण करा देगी पर यह सपना धरा का धरा रह गया। कभी अदालती लड़ाई के नाम पर तो कभी वोटों के चलते राम मंदिर निर्माण को लेकर टोटके तो खूब किये गये पर ७० सालों बाद भी मंदिर निर्माण की नौबत न आ सकी।राजनीतिक दलों ने इसे वोटों का सशक्त हथियार ही मान लिया। संविधान की आड़ में मंदिर की रक्षा के लिये मुलायम सिंह यादव ने १९९० में कितने राम भक्तों को गोलियों से भुनवा डाला इसे यहां दोहराने की जरूरत नहीं है। निर्दोष राम भक्तों को गोलियों से छलनी करवाने का मुलायम सिंह यादव को भरपूर लाभ मिला और वो उत्तर प्रदेश की सत्ता में अनेक बार लौटे। कालांतर में उन्हे मुस्लिमों का सच्चा पैरोकार मान लिया गया। जुर्रत देखिये यादव जी आज भी खासकर चुनाव के समय मस्जिद बचाने हेतु राम भक्तों को गोलियों से छलनी कराने के अपने घृणित कारनामों का प्रश्चाताप करने की बजाय गर्व से उसे अपनी उपलब्धि बताने में जरा भी संकोच नहीं करते।कालचक्र ने भाजपा के उन रामभक्त मठ्ठाधीशों/नेताओं की कलई भी खोलकर रख दी है। जो एलके आडवाणी, कभी सोमनाथ से रथयात्रा लेकर मंदिर निर्माण को निकले थे, जो कल्याण सिंह बाबरी मस्जिद ध्वंस पर सत्ता गवाने के बाद बोले थे राम लला के लिये एक नहीं ऐसी हजारों सरकारें कुर्बान है। उमा भारत जो राम मंदिर निर्माण के लि ये प्राण न्यौछावर तक की धमकी दिया करते थी। जब रायबरेली की अदालत ने मुकदमा चला तो इन सभी के पैर कांपते दिखे थे। श्री आडवाणी ने गृहमंत्री की कुर्सी बचाने हेतु मुकदमें से अपना नाम ही निकलवा दिया था। कल्याण सिंह ने जब भाजपा छोड़कर सपा का दामन थामा तो बार-बार मंचों से रोते थे, हां उन्होने मस्जिद गिरवा कर पाप करने की भूल की थी। अटल बिहारी बाजपेयी की अगुवाई में भाजपा नीत राजग सरकार बनने पर जब भी राम मंदिर निर्माण की याद दिलाई जाती रही तब-तब भाजपा नेताओं द्वारा यही राग अलापा जाता रहा कि जिस दिन भाजपा की पूर्ण बहुत से केन्द्र में सरकार बनेगी उसी दिन राम मंदिर बन जायेगा।२०१४ में वह समय भी आ गया। भाजपा प्रंचड बहुमत से सत्तासीन हो गई और देखते ही देखते चार साल बीत गये पर राम मंदिर बनाना तो दूर उसकी चर्चा तक से बचते रहे। कई बार तो यहां तक कहा गया कि राम मंदिर मुद्दा भाजपा के एजेन्डे में है ही नहीं। और अब जब चुनाव सिर पर आ गये तो सरकार में बैठे ओहदेेदारों की ओर से भी राम मंदिर निर्माण की प्रतिबद्धता जतायी जा रही है।संविधान/न्याय की दुहाई देने वाले देश के मूर्धन्य न्यायाधीशों ने ही यदि राम मंदिर निर्माण को लेकर प्रतिबद्धता दिखाई होती तो यह विवाद कब का निपट गया होता। और आज मुख्य न्यायाधीश की मंशा पर सवाल तो न ही उठत।जिस शीर्ष अदालत की निगाह में राम मंदिर मुद्दा वरीयता में ही न हो तो सीधे-सीधे यह कहने में कोई हिचक नहीं होती कि ऐसे न्यायाधीशों को न तो देश दुनिया के करोड़ों हिन्दुओं की आस्था की चिंता है और न ही उस प्रभु श्रीराम की जिनके नाम पर संविधान बनाने वाले शपथ लेते रहे हैं और जिनके नाम पर मोक्ष की कामना की जाती है।निश्चयेन जब भविष्य में इस काल खण्ड का इतिहास लिखा जायेगा तो हर जगह, हर मोड़ पर सिर्फ  सच को ही सलीब पर चढ़ा पाया जायेगा और उन चेहरों पर कालिख पुती नजर आयेगी जो सिर्फ  अपने स्वार्थ, अपनी सत्ता अक्षुण रखने के लिये श्रीराम की सत्ता को नकारने का घृणित कार्य करते रहे हैं।
और हमने भी अपनी अस्मिता बेच डाली!
बहुतों को याद भी नहीं होगा कि २६ नवम्बर २००८ को ऐसा भयावह आतंकी हमला हुआ था जिसमें १६६ निर्दोष लोगों को प्राण गवाने पड़े थे और सैकड़ों घायल हो गये थे। जिनमें से भले ही कईयों का जीवन तो बच गया था पर वे चलने फि रने लायक नहीं रहे। पर वे देखने सुनने लायक नहीं बचे।दस खूंखार पाकिस्तान के आतंकियों द्वारा मुंबई में अंजाम दिये गये दुनिया के इस क्रूरतम आतंकी हमले में मरने वालों के अनेक अनाथ बच्चों को अपने मां-बाप का चेहरा तक याद नहीं है तो अनेक दुनिया में आने से पहले (जो गर्भ में थे) ही अपना अस्तित्व खो बैठे थे।सुरक्षाबलों के हमारे जांबाज जवानों ने अंतत: अपनी शहादत देकर १० में से ९ आतंकियों को जहां मौत के घाट उतार दिया था वहीं अजमल कसाब नामक एक आतंकी को जिंदा पकडऩे में भी कामयाबी हासिल की थी। अजमल कसाब को सजा-ए-मौत के मामले में किस हद तक घृणित राजनीति हुई थी उसको यहां पुन: व्याख्यायित करने का कोई औचित्य नहीं है पर इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि सारे सबूतों, तथ्यों के बावजूद अजमल कसाब को फांसी पर लटकाये जाने में सरकार को ४ साल से अधिक लग गये थे।उसके बाद पूरी तरह खुलासा हो जाने के बाद कि उक्त घृणित व भयावह हमले की साजिश पाकिस्तान में ही रची गई थी और उसके प्रमुख सूत्रधारों में लश्कर-ए-तैयबा फि र जमाउतदावा का मुखिया हाफिज सईद, अमेरिकी मूल का डेविड कोलमैन हेडली, तहव्वुल राणा के साथ ही आतंकी संगठनों को धन उपलब्ध कराने वाला सलाउद्दीन भी शामिल था।भले ही डेविड अमेरिका की एक जेल में बंद है और उसे ३५ साल की सजा दी गई है। किन्तु भारत सरकार उसे भारत नहीं ला सकी  है। तहव्वुराणा भी भारत नहीं लाया जा सका है। जहां तक मुख्य साजिश कर्ता हाफि ज सईद का प्रश्न है वो आज भी खुलेआम पाकिस्ताान में न केवल घूम रहा है वरना वो राजनीतिक दल बनाकर हाल ही में अपने प्रत्याशियों को खुलेआम चुनाव भी लड़वा चुका है। वो सरे आम कश्मीर लेने व भारत को बर्बाद करने की धमकी देता नजर आता है। पाकिस्तान के खूंखार आतंकी संगठनों में शामिल लश्कर-ए-तैयबा, जमाउतदावा सहित कई आतंकी संगठनों पर अमेरिका प्रतिबंध लगा चुका है। भारत में २६/११ हमले के साजिशकर्ताओं व हमले में शामिल लोगों के बारे में अतिरिक्त सूचना देने वालो ंको अमेरिका ने ५० लाख डालर के ईनाम की भी घोषिणा की है। स्वयं राष्ट्रपति ट्रंप पाकिस्तान पर लगातार हमलावर है और उस पर लगातार आर्थिक शिकंजा भी कस रहे हैं ।
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान की रीढ़ तोडऩे का हर भरसक प्रयास करने का दावा करते है। उनके प्रयासों का काफ ी कुछ असर भी दीखने लगा है। पाकिस्तान जिस तरह आर्थिक दिवालियेपन की कगार पर जा खड़ा हुआ है तो निश्चित ही उसकी यह हालत भारत के वैश्विक प्रयासों का ही नतीजा है।
बावजूद इनके यदि १० वर्षो में भारत सरकार २६/११ के उपरोक्त साजिशकर्ताओं को दण्डित नहीं कर सकी है तो उसके लिये सिर्फ  और सिर्फ  हमारी सरकारें ही जिम्मेदार रही है। यदि ऐसा न होता तो अब तक साजिश कर्ता या तो फांसी के फंदें पर चढ़ चुके होते या ताजीवन कारावास की सजा भुगत रहे होते।कसाब को  फांसी से बचाने व  फांसीके बाद वैसी घृणित राजनीति तो नहीं देखने को मिली जैसी की संसद के हमले के दोषी अफ जल गुरू को  फांसी पर चढ़ाने के पूर्व व बाद में देखने को मिली थी। पर कल आतंकी हाफि ज सईद को हाफि ज सईद जी कहने वाले दिग्विजय सिंह और अब उसी हाफि ज सईद के संरक्षकों पाक के प्रधानमंत्री इमरान व सेनाध्यक्ष बाजवा से बार-बार हाथ मिलाने को आतुर कांग्रेस के नवजोत सिंह सिद्धू जैसे नेताओं का कांग्रेस आलाकमान द्वारा संरक्षण देना क्या अप्रत्यक्षत: आतंकियों की पैरवी करने व आतंक को बढ़ावा देने के समान नहीं हैं।वास्तविकता यही है कि भारत ने वोटों के लिये राजनीतिक दल किसी हद तक जा सकते हैं। कभी मध्यमार्गी रही कांग्रेस सत्ता की लालच में किस हद तक बाममार्गी हो गई, किस हद तक उसने अल्प संख्यक वोटों के लिये बार-बार सारी हदें पार की थी व करती रही थी किसी से छिपा नहीं है।कालांतर में संविधान में यदि ‘धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ा गया तो उसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ थे। इस बहाने जहां सनातनी हिन्दुओं को पग-पग पर लज्जित, लांछित  व प्रताडि़त किये जाने की शुरूआत की गई वहीं अल्पसंख्यक वोटों के लिये खासकर मुस्लिम जमात के वोटों के लिये धर्मनिरपेक्षता के बहाने कांग्रेस सहित अनेक क्षेत्रीय दलों ने उनकी मनमानी पैरवी व उन्हे उचित/अनुचित लाभ पहुंचाने की परम्परा की शुरूआत कर दी।संविधान के धर्मनिरपेक्ष होने से देश ऐसा धर्मनिरपेक्ष बना कि एक-एक कर स्थापित मान्यतायें व हिन्दुत्व की सारी परिभाषायें ही बदल डाली गई और अंतत: वोटों के इस खेल ने हिन्दुओं व मुस्लिमों के बीच खाई इतनी चौड़ी कर दी कि देश में साम्प्रदायिक दंगों की पुन: नीव पड़ गई। चूंकि स्वार्थवश राजनीति के खांचों में बंटकर हमने सच से आंखे मूंद ली तो यही हश्र होना ही था।अब भी समय है हम सभी देशवासी धर्मनिरपेक्ष की बजाय संविधान में ‘राष्ट्रवाद’ शब्द को जोडऩे का आंदोलन छेड़े तभी समाज व देश को वोटों के सौदागारों से मुक्त मिल सकेगी। कहीं अधिक एकजुटता से हर समस्या या मुकाबला व समाधान कर सकेगें।

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