“ब्रह्मसमाज की अवैदिक व अव्यवहारिक मान्यतायें और आर्यसमाज”

मनमोहन कुमार आर्य,

महर्षि दयानन्द ने आर्यसमाज की स्थापना सन् 1875 में मुम्बई में की थी। उन्होंने सन् 1863 से वेद व वैदिक मान्यताओं का प्रचार आरम्भ कर दिया था। वह वेद विरुद्ध मान्यताओं व सिद्धान्तों का खण्डन करते थे। उनका उद्देश्य असत्य को छोड़ना व छुड़ाना तथा सत्य को स्वीकार करना व कराना था। इसके लिये वह किसी भी मत के आचार्य से वार्तालाप व शास्त्रार्थ करने के लिये उद्यत रहते थे। उन्होंने अपने किसी विचार व मान्यता को कभी झुपाया नहीं और अपनी सभी मान्यताओं व सिद्धान्तों को सत्य की कसौटी पर कस कर उसे सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया। सभी मतों के विद्वानों को उन्होंने वेद व आर्यसमाज के सिद्धान्तों पर आपत्ति व खण्डन का अवसर दिया। उनकी सभी मान्यतायें अकाट्य थीं। यही कारण है कि किसी मत का कोई विद्वान उनके सामने शंका समाधान व शास्त्रार्थ के लिए उद्यत नहीं होता था। ऋषि दयानन्द ने अपनी प्रमुख मान्यताओं का दो लघु ग्रन्थ स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश और आर्योद्देश्यरत्नमाला नाम से प्रकाशित किये। प्रथम लघु ग्रन्थ में उनकी लगभग 51 मान्यतायें व सिद्धान्त दिये हैं जो आज भी सत्य की कसौटी पर खरे हैं। किसी मत का कोई आचार्य उन का खण्डन व आलोचना नहीं कर सका। जो लोग वेदानुयायी हैं और ऋषि दयानन्द के बताये मार्ग पर चलते हैं, वह धन्य हैं। इन ऋषि की मान्यताओं को जानकर उनका आचरण करने से निश्चय ही अध्येता को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति में सफलता प्राप्त होती है। हमारे अनुमान से यह लाभ अन्य मतों के अनुयायियों को मिलना संदिग्ध है।ऋषि दयानन्द द्वारा सन् 1875 में आर्यसमाज की स्थापना से 47 वर्ष पूर्व बंगाल के धार्मिक एवं सामाजिक नेता राजा राममोहन राय ने सन् 1828 में ब्रह्म-समाज की स्थापना की थी। बाद में श्री देवेन्द्र नाथ ठाकुर तथा श्री केशव चन्द्र सेन आदि नेता भी इस आन्दोलन से जुड़े। महर्षि दयानन्द की बाद के दो नेताओं से भेंट व सम्पर्क भी हुआ था। महर्षि दयानन्द के काल में इस समाज का बंगाल व देश के कुछ भागों, मुख्यतः नगरों में, अच्छा प्रभाव था। महर्षि दयानन्द ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के ग्यारहवें समुल्लास में इस ब्रह्म-समाज की समालोचना की है। वह कहते हैं कि ब्रह्मसमाज में कुछकुछ बातें अच्छी और बहुत सी बुरी हैं। अपनी बात को स्पष्ट करते हुए वह लिखते हैं कि इस समाज के सभी नियम सर्वांश में अच्छे नहीं हैं क्योंकि वेदविद्याहीन लोगों की कल्पना सर्वथा सत्य क्योंकर हो सकती है? जो कुछ ब्राह्मसमाज और प्रार्थनासमाजियों ने ईसाई मत में मिलने से थोड़े मनुष्यों को बचाये और कुछकुछ पाषाणादि मूर्तिपूजा को हटाया तथा अन्य जाल ग्रन्थों (पुराण आदि) के फन्द से भी कुछ बचाये इत्यादि बातें ब्राह्म समाज प्रार्थनासमाज की अच्छी हैं। इन अच्छाईयों के बाद ऋषि दयानन्द ने इस संस्था की कमियों त्रुटियों को प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि इन लोगों में स्वदेश भक्ति बहुत न्यून है। ईसाईयों के आचरण बहुत से ले लिये हैं। खानपान विवाहादि के नियम भी बदल दिये हैं।ऋषि दयानन्द लिखते हैं कि ब्रह्मसमाज के लोग अपने देश की प्रशंसा वा पूर्वजों की बढ़ाई सम्मान करना तो दूर उस के स्थान में पेट भर निन्दा करते हैं। व्याख्यानों में ईसाई आदि अंगरेजों की प्रशंसा भरपेट करते हैं। ब्रह्मादि महर्षियों का नाम भी नहीं लेते प्रत्युत ऐसा कहते हैं कि बिना अंगरेजों के सृष्टि में आज पर्यन्त कोई भी विद्वान् नहीं हुआ। आर्यावर्ती लोग सदा से मूर्ख चले आये हैं। इन की उन्नति कभी नहीं हुई।ऋषि दयानन्द आगे लिखते हैं कि वेद आदि ग्रन्थों की प्रतिष्ठा तो दूर रही परन्तु निन्दा करने से भी पृथक् नहीं रहते। ब्राह्मसमाज के उद्देश्य के पुस्तक में साधुओं की संख्या में ‘ईसा’, ‘मूसा’, ‘मुहम्मद’, ‘नानक’ और ‘चैतन्य’ के नाम लिखे हैं। किसी ऋषि महर्षि का नाम भी नहीं लिखा। इस से जाना जाता है कि इन लोगों ने जिन का नाम लिखा है उन्हीं के मत के अनुसार ही मत वाले हैं। भला! जब आर्यावर्त देश में उत्पन्न हुए हैं और इसी देश का अन्न जल खाया पिया, अब भी खाते पीते हैं। अपने माता, पिता, पितामहादि के मार्ग को छोड़ दूसरे विदेशी मतों पर अधिक झुक जाना ब्राह्मसमाजी और प्रार्थनासमाजियों का एतद्देशस्थ संस्कृत विद्या से रहित अपने को विद्वान् प्रकाशित करना, इंगलिश भाषा पढ़के पण्डिताभिमानी होकर झटिति एक मत चलाने में प्रवृत्त होना, मनुष्यों का स्थिर और वृद्धिकारक काम क्योंकर हो सकता है? इन पंक्तियों में ऋषि की स्वदेश भक्ति के दर्शन होते हैं। उनका मानना है कि जो मनुष्य जिस देश में उत्पन्न हुआ, उस देश के पूर्वजों, महापुरुषों व विद्वान ऋषियों की प्रशंसा न कर उनके स्थान पर विदेशियों की प्रशंसा करना उचित नहीं है। यदि ऐसा करेंगे तो इस देश में ईश्वर व ऋषियों की देन ज्ञान विज्ञान पर आधारित विश्व का एकमात्र सर्वश्रेष्ठ वैदिक धर्म व संस्कृति विलुप्त व समाप्त हो जायेगी। ऐसा करना किसी भी देशवासी के लिये उचित नहीं है।स्वामी दयानन्द जी ने ब्राह्मसमाजियों पर एक आरोप यह भी लगाया है कि इन्होंने अंगरेज, यवन, अन्त्यजादि से भी खाने-पीने का भेद नहीं रक्खा। इन्होंने यही समझा होगा कि खाने पीने और जातिभेद तोड़ने से हम और हमारा देश सुधर जायेगा परन्तु ऐसी बातों से सुधार तो कहां होता है, उल्टा बिगाड़ होता है। यह बता दें कि स्वामी दयानन्द जी मनुष्यों की एक ही जाति मानते थे। ब्राह्मसमाजी लोग जगत् की उत्पत्ति बिना प्रकृति नामी उपादान कारण के मानते हैं। ऋषि दयानन्द लिखते हैं कि यह लोग जीव को भी उत्पत्ति धर्मा मानते हैं। इनकी यह मान्यता ईसाई मुसलमानों की मान्यताओं के अनुरूप है। ऋषि दयानन्द लिखते हैं कि सृष्टि की उत्पत्ति ईश्वर के द्वारा प्रकृति नामी अनादि व अविनाशी उपादान कारण से होती है। इसी प्रकार जीव भी अनादि व अविनाशी है और इसी के कर्मों के फल भोग के लिये ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना की है।मनुष्यों के पापों को क्षमा करने की मान्यता का उल्लेख कर ऋषि दयानन्द लिखते हैं कि एक यह भी उनका दोष है कि जो पश्चाताप और प्रार्थना से पापों की निवृत्ति मानते हैं। इसी बात से जगत् में बहुत से पाप बढ़ गये हैं। क्योंकि पुराणी लोग तीर्थादि यात्रा से, जैनी लोग भी नवकार मन्त्र जप और तीर्थादि से, ईसाई लोग ईसा के विश्वास से, मुसलमान लोग तोबाः करने से पाप का छूट जाना बिना पाप कर्मों के भोग के मानते हैं। इस से पापकर्त्ता में पापों से भय न होकर पाप में प्रवृत्ति बहुत हो गई है। इस बात में ब्राह्म और प्रार्थनासमाजी भी पुराणी आदि के समान हैं। यह सब लोग यदि वेदों को सुनते तो विना भोग के पाप-पुण्य की निवृत्ति न होने से पापों से डरते और धर्म में सदा प्रवृत्त रहते। जो पापों को विना भोगे उनकी निवृत्ति मानें तो ईश्वर अन्यायकारी होता है। ऐसा नहीं है, ईश्वर समी मनपुष्यों के शुभ व अशुभ कर्मों का याथातथ्य अर्थात् पूरा-पूरा, न कम न अधिक फल अवश्य देता है जिससे जीव पापों में प्रवृत्त न हो अथवा पाप कर्म करना छोड़ दें।ऋषि दयानन्द आगे कहते हैं कि ब्राह्मसमाजी जीव की अनन्त उन्नति मानते हैं सो कभी नहीं हो सकती क्योंकि समीम जीव के गुण, कर्म, स्वभाव का फल भी ससीम होता है। पुनर्जन्म को न मानने की ब्राह्मसमाजियों की मान्यताओं का उल्लेख कर ऋषि कहते हैं कि आप लोगों ने पूर्व और पुनर्जन्म नहीं माना है, वह ईसाई मुसलमानों से लिया होगा। इस पूर्व व पुनर्जन्म के विषय को समझने के लिये ऋषि ने सत्यार्थप्रकाश के पुनर्जन्म प्रकरण को पढ़ने की सलाह दी है। वह लिखते हैं कि इतना समझो कि जीव शाश्वत अर्थात् नित्य है और उस के कर्म भी प्रवाहरूप से नित्य हैं। कर्म और कर्मवान् का नित्य सम्बन्ध होता है। वह पूछते हैं कि क्या वह जीव जन्म से पूर्व कहीं निकम्मा बैठा रहा था? वा मृत्यु के बाद बैठा रहेगा? और परमेश्वर भी तुम्हारे कहने से निकम्मा होता है। पूर्व व पुनर्जन्म न मानने से कृतहानि आदि अनेक दोष ईश्वर में आते हैं। जन्म न हो तो पाप-पुण्य के फल भोग की हानि हो जाये क्योंकि जिस प्रकार दूसरे मनुष्य व प्राणियों को सुख, दुःख, हानि, लाभ पहुंचाया होता है वैसा उस का फल विना शरीर धारण किये नहीं होता। दूसरा पूर्वजन्म के पाप-पुण्यों के विना इस जन्म में सुख, दुःख की प्राप्ति क्योंकर होवे? जो पूर्वजन्म के पाप-पुण्यानुसार जन्म न होंवे तो परमेश्वर अन्यायकारी कहलायेगा और विना भोग किये कर्म का फल नाश को प्राप्त हो जावे, इसलिए यह पुनर्जन्म न मानने की बात ब्राह्मसमाजियों की अच्छी नहीं है। स्वामी जी ने यह भी लिखा है कि ब्राह्मसमाजियों द्वारा अग्निहोत्रादि परोपकारक कर्मों को कर्तव्य समझना अच्छा नही है। वह यह भी कहते हैं कि ऋषि महर्षियों के किये उपकारों को न मानकर ईसा आदि के पीछे झुक पड़ना अच्छा नहीं। उनके अनुसार विना कारण-विद्या वेदों के अन्य कार्य-विद्याओं की प्रवृत्ति मानना सर्वथा असम्भव है। इसका तात्पर्य है कि वेद ही सभी विद्याओं का कारण है। यदि वेद न होते तो संसार में कोई कार्य विद्या न होती। ऋषि यह भी लिखते हैं कि जो विद्या का चिन्ह यज्ञोपवीत और शिखा को छोड़ मुसलमान ईसाइयों के सदृश बन बैठना है, यह भी व्यर्थ है। जब पतलून आदि वस्त्र पहिरते हो और तमगो की इच्छा करते हो तो क्या यज्ञोपवीत आदि का कुछ बड़ा भार हो गया था? स्वामी जी ने कहा है कि ब्रह्मा से लेकर पीछे-पीछे आर्यावर्त में बहुत से विद्वान हो गये हैं। उन की प्रशंसा न करके यूरोपियन लोगों ही की स्तुति में उतर पड़ना पक्षपात और खुशामद के विना क्या कहा जाए?ब्राह्मसमाज के प्रकरण ने ऋषि दयानन्द ने महत्वपूर्ण बात यह भी लिखी है इसलिये जो उन्नति करना चाहो तो आर्यसमाज के साथ मिलकर उस के उद्देश्यानुसार आचरण करना स्वीकार कीजिये, नहीं तो कुछ हाथ लगेगा। क्योंकि हम और आपको अति उचित है कि जिस देश के पदार्थों से अपना शरीर बना, अब भी पालन होता है, आगे भी होगा, उसकी उन्नति तन, मन, धन से सब जने मिलकर प्रीति से करें। इसलिए जैसा आर्यसमाज आर्यावर्त देश की उन्नति का कारण है वैसा दूसरा नहीं हो सकता। यदि इस समाज को यथावत् सहायता देवें तो बहुत अच्छी बात है, क्योंकि समाज का सौभाग्य बढ़ाना समुदाय का काम है, एक का नहीं।वर्तमान में ब्रह्मसमाज का संगठन व विचारधारा अव्यवहारिक प्रायः हो चुकी है। देश भर और बंगाल में भी इसका प्रभाव कम व समाप्त प्रायः दीखता है। दूसरी ओर आर्यसमाज की सत्य व ज्ञान-विज्ञान पर आधारित वेदसम्मत स्वदेशी मान्यताओं के कारण ब्रह्मसमाज के 47 वर्ष बाद स्थापित आर्यसमाज आज भी विश्व के अनेक देशों में कार्यरत है। देश में भी इसका प्रभाव बढ़ रहा है। आर्यसमाज ने ही देश में स्वदेशी की भावना, स्वतन्त्रता आन्दोलन व शिक्षा जगत में क्रान्ति की। अनेक अन्धविश्वासों व कुरीतियों का उन्मूलन किया। जन्मना जातिवाद सहित बाल विवाह, बेमेल विवाह तथा एक समुदाय-जाति में विवाह का विरोध आर्यसमाज ने ही किया था। कम आयु की विधवाओं के पुनर्विवाह को आपदधर्म के रूप में मान्यता दी। आज देश व समाज से अन्धविश्वासों, मिथ्या-परम्पराओं व सामाजिक भेदभाव का प्रभाव पूर्णरूपेण समाप्त भले ही न हुआ हो, परन्तु यह कम अवश्य हुआ है और अब पूर्णतया उन्मूलन के कागार पर है। ऋषि दयानन्द ने देश और समाज को बहुत कुछ दिया है। आर्यसमाज के सभी सिद्धान्त सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक एवं सर्वजनहितकारी, प्राणीमात्र के लिये उपादेय एवं व्यवहारिक हैं। सभी को आर्यसमाज की विचारधारा व वैदिक सिद्धान्तों का पालन करना चाहिये। इसी में सबका लाभ है। इसी के साथ लेख को विराम देते हैं।

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