लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

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कभी कभार आपको ऐसी किताब मिल जाती है जो आपको चौंकाती है और जीवन के प्रति आकर्षण बढ़ाती है। पिछले दिनो एक किताब पढ़ने का अवसर मिला। किताब का नाम है Tuesdays with Morrie. यह किताब अमेरिका के मैसाचुसेट्स के ब्राण्डिस विश्वविद्यालय में सामाजिक मनोविज्ञान के प्रोफेसर मॉरी श्वार्ज़ की कहानी कहती है। मॉरी जीवन के आठवें दशक में स्नायु के एक मारात्मक रोग से ग्रस्त हो गए। यह रोग एएलएस (amyotrophic lateral sclerosis) कहलाता है। एएलएस एक जलती हुई मोमबत्ती की तरह होता है। रोगी के स्नायु पिधल जाते हैं और उसका शरीर मोम का पिंड बन जाता है। अक्सर यह पाँव के निचले हिस्से से शुरु होकर ऊपर की तरफ बढ़ता जाता है। जाँघ की मांसपेशियों पर से नियन्त्रण समाप्त हो जाता है, नतीजा होता है कि आप खड़े नहीं रह सकते। अपने धड़ की मांस पेशियों पर नियन्त्रण खत्म हो जाने के फलस्वरुप सीधे बैठा नहीं जा सकता। अन्त में, अगर आप अभी भी जीवित रहते हैं तो आप अपने गले में किए गए सुराख में लगी नली के जरिए साँस लेते रहेंगे. जब कि आपकी पूरी तरह सजग रूह, शिथिल छाल के अन्दर कैद रहती है शायद कुटकुट करने या झपकने में समर्थ हो. किसी विज्ञान-कथा मुवी की तरह, अपने ही शरीर में जम गए हुए आदमी की तरह.। रोगी को इस हालत में आने में बीमारी शुरु होने के समय से पाँच साल से अधिक नहीं लगते।
मॉरी के डॉक्टरों के अनुमान में मॉरी के पास दो साल का समय था। डॉक्टर के चैम्बर से बाहर निकलते समय मॉरी सोच रहे थे- “मैं क्या करूँ? क्या क्रमशः पिघलते हुए ओझल हो जाउँ या बची हुई अवधि का अच्छे से अच्छा उपयोग करूँ?” फिर उन्होंने फैसला किया— “मैं मुरझाउँगा नहीं, मरने में मैं शर्म नहीं करूँगा।“
बल्कि वे मौत को अपना आखिरी पाठ आखिरी प्रोजेक्ट बनाएँगे, अपने बचे दिनो का केन्द्रीय बिन्दु।
चूँकि हर किसीको मरना होता है, इसलिए मॉरी बहुत ही मूल्यवान होंगे, है न? वे अनुसंधान के विषय हो जाएँगे, मानव पाठ्यपुस्तक। “मेरी धीमी और धीरज से भरी मौत में मेरा अध्ययन करो। अवलोकन करो, मेरे साथ क्या होता है, मुझसे सीखो।“
मॉरी ने जिन्दगी और मौत के बीच के उस आखिरी पुल की सैर करना और उस सैर का विवरण करना तय किया।
मॉरी मुलाकातियों की बढ़ती हुई तायदाद का स्वागत करते रहे। मौत के बारे में विमर्श-समूह होते रहे, इसके क्या मायनी हैं, कैसे विभिन्न समाज इसे समझे बिना आदिकाल से इससे डरती रही हैं। उन्होंने अपने मित्रों से कहा कि अगर वे सचमुच उनकी मदद करना चाहते हैं, तो उन्हें सहानुभूति से नहीं, बल्कि मुलाकातों, फोन कॉल, और समस्याओं को साँझा करने के जरिए मदद करें- पहले भी वे अपनी समस्याएँ मॉरी के साथ हमेशा साँझा करते रहे थे, क्योंकि मॉरी हमेशा से एक अच्छा श्रोता रहे थे।
इस अवस्था में भी मॉरी की आवाज बुलन्द और आकर्षक थी तथा उनका मस्तिष्क करोड़ों अरबों विचारों से गूँजा करता था। वे यह साबित करने के लिए बद्धपरिकल्प थे कि मरना अनुपयोगी हो जाने के समानार्थक नहीं हुआ करता। नया साल आया और बीत गया। हालाँकि उन्होंने ऐसा किसीसे नहीं कहा था, लेकिन मॉरी जानते थे कि यह उनका आखिरी साल होगा। अब वे एक व्हिलचेयर का इस्तेमाल कर रहे थे और उन सभी लोगों को जिन्हें वे प्यार करते थे, अपनी सारी बातें कह डालने के लिए वक्त से लड़ रहे थे।
ब्राण्डिस में उनके एक सहकर्मी का दिल के दौरे से अचानक देहान्त हो गया। मॉरी उनकी अन्त्येष्टि में गए थे। घर लौटने पर वे बहुत उदास थे। उन्होंने कहा, “कितना बड़ा अपव्यय है? उन सारे लोगों ने कितनी अच्छी बातें कहीं, लेकिन इर्व(मृत व्यक्ति) ने कुछ भी नहीं सुना।”
मॉरी के पास एक बेहतर विचार था। उन्होंने कई एक लोगों से फोन पर सम्पर्क किया। उन्होंने एक दिन का चुनाव किया और सर्दी के एक अपराह्न में मित्रों और परिवार का एक समूह उनके पास “जीवित अन्त्येष्टि” के लिए जुटा। उनमें से हर कोई बोला और बूढ़े प्रोफेसर को अपनी अपनी श्रद्धांजलि दी। कुछ लोग रोए। कुछ हँसे। एक महिला ने एक कविता पढ़ी।
मॉरी उनलोगों के साथ रोए और हँसे। और दिल में महसूस की गई वे सारी बातें, जिन्हें हम कभी अपने प्यारे लोगों को नहीं कह पाते, उस दिन मॉरी ने कही।
उनकी जीवित अन्त्येष्टि उत्साहवर्द्धक कामयाबी थी, बस मॉरी अभी तक मरे नहीं थे।
मार्च 1995;मॉरी अब हमेशा के लिए व्हिलचेयर पर सिमट गए थे। और सहायकों द्वारा एक भारी थैले की तरह चेयर से बिस्तर पर डाल दिए जाने की दिनचर्या के अभ्यस्त होते जा रहे थे। भोजन करते समय वे खाँसने लगे थे और चबाने में तकलीफ होने लगी थी। अपने खयालातों को वे लिफाफों, फोल्डरों और कागज के टुकड़ों पर लिख लिया करते। इनमें उन्होंने मौत की छाया में जीवित रहने के बारे में छोटी छोटी दार्शनिकताएँ लिखीं। “, तुम जो कुछ भी कर सकने लायक हो,उसे स्वीकार करो”, “बीते समय को, बिना अस्वीकार या ठुकराए, गुजरा हुआ वक्त मानना सीखो”, “अपने आपको माफ करना सीखो और दूसरों को माफ करना सीखो”, “ ऐसा मत मान लो कि संलग्न होने में बहुत देर हो गई है।“
कुछ समय बाद उनके पास ऐसे पचास सूत्र इकट्ठे हो गए थे। उन्होंने अपने मित्रों से इनका साझा किया। उनके एक मित्र प्रोफेसर मॉरी स्टिन इन वचनों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इन्हें बोस्टन ग्लोब रिपोर्टर को भेज दिया। बोस्टन ग्लोब रिपोर्टर ने मॉरी पर एक लम्बी फीचर स्टोरी लिखी, जिसका शीर्षक था—
एक प्रोफेसर का आखिरी पाठः उसकी खुद की मौत

2 Responses to “जीवित अन्त्येष्टि”

  1. बी एन गोयल

    बी एन गोयल

    एक अच्छा लेख -सभी वरिष्ठ व्यक्तियों के लिए पठनीय

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  2. बी एन गोयल

    बी एन गोयल

    एक अच्छा लेख – सभी वरिष्ठ व्यक्तिओं को पढना चाहिए

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