लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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संजय सक्सेना


समाजवादी पार्टी और कांगे्रस के गठबंधन को लेकर कयासों के बादल छंट चुके हैं। बस अब समय और स्थान का फैसला होना बाकी रह गया हैं,जहां सपा-कांगे्रस गठबंधन की घोषणा करेंगे। इस गठबंधन का राष्ट्रीय लोकदल सहित अन्य कुछ छोटे-छोटे दल भी हिस्सा हो सकते हैं। दोनों तरफ से कहा तो यह जा रहा है कि साम्प्रदायिक शक्तियों के खिलाफ यह गठबंधन है, लेकिन हकीकत यह है कि अखिलेश को सत्ता विरोधी और समाजवादी कुनबे के कारण होने वाले नुकसान का डर सता रहा था तो कांगे्रस को चिंता इस बात की थी कि अगर उत्तर प्रदेश की जनता ने एक बार फिर राहुल बाबा को नकार दिया तो उनके लिये 2019 में दिल्ली दूर हो जायेगी। आश्चर्य होता है कि एक तरफ तो राहुल गांधी पूरे देश में पीएम मोदी के खिलाफ हुंकार भरते रहते हैं,उन्हें तानंे और चुनौती देते हैं, लेकिन जब जनता के बीच जाकर चुनावी मुकाबले की नौबत आती है तो राहुल कभी नीतीश-लालू की ‘गोद’ में बैठ जाते हैं तो कभी उन्हें अखिलेश और मायावती की ‘गोद’ रास आने लगती है। 1996 में बसपा के साथ खड़ी कांगे्रस बीस वर्षो के बाद समाजवादी पार्टी के साथ गलबहियां कर रही है। 1996 में बसपा ने राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त कांगे्रस के लिये करीब सवा सौ सीटें छोड़ी थीं और इस बार सपा उनका संख्या बल और भी कम कर सकता है। यानी करीब सौ सीटों पर ही कांगे्रस को संतोष करना पड़ सकता है। यह और बात है कि राहुल गांधी इसमें भी अपनी जीत देख रही है। मायावती ने कांगे्रस के साथ अन्य तमाम वजहों के अलावा इस लिये भी गठबंधन नहीं किया कि उन्हें 1996 में इस बात का अहसास हो चुका था कि बसपा से गठबंधन का फायदा कांगे्रस को तो मिल गया,लेकिन बसपा को नहीं मिल पाया। बसपा के वोटरों ने तो मायावती के कहने पर कांगे्रस प्रत्याशी के पक्ष में मतदान कर दिया था,लेकिन जहां बसपा के प्रत्याशी थे वहां कांगे्रस के वोटरों ने बीजेपी और सपा की झोली में वोट डाल दिया।
यूपी में जब से चुनावी आहट की शुरूआत हुई है तभी से राहुल गांधी किसी न किसी दल से समझौते की बांट जोह रहे थे,मायावती ने कांगे्रस के युवराज के मंसूबों को परवान नहीं चढ़ने दिया तो मुलायम भी कांगे्रस को लेकर सख्त रवेया अख्तियार किये हुए थे। कांगे्रस की किस्मत अच्छी थी,अगर सपा में फूट न होती तो मुलायम कांगे्रस को सपा के करीब भी भटकने नहीं देते। सपा-कांग्रेस गठबंधन पर लगे रहे कयास की कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद और कांग्रेस से मुख्यमंत्री पद की दावेदार शीला दीक्षित पुष्टी कर चुकी हैं। चुनाव आयोग से पक्ष में फैसला आने के बाद गठबंधन के सवाल अखिलेश भी कहने लगे हैं की जल्द ही इस पर फैसला हो जायेगा।
गठबंधन तो हो जायेगा,लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि इससे विरोधियों की ताकत पर कितना प्रभाव पड़ेगा। अखिलेश को समाजवादी पार्टी का नाम और सिंबल मिलने के बाद संभावना इस बात की बढ़ गई है कि सपा की लड़ाई की वजह से जो मुस्लिम वोटर बसपा की तरफ झुकाव दिखा रहे थे,उनमें बिखराव हो सकता है। इससे बसपा को नुकसान और बीजेपी को फायदा मिलेगा। इतना ही नहीं जो सीटे गठबंधन के तहत कांगे्रस के लिये छोड़ी जायेंगी,उसमें भी सियासी समीकरण बिगड़ सकते हैं। बात कांगे्रस की कि जाये तो यूपी में 27 साल से कांगेे्रस सत्ता से दूर है और उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा हुआ है। संगठन में भी ताकत नही दिखती है। लिहाजा अब गठबंधन पार्टी की जरूरत बन गई है। गठबंधन को मजबूरी और जरूरी बताने वाले कांगे्रसी बिहार की स्थिति से यूपी की तुलना करते है। वह कहते है, कि बिहार में कहने को तो हम कम ही सीटों जीते, लेकिन गठबंधन के सहारे ही सही उनके कुछ विधायक मंत्री तो बन गए। गठबंधन की मजबूरी गिनाते हुए कांगे्रस का थिंक टैंक कहता हैं कि 1989 में सत्ता से बाहर जाने के बाद कांगे्रस पहली बार 1996 में टूट गई थी। टूटने की वजह भी सत्ता की चाहत थी। विधायक जो चुनकर आए थे, उन्होंने सत्ता की के लालच में कांग्रेस से अगल होकर एक नई पार्टी ही बना ली थी और सरकार के साथ हो गए थे। कांग्रेस अब दोबारा ऐसी स्थिति नहीं चाहती है।
बात 1996 के विधान सभा चुनाव में कांगे्रस-बसपा गठबंधन की कि जाये तो तब समझौता होने की वजह से कांग्रेस से टिकट की मांग कर रहे काफी लोगों को बैठा दिया गया। 403 सीटों में से कांगे्रस सिर्फ 126 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और उसके 33 विधायक ही चुनकर आये थे। फिर भी दम तोड़ती कांग्रेस के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी,लेकिन यह सिक्के का एक ही पहलू है। तमाम सीटों पर अच्छा उम्मीदवार होने के बाद भी गठबंधन की वजह से कांगे्रस यहां से अपना प्रत्याशी नहीं उतार सकी थी। इसका असर यह हुहा कि ऐसे विधान सभा क्षेत्रों में कांगे्रस का संगठन ठप हो गया। पार्टी टूट गई थी। सबकों पता था कि सत्ता कि लिए गठबंधन किया गया। इसका असर 1996 के लोकसभा चुनाव में भी दिखा जब कांग्रेस को यूपी में पांच सीटें ही मिल पाई थीं। इसकी वजह थी कि संगठन हताशा। उम्मीदवार गठबंधन की वजह से निराश थे,अबकी बार भी कुछ ऐसी ही तस्वीर नजर आ रही है। गठबंधन से कांगे्रस के बड़े नेता तो खुश हैं,लेकिन जमीन पर काम करने वाले कांगे्रसी जो चुनाव लड़ने का मन बनाये हुए थे,उनमें हताशा घर कर गई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर खुद भी स्वीकारते हैं कि गठबंधन से कार्यकर्ता निराश होते है। बीते दिनों गुलाम नबी आजाद ने कांर्यकर्ताओं को समझाने की कोशिश की थी कि टिकट तो सभी चाहते है, लेकिन सबकों मिलता नही है। ऐसे में जिसकों टिकट मिले उसे सब मिलाकर जिताएं। जानकारों की माने तो कार्यकर्ता इसके बाद खुद कों पार्टी का विश्वस्त नही बनाएं रख पाते है। जानकारों की माने कि जब गठबंधन होता है। उसमंे सबसें ज्यादा नुकसान कार्यकर्ताओं का ही होता है। यही कार्यकर्ता पार्टी बनाता है। ऊपरी तौर पर भले ही कुछ बड़े नेताओं के नाम से पार्टी जानी हो लेकिन पार्टी की असली ताकत उसके जमीनी कार्यकर्ता होते है।
दरअसल, 2009 के बाद से कांग्रेस का ग्राफ लगातार गिर रहा है। कांग्रेस के हाथ से राज्यों की सत्ता छिटक रही है। लिहाजा यूपी में सत्ता में होना कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरी माना जा रहा है। कांग्रेस सत्ता में तो आना चाहती है। इसके अलावा एक मकसद बीजेपी को यूपी की सत्ता से दूर रखना भी है। कांगे्रस की दुर्दशा के कारणों पर नजर डाली जाये तो जटिल जातीय समीकरण वाले इस सूबे में कांग्रेस के पास अपना परंपरागत वोट बैंक नही बचा है। ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम अब कांग्रेस के वोटर नहीं रह गये हैं। पिछले 27 सालों से कांगे्रस सत्ता से बाहर है और क्षेत्रीय दलों की स्थिति लगातार मजबूत हुई है। पहले मुलायम और अब अखिलेश एवं मायावती यूपी की सियासत के अहम चेहरे बन गये है। अब अखिलेश यादव भी उसी तर्ज पर आगे बढ़ रहे। कांग्रेस भी जान रही है कि बिना गठबंधन के यूपी का किला फतेह करना मुश्किल होगा।लब्बोलुआब यह है कि कांगे्रसी और राहुल गांधी भले ही शेखचिल्ली की तरह बड़ी-बड़ी बातें करते रहे ,लेकिन रसातल की ओर जा रही कांगे्रस के लिये गठबंधन जरूरी हो गया है,ताकि गठबंधन के सहारे ही सही कुछ और सालों तक कांगे्रस को ‘मरने’ से बचाया जा सके।
यूपी में 27 साल कांगे्रस बेहाल

1989 में 410 में 94 सीटंें कांगे्रस जीती।
1991 में 413 में 46 सीटें जीती।
1993 में 421 में 20 सीटें ही जीती।
1996 में बीएसपी से गठबंधन किया 126 में 33 सीटें जीती।
2002 मंे 402 में 25 सीटें मिली।
2007 में 393 में 22 सीटें मिली।
2012 में 355 में 28 सीटें मिली।

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