उ. प्र. पंचायती चुनाव

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सवाल भी, उम्मीद भी

गौतमबुद्धनगर को छोङकर 74 जि़ले, 11.36 करोङ मतदाता, 78,596 मतदाता केन्द्र, एक लाख, 78,588 मतदाता बूथ और तीन लाख सुरक्षाकर्मी! मतगणना के चार चरण – 9,13,17 और 29 अक्तूबर, 2015; नतीजे का तिथि – एक नवंबर, 2015. इन आंकङों के साथ बीती 21 जुलाई को उत्तर प्रदेश में जिला और क्षेत्र पंचायत चुनावों की अधिसूचना जारी कर दी गई। तैयार मतदाता सूची में 53.33 प्रतिशत मतदाता पुरुष हैं और 46.67 प्रतिशत मतदाता नारियां है। 51.5 प्रतिशत मतदाताओं की उम्र 18 से 35 के बीच दर्ज पाई गई है। चुनाव आयोग द्वारा जारी सूचना के अनुसार, कुल मतदाताओं में 2.13 करोङ मतदाता नये हैं।

ग्राम पंचायत के चुनाव बाद में क्यों ?

जाहिर है कि यह पहली बार होगा कि मतदाता के नाते वे उत्तर प्रदेश के ग्राम्य लोकतंत्र में अपनी भागीदारी दर्ज करायेंगे। यह भी पहली ही बार होगा कि उत्तर प्रदेश के पंचायती राज संस्थाआंे के चुनाव में केन्द्र का कोई सुरक्षा बल तैनात नहीं होगा। उत्तर प्रदेश शासन, इस बार पी ए सी की 139 कंपनियों, एक लाख, पांच हजार, 289 चैकीदार तथा अन्य पुलिस कर्मियों के भरोसे चुनाव कराने को तैय्यार है। इसी के साथ तैय्यार हैं, जागरूक नागरिक और संस्थान अपनी जवाबदेही निभाने को। उन्होने सवाल उठा दिया है। सामान्यतः जिला, क्षेत्र और ग्राम पंचायतों के चुनाव एक साथ होते हैं। यही परंपरा रही है। सवाल है कि इस बार ऐसा क्यों नहीं हो रहा ? ऐसी भी क्या मजबूरी है ?

मजबूरी या होशियारी

जानकार इसे मजबूरी नहीं, सरकार की होशियारी बताते हैं। कहने को तो सरकार का जवाब है कि क्योंकि जिला और क्षेत्र पंचायतों में आरक्षित सीटों का निर्धारण हो चुका है। ग्राम पंचायतों के मामले में यह होना अभी बाकी है। अतः जिला और क्षेत्र पंचायत चुनाव पहले कराये जा रहे हैं। फिलहाल, सरकार के जवाब से असहमति जाहिर करते हुए एक अर्जी, अदालत भी पहुंच चुकी है, जिसकी सुनवाई तिथि 29 सितम्बर है।

गौरतलब है कि सरकार ने सुनवाई तिथि से पहले ही ग्राम पंचायतों के आरक्षण की अंतरिम अधिसूचना जारी कर दी है। तद्नुसार, 59,190 पदों में से 22.67 फीसदी अनुसूचित जाति, 0.57 फीसदी अनुसूचित जनजाति तथा 27 फीसदी पिछङी जातियों के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव है। जानकारी के अनुसार, इस अंतरिम प्रस्ताव पर आपत्ति हेतु पांच दिन का समय दिया गया है। ज्ञातव्य है कि यह अधिसूचना 26 सितम्बर को जारी की गई है। जाहिर है कि आपत्ति प्राप्ति की अंतिम तिथि एक नवम्बर होगी। राज्य सरकार, अगले आठ दिन के भीतर आपत्तियों का निस्तारण कर, नौ अक्तूबर को राज्य निर्वाचन आयोग को स्थिति से अवगत करा देगी।

इस चुनावी हेरफेर को सरकार की होशियारी बताने वालों का कहना है कि सत्तारूढ दल जानता है कि जिला व क्षेत्र पंचायतों के चुनाव दलगत पहचान और दखल से लङे और जीते जाते हैं। यदि समाजवादी पार्टी ने ये चुनाव जीत लिए, तो जीते प्रत्याशियों के माध्यम से ग्राम पंचायत के चुनाव को प्रभावित करने मंे भी वह सफल रहेगी। सभवतः इसके पीछे समाजवादी पार्टी का यह विश्वास है कि यदि वह पंचायतों के नतीजे अनुकूल कर पाई, तो वह उ. प्र. शासन को अराजक और दागदार बताने वालों को मुंहतोङ जवाब दे देगी। इससे अन्य स्तरीय चुनावों मंे मदद मिलेगी, सो लाभ अलग है ही।
इस चुनाव के लिए केन्द्र से सुरक्षा बल ने मिलने के बारे में भी अधिकारिक सूचना यही दी गई है कि केन्द्र ने सुरक्षा बल देने से इंकार कर दिया है। किंतु इसे समाजवादी पार्टी की होशियारी बताने वालों के मुताबिक, असल में उ. प्र. शासन इस बार केन्द्र से सुरक्षा बल लेना ही नहीं चाहता; ताकि राज्य चुनाव आयोग की सरपरस्ती में वह चुनाव को पार्टी मफिक तरीके से अंजाम दे सके।

उचित नहीं यह उलटबांसी

सवाल ’तीसरी सरकार अभियान’ के अगुवा डाॅ. चन्द्रशेखर प्राण का भी है। वह बताते हैं कि शपथ ग्रहण की तिथि के गणित से कार्यकाल की अवधि तय होती है। इस हिसाब से उत्तर प्रदेश की ग्राम पंचायतों का कार्यकाल आठ नवंबर, 2015 को समाप्त हो रहा है। किंतु क्षेत्र पंचायतों और जिला पंचायतों का कार्यकाल अगले वर्ष 2016 के फरवरी-मार्च में खत्म होगा। कारण कि पांच साल पूर्व सरकार ने इन्हे लटकाये रखा था और क्षेत्र तथा पंचायतों को, ग्राम पंचायतों से एक तिमाही बाद अलग-अलग तारीखों पर शपथ ग्रहण कराया था। इस दृष्टि से कायदे से ग्राम पंचायतों का चुनाव तत्काल होना चाहिए। जिला पंचायतों का चुनाव अवश्य टाला जा सकता है। उठा सवाल है कि सरकार उलटा क्यों कर रही है ?

न्याय पंचायतों को लेकर वादाखिलाफी क्यों ?

इन सवालों के साथ उठाने लायक एक अहम् सवाल और है। सवाल है कि जब उत्तर प्रदेश शासन ने पूर्व में संवैधानिक तौर पर यह वादा किया था कि वह न्याय पंचायतों का अस्तित्व बनाये रखेगी, तो उसने न्याय पंचायतों के चुनाव क्यों नहीं कराये ? इस बाबत् संविधान से किए अपने वायदे को बिहार सरकार आज भी निभा रही है। उसे इसका लाभ भी मिल रहा है। जहां, न्याय पंचायतें अच्छा काम कर रही हैं, वहां पुलिस और अदालतों पर बोझ कम है। ज्यादातर मामले, न्याय पंचायतें ही निपटा देती है। क्या न्याय पंचायतों का अस्तित्व मिटाकर उत्तर प्रदेश सरकार, थानों और अदालतों में दर्ज मामलों की संख्या बढाने और ग्राम समाज को तोङने की पक्षधर है ? आखिरकार, वह न्याय पंचायतों के चुनावों क्यों नहीं करा रही ? यदि निवर्तमान सरकार इसकी सुनहरी पहल करती, तो एक इतिहास ही रचती।

पहल करे सरकार

ऐसे अहम् सवालों को उठाने वाले ’तीसरी सरकार अभियान’ ने न्याय पंचायतों को उनका अस्तित्व वापस लौटाने और न्यायसंगत चुनाव की अपील करते हुए एक खुला पत्र जारी कर दिया है। जिला पंचायत चुनाव के उम्मीदवारों के नाम जारी इस खुले पत्र में ईमानदार और कर्तव्य निष्ठ उम्मीदवारों की जीत की कामना करते हुए जिला पंचायत सदस्य के तौर पर उनके अधिकार और कर्तव्यों के प्रति भी आगाह किया गया है।

उम्मीदवारों से कुछ सवाल

अभियान ने जिला व क्षेत्र पंचायत के उम्मीदवारों से पूछा है कि क्या आप जानते हैं कि 1992 में हुए 73वें संविधान संशोधन के कारण, नगरपालिकाओं व पंचायतों को ’तीसरी सरकार’ का दर्जा मिलना संभव हुआ ? क्या आप जानते हैं कि 73वें संशोधन के बाद अब यह विधानसभा की जिम्मेदारी है कि वह जिला पंचायतों को कृषि विकास, भूमि सुधार, जल संसाधन, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, गरीबी उन्मूलन, ग्रामीण सड़क, ग्रामीण विद्युतीकरण और ग्रामोद्योग आदि गांव विकास के कार्यों की योजना, निर्णय तथा क्रियान्वयन का पर्याप्त अधिकार दे ? क्या आप जानते हैं कि उ. प्र. की विधानसभा ने प्रदेश की पंचायती राज संस्थाओं को न पर्याप्त अधिकार दिए हैं, न पर्याप्त कर्मचारी और न पर्याप्त कोष ? लिहाजा, हमारी पंचायतें ’तीसरी सरकार’ बनने की बजाय, प्रशासन के बताये काम निपटाने वाली संस्था. स्पष्ट कहें, तो महज् एक ऐसा ठेकेदार बनकर रह गई है, जिन पर न प्रशासन यकीन करता है और ग्रामसमाज। इस स्थिति में न तो सही मायनों में हमंे असली आजादी मिल सकती है और न ही हमारे गावों व लोकतंत्र का सही विकास हो सकता है। क्या आप नहीं चाहते कि उ. प्र. के त्रुटिपूर्ण पंचायती राज अधिनियम को दुरुस्त किया जाये ? क्या आप नहीं चाहते कि बतौर पंचायती राज प्रतिनिधि, आपको वे सभी संविधान प्रदत अधिकार मिलें, जिनके जरिए आप अपने कर्तव्य का पूरी तरह निर्वाह कर सकें ? क्या आप नहीं चाहते कि पंचायती राज संस्थाओं को नेकनामी संस्था में बदला जाये ?

इन सवालों से उठा चित्र स्पष्ट है कि यदि पंचायती राज संस्थाओं को सचमुच बदनामी से बचना है; यदि हम चाहते हैं कि पंचायती राज संस्थान सत्ता के विकेन्द्रीकरण के उस लक्ष्य को प्राप्त करें, जिन्हे सामने रखकर 73वां संविधान संशोधन किया गया है, तो तद्नुसार अधिकार और व्यवस्था दिए बगैर यह संभव नहीं है। नैतिकता और जागरूकता तो बुनियादी शर्त हैं हीं।

जागृति जरूरी

आज सचमुच जिला पंचायत के हर उम्मीदवार को जानना चाहिए कि बतौर जिला पंचायत सदस्य, वह कम से कम 50 हजार गांववासियों का प्रतिनिधित्व करता है। करीब 25 से 30 ग्राम पंचायतों व ग्रामसभाओं का ख्याल रखना उसकी निजी जवाबदेही है। उससे जानना चाहिए कि प्रत्येक जिला पंचायत में छह समितियां होती हैं। प्रत्येक समिति में छह सदस्य होते हैं। प्रत्येक सदस्य, किन्ही दो समितियों का सदस्य होता ही है। दो समितियों को छोङकर, प्रत्येक समिति का सभापति, कोई न कोई सदस्य ही होता है। प्रत्येक समिति का उपसभापति तो निश्चित रूप से जिला पंचायत सदस्य ही होता है। कल को वह भी होगा; तब उसकी जिम्मेदारी होगी कि महीने में एक बार प्रत्येक समिति की बैठक हो। उसे पता होना चाहिए कि प्रत्येक समिति चाहे तो, आवश्यकतानुसार उपसमितियां भी बना सकती है। वह जानें कि जिला पंचायत के समस्त निर्णय और उनका क्रियान्वयन, इन्ही समितियों/उपसमितियों के माध्यम से ही किए जाते हैं।

कुछ उम्मीद

स्पष्ट है कि समितियों के सभापति/उपसभापति/सदस्य के तौर पर एक जिला पंचायत उम्मीदवार के पास कई काम और अधिकार होते हैं। जरूरत होती है, तो सिर्फ समर्पण और संकल्प की। क्या उम्मीदवारी का पर्चा भरने वाले हमारे आज के उम्मीदवारों के पास है ? यह सवाल मतदाता और उम्मीदवार..दोनो के लिए है। सच है कि यह जवाबदेही, सहज् नहीं है। फिर भी इसी व्यवस्था में कई ने इस जवाबदेही का निर्वाह किया है। वे ऐसा इसलिए कर पाये, चूंकि राजनैतिक दल, व्यक्ति अथवा स्वेच्छा से प्रेरित होकर चुनाव के मैदान में कूदने के बावजूद, जीत के बाद उन्होने इन सभी का होते हुए भी गांव और गांव मंे भी सबसे जरूरतमंद के हित व बेहतरी को अपनी प्राथमिकता बनाया; तय कर लिया कि समुचित विकास, सामाजिक न्याय और सुशासन की राह में वे कोई रोङा स्वीकार नpanchayati chunavहीं करेंगे।

कहना न होगा कि यह संकल्प का मामला है; लाखों-लाख गांवों के उत्थान का मामला है। संविधान प्रदत तीसरी सरकार को अपनी सरकार बनाने का काम, सचमुच ग्रामोदयी सपने को सच करने का काम है। हम सभी को इस काम में लगना चाहिए। उम्मीद करनी चाहिए कि इन पंचायती चुनावों के दौरान और पश्चात् उत्तर प्रदेश की जनता अपनी जागरुकता का दम दिखायेगी। अपनी जरूरतों और आकांक्षाओं को लोक घोषणा पत्र खुद बनायेगी और चुनाव पश्चात् उसे लागू करने के लिए जीते हुए उम्मीदवार को प्रेरित, विवश और सहयोग करेगी।

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