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    Homeसाहित्‍यकविताभारत का दूसरा आक्रांता यूनानी सिकंदर

    भारत का दूसरा आक्रांता यूनानी सिकंदर

    –विनय कुमार विनायक
    ईसा पूर्व तीन सौ तीस का जब था जमाना,
    दरायवौष/डैरियस 3 का हुआ यूनान से सामना
    अराबेला के युद्ध में यूनानी वीर सिकंदर ने
    सोलह वर्ष की उम्र में अरस्तू से ज्ञान प्राप्तकर
    ईरानी हखमीवंशी डैरियस तृतीय को देके जख्म
    ईरानी परसिपोलिस राजप्रासाद को करके भस्म
    आरम्भ किया विश्व विजय का अपना रस्म!

    सिकंदर को अंग्रेजों ने ‘अलेक्जेंडर द ग्रेट’ कहा है
    भारतीय आर्यों ने संस्कृत में ‘अलक्षेन्द्र’ नाम दिया,
    पारसियों ने फारसी में ‘एस्कंदर-ए-मक्दुनी’ पुकारा,
    वह बेटा मकदूनिया के ग्रीक शासक फिलिप-2 औ’
    ओलंपियस का, तीन सौ छप्पन बी सी में जन्मा
    यूनान के पेला मेसीडोन में, और भारत से लौटते
    तीन सौ तेईस बी सी में जान गंवाई बेबीलोन में!

    वीर सिकंदर तीन सौ छत्तीस बी.सी. में बैठा था
    पिता की मौत के बाद मकदूनिया की गद्दी पर
    जिन्होंने तीन सौ तीस बी.सी.में जीतकर ईरान
    आरंभ किया था भारत जय का एक अभियान
    पहले जीता शकिस्तान/ सिस्तान, फिर दक्षिण
    अफगानिस्तान, जहां अराकोशिया का एक नगर
    सिकंदरिया बसाया,फिर काबुल-बाह्लीक पारकर
    हिन्दूकुश तक,शशिगुप्त देशद्रोही और आम्भी
    तक्षशिलाधीष दंभी की मैत्री के सह पर उतरा
    सिकंदर भाग्य आजमाने भारत की भूमि पर!

    शशिगुप्त ईरानी युद्ध में यद्यपि था सिकंदर का
    प्रतिद्वंदी, किन्तु देश बेचने के लिए स्वार्थी ने चाल
    खेलकर गंदी, किया था यवन राजा सिकंदर से संधि,
    तक्षशिलाधीष आम्भी भी पुरु पौरवराज से खार खाकर
    मिला सिकंदर से जाकर,पुष्करावती का संजय भी था
    यवन जय का आकांक्षी,जाने कितने ऐसे थे फिर भी
    विश्व विजेता सिकंदर हारा भारत के बिखरे जन से!

    मगध साम्राज्य की गद्दी पर धनानन्द की सेना से
    टकराने का साहस नही किया था ग्रीक सिकंदर ने
    चाणक्य शिष्य चन्द्रगुप्त भी तैयार खड़ा मगध में,
    कपिशा, पौरव,ग्लौगनिकाय और कठ से लोहा लेकर,
    सैन्य सिकंदर का हतबल था, तन ही नहीं मन से,
    पंजाब के पुरु पौरव राज से टकराकर,मर कटकर!

    ईसा पूर्व तीन सौ छब्बीस वर्ष में भागा सिकंदर!
    व्यास और झेलम के बीच पुरु; पौरव; पोरस को,
    झेलम और सिन्ध के बीच खण्ड को आम्भी को
    और सिन्ध के पश्चिम भाग दे फिलिप्स को भार,
    भागा विश्व विजेता व्यास नद के पश्चिमी तट से
    विफल मनोरथ खाली-खाली,पा न सका लक्ष्य और
    ना ही घर,उसने राह बीच ई.पू. तीन सौ तेईस में
    जाते-जाते अपनी जान गवा डाली थी बेबीलोन में!

    भारत भाया सिकंदर को पर नहीं सिकंदर भाया
    भारत को,इसी बीच भारत ने पाया उनसे जो सो
    सिकंदर-पोरस युद्धस्थल पर बस्ती ‘निकाइया’
    भारत पर सिकंदर की आक्रमण तिथि; ईसा पूर्व
    तीन सौ छब्बीस ने भारत इतिहास की सुलझाई
    कालक्रम गत गुत्थी, इसके पूर्व मिथक स्थिति!

    झेलम तटपर मृत घोटक की स्मृति में बना था एक
    बुकाफेल नाम की बस्ती, काबुल में सिकंदरिया शहर
    और सिकंदरिया गांव बसा चिनाब-सिन्धु के ठांव पर,
    सोगड्यिम अलेक्जेंडरिया वस्ती बसी सिन्ध-पंजाब की
    उपनद के तटपर, सिकंदर आया एक तूफान सा और
    झोंका सा गया चला,मात्र उन्नीस मास के मध्य तक
    इससे अधिक क्या हो सकता युद्ध में देश का भला?

    विनय कुमार'विनायक'
    विनय कुमार'विनायक'
    बी. एस्सी. (जीव विज्ञान),एम.ए.(हिन्दी), केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो से प्रशिक्षित अनुवादक, हिन्दी में व्याख्याता पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त, पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन, मिथकीय सांस्कृतिक साहित्य में विशेष रुचि।

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