वेंकैया नायडू का हिन्दी भाषा का दर्द समझें

ललित गर्ग-
हिन्दी की दुर्दशा आहत करने वाली है। इस दुर्दशा के लिये हिन्दी वालों का जितना हाथ है, उतना किसी अन्य का नहीं। अंग्रेजों के राज में यानी दो सौ साल में अंग्रेजी उतनी नहीं बढ़ी, जितनी पिछले सात दशकों में बढ़ी है। इस त्रासद स्थिति की पड़ताल के लिये हिन्दी वालों को अपना अंतस खंगालना होगा। पैसा, तथाकथित आधुनिकता, समृद्धि एवं राजनीतिक मानसिकता इसके कारण प्रतीत होते हैं तो भी इसकी सूक्ष्मता में जाने की जरूरत है। यह खुशी की बात है कि उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू इनदिनों हिंदी को प्रोत्साहन देने की लिये प्रयास कर रहे हैं, जबसे वे उपराष्ट्रपति बने हैं, अपने हर भाषण में हिन्दी को उसका स्थान दिलाने की बात करते हैं। 
गतदिनों उन्होंने हिन्दी के बारे में ऐसी बात कह दी है, जिसे कहने की हिम्मत महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी और डाॅ. राममनोहर लोहिया में ही थी। उन्होंने कहा कि ‘अंग्रेजी एक भयंकर बीमारी है, जिसे अंग्रेज छोड़ गए हैं।’’ अंग्रेजी का स्थान हिंदी को मिलना चाहिए, लेकिन आजादी के 70 साल बाद भी सरकारें अपना काम-काज अंग्रेजी में करती हैं, यह देश के लिये दुर्भाग्यपूर्ण एवं विडम्बनापूर्ण स्थिति है। वैंकय्या नायडू का हिन्दी को लेकर जो दर्द एवं संवेदना है, वह सही और अनुकरणीय है। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी राष्ट्र एवं राज भाषा हिन्दी का सम्मान बढ़ाने एवं उसके अस्तित्व एवं अस्मिता को नयी ऊंचाई देने के लिये अनूठे उपक्रम किये हैं। हिन्दी राष्ट्रीयता एवं राष्ट्र का प्रतीक है, उसकी उपेक्षा एक ऐसा प्रदूषण है, एक ऐसा अंधेरा है जिससे छांटने के लिये ईमानदारी से लड़ना होगा। क्योंकि हिन्दी ही भारत को सामाजिक-राजनीतिक और भाषायिक दृष्टि से जोड़नेवाली भाषा है। हिन्दी को सम्मान दिलाने के लिये नायडू के प्रयास राष्ट्रीयता को सुदृढ़ करने की दिशा में एक अनुकरणीय एवं सराहनीय पहल है। ऐसा करके वे महात्मा गांधी, गुरु गोलवलकर और डाॅ. राममनोहर लोहिया के सपने को साकार कर रहे है।
देश में एक तबका अंग्रेजी मानसिकता का है। जो आवश्यक मानदंडों की उपेक्षा करते हुए जिस तरह की भाषाई विकृतियां प्रस्तुत कर रहा है, उस पर हल्ला बोलने की आवश्यकता है। लेकिन हम में यानी हिन्दीभाषियों में अपनी मातृभाषा के प्रति प्रेम और प्रतिबद्धता अभी तक जागृत नहीं हो पाई है।  वैंकय्या नायडू के इस ताजा बयान ने भारत के अंग्रेजी मानसिकता के दिमागों में खलबली मचा दी है। कई अंग्रेजी अखबारों और टीवी चैनलों ने वैंकय्याजी के बयान पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनके खिलाफ अंग्रेजी अखबारों में लेख लिखे जा रहे हैं? क्यों हो रहा है, ऐसा? क्योंकि उन्होंने देश के सबसे बौद्धिक और ताकतवर तबके की दुखती रग पर उंगली रख दी है।
हिन्दी भाषा का मामला भावुकता का नहीं, ठोस यथार्थ का है। हिन्दी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही हमारी राजभाषा भी है, यह हमारे अस्तित्व एवं अस्मिता की भी प्रतीक है, यह हमारी राष्ट्रीयता एवं संस्कृति की भी प्रतीक है। भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद ही हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रचारित-प्रसारित करने के लिए 1953 से सम्पूर्ण भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। गांधीजी ने राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी की वकालत की थी। वे स्वयं संवाद में हिन्दी को प्राथमिकता देते थे। आजादी के बाद सरकारी काम शीघ्रता से हिन्दी में होने लगे, ऐसा वे चाहते थे। राजनीतिक दलों से अपेक्षा थी कि वे हिन्दी को लेकर ठोस एवं गंभीर कदम उठायेंगे। लेकिन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति से आक्सीजन लेने वाले दल भी अंग्रेजी में दहाड़ते देखे जा सकते हैं। हिन्दी को वोट मांगने और अंग्रेजी को राज करने की भाषा हम ही बनाए हुए हैं। कुछ लोगों की संकीर्ण मानसिकता है कि केन्द्र में राजनीतिक सक्रियता के लिये अंग्रेजी जरूरी है। ऐसा सोचते वक्त यह भुला दिया जाता है कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जैसे शीर्ष पर बैठे नेता बिना अंग्रेजी की दक्षता के सक्रिय और सफल है। नायडू एक अहिन्दी प्रांत से होकर भी हिन्दी में बोलते हैं, उसे आगे बढ़ाने की बात करते हैं।
हिन्दी राष्ट्रीयता की प्रतीक भाषा है, उसके लिये नायडू की संवेदना और दर्द बार-बार उजागर हो रहा है, लेकिन अंग्रेजी तबका उन पर ‘हिंदी साम्राज्यवाद’ का आरोप लगा रहा है और उनके विरुद्ध उल्टे-सीधे तर्कों का अंबार लगा रहा है। नायडू ने यह तो नहीं कहा कि अंग्रेजी में अनुसंधान बंद कर दो, अंग्रेजी में विदेश नीति या विदेश-व्यापार मत चलाओ या अंग्रेजी में उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान का बहिष्कार करो। उन्होंने तो सिर्फ इतना कहा है कि देश की शिक्षा, चिकित्सा, न्याय प्रशासन आदि जनता की जुबान में चलना चाहिए। दो मराठी या बांग्ला भाषी लोग अंग्रेजी जानते हुए भी अपनी भाषा में बात करते हुए गर्व महसूस करते हैं। लेकिन हिन्दी में प्रायः ऐसा नहीं होता। हिन्दी वाला अपनी अच्छी हिन्दी को किनारे कर कमजोर अंग्रेजी के साथ खुद को ऊंचा समझने का भ्रम पालता है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों हम खुद ही अपनी भाषा एवं अपनी संस्कृति को कमजोर करने पर तुले हैं?
भारत लोकतांत्रिक राष्ट्र है लेकिन लोक की भाषा कहां है? हिन्दी को हमने पांवों में बिठा दिया है और अंग्रेजी को सिंहासन पर बिठा रखा है। नायडूजी अंग्रेजी का नहीं, उसके वर्चस्व का विरोध कर रहे थे। यदि भारत के पांच-दस लाख छात्र अंग्रेजी को अन्य विदेशी भाषाओं की तरह सीखें और बहुत अच्छी तरह सीखें तो उसका स्वागत है लेकिन 20-25 करोड़ छात्रों के गले में उसे पत्थर की तरह लटका दिया जाए तो क्या होगा? हिंदी को दबाने की नहीं, उपर उठाने की आवश्यकता है।  लेकिन अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण आज भी हिन्दी भाषा को वह स्थान प्राप्त नहीं है, जो होना चाहिए। चीनी भाषा के बाद हिन्दी विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है। भारत और अन्य देशों में 70 करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। पाकिस्तान की तो अधिकांश आबादी हिंदी बोलती व समझती है। बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, तिब्बत, म्यांमार, अफगानिस्तान में भी लाखों लोग हिंदी बोलते और समझते हैं। फिजी, सुरिनाम, गुयाना, त्रिनिदाद जैसे देश तो हिंदी भाषियों द्वारा ही बसाए गये हैं। दुनिया में हिन्दी का वर्चस्व बढ़ रहा है, लेकिन हमारे देश में ऐसा नहीं होना, बड़े विरोधाभास को दर्शाता है।
हिन्दी को सही अर्थों में राष्ट्र भाषा का दर्जा नहीं मिलने के पीछे सबसे बड़ी बाधा सरकार के स्तर पर है क्योंकि उसके उपयोग को बढ़ावा देने में उसने कभी भी दृढ़ इच्छा शक्ति नहीं दिखाई। सत्तर साल में बनी सरकारों के शीर्ष नेता यदि विदेशी राजनेताओं के साथ हिन्दी में बातचीत का सिलसिला बनाये रखते तो इससे तमाम सरकारी कामकाज में हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा मिलता। प्रसन्नता हैं कि वर्तमान प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इस दिशा में पहल की है। उन्होंने अपनी विदेश यात्राओं में हिन्दी में भाषण देकर और विदेशी प्रतिनिधियों से हिन्दी भाषा में ही बातचीत करके एक साहसिक उपक्रम किया है। प्रधानमन्त्री की यह भावना राष्ट्र भाषा के प्रति सम्मान और समर्पण को दर्शाती है।
किसी भी देश की भाषा और संस्कृति किसी भी देश में लोगों को लोगों से जोड़े रखने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। भाषा राष्ट्र की एकता, अखण्डता तथा प्रगति के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है। कोई भी राष्ट्र बिना एक भाषा के सशक्त व समुन्नत नहीं हो सकता है अतः राष्ट्र भाषा उसे ही बनाया जाता हैं जो सम्पूर्ण राष्ट्र में व्यापक रूप से फैली हुई हो। जो समूचे राष्ट्र में सम्पर्क भाषा के रूप में कारगर सिद्ध हो सके। राष्ट्र भाषा सम्पूर्ण देश में सांस्कृतिक और भावात्मक एकता स्थापित करने का प्रमुख साधन है। महात्मा गांधी ने सही कहा था कि राष्ट्र भाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की एकता और अखण्डता तथा उन्नति के लिए आवश्यक है।’ राष्ट्र भाषा के रूप में हिन्दी को प्रमुखता से स्वीकार किया गया है। क्योंकि इसे बोलने वालों की सर्वाधिक संख्या है। यह बोलने, लिखने और पढ़ने में सरल है। इसलिये शिक्षा का माध्यम भी मातृभाषा होनी चाहिए क्योंकि शिक्षा विचार करना सिखाती है और मौलिक विचार उसी भाषा में हो सकता है जिस भाषा में आदमी सांस लेता है, जीता है। जिस भाषा में आदमी जीता नहीं उसमें मौलिक विचार नहीं आ सकते। अंग्रेजी बोलने वाला ज्यादा ज्ञानी और बुद्धिजीवी होता है यह धारणा हिन्दी भाषियों में हीन भावना ग्रसित करती है। हिन्दी भाषियों को इस हीन भावना से उबरना होगा। हिन्दी किसी भाषा से कमजोर नहीं है। हमें जरूरत है तो बस अपना आत्मविश्वास मजबूत करने की। यह कैसी विडम्बना है कि जिस भाषा को कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारत में समझा जाता हो, उस भाषा के प्रति घोर उपेक्षा व अवज्ञा के भाव, हमारे राष्ट्रीय हितों में किस प्रकार सहायक होंगे। हिन्दी का हर दृष्टि से इतना महत्व होते हुए भी प्रत्येक स्तर पर इसकी इतनी उपेक्षा क्यों? इस उपेक्षा को उपराष्ट्रपति वैंकय्या नायडू के अनूठे प्रयोगों से ही दूर किया जा सकेगा। इसी से देश का गौरव बढ़ेगा।

6 thoughts on “वेंकैया नायडू का हिन्दी भाषा का दर्द समझें

  1. यहाँ अपनी निम्नलिखित टिप्पणी द्वारा मैं पाठकों के ध्यान में यह बात लाना चाहता हूँ किस प्रकार देश के समाचार विदेश में रहते एनआरआई द्वारा भेजे अथवा आमंत्रित लेख “Language is no zero-sum game: For India, learning English does not come with costs—it only brings benefits, by Devashish Mitra, IE October 11, 2018” प्रकाशित कर भारतीयों को पथ-भ्रष्ट कर रहे हैं| इंसान

    मेरी टिप्पणी: The foremost economic benefit of having English as an official language is for Nehru’s India to have her children, including the author himself, earn a living outside the country. Compare them with those indentured as laborers to work on sugar plantations in the Caribbean!

    The devastating cost of learning English language in India must be viewed in a scenario where despite centuries of British rule the language failed to find favor with majority of the natives, especially when English language reigned freely in our universities and institutions of higher learning since after the so-called independence. The author is merely playing cruel politics of language in a country already suffering from the consequences of a deep-rooted conspiracy by Nehru’s Congress of not devising a national language of Indian origin, not only for communication among all Indians across the country but most importantly for educating ourselves. I dare ask the author to tell me why an Indian has no right to acquire higher education in science and technology in his or her own native language?

    Today, our English-medium educational factories are churning out graduates to go to the developed countries to live a life in comfort while millions speaking Malayalam, Urdu, Hindi or any other language you name, are toiling hard in the sultry hot weather in the Middle East. I can see Indians gazing at their smartphones in a lounge at the airport in the West and those squatting on the floor huddled together waiting for their flight home at an obscure part of the Doha airport. And here, Mitra brings politics of language back to feed on the follies of the 1885-born Indian National Congress. Don’t you forget they gave you a mere sum of eight dollars with your P form when you left your poor country. You, their कमाऊ-पूत sent home tons of foreign currency to support a system hitherto designed to keep you divided so that you could never even suspect if it was the extension of the Raj or real freedom!”

  2. मेरे विचार में नेहरु के कांग्रेस-राज की सेवा में लगे “हिन्दी की दुर्दशा के लिये हिन्दी वालों का जितना हाथ है, उतना किसी अन्य का नहीं।” को प्रमाणित करते शोधकर्ताओं को भारतीय नागरिकों के सार्वजनिक ज्ञान के लिए खोज निकालना होगा कि विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, और अन्य उच्च स्तरीय शिक्षा संस्थाओं में कला, विज्ञान, व प्रोद्योगिकी विषयों में हिंदी भाषा शिक्षा का माध्यम क्योंकर न बन पाई ताकि वर्तमान शिक्षा पद्धति के चलते राष्ट्रीय शासन में नीति निर्माता व समाज में अग्रणी आने वाली पीढ़ियों के लिए भाषा को लोकप्रिय बनाने हेतु उपचारात्मक उपाय ढूँढ निकालें|

    सम्पादक जी से मेरा विनय अनुरोध है कि ललित गर्ग जी द्वारा लिखा प्रस्तुत निबंध “जरुर पढ़ें राष्ट्र-भाषा” प्रवक्ता.कॉम पर “Popular” स्तम्भ के नीचे सम्मिलित होना चाहिए ताकि हिंदी भाषा को लेकर सभी पाठक वेंकैया नायडू का हिन्दी भाषा का दर्द समझें व अपना दर्द ब्यान करते रहें|

    1. आज के युग में धरती पर राम-राज्य सा अनुभव व आनंद लेते मैं जब कभी “पर्यटक” बने घर से मैनहैट्टन की ओर निकलता हूँ तो अप्रवासियों द्वारा निर्मित लगभग चार सौ तीस बोली जाती भाषाओँ वाले संयुक्त राष्ट्र अमरीका में भारतीय विभिन्नता के समान वातावरण देखता हूँ| तिस पर अन्य परिस्थितियों के रहते समस्त राष्ट्र के शासकीय व निजी विद्यालयों में अमेरिकन इंग्लिश अनिवार्य होने के फलस्वरूप सभी को उनके पुरुषार्थ और योग्यता अनुसाए व्यक्तिगत विकास व प्रगति के अवसर प्राप्त किये देखता हूँ| भारत मैं प्रत्येक वयस्क के हाथों में सेल फोन देखता हूँ तो सोचता हूँ कि इस उपकरण का प्रयोग करते वह सचमुच्च बुद्धिमान व चतुर है तो उसे यदि भारतीय मूल की भाषा में विद्या मिली होती तो आज इक्कीसवीं सदी में वैश्वीकरण व उपभोग्तावाद के चलते वह क्योंकर दलित बना रह जाता?

  3. बात बिलकुल सही है. मैंने भी इसपर बहुत से लेख लिखे हैं. आप “हिंदी दशा और दिशा” नेट पर खोज कर देखिए.रोना इसी बात का है कि हम सब भाषण देना जानते हैं सुझाव देना जानते हैं पर उसका कार्यान्वयन की किसी और से उम्मीद करते हैं. हिंदी कुंचज के मेरे विशिष्ट पृष्ठ “www.hindikunj.com/p/mr.html” पर आप मेरे हिंदी के बहुत से लेख देख सकते हैं

    अयंगर एम आर

    1. गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी सीखने की इच्छा रखने वालों को नि;शुल्क हिन्दी कोचिंग और हिन्दी अध्ययन सामग्री भी हिन्दी – प्रेमी अपने स्तर से मुफ्त उपलब्ध करवाएँ और उनकी मातृभाषा व स्थानीय संस्कृति के सम्मान के साथ उन्हें हिन्दी सिखाएँ ( विदेशों में हम सभी ऐसे कर रहे हैं – अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है ) !!!
      शिक्षण संस्थानों में जहां अंग्रेजीपरस्त अधिकारी हैं — वे षड्यंत्र करके सभी हिन्दी पदों जैसे — हिन्दी विभागाध्यक्ष- हिन्दी अधिकारी आदि पदों पर गैर हिन्दी या हिन्दी विरोधियों को बैठाकर हिन्दी का अधिकतम नुकसान कर रहे हैं और खानापूर्ति के लिए दिखावा भी हो जाता है कि मैं सरकारी आदेशों को मानकर हिन्दी को बढ़ावा दे रहा हूँ ??? हिन्दी प्रेमियों को सावधान रहकर इनका पता करके राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर जबर्दस्त विरोध करना चाहिए ( उदाहरण के तौर पर अभी जहां मैं काम करता हूँ — गैर हिन्दी भाषी हिन्दी एच ओ डी ने 2016 में हिन्दी दिवस नहीं मनाया , हिन्दी पाठ्यक्रम में होने के बावजूद व अन्य शिक्षक-शिक्षिकाओं के निवेदन के बावजूद कक्षा – 6 के पाठ्यक्रम से ” महारानी लक्ष्मीबाई ” तथा कक्षा – 7 से ” वीर कुंअर सिंह ” जैसे महत्वपूर्ण पाठों को कोर्स से हटा दिया ???— फिर मैंने स्कूल कमेटी से बात करके 2017 से पुन: इन्हें लागू करवाया फिर भी हिन्दी को कमजोर करने के लिए क्लास – 9 उन्हीं से पढ़वाया जा रहा है जिन्हें हायर क्लास पढ़ाने का अनुभव नहीं है और वे इंटेरेस्टेड भी नहीं हैं ( स्कूल मैनेजमेंट कमेटी की मीटिंग में हिन्दी एच ओ डी ने कहा भी था, “मैं क्लास – 1 to 5 ही पढ़ाना चाहती हूँ |”? ?——— गल्फ के लगभग सभी देशों के इन्डियन स्कूलों पर इनका बर्चस्व है – कैम्ब्रिज बोर्ड इनको परमीशन दे नहीं रहा है स्टेट बोर्ड का परमीशन विदेश में अलाऊ नहीं है – मजबूरन ये सीबीएसई में रजिस्टर्ड हैं – हिन्दी पढ़ना नहीं चाहते हैं और ये अपनी नाराजगी हिन्दी शिक्षक-शिक्षिका पर उतारते हुए अपने बच्चों तक से उन्हें बेइज्जत करवाते हैं :—
      1) २२ सालों के अनुभव, ६१ साल की उम्र विनयी स्वभाव वाले श्री शांति शुक्ल ०४-१२-१६ ( इतवार – यहाँ शुक्रवार को छुट्टी होती है – इतवार वर्किंग होता है ) क्लास 5-सी में हिन्दी शिक्षण के लिए गए – सभी स्टूडेंट्स गुड मार्निंग बोले पर अधिकतर मलयाली स्टूडेंट्स ने “ पट्टी – बेगर ” कहा , मलयालम में पट्टी का अर्थ कुत्ता होता है शुक्ला जी जैसे अनुभवी आदमी समझ गए पर बात को टालते हुए बोर्ड पर हिन्दी लिखने लगे – उन्हीं में से कुछ मलयाली बच्चे – बच्चियों ने ही चिल्लाना शुरू किया :– “ सर इन लोगों ने आपको पट्टी – कुत्ता – भिखारी बोला – ऐसी आवाजें जब अधिक बढ़ गईं तो मजबूरन शुक्ला जी को ऐसी गंदी बातें करने में अगुआ बच्चे को लेकर इंचार्ज फहीम खान के पास जाना पड़ा – इंचार्ज ने पैरेंट्स को इन्फार्म करके यथासंभव अनुशासनात्मक कार्यवाहियाँ कीं , अगले दिन बच्चे की माँ ने आकर मलयाली प्रिंसिपल के सामने शुक्ला जी को बुलाकर बहुत हंगामा डाट –डपट किया और मलयाली प्रिंसिपल के दबाव से शुक्ला जी को सॉरी कहना पडा – आँखों में आंसू केवल शुक्ला जी के ही नहीं आए हम सभी हिन्दी टीचर्स रो पड़े – केवल यहीं तक नहीं – उसके बाद से कई दिनों तक रिसेस टाइम में मलयाली बच्चे फील्ड में नारे लगाते थे – एक बच्चा बोलता था – शुक्ला जी –तो अन्य दुहराते थे – पट्टी हैं –बेगर हैं — पर क्या करें लोकल कमेटी और राजधानी में बैठी सेन्ट्रल कमेटी और अधिकारी सभी में मलयाली और हिन्दी विरोधी हैं ?——- === ===== ( सुझाव :– आप सभी लोग विदेश मंत्रालय को विशेषकर सुषमा स्वराज मैडम से निवेदन कीजिए कि वे सभी दूतावासों को निर्देश दें कि स्कूल कमेटियों में हिन्दी विरोधियों को न रखा जाए ! ) ——
      2) जैसे लोग गंजी-बनियाइन बदलते हैं ये वैसे हिन्दी टीचर बदलते हैं –२०१० से लेकर २०१५ तक –मित्तल सर,गुप्ता जी, कौर मैम, एम.पी. शुक्ला आदि सीनियर टीचर को एक ही स्कूल से निकाला गया, एमपी शुक्ला वाइस प्रिंसिपल भी थे – | —————– इसी तरह भारत के डी अंबानी विद्या मंदिर रिलायंस ग्रीन्स जामनगर गुजरात में जहां की स्कूल चेयरमैन मुकेश अंबानी की पत्नी नीता अंबानी हैं – – 14 सितंबर 2010 को हिन्दी दिवस के दिन जब प्राचार्य मिस्टर एस सुंदरम को आशीर्वाद के शब्द कहने के लिए माइक पर बुलाया गया तो उन्होंने कहा , ” बच्चों हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं है – हिन्दी टीचर आपको गलत सिखाते हैं , आप नए जमाने के बच्चे हो – गांधी को छोड़ो फेसबुक को अपनाओ , पैर छूना गुलामी की निशानी है , माता-पिता भी डांटें तो पुलिस में शिकायत कर सकते हो ” कृपया माइक पर ऐसे न कहें ऐसे कहने से बच्चों में गलत संस्कार आएंगे ये निवेदन करने पर हिन्दी शिक्षण में लगे पुराने व अनुभवी 2 हिन्दी भाषियों को रिलायंस कंपनी ने नौकरी से निकाल दिया , आज वहाँ श्रीमती शोभा दहीफले हिन्दी विभागाध्यक्षा है जिन्होंने एक विषय के रूप में कभी हिन्दी पढ़ा ही नहीं और जिनको राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त प्राचार्य श्री जी थंगादुरई ने हिन्दी शिक्षिका के लिए भी नहीं चुना था — आप कल्पना कीजिए वहाँ हिन्दी की क्या दशा होगी – नौकरी के डर से कोई बोल भी नहीं सकता है –जिनको कोई संदेह या विस्तृत जानकारी चाहिए वे वाट्स अप नंबर – +919428075674 पर संपर्क कर सकते हैं — पर आपका धर्म-ईमान क्या कहता है ??? – कुछ कीजिए ? ? ? ? ?

      समाधान ‌‌ :——- गृहमंत्रालय के निर्देशन में सीबीएसई की निरीक्षण टीम अचानक जाँच करे और ऐसे दुष्कृत्य में लगे लोगों को गिरफ्तार करके उनपर राष्ट्रद्रोह के मुकदमे चलाए जाएँ !
      2) शिक्षक-शिक्षिकाओं के पर्सनल फाइल लिखने,परमोसन, किसी एवार्ड के लिए नॉमिनेट करने,एच.ओ.डी.-इंचार्ज आदि बनाने,बढ़ोत्तरी तथा मिसलेनियस एकाउंट के पावर अंग्रेजी परस्त प्राचार्यों से तुरंत ले लिए जाएं

    2. माड़भूषि रंगराज अयंगर जी, अभी राष्ट्र गान का आदर और हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी आपके केवल दो ही निबंध पढ़ मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ कि हिंदी भाषा के प्रचलन और विकास हेतु सुझाए अथवा चिरकाल से गाए गए उपक्रमों व उपायों का कार्यान्वयन होना बहुत ही आवश्यक है क्योंकि उनको कार्यान्वित करते राष्ट्रीय शासन में नीति-निर्माता नेहरु की कांग्रेस द्वारा रचाए दूषित वातावरण दूर कर सुधार ला पाएंगे| अपने आकाओं के चरण-चिन्हों पर चलते नेहरु की कांग्रेस ने (राष्ट्र-हित कांग्रेस में आज सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा का अनावरण उनके प्रति राष्ट्र का सम्मान है) आज राष्ट्र को अंग्रेजी की गुलामी के ऐसे चक्रव्यूह में फंसा रखा है जिसे अनुकूल समय केवल आपके हमारे व आंध्र प्रदेश से मुप्पवरपु वेंकैया नायडू जी व अन्य समस्त भारतीयों के कांग्रेस-मुक्त भारत में ही भेदा जा सकेगा| मुझ बूढ़े पंजाबी ने युवावस्था में दिल्ली तमिल संगम में तमिल की वर्णमाला सीखी थी, वर्षों पश्चात एक माह कन्याकुमारी व अन्य दक्षिणी भारत के शहरों में भ्रमण करते बसों पर लिखे उनके गंतव्य स्थान को पढ़ने में कोई कठिनाई नहीं हुई| बचपन में देखा चल-चित्र భక్త పోతన भक्त पोतना आज भी हृदय में समाया हुआ है| हम भारतीय हैं और हमारी सोच में कांग्रेस की “विभिन्नता में एकता” नहीं केवल राष्ट्र-हित विभिन्न विचारों की एकता होनी चाहिए| संगठन होना चाहिए| धन्यवाद|

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