उठे कहाँ मन अब तक !

शब्द परश रूप गंध, रस हैं तन्मात्रा;
छाता जब श्याम भाव, होता मधु-छत्ता !

राधा भव-बाधा हर, मिल जाती भूमा;
अणिमा महिमा गरिमा, भा जाती लघिमा !
तनिमा तरती जड़ता, सुरभित कर उर कलिका;
झंकृत तन्त्रित झलका, सुर आता रस छलका !

उठे कहाँ मन अब तक, जाति वर्ग सीमा;

समझे ना वे भूमा, आत्मिक भव महिमा !

गुलदस्ता जीवन पा, प्रति प्रसून भाये ना;
मन लाए एक रंग, ता में भरमाये !
सीमित गति जगती प्रति, प्रकृति उत्तिष्ठित ना;
उमगा ना मन मयूर, आनन्दित नाचा ना !

खिला कहाँ चित चकोर, मुरली धुनि सुनी कहाँ;
वीणा हिय बजी कहाँ, दीखे घनश्याम कहाँ !
आओ भूलो प्रतिमा, देखो नयनन कान्हां;
हर ‘मधु’ के उर उपवन, बृन्दावन बिन सीमा !

शब्द परश रूप गंध !

शब्द परश रूप गंध, रस हैं तन्मात्रा;
छाता जब श्याम भाव, होता मधु-छत्ता !

राधा भव-बाधा हर, मिल जाती भूमा;
अणिमा महिमा गरिमा, भा जाती लघिमा !
तनिमा तरती जड़ता, सुरभित कर उर कलिका;
झंकृत तन्त्रित झलका, सुर आता रस छलका !

तन तब तरजित ऊर्जित, आत्मा को झलकाता;
थिरकाता हर इन्द्रिय, कणिका मणि किलकाता!
झलमल औ ओतप्रोत, भव भावों भर जाता;
भूतों की भित्ति तर, ‘मधु’ भर्त्ता प्रभु वरता !

रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’

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