वैदिक धर्म की रक्षक गुरुकुल शिक्षा प्रणाली


मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

               वैदिक धर्म सनातन धर्म है। इसका आरम्भ ईश्वर प्रदत्त ज्ञान से हुआ है जिसे वेद कहते हैं। वेद संख्या में चार हैं जिनके नाम ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं। इन चार वेदों में ईश्वर ने मनुष्यों को उनके ज्ञान, कर्म व उपासना सहित कर्तव्यों की शिक्षा दी है। इसके साथ ही ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति, इन तीन मूल अनादि तत्वों का ज्ञान भी वेदों से होता है। वर्तमान में वेदों के आधार पर ऋषियों द्वारा प्रणीत दर्शन व उपनिषद् आदि अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं। इनसे भी वेद विषयक अनेक विषयों का ज्ञान प्राप्त होता है। ऋषि दयानन्द जी का सत्यार्थप्रकाश’ मुख्य ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में वेदों सहित वेद के अनेक विषयों से सम्बन्धित सामग्री उपलब्ध है जिससे वेदों का प्रायः समग्रता से ज्ञान होता है। ऐसा अद्भुत ग्रन्थ इससे पूर्व नहीं लिखा गया। वेद के संस्कृत भाषा में होने तथा इस भाषा की जानकारी न रखने वाले बन्धुओं को वेद का पठन पाठन करने में असुविधा होती है। अतः वेदों पर आधारित तथा वेद की मान्यताओं से युक्त सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ ही वेद सम्मत धर्मग्रन्थ है जिससे मनुष्य को वैदिक धर्म को जानने व पालन में सहायता मिलती है। संसार में अनेक ग्रन्थों को मत-पन्थ-सम्प्रदाय का ग्रन्थ व धर्मग्रन्थ भी कहा जाता है। मत-पन्थों के यह सभी ग्रन्थ मुनष्यों द्वारा रचित हैं और विद्या-अविद्या दोनों से युक्त हैं। अविद्या ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है और मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति में बाधक है। यह मान्यता है कि यदि किसी ग्रन्थ में थोड़ी भी अविद्या है तो वह विष ये युक्त भोजन के समान त्याज्य है। संसार में वेद ही ऐसे ग्रन्थ हैं जो ईश्वर प्रदत्त ज्ञान होने से अविद्या से सर्वथा मुक्त है। वेद के बाद 6 दर्शन व 11 उपनिषदें वेदानुकूल ऋषिकृत रचनायें हैंं। इनका भी अध्ययन व अनुसरण करना लाभप्रद है। ऋषि दयानन्द द्वारा रचित सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन वैदिक सिद्धान्तों एवं मान्यताओं के अध्ययन में सरलतम एवं सर्वाधिक लाभप्रद है। इसके अध्ययन से वेद, दर्शन एवं उपनिषद की मान्यताओं का भी ज्ञान हो जाता है। ऋषि दयानन्द जी उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में वेदों का यथार्थ ज्ञान रखने वाले सबसे बड़े महापुरुष थे। उनके ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि यह लोकभाषा हिन्दी में लिखा गया है। इसे संस्कृत से अपरिचित और केवल देवनागरी के अक्षरों का ज्ञान रखने वाला साधारण मनुष्य भी जान व समझ सकता है। आर्यसमाज का अनुयायी सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन करके सभी मत-पन्थों के अनुयायी व आचार्यों से किसी भी धार्मिक व सामाजिक विषय में वार्तालाप व संवाद कर वैदिक धर्म की श्रेष्ठता को सिद्ध कर सकता है।

               वैदिक धर्म एवं सस्कृति के आधार व मूल ग्रन्थ वेद हैं और इतर वेदानुकूल ग्रन्थ उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, रामायण एवं महाभारत आदि हैं। यह सभी ग्रन्थ संस्कृत भाषा में हैं। अतः वैदिक धर्म का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के लिये संस्कृत भाषा का ज्ञान आवश्यक है जिससे वेदों के सत्य अर्थों को जाना जा सके व साधारण लोगों को उसका ज्ञान कराया जा सके। वेदों का ज्ञान कराने के लिये ही सृष्टि के आरम्भ में हमारे ऋषियो ंने गुरुकुलों की स्थापना कर युवा स्त्री-पुरुषों वा बालक-बालिकाओं को संस्कृत भाषा, व्याकरण व वेदों के अर्थों का ज्ञान कराया था। समय बीतने के साथ अन्य विद्याओं व विषयों का विस्तृत ज्ञान भी उपलब्ध हुआ। यह समस्त ज्ञान गुरुकुलों में ब्रह्मचारियों को पढ़ाया जाने लगा। प्राचीन काल में गुरुकुलों में पढ़ने वाले संस्कृत के विद्वान, योगी, महात्मा, मुनि व ऋषि बनते थे। वह इस सत्य को जानते थे कि पंचभूतों से बना यह संसार नाशवान है। मनुष्य का शरीर भी पंचभूतों से बना होने से यह भी नाशवान व मृत्यु को प्राप्त होने वाला है। इन तथ्यों को जानने के कारण अधिकांश लोग सम्पन्नतायुक्त सामाजिक जीवन व्यतीत करते हुए भी आध्यात्मिक जीवन पर विशेष ध्यान एवं बल देते थे।  इसी कारण हमारा धर्म व संस्कृति पूरे विश्व में पढ़ी व जानी जाती थी तथा विश्व भर के लोग वेद और ऋषियों से प्रेरणा लेते थे। सत्यार्थप्रकाश में इससे जुड़े तथ्यों का दिग्दर्शन वा संकेत किया गया है। महाभारतकाल तक वेद व संस्कृत भाषा का विश्व भर में प्रचार था। संसार में वेद व उपनिषदों आदि के ग्रन्थों के अतिरिक्त धर्म विषयक अध्ययन का अन्य कोई ग्रन्थ नहीं था। महाभारत युद्ध के बाद ज्ञान विज्ञान का पतन हुआ और देश विदेश में वेदों का प्रचार व प्रसार बन्द हो गया। इसके परिणामस्वरुप ही विश्व में अनेक अवैदिक मतों का विभिन्न पुरुषों द्वारा आविर्भाव हुआ। इन्हें ईश्वर का पुत्र व सन्देशवाहक भी कहा जाता है। आर्यसमाज शब्दों के अर्थों के अनुरुप व वैदिक ज्ञान के आधार पर विभिन्न विषयों का निर्णय करता है। उसके अनुसार समस्त जीवात्मायें, मनुष्य आदि प्राणी व जीव-जन्तु ईश्वर के पुत्र व पुत्रियां ही हैं। जो मनुष्य ज्ञान प्राप्त कर ईश्वर के वेद के सन्देश का प्रचार प्रसार करता है जैसा कि हमारे ऋषियों, विद्वानों, ऋषि दयानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम जी, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी आदि ने किया, इससे यह लोग भी ईश्वर के सन्देशवाहक ही हैं। वर्तमान में भी जो वैदिक विद्वान वेदों के सन्देश का जन-जन में प्रचार कर रहे हैं, वह भी ईश्वर के सन्देश का प्रचार करने वाले व ईश्वर के सन्देशवाहक कहे व माने जा सकते हैं। आज परिस्थितियां ऐसी हैं कि वेदमत का प्रचार कम व मत-पन्थों का प्रचार अधिक है। ऋषि दयानन्द जी ने एक नियम दिया है कि अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये। अविद्या का अर्थ मत-पन्थों में निहित अविद्या भी सम्मिलित है। अतः इस अविद्या का निवारण वेद व उसकी मान्यताओं का युक्ति, तर्क, प्रमाण, शास्त्रार्थ, चर्चा व संवाद आदि के द्वारा प्रचार कर ही किया जा सकता है। इसके साथ ही वेदों का ज्ञान मूलसंहिताओं एवं अर्थ सहित सुरक्षित रहे, इसकी भी आवश्यकता है। इस कार्य को सम्पादित करने के लिये गुरुकुलों की आवश्यकता है जो वेद व वैदिक संस्कृत भाषा का व्याकरण सहित अध्ययन व अध्यापन करायें। इन गुरुकुलों का उद्देश्य संस्कृत व वेद के विद्वान उत्पन्न करना ही हो सकता है जिससे वेदों के सत्यार्थ, वेदों के सत्य रहस्य, ईश्वर-जीवात्मा-प्रकृति विषयक ज्ञान, मनुष्य के कर्तव्यों से सम्बन्धित ज्ञान व कर्मकाण्ड विषयक जानकारी सामान्य जनता तक पहुंचती रहे।

               गुरुकुलीय शिक्षा पर विचार करते हैं तो हमें गुरुकुल वही प्रतीत होता है कि जहां ऋषि दयानन्द समर्थित आर्ष व्याकरण पाणिनी-अष्टाध्यायी-महाभाष्य का अध्ययन कर ब्रह्मचारी वेदमन्त्रों के अर्थ करने योग्यता व दक्षता से सम्पन्न हो। यदि कोई विद्यार्थी किसी गुरुकुल में पढ़कर स्नातक बनता है तो उसमें वेद, उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, रामायण व महाभारत के श्लोकों का बिना टीकाओं व भाष्यों के अध्ययन व प्रचार करने की योग्यता होनी चाहिये। हम जानते हैं कि हमारे सभी गुरुकुल अपने विद्यार्थियों को इस स्थिति तक नहीं ले जा पाते। इसमें गुरुकुल के विद्यार्थियों की भी इस स्तर का व्याकरणाचार्य न बनने की भावना व संकल्प का अभाव भी मुख्य होता है। अतः गुरुकुल के विद्यार्थियों को संस्कृत भाषा की व्याकरण का आचार्य तो बनना ही चाहिये जिससे वह अन्य विद्यार्थियों को पढ़ा सके और उन्हें वेदों व वैदिक साहित्य का उत्तम विद्वान बना सके। यदि हमारे गुरुकुल अपने गुरुकुलों में व्याकरणाचार्य तैयार कर रहे हैं तो वह निश्चय ही प्रशंसा के पात्र है। आर्यजगत को ऐसे गुरुकुलों की भरपूर सहायता एवं सहयोग करना चाहिये। ऐसे गुरुकुलों में विद्यार्थियों की संख्या अन्य शिक्षण संस्थाओं व गुरुकुलों से भले ही कम हो, परन्तु व्याकरण के आचार्य विद्वानों का आर्यसमाज में होना वेद की रक्षा व प्रचार के लिये आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं होगा तो भविष्य में गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली शिथिल व अव्यवस्थित हो सकती है। अतः आर्यसमाजों को संस्कृत के उच्च कोटि के विद्वानों व व्याकरणों के आचार्यों का पोषण, सम्मान व उनकी जीविका पर विशेष ध्यान देना चाहिये। संस्कृत का कोई भी विद्वान व आचार्य उपेक्षित नहीं होना चाहिये। गुरुकुलों में शिक्षित योग्य विद्वान आचार्यों को गुरुकुलों में रखकर ब्रह्मचारियों को संस्कृत का योग्यतम विद्वान बनाने का प्रयत्न करना चाहिये और उनसे धर्मोपदेश सहित अनेक विषयों पर लेखन व शोधपूर्ण पुस्तकें लिखवानी चाहियें जिससे उनकी विद्या सफल होकर देश व समाज में वेदों का प्रभावशाली प्रचार व प्रसार हो सके।

               धर्म प्रचार की दृष्टि से वर्तमान काल संक्रमण काल कहा जा सकता है। आज हमारा प्रचार व प्रसार आर्यसमाज मन्दिरों की चार दिवारी, इसके सत्संगों व उत्सवों तक ही सीमित हो गया है। हमारे विद्वानों को विद्यालयों व विश्वविद्यालयों में जाकर वेद के विषयों की आधुनिक परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिकता, उपयोगिता व सार्थकता पर भी चर्चा करनी चाहिये। योग एवं आयुर्वेद का प्रयार भी किया जाना चाहिये। योगमय जीवन ही वैदिक जीवन है। इसको अपना कर ही मनुष्य अपनी सर्वांगीण उन्नति कर सकता है। कोई भी आधुनिक विद्या व ज्ञान हेय नहीं है परन्तु आधुनिक ज्ञान के साथ हमें वेदों का ज्ञान होना चाहिये। इसके साथ हम ईश्वर स्तुति-प्रार्थना-उपासना व यज्ञ से भी जुड़े हुए होने चाहियें। ऐसा जीवन ही इस जीवन व परजन्म में हमें सुख व शान्ति दे सकता है। अतः सत्यार्थप्रकाश एवं अन्य ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों का अध्ययन करते हुए हम वेद एवं समस्त वैदिक साहित्य के अध्ययन से जुड़े रहें और अपनी योग्यता व क्षमता से लेखन व मौखिक प्रचार द्वारा वैदिक धर्म व संस्कृति का प्रचार करते रहें। गुरुकुलीय शिक्षा से अधिक से अधिक वेदों के विद्वान उत्पन्न किये जाने चाहियें। ऐसे ब्रह्मचारी जो वैदिक धर्म व संस्कृति की रक्षा का व्रत लें वही आर्यसमाज की रीढ़ का काम कर सकते हैं। इनको आर्यसमाज में सम्मान व रक्षण मिलना चाहिये। ऐसा होने पर ही विद्वान वेदों का कार्य करेंगे। हमने गुरुकुल के उद्देश्य विषयक कुछ चर्चा की है। इस विषय में पाठक अनेक प्रकार के सुझाव दे सकते हैं। ओ३म् शम्। मनमोहन कुमार आर्य

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