वनबीवी का जात्रागान

20 मई को चक्रवात आम्फान सुन्दरवन को ध्वस्त करते हुए गुजरा था। नाट्यकर्मी  अनिता मंडल, जो सुन्दरवन के एक प्रत्यन्त ग्राम में रहती है, अपने पति और बच्चों के साथ एक चारपाई के नीचे से रेंगती रही थीं। हवा  सिरीस और नारियल के विशाल पेड़ों को चीरती हुई गुजरती रही थी, उसके घर के छप्पर को उड़ा कर ले गई थी।पाँवो तले धरती काँप रही थी, चारपाई के पावों को उन्होंने कसकर पकड़ा हुआ था ताकि हवा उसे उड़ा न दे। अनीता वनबीवी से सहायता की पुकार करती जा रही थी।

   विश्व के सबसे बड़े तथा घने मैंग्रोव जंगल में घड़ियाल, साँप, शार्क तथा आदमखोर रॉयल बंगाल टाइगरों की घनी आबादी के निकट मनुष्य का वास है। इनमें से अनेक रोजी रोटी के लिए जंगल पर मछुवारों, केंकड़े पकड़ने वालों,मैंग्रोव वृक्षों पर मिलने वाले घने मधु को इकट्ठा करनेवालों के रुप में जीते हैं।

सुन्दरवन के बासिन्दों का मानना है कि आप जंगल में किसी भी समय घुस सकते हो, लेकिन वहाँ से सही सलामत निकलना वन बीवी के उपर निर्भर करता है। पिछले महीने में ही दो आदमी जंगल के अन्दर गए थे। उनम् से एक जलावन इकट्ठा करने और दूसरा मछली पकड़ने गए थे। बाघ दोनो को ही खा गए। इसीलिए सुन्दरवन में 102 द्वीप हैं। इनमें से 54 द्वीपों में मनुष्य की आबादी है। ये गाँव वन बीवी और उसके जुड़वाँ भाई शाह जंगली के मन्दिरों से भरे पड़े हैं। “जनकथा के अनुसार वन बीवी का जन्म साउदी अरब में हुआ था। उसे पिता फकीर इब्राहिम  मदीना में रहते थे और माँ गलाल मक्का की रहनेवाली थी। वनबीवी महसूस करती है कि उन्हें धरती पर एक ईश्वरीय उद्देश्य पूरा करने भेजा गया, इसलिए उन्हें मदीना छोड़ना पड़ेगा। यही वजह है कि वे सुन्दरवन आईं।“ कनाई लाल सरकार History of Sundarbans (2011),के लेखक, जोगोसाबा के एक गाँव लाहिरपुर में पैदा हुए थे

  पालागान वन बीवी और शाहजंगली के जन्म की कहानी के साथ भयावने दक्खिन राय और उसकी माँ नारायणी, (जो बाघ का प्रतिनिधित्व करते हैं) के साथ संघर्ष में विजय की गाथा का गीतिनाट्य प्रदर्शन है। कहानी के तीसरे भाग में मधु जमा करनेवालों का एक समूह दुखे नामक बालक के साथ जंगल के अन्दर जाता है। उसकी माँ नहीं चाहती है कि दुखे जंगल जाए, पर हतदरिद्र लोगों को तो भोजन के लिए कोशिश जंगल जाना ही पड़ता है. बदकिस्मती से दुखे नहीं लौटता है। मधु जमा करनेवाले उसकी मां को बताते हैं कि उसे बाघ ले गया और दुखे कभी भी माँ को गोद में वापस नहीं लौटेगा।।जंगल में दुखे  बीवी के पास गोहार लगाता है। वनबीवी दुखे का उद्धार करती हैं और उसे उसकी माँ के पास लौटा देती हैं।

खड़गपुर, आई आईटी के एसिस्टैंट प्राफेसर अमृता सेन रिसर्च के लिए सुन्दरवन गई थी तो जंगलों के अन्दर के गोसाबा के गाँवों में ठहरी थीं। उनका कहना, वहाँ के लोगों के बारे में, खासकर जो बहुत गरीब थे, एक बात मूल रुप से थी —- “वे अपने आपको बनबीवी के बेटे दुखे की जगह देखते हैं और अपने आपको वनबीवी की सन्तान मानते हैं।“ संसार के पर्यावरणीय नजरिए से सबसे नाजुक क्षेत्र में एक दृढ़ आचार संहिता का वर्चस्व है।जो इस विश्वास से जुड़ा है कि वनबीवी की कृपा से ही आदमी की जरुरतें पूरी होती हैं। द्वीपवासी विश्वास करते हैं कि वनबीवी के साम्राज्य में आदमी को बिना किसी हथियार के ही प्रवेश करना चाहिए उनका कहना है कि वनबीवी ने उन्हें यह निर्देश दिया है कि जंगल तभी प्रवेश किया जाना चाहिए जब मन पवित्र हो और हाथ खाली हों। वे अपने आपको पूरी तरह से दुखे समझते हैं। वनबीवी में दुखे की एकनिष्ठ आस्था उसकी रक्षा की थी। 

  वन बीवी में अपना विश्वास अभिव्यक्त करने का एक तरीका वन बीवी का पालागान है। पालागान बांग्ला के गीतिनाट्य का एक स्वरुप है।इसका  मंचन  सभी द्वीपों में हुआ करता है। सुन्दरवन द्वीपसमूह में  लगभग 30  टोलियाँ हैं पारम्परिक रुप से वनबीवी मन्दिरों के निकट सोलर लैम्प और बल्व की रोशनी में जंगल की सीमा कर के गाँवों में मंचन होता है। लोग अपनी दिनचर्या के तौर पर इनमें शरीक होते हैं। उनकी आस्था के है कि वे बाघों से भरे इस इलाके में वनबीवी की कृपा से ही जीवित हैं।

जंगल के कानून–

 वन बीवी पंथ मनुष्य के लोभ और अधिग्रहण की प्रवृतियों पर लगाम लगाता है। एक अलिखित संहिता द्वीप वासियों को जंगल के भीतर बन्दूक और दूसरे हथियार ले जाने को प्रतिबन्धित करती है।  द्वीप वासियों को जंगल में तभी प्रवेश करना चाहिए जब उन्हें आजीविका के लिए जरुरत पड़ जाए। .जंगल से, मधु, केकड़े, मछलियाँ या प्रॉन— अपनी जरुरत से अधिक नहीं लेना चाहिए। जंगल को किसी भी तरह अपवित्र नहीं करना चाहिए। धूम्रपान, शौच अथवा बर्तन इत्यादि धोकर जंगल में गन्दगी नहीं फैलानी चाहिए। लोक कथाओं के अनुसार शिकारी, लुटेरे और अन्य, जो वनदेवी की आज्ञा का पालन नहीं करते, बाघ के शिकार होते हैं। यह वनबीवी के द्वारा निर्धारित उनकी सजा है।

 साँझी समन्वयात्मक परम्परा–   इस पालागान की कहानी उन्नीसवीं सदी की किताब “वनबीवीर जौहरनामा” में मिलती है। जौहरनामा की भाषा मुसलमानी बांग्ला है जो बांग्ला लिपि में लिखी गई है। लेकिन यह किताब दाहिनी तरफ खुलती है जैसा अरबी किताबों में होता है। उसके उपासक वनबीवी की पहचान हिन्दु मुसलमान के लेबल से नहीं करते। उनके लिए वनबीवी एक जंगल की वह दैवी अस्तित्व है जिसका प्रभाव सभी समुदायों पर बराबरी से पड़ता है। जब लोग जौहरनामा का पाठ करते हैं तो वे बीच बीच में सामूहिक रुप से “बोल अल्लाह बोल” की पुकार करते हैं।

पालागान के पात्र उसके नायक नहीं हैं। वे प्रकृति के पात्र या भुक्तभोगी हैं। यह उस पाठ की तरह है जो महामारी की शक्ल में प्रकृति मनुष्य को पढ़ा रही है। वे आदिंम  अवस्था में—चमड़ी से ढंके हड्डी का ढाँचे हैं। प्रकृति के सामने असहाय और भयभीत। पालागान के अभिनेता मनोरंजन या शिक्षा ही नहीं देते, वे हमें प्रकृति के आगे पूर्ण आत्मसमर्पण करने की सीख भी देते हैं।. हम जब जंगल में जाचते हैं तो सोचते हैं, जो होगा सो होगा, उसके उपर बाद में सोचा जाएगा। यदि लौट कर आउँगा तो अच्छा, नहीं लौटूँ तो क्या किया जाएगा।

  जात्रा के एक अंश में विशाल रायमंगल नदी, जो इतनी बड़ी है कि उसके एक ओर से दूसरा छोर नहीं देखा जा सकता, के बीच में मछुवारे हैं, तभी आसमान में घने बादल घिर आते हैं। वे लहरों से हट जाने की प्रार्थना नहीं करते. वे आत्मसमर्पण कर देते हैं। नाविक से कहते हैं, तेजी से नाव खेओ। वनबीवी सहाय हैं. वे रक्षा करेंगी। जब बाघ मिले तो उससे लड़ना नहीं चाहिए,, उसके रास्ते से हट जाना चाहिए। अगर बाघ ने तुम्हें चु लिया है तो, केवल बीवी माँ ही तुम्हें बचा सकती हैं। गोसाबा ग्राम की अनुजा अधिकारी जात्रा गान में दुखे की मां का रोल करती हैं. उनको विश्वास है कि वनबीवी हारी रक्षा करती हैं। कुछ साल पहले दुखे की मआं का फात्र निभाकर वे घर लौट रही थीं, तो जानवर गी गंध नजदीक में मिली । बाघ नदी पार कर  जंगल से गाँव मेंआया हुआ था। मैं अपने आपसे कहती रही— मा आछे, असुविधा होबे ना।  एक ग्वाले के बथान में बाघ को देखा उसने. अगर बाघ को उसका आहार( गाय) नहीं मिला होता, मैं उस दिन जीवित नहीं रहती। अपने जात्रा गान के जरिए मैं लोगों से वनबीवी में आस्था रखने को कहना चाहती हूँ। 

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