लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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– पंकज झा

मेघ को दूत बनाने से लेकर ‘मोडेम’ के अग्रदूत बनने तक, सिंधु नदी घाटी से निकल कर सिलिकोन घाटी तक पहुचने का मानव संचार एवं सभ्यता का इतिहास कई आरोहों-अवरोहों से गुजरा है. किसी ने सच कहा कि अब कम से कम संचार माध्यमों में ‘भूगोल’ तो ‘इतिहास’ की वस्तु हो गया है. वैश्वीकरण के बाद समाज वास्तव में रक्तहीन क्रान्ति से गुजरा है. मानव ने सदियों की दूरी को अंगुलियों-चुटकियों में नाप देने की सफलता प्राप्त की है. यह सारी क्रान्ति सूचनाओं के विस्फोट के बिना असंभव था. वास्तव में इंटरनेट के द्वारा ही ‘सूचना’ को आज की सबसे बड़ी ताकत बनाने में सफलता हुई है. ज़ाहिर है हर अच्छी चीजों के बरक्श कुछ बुरी चीज़ें भी होती है या इसका उलटा भी उतना ही सच है. लेकिन अब कम से कम नए माध्यमों की उपादेयता से कोई भी इनकार करने की स्थिति में नहीं है. पिछलग्गू बने रहने के अपने स्वभाव के कारण भले ही भारत थोडा देर से जागा लेकिन अब असंख्य भाषाई पोर्टलों एवं ब्लॉगों के द्वारा हिन्दी का सुयश चारों ओर फ़ैलना प्रसन्नता की ही बात है.

तो समाज के हर क्षेत्र में भले ही क्रांतिकारी परिवर्तन हो गया लेकिन मानव का मौलिक गूण स्थाई है. बादशाहत एवं सफलता के लिए कुछ भी तो कर जाने की आदिम लालसा, दौलत शोहरत और इज्ज़त के लिए हद से गुजर जाने का स्वभाव. हालांकि शोहरत के मामले में वेब का हिन्दी जगत भले ही उपलब्धियों से भरा रहा हो लेकिन अन्य माध्यमों की तरह लोगों तक अपनी बढती पहुच या प्रसार संख्या का व्यावसायिक उपयोग करने में वह असफल रहा है. हाल ही में लाखों हिन्दी भाषी ब्लॉगर और पाठकों की जुबान पर चढा ‘ब्लोगवाणी’ नाम के अनोखे साईट का, अर्थाभाव के कारण बंद हो जाना इसका कृष्ण पक्ष है. यानी अगर आपके पास राज्याश्रय नहीं हो या फिर आपका कोई और धंधा नहीं हो तो भले ही आपने लाखों पाठक इकठ्ठा कर लिया हो. कंटेंट के मामले में आप कितने भी सक्षम हों. अलेकसा रेंकिंग आपको भले ही टॉप की साईट बताता हो लेकिन बाल-बच्चों के लिए कुछ घर ले जाने की बात तो जाने दीजिए, उस नेट कनेक्सन का शुल्क भी आप नहीं चुका पायेंगे जिसके द्वारा आप अपनी रेंकिंग देख कर गुमान करते हों. तो जो घर जारे आपना चले हमारे साथ, के हिन्दी सेवा के इस प्रकल्प में विकल्प क्या बचता है?

अभी कई पढ़े जाने वाले साईट के कर्ता-धर्ताओं ने अलग-अलग तरह से यही बात कहने की कोशिश की है कि अर्थाभाव के कारण वो आगे साईट चलाने में असमर्थ हैं. बकुल वे उन्होंने अपना अच्छा-ख़ासा कैरियर छोड़ कर इस माध्यम को अपनाया था. वे जनसरोकारों की बात करने वाले माध्यमों को ज़िंदा रखना चाहते हैं. उन्हें डिजिटल कैमरे चाहिए तो कंप्यूटर चाहिए. सीधे तौर पर पाठकों से पैसे चाहिए, वे कंपनियों से पैसे या विज्ञापन नहीं लेना चाहते आदि-आदि. बहुत भावुक होकर लिखे गए इन सभी पत्रों में कितना सही कितना गलत है, यह तो तय करना मुश्किल ही है. कुछ हद तक प्रयास इमानदारी भरा दिखता भी है. लेकिन क्या इस तरह से साईट का संचालन कर मेंटिनेंस के अलावा अपने लिए ब्रेड-बटर का इंतज़ाम करना संभव होगा? और अगर कोई एक-दो लोग ऐसा करने में अपवादस्वरूप सफल भी हो गए तो क्या यह नए मीडिया के हिन्दी जगत के लिए कोई नजीर बन सकता है? जब पाठक रद्दी के भी चौथाई दाम पर अखबार खरीदने के आदी हो गए हों. मल्टीप्लेक्स के एक टिकट के दाम पर महीने भर घर बैठ कर सारे चैनल देख पा रहे हों तो कहां संभव है कि वे लेख या रिपोर्ट पढ़ने के लिए पैसा खर्च करें? तो फिर सवाल यह पैदा होता है कि क्या इतनी तेज़ी से स्थान बनाते जा रहा यह माध्यम अपनी मौत मर जाएगा? क्या इसके व्यावसायिक उपयोग की कोई संभावना, मिहनत कर समाज को कुछ अच्छा देकर बदले में इज्ज़त के साथ दो जून ब्रेड-बटर का इंतज़ाम करने की ताकत इस माध्यम में नहीं है? यह सवाल एक यक्ष-प्रश्न बन कर सामने खड़ा है. आखिर तब किया क्या जाय?

तो सबसे पहले यह कि अगर आप इस नए सूरज के हमसफ़र बने हैं तो रेत का दरिया फलांग लेने की कूवत अपने अंदर लायें. अव्वल तो इस माध्यम को मोडरेट करते हुए कभी यह मुगालता ना पालें कि आप समाज का कोई उद्धार कर रहे हैं. सीधी सी बात यह है कि नब्बे प्रतिशत ईमानदार होकर भी आप एक सीमा तक सरोकार की बात कर भी सकते हैं. अगर आप बहुत शुद्धतावादी हों फिर भी यह सोच कर संतुष्ट हो सकते हैं कि अपने लाभ के लिए जिस दस प्रतिशत की बुरी बात आप सामने नहीं ला पा रहे हैं वह दूसरा साईट जिसका उस समूह से हित नहीं जुड़ा हुआ है वह कर लेगा. इस तरह सांप को मार देने पर भी आपके नैतिकता की लाठी बदस्तूर रह सकेगी. साथ ही एक विकल्प यह हो सकता है कि सामुदायिक प्रकल्प की तरह इसे चलायें. कुछ चर्चित ब्लोगर ने पे-पाल लगा कर पैसा वसूल करना शुरू भी कर दिया है. लेकिन उसके साथ भी दिक्कत यह आयेगी कि इसका हिसाब-किताब कौन करेगा. अगर आपके पास संसाधन आने लगे तो ज़ाहिर है उसमें आपके आपके अलावा लेखकों का हिस्सा भी होगा. आप किस तरह इसमें हिस्सेदारी कर पायेंगे? इसके अलावे अन्य व्यावहारिक कठिनाइयां तो है ही. और अगर ऐसा बड़े स्तर पर होना शुरू हुआ तो इसके नियमन के लिए कौन सी एजेंसी होगी? जो सरकार अभी तक तेज़ी से बढते जा रहे इलेक्ट्रोनिक मीडिया के नियमन के लिए ही कोई कदम नहीं उठा पायी है, उससे यह उम्मीद करना कि वह वेब के बारे में भी सोचेगी यह असंभव ही है.

तो भले ही इस माध्यम पर लगाम लगाने के लिए सरकार कुछ करने में सक्षम नहीं हो लेकिन इसे प्रोत्साहित करने में जरूर अपना योगदान दे सकती है. मुख्यधारा से अलग हो गयी कला और संस्कृति के खेवनहारों को मंच देकर उनके संरक्षण-संवर्द्धन का श्रेय सरकारी माध्यम आकाशवाणी और दूरदर्शन को जाता है. उसी तरह अगर सरकार चाहे तो इस नए मीडिया के लिए भी कोई नीति तय कर सकती है. छोटी पत्रिकओं के मामले में दिल्ली की सरकार ने विज्ञापन के लिए नीति बना रखी है. लेकिन वह नीति उसके मालिक के बदले लेखकों के पक्ष में है. वहां विज्ञापन का भुगतान करने से पहले शायद यह प्रमाण पत्र देना होता है कि पत्रिका ने लेखकों को भी भुगतान किया है. तो ऐसा कुछ इस माध्यम के लिए भी किया जा सकता है. हो सकता है सरकारें अलेक्सा या ऐसे ही पारदर्शी तरीके का इस्तेमाल कर कोई मानदंड बना हिन्दी जगत के लिए कुछ करे. अपनी जानकारी में कुछेक राज्य सरकारों ने इस मामले में पहल की भी है. लेकिन फिर मामला वही फसने की आशंका है कि जब अभी आपकी रेटिंग का आर्थिक मामले से कोई सीधा सरोकार नहीं है तब आपने मां-बहन की गाली को अपना यूएसपी बना रखा है. कई उपलब्धियों के उलट ब्लॉग जगत के सर पर यह कलंक भी है कि अन्य हर मीडिया जितनी गंदगी दशकों में नहीं फैला पाया उतना कुछ सालों में ही हिन्दी जगत के भडासी भाइयों ने कर दिया. तो जब नेट के रेटिंग से आय की भी गुंजाइश दिखने लगेगी तब तो यह गंदगी और परवान चढ जानी है. खैर….आशंकाये और खतरें तो हर नयी चीज़ के साथ जुडी आती ही है. हम बस उम्मीद यह कर सकते हैं कि यह वैकल्पिक संवाद जगत सतत हिन्दी सिरमौर बनने की ओर अग्रसर हो. हरसिंगार की उन्नत टहनियों की तरह हिन्दी वेबपोर्टलों के अरमान पल्‍लवित होते रहें।

One Response to “वेबमीडिया की विडंबनाएं”

  1. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    आलेख के सरोकार समीचीन और लोक -अनुकूल हैं .वैकल्पिक सुझावों के साथ सूचनापरक अधुनातन परिवर्तनों पर आपकी यह पोस्ट स्वागत योग्य है .साहित्य -कला और संगीत की वेव मीडिया से संगति के विचारों को हिंदी से इतर जगत में साकार किया जा चूका है .अब हिंदी को तदनुरूप होना है तो यह प्रयाश जरूरी है .

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