लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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       मनमोहन कुमार आर्य

महर्षि दयानन्द के प्रमुख शिष्यों में एक शिष्य पं. लेखराम जी हैं। आपने अपने जीवन काल में अजमेर में महर्षि दयानन्द जी के दर्शन किये थे और उनसे शंका समाधान किया था। इसके बाद आपने अपना सारा जीवन ही ऋषि दयानन्द के मिशन के लिए समर्पित कर दिया। आपने महर्षि दयानन्द की मृत्यु के बाद उनका सर्वाधिक खोजपूर्ण एवं अनेक तथ्यों से युक्त सबसे अधिक प्रमाणित एवं महत्वपूर्ण जीवन चरित्र लिखा है। स्त्री-शिक्षा सहित अन्य अनेक ग्रन्थों की रचना भी आपने की। आप सर्वात्मा ऋषि दयानन्द और आर्य समाज के लिए समर्पित थे। आर्यसमाज के अनुयायियों को महर्षि दयानन्द जी और उन्हें अपना रोल माडल बनाना चाहिये। हम आजकल देख रहें हैं कि आर्यसमाज के हमारे विद्वानों के आदर्श क्रिकेट के खिलाड़ी बन रहे हैं। यह विद्वान क्रिकेट के मैच बड़े चाव से देखते हैं। अपना बहुमूल्य समय उसमें लगाते हैं और उनकी प्रशंसा व प्रचार भी करते हैं। आर्यसमाज के विद्वानों को इस पर विचार करना चाहिये कि कुछ आर्यों की यह प्रवृत्ति कितनी उचित है? आज हम पंडित लेखराम जी की एक लधु पुस्तक ‘स्त्री-शिक्षा’ से वैदिक नारी ‘गार्गी जी’ का चित्रण कर रहे हैं। इससे हमें ज्ञात होगा कि प्राचीन काल में हमारे देश की नारियां न केवल वेदपाठी और वेद विदुषी होती थीं अपितु वह वेदों के बड़े गम्भीर विद्वानों व ऋषि कोटि के मनीषियों से शास्त्रार्थ भी करती थीं। इस वर्णन से अन्य अनेक बातों पर भी प्रकाश पड़ता है जिसका उल्लेख पंडित लेखराम जी ने किया है।

 

पं. लेखराम जी लिखते हैं कि ‘इस प्रसिद्ध देवी ने अपने ज्ञान विज्ञान और बुद्धि कौशल से बहुत बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त की। एक उपनिषद् में इनके और याज्ञवल्क्य का वर्णन इस प्रकार है कि एक बार दोहासाधिपति राजा जनक के यहां बड़ा यज्ञ हुआ। कुरु और पांचाल देश के बड़े बड़े प्रसिद्ध विद्वान् पंडित वहां पधारे। राजा ने यह जानने के लिए कि इस सभा में कौन सा विद्वान् बड़ा गंभीर ज्ञान रखता है और अच्छा व्याख्याता है, एक गौ के सीगों पर सोने के खोल (आवरण) चढ़ाकर ब्राह्मणों (विद्वानों) से कहा कि तुम में से जो व्यक्ति शास्त्र में अपूर्व योग्यता दिखावे, वह यह दान पारितोषिक रूप में प्राप्त करे। याज्ञवल्क्य को छोड़कर और किसी को साहस न हुआ कि उनको हाथ लगाए। यहां तक कि उनके कहने से उनका शिष्य सब गौए हाक कर उनके घर ले गया। इस बात पर समस्त विद्वानों में हलचल मची। राजा के पुरोहित ने उससे कहा कि तुम अपनी योग्यता के प्रमाण के बिना किस प्रकार इस दान के पात्र हो सकते हो? याज्ञवल्क्य ने इस सभा के समस्त विद्वानों को प्रणाम करके कहा कि मैं अपने ही को इस दान का पात्र समझता हूं। जिसको कुछ कहना हो मुझ से शास्त्रार्थ कर ले। उस समय सभा में छः महानुभाव जिन में गार्गी जी भी थी, शास्त्रार्थ के लिये समुद्यत हुए। पांच विद्वान तो थेड़ी देर में मौन धारण कर गए। गार्गी जी भी अन्त में हार गई परन्तु उन्होंने बड़ी देर तक ऐसी गम्भीरता और विचार से शास्त्रार्थ किया कि सभामंडप में पधारे लोग वाह वाह कह उठे और शास्त्रार्थ समाप्त हुआ।’

 

इस शास्त्रार्थ के विवरण का परिणाम बताते हुए पं. लेखराम जी लिखते हैं कि ‘गार्गी जी के शास्त्रार्थ से प्राचीनकाल के आर्यों के स्वभाव के सम्बन्ध में कई बातें ज्ञात होती हैं। प्रथम यह कि उस युग में आर्यों के विचार में पशु धन सबसे बड़ा धन समझा जाता था। उस समय भी स्त्रियां पठित होती थी। द्वितीय यह कि प्राचीन काल में पर्दा न था। स्त्रियां मकान की चार दीवारी के अन्दर कैद न रहती थी। प्रत्युत सभाओं और शास्त्रार्थों में भाग लेती थीं। तृतीय यह कि जिस प्रकार आजकल के लोग अपनी सम्मति समाचार पत्रों तथा पुस्तकों में प्रकाशित करके प्रसिद्ध करते हैं अथवा किसी सभा में खड़े होकर सुनाते हैं। उस युग में यह प्रथा न थी। उन दिनों में जो बात किसी को लोगों के हृदयों में जमाना होती थी तो वह शास्त्रार्थ की समिति में उपस्थित करता था और ऐसी समिति किसी यज्ञोत्सव का किसी अच्छे अवसर पर प्रबन्ध करती थी। इन सभाओं में ब्राह्मण अपनी विद्वता की धाक बैठाते थे और सभा के सभ्य सभासदों से प्रशंसित होते थे। लगभग ऐसी ही प्रथा यूनानादि में भी थी। जैसा कि लिखा है कि उस देश के प्रसिद्ध इतिहासज्ञ हरीडेविक ने ओपमन्यार के अखाड़े में अपने इतिहास पढ़े थे। ब्राह्मणों में अब भी प्रथा है कि जो पंड़ितों पर अपना प्रभाव जमाना चाहता है वह किसी अच्छे अवसर पर अपना चमत्कार दिखाता है और सबसे अधिक दान ले जाता है।’

 

हमें लगता है कि हमारा समाज वैदिक नारी गार्गी के यथार्थ महत्व से परिचित नहीं है, इसलिए हमने आज इस ऐतिहासिक विवरण को अपनी प्रस्तुति के लिए चुना। एक ओर प्राचीन काल में हमारे देश में गार्गी, मैत्रेयी, तारादेवी और मन्दोदरी सहित माता सीता और रूकमणी जैसी वेद पठित देवियां होती थीं जो शास्त्रार्थ भी करती थीं और वैदिक ज्ञान से प्रदीप्त विदुषी होती थीं, वहीं हमारे ही देश के विद्वानों ने अपने अज्ञान व स्वार्थों के कारण मध्यकाल में स्त्रियों के वेदाध्ययन पर ही केवल विराम ही नहीं लगाया अपितु अमानवीय दण्डों का विधान भी किया। यहां तक हुआ कि अपने समय में शास्त्रोें के प्रसिद्ध विद्वान स्वामी शंकराचार्य जी ने लिख दिया कि नारी नरक का द्वार है। हम पाठकों को यह भी अनुरोध करेंगे कि वह डा. रामनाथ वेदालंकार जी रचित ‘वैदिक नारी’ ग्रन्थ अनुशीलन अवश्य करें। इससे उन्हें नारी के आदर्श स्वरूप के विषय में सृष्टि के आदि ग्रन्थ वेदों में गौरवपूर्ण उल्लेख मिलेंगे जैसे संसार के किसी अन्य प्राचीन व अर्वाचीन ग्रन्थ में उपलब्ध नहीं है। इसी कारण वेद सर्वोपरि एवं सर्वोत्तम धर्म ग्रन्थ के रूप में आज भी प्रतिष्ठित हैं। ओ३म् शम्।

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