वेद ही सब मनुष्यों का परमधर्म एवं ईश्वर-प्रदत्त आदि धर्मग्रन्थ है

-मनमोहन कुमार आर्य

               ईश्वर और धर्म दो महत्वपूर्ण शब्द हैं। ईश्वर उस सत्ता का नाम है जिसने इस संसार को बनाया है और जो इसका संचालन कर रही है। धर्म उस सत्य और तर्कपूर्ण आचार संहिता का नाम है जिसका आचरण मनुष्य को करना होता है और जिसको करने से मनुष्य का जीवन दुःखों से रहित तथा सुखों से पूरित होता है। मत-मतान्तर उनके ग्रन्थों को धर्म ग्रन्थ इस लिये नहीं कह सकते क्योंकि उन सबमें अविद्या पायी जाती है। अविद्या मनुष्य की सबसे बड़ा शत्रु है। अविद्या मनुष्य के ज्ञान सुख प्राप्ति में सबसे अधिक बाधक होने सहित सभी दुःखों का कारण होती है। यही कारण था कि हमारे ऋषि मुनि समाज को अविद्या से दूर करने के लिये सतत चिन्तन-मनन करते थे और सभी लोगों को वेदों के सत्य व ज्ञान से पूर्ण मार्ग पर चलने की प्रेरणा करते थे। सृष्टि के आरम्भ में प्रचलित ऋषियों की परम्परा में ही ऋषि दयानन्द का आविर्भाव हुआ था। उन्होंने संसार में कोई नया मत तथा सम्प्रदाय नहीं चलाया अपितु प्राचीन ऋषियों की मान्यताओं सत्य सिद्धान्तों के प्रचारार्थ आर्यसमाज की स्थापना की थी। आर्यसमाज की स्थापना इसलिये की गई थी कि वह असत्य अविद्या से समाज को परिचित कराये और उसे दूर करने के उपाय करे। इसके लिए असत्य का खण्डन करना भी आवश्यक था जोकि आर्यसमाज ने किया। खण्डन का उद्देश्य जन-कल्याण ही होता है। खण्डन असत्य का ही किया जाता है सत्य का नहीं। यदि कोई मनुष्य व विद्वान सत्य को स्वीकार न करे तथा उसका खण्डन करे तो यह मनुष्यता से बाहर की बातें हैं। कुतर्क करना बुरा स्वभाव होता है परन्तु सत्य को स्थापित करने के लिये तर्क वा खण्डन करना प्रशंसनीय एवं हितकर होता है। ऋषि दयानन्द ने मनुष्य जीवन को सुखद एवं उन्नति से पूर्ण करने के लिये ही असत्य का खण्डन और सत्य का मण्डन किया और इसके अच्छे परिणाम भी सामने आये।

               ऋषि दयानन्द ने जिन अंधविश्वासों और मिथ्या सामाजिक परम्पराओं का खण्डन किया था उसका समाज पर प्रभाव पड़ा और आज सभी मतों के लोग अन्धविश्वासों एवं मिथ्या परम्पराओं को बुरा मानने लगे हैं परन्तु वह अपने अन्धविश्वासों तथा मिथ्या परम्पराओं को छोड़ने सहित उन पर विचार करने के लिये उद्यत नहीं हैं। उनमें विवेक बुद्धि के कमी भी उन्हें अनेक अन्धविश्वासों एवं अविद्यायुक्त मिथ्या परम्पराओं को छोड़ने में बाधक बनती हैं। हम अनुभव करते हैं कि बिना वेदों का ज्ञान प्राप्त किये और बिना ईश्वर का सच्चा उपासक बने मनुष्य अन्धविश्वासों एवं मिथ्या परम्पराओं के पालन से विमुख नहीं हो सकता। महर्षि दयानन्द जी की यह बहुत बड़ी देन है कि उन्होंने हमें वेदों का ज्ञान दिया। इस कार्य का सम्पादन उन्होंने सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि ग्रन्थों के माध्यम से करने के साथ ऋषि ने चारों वेदों का भाष्य करना भी आरम्भ किया था। यदि कुछ दुष्टों एवं अज्ञानियों ने षडयन्त्र करके उनकी हत्या की होती तो वह चारों वेदों का भाष्य पूर्ण कर जाते। ऋषि दयानन्द अपनी मृत्यु दिनांक 30-10-1883 से पूर्व यजुर्वेद का पूर्ण तथा ऋग्वेद का सातवें मण्डल के 52 वें सूक्त तक का भाष्य ही पूर्ण कर सके। उनकी मृत्यु का कारण हत्या का षडयन्त्र था जिसने मानव जाति को ईश्वर की वाणी वेदों के सम्पूर्ण भाष्य से वंचित कर दिया। आज स्थिति यह है कि संसार में, संसार की 7 अरब से अधिक जनसंख्या में, ऋषि दयानन्द के समान एक भी मनुष्य ऐसा नहीं है जो उनके समान वेदों का ज्ञान व उसके भाष्य करने की योग्यता सहित उपासना में भी सफलता प्राप्त किया हुआ हो। हमारा सौभाग्य है कि ऋषि की शिक्षाओं का अनुसरण करते हुए कुछ विद्वान हुए जिन्होंने ऋषि के सिद्धान्तों को जाना, समझा व अपने जीवन में धारण किया और वह वेदों का अत्यन्त उपयोगी एवं मानव जाति के लिये हितकर व कल्याणप्रद सम्पूर्ण वेदभाष्य करने में सफल हुए। संसार इन सभी भाष्यकारों का ऋणी है परन्तु अपनी अज्ञानता के कारण संसार वेदों से लाभ नहीं उठा रहा है जिससे मानव जीवन अनेक प्रकार के दुःखों से ग्रस्त एवं सुखों से वंचित है। वेद और संसार के सभी मत-मतान्तरों पर दृष्टि डालने से यह स्पष्ट होता है कि विश्व में यदि शान्ति लाई जा सकती है तो वह केवल वेदों का प्रचार कर अविद्या को दूर करके ही लाई जा सकती है। वैदिक शिक्षाओं का आचरण, उनका धारण करके तथा देश व विश्व के सभी कानून व नियम वेदानुकूल बनाकर ही लाई जा सकती है।

               वेद ही मनुष्यों का धर्म क्यों हैं? इसका कारण यह है कि वेद में विश्व के सभी मनुष्यों को एक ही परमात्मा की सन्तान बताया गया है और सभी मनुष्यों को एक परिवार की भांति मानकर सत्य मान्यताओं एवं ज्ञानयुक्त सिद्धान्तों का पालन करने की शिक्षा दी गई है। वेद हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, पारसी, सिख, बौद्ध व जैन में अन्तर नहीं करता। वह इन सभी को एक ही परमात्मा जो सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अनादि, नित्य, अमर है, उसकी सन्तान बताता है और यही वास्तविकता भी है। संसार में जितने भी मनुष्य हुए हैं वह न तो ईश्वर का अवतार थे, न परमात्मा में ज्ञान, बल, शक्ति, सदाशयता व अन्यान्य गुणों से पूर्ण थे। वह सब अपूर्ण व अधूरे व्यक्तित्व से युक्त अल्पज्ञ एवं ससीम थे। मनुष्य में पूर्णता वेदों के ज्ञान यौगिक विधि से उपासना करने से ही आती है। इस दृष्टि से हमारे प्राचीन काल के सभी ऋषि और योगी तथा वर्तमान युग में 136 वर्ष पूर्व संसार में विद्यमान महर्षि दयानन्द सरस्वती वैदिक ज्ञान और उपासना से युक्त होने सहित ईश्वर के सर्वाधिक निकट थे। ऐसे विद्वान ऋषियों की शिक्षाओं का पालन करने से ही मनुष्यों का सर्वांगीण विकास वा उन्नति होती है। हम अनुमान से कह सकते हैं कि राम कृष्ण के समय में किसी मनुष्य के साथ पक्षपात नहीं होता था। अन्याय करने वाले दण्डित किये जाते थे और न्याय व धर्म पर चलने वाले मनुष्यों को शासन से हर प्रकार का सहयोग मिलता था। राम व कृष्ण के समय की न्याय व्यवस्था भी वेद व मनुस्मति आदि ग्रन्थों के अनुसार कठोर व धर्मपालक मनुष्यों के लिये हितकारी थी। यदि ऐसा न होता तो राम बाली और रावण जैसे लोगों को दण्डित न करते, कृष्ण दुर्योधन के अन्याय के विरुद्ध पाण्डवों का साथ देकर उन्हें विजयी न बनाते और ऋषि दयानन्द अन्याय, अत्याचार व विदेशी शासको सहित अविद्यायुक्त मत जो मनुष्यों के दुःख का कारण बनते हैं, उनका खण्डन व विरोध न करते। ज्ञानी, विद्वान व योगी वही होता है जो असत्य का खण्डन और सत्य का मण्डन करता है और पक्षपात से सर्वथा रहित होता है। यह गुण ऋषि दयानन्द सहित वैदिक कालीन हमारे सभी पूर्वजों में था।

               वेद ही सब मनुष्यों का परम धर्म क्यों हैं? इसका प्रथम उत्तर तो यह है कि यह सृष्टि के आरम्भ में ही सीधा ईश्वर से प्राप्त हुआ था। अन्य सभी मत-पंथ-सम्प्रदाय आदि ईश्वर से आविर्भूत न होकर अविद्यायुक्त अल्पज्ञ मनुष्यों द्वारा प्रवर्तित हैं। वेदों का अध्ययन करने पर वेद में कोई अविद्यायुक्त मान्यता दृष्टिगोचर नहीं होती। वेद सब सत्य विद्याओं से युक्त हैं। वेदों का ज्ञान किसी एक जाति, समुदाय, देश अथवा क्षेत्र विशेष के लिये न होकर विश्व के सभी मानवों के लिये है जिससे मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। वेदों में विश्व को वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सन्देश दिया गया है अन्य मतों में ऐसा नहीं है। अन्य मतों में तो अपने मत को श्रेष्ठ मानने तथा दूसरों के श्रेष्ठ मत को भी निरस्कृत मानने के विचार वा भावनायें मिलती हैं। वेद दूसरे भटके हुए लोगों का मतान्तरण वा धर्मान्तरण करने की बात न कह कर उनके विचारों व ज्ञान की शुद्धि करने की प्रेरणा करते हैं। अन्य मत-मतावलम्बी अपने राजनीतिक व अन्य स्वार्थों की पूर्ति के लिये भोलेभाले अशिक्षित व श्रद्धावान लोगों का छल, प्रलोभन व भय से मतान्तरण वा धर्मान्तरण कराते हैं जो मानवीय दृष्टि से अनुचित व अधर्म होता है। इतिहास में ऐसे दुष्कर्मों के सैंकड़ों उदाहरण मिलते हैं। संसार में कोई भी मत, सिद्धान्त, मान्यता व कथन या तो सत्य होता है या असत्य या फिर सत्यासत्य मिश्रित। मत मतान्तरों में जो सत्य बातें हैं वह सब वेदों से ही ली गई हैं जो मत-मतान्तरों के अस्तित्व में आने के पहले से विद्यमान थीं। सभी मतों में इसके साथ असत्य एवं असत्य मिश्रित मान्यतायें भी हैं जो कि त्याज्य हैं। इनकी असत्य व असत्य मिश्रित मान्यतायें ही इन्हें अस्वीकार्य सिद्ध करती हैं।

               ऋषि दयानन्द ने अपने समय में किसी मत-मतान्तर के आचार्य व विद्वान का वेदों व वैदिक धर्म पर किसी प्रश्न का उत्तर देने से इनकार नहीं किया जबकि अन्य मत-मतान्तर के लोग अपने व दूसरे मतों के लोगों की शंकाओं का समाधान नहीं करते। उनका स्वभाव है  कि वह दूसरे मत के बुद्धिजीवियों के प्रश्नों को सुनकर कू्रद्ध होते हैं। अनेक मत अपने अनुयायियों को प्रश्न व शंका करने का अधिकार भी नहीं देते। ऐसी स्थिति में वह धर्म अथवा सत्य-धर्म कैसे कहे व माने जा सकते हैं? वेद धर्म की महत्ता यह है कि इसका पालन करने से किसी मनुष्य को कोई हानि नहीं होती अपितु लाभ होते हैं जबकि अन्य मतों की ऐसी बहुत सी बातें हैं जिनके कारण दूसरों को परेशानी व कठिनाईयां उठानी पड़ती हैं। सरकार व व्यवस्था भी ऐसे कार्यों पर लोग लगाने में असमर्थ दीखती है। वैदिक धर्म अग्निहोत्र यज्ञ आदि उपायों द्वारा वायु, जल तथा भूमि को शुद्ध रखने सहित सभी प्राणियों वा पशुओं पर दया व अहिंसा का व्यवहार करने की प्रेरणा करता है जबकि अनेक मत इसका पालन नहीं करते। अतः दया व अहिंसा से रहित किसी मत को धर्म की संज्ञा देना उचित नहीं है। धर्म का एक अर्थ ही परहित व दूसरों के दुःखों को बांटना व दूर करना है। यदि हम किसी प्राणी को दुःख देते हैं व हिंसा, छल, प्रलोभन तथा भय आदि का सहारा लेते हैं तो ऐसा कार्य धर्म कदापि नहीं हो सकता। धर्म का अर्थ मत नहीं होता अपितु कर्तव्य होता है। जो मत व मतान्तर मनुष्य-मनुष्य में धर्म, मत व सम्प्रदाय आदि के आधार पर भेद करते हैं, वह धर्म धर्म कदापि नहीं कहे जा सकते क्योंकि धर्म का एक अर्थ सत्याचरण भी है। इन सब कारणों से हमें वेद व वेदानुकूल ग्रन्थों सहित सत्य पर आधारित अकाट्य सत्य मान्यतायें व सिद्धान्त ही धर्म प्रतीत होते हैं। इस कसौटी पर केवल वेद और ऋषियों के वेदानुकूल ग्रन्थ ही सत्य सिद्ध होते हैं। इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

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