लेखक परिचय

वीरेन्द्र जैन

वीरेन्द्र जैन

सुप्रसिद्ध व्‍यंगकार। जनवादी लेखक संघ, भोपाल इकाई के अध्‍यक्ष।

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वीरेन्द्र जैन

एक बार फिर से आम पढा लिखा व्यक्ति दुविधा में है। वह जब जिस कोण से बात सुनता है उसे उसी की बात सही लगती है और वह समझ नहीं पाता कि सच किस तरफ है। दर असल दोष उसका नहीं है अपितु एक ही नाम से दो भिन्न प्रवृत्तियों को पुकारे जाने से यह भ्रम पैदा होता है।

जैसे हमने किसान और कुलक[बड़ा किसान] को एक साथ किसान के नाम से पुकारा इसलिए किसानों की आत्महत्याओं से उपजी चिंताओं का लाभ ये कुलक उठा रहे हैं और किसान लगातार आत्महत्या किये जा रहे हैं। यही कुलक किसान नेता के नाम पर पंचायती राज व्यवस्था में पंच, सरपंच, जनपद अध्यक्ष, तथा विधायक, सांसद मंत्री आदि बन कर देश की लूट में हिस्सेदारी करते हैं और कृषि के नाम पर आयकर से लेकर अन्य बड़ी बड़ी छूटें, अनुदान आदि लेते रहते हैं। जब अतिरिक्त बड़ी आमदनी पर टैक्स लगाने का सवाल आता है तो ये जमींदार खेतों में पसीना बहाने वाले किसान का मुखौटा लगा कर प्रकट होते हैं व सरकार को कोसने लगते हैं जिससे सरकार दबाव में आ जाती है। दूसरी ओर मेहनत करने वाला किसान और खेत मजदूर कोई लाभ नहीं उठा पाता, व कर्ज के बोझ तले दबा दबा आत्महत्या की स्थिति तक पहुँच जाता है।

प्रैस काउंसिल आफ इंडिया का अध्यक्ष बनने के बाद उच्चतम न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय ने मीडिया के बारे में जो कुछ भी कहा उसकी भाषा बहुत कठोर है और वह एक ओर से सही होते हुए भी पूरे मीडिया पर लागू नहीं होती, क्योंकि मीडिया का एक वर्ग मुनाफा कमाने वाला उद्योग बन गया है। यही कारण है कि जिस आशंका पर मीडिया की जुबान पर नियंत्रण लगाने और एमरजैंसी जैसे हालात की बात की जा रही है वह मीडिया के माफिया गिरोहों के भय को अधिकप्रकट अकर रही है। सच तो यह है कि जिस मीडिया को एक पवित्र गाय समझा जाता रहा था उसके एक हिस्से ने भेड़िये का रूप ग्रहण कर लिया है और जब उसको नियंत्रण में लाने की बात की जाती है तो पवित्र गाय को आगे कर दिया जाता है। जब से मीडिया बड़ी पूंजी पर आश्रित हो गया है तबसे उसका स्वरूप ही बदल गया है और वह समाचार व विचार देने की जगह प्रचार एजेंसी में बदल गया है, और समाचार भी सच्चाइयों से दूर होकर विज्ञापनों की ही दूसरी किस्म में बदल गये हैं जो भुगतान पर वस्तुओं के अतिरंजित प्रचार की तरह ही व्यक्तियों, दलों, संस्थाओं के साथ अपराधियों और दूसरे समाज विरोधी तत्वों की वैसी छवि प्रस्तुत करने लगते हैं जैसी वे चाहते हैं। इतना ही नहीं कि वे अपने पास आये व्यक्तियों को ही उपकृत करते हैं अपितु वे स्वयं ही उनके पास जाकर सौदा करने लगे हैं। टूजी स्पैक्ट्रम वाले मामले में नीरा राडिया के टेपों से जो खुलासे हुये हैं उनसे तो मीडिया को मीडियेटर कहा जाने लगा है।

गत लोकसभा चुनाव में भाजपा के लालजी टंडन ने उत्तर प्रदेश के एक बड़े अखबार द्वारा सौदे की पेशकश करने का खुलासा किया था तो मध्य प्रदेश में भाजपा की ही सुषमा स्वराज ने एक अखबार द्वारा दो करोड़ रुपये मांगने का खुलासा किया था, पर दोनों नेताओं ने चुनाव निपट जाने के बाद अखबार पर किसी कार्यवाही की जरूरत नहीं समझी और न ही इसे राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाना चाहा। भाजपा के ये दोनों उम्मीदवार तो उनके शिखर के नेता हैं इसलिए वे बड़ी राशि माँगे जाने पर इंकार कर सके पर जिन कम चर्चित नेताओं के गुणगान करते हुए उनके जीतने की सम्भावनाओं की अतिरंजित खबरें ये अखबार छापते रहे हैं उन्होंने अवश्य ही इन अखबारों समेत दूसरे कई मीडिया संस्थानों के साथ सौदे किये होंगे। दूसरे दलों के नेताओं ने भी ऐसा ही कुछ किया होगा।

सवाल यह है कि इस सच्चाई के बाद भी क्या इन आधारों पर पूरे मीडिया को एक ही लाठी से हांका जा सकता है? पूंजीपतियों द्वारा नियंत्रित मीडिया के अलावा मीडिया का एक हिस्सा ऐसा भी है जो निष्पक्ष होकर सच को सच कहते हुए पूरी ईमानदारी से अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहा है और समय समय पर सत्त्ता में प्रवेश कर गयी विकृत्तियों को भी अपने स्टिन्ग आपरेशंस आदि से देश हित में उजागर करता है। इससे सत्ता से जुड़े निहित स्वार्थ उनके दुश्मन हो जाते हैं और उन्हें नुकसान पहुँचाना चाहते हैं। यदि मीडिया के खिलाफ कोई कड़ा कानून लाया जाता है तो वो इन निहित स्वार्थों द्वारा ईमानदार मीडिया को प्रताड़ित करने का साधन भी बन सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि रास्ता इनके बीच में से निकाला जाये जिससे साँप भी मर जाये और लाठी भी टूटने से बच जाये। जस्टिस मार्कण्डेय एक खरे व्यक्ति हैं और उनके कार्यकाल के फैसले बताते हैं कि वे हमेशा ही व्यवस्था में घर कर गयी विकृत्तियों के प्रति चिंतित रहे हैं। सामने नजर आ रहे दोषों और उन दोषों के लिए जिम्मेवार लोगों के प्रति वे नरम नहीं रह पाते, व कटु सत्य बोलते हैं। उन्होंने न्याय व्यवस्था और न्यायधीषों के खिलाफ भी कटु टिप्पणियाँ की हैं।

आईबीएन-सीएनएन पर करण थापर को दिये साक्षात्कार के विवादास्पद मुद्दों को लें तो उससे स्पष्ट होता है कि उनकी सारी आपत्तियां सेठाश्रित मीडिया और सेठाश्रित व्यवस्था के प्रति हैं। वे कहते हैं कि

‘मीडिया अक्सर लोगों का ध्यान वास्तविक समस्याओं से हटा देता है जो कि आर्थिक हैं। देश के अस्सी फीसदी लोग मुफलिसी में जी रहे हैं। वे बेरोजगारी, मँहगाई और स्वास्थ सम्बन्धी समस्याओं से जूझ रहे हैं जिससे ध्यान हटाकर फिल्मी सितारों, फैशन परेडों और क्रिकेट का मुजाहिरा करते हैं’।

‘मीडिया अक्सर लोगों को बाँटने का काम करता है। उदाहरण के लिए जब भी मुम्बई, दिल्ली, बंगलौर आदि में बम विस्फोट होता है तो कुछ ही घंटों में तकरीबन हर चैनल दिखाने लगता है कि एक ई-मेल या एसएमएस आया है कि इंडियन मुजाहिदीन ने वारदात की जिम्मेवारी ली है, या जैशे मोहम्मद या हरकत उल जिहाद का नाम लिया जाता है। कुछ मुसलमान नाम आते हैं। देखने वाली बात यह है कि इस तरह के ई-मेल और एसएमएस कोई भी शरारती आदमी भेज सकता है। लेकिन टीवी चैनलों में यह दिखा कर और अगले महीने अखबारों में छाप कर आप महीन ढंग से यह सन्देश देते हैं कि सभी मुसलमान दहशतगर्द और बम फेंकने वाले हैं। इस तरह आप एक समुदाय को बुरा बना रहे हैं जबकि हकीकत यह है कि सभी समुदायों में निन्यानवे प्रतिशत लोग चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान अच्छे हैं।‘

‘मुझे यह कहने में अफसोस है कि मीडिया के ज्यादातर लोगों के विवेक का स्तर काफी निम्न है। मुझे इस बात पर शुबहा है कि उन्हें आर्थिक सिद्धांतों, राजनीति शास्त्र, दर्शन या साहित्य के बारे में कुछ पता होगा। मुझे शक है कि उन्होंने ये सारी चीजें पढी होंगी, जो उन्हें पढना चाहिए’।

‘कई चैनल ज्योतिष दिखा रहे हैं, यह राशि है वह राशि,आखिर यह सब है क्या?’

‘हर कोई लोकतंत्र में जवाबदेह है। कोई भी आजादी पूर्ण नहीं है। हर आजादी के लिए तर्कसंगत पाबन्दियां जरूरी हैं’

 

जस्टिस मार्कण्डेय के उक्त विचारों से लगता है कि देश में कोई ऐसी ताकतवर लाबी है जो यह नहीं चाहती जनता की मुफलिसी, बेरोजगारी, मँहगाई और स्वास्थ सम्बन्धी सवाल सामने आयें वही लोग मीडिया में क्रिकेट फैला दे रहे हैं, जो अफीम की तरह है। मीडिया जो जानबूझ कर एक खास अल्पसंख्यक समुदाय को आतंकी घटनाओं के प्रति जिम्मेवार ठहराने की कोशिश करता है वह यह विभाजन पैदा करके किस को लाभ पहुँचाना चाहता है और ऐसा करने के लिए उसे निश्चित रूप से बहुसंख्यकों की राजनीति करने वाली पार्टी ही प्रोत्साहित कर रही होगी। स्मरणीय है कि अभी हाल ही में आडवाणी की यात्रा के दौरान सतना में पत्रकारों को एक एक हजार रुपयों के लिफाफे देने वाला पकड़ा गया था । इसी मीडिया का चरित्र चित्रण करती हुयी एक फिल्म पीपली लाइव कुछ समय पहले दिखायी गयी थी। इसे देख कर भी मीडिया को बिल्कुल भी शर्म नहीं आयी तथा उसकी घटिया हरकतें जारी रहीं, पर जनता ने जिस उत्साह के साथ उसका स्वागत किया उससे लगता है जनता को मीडिया की ऊटपटांग हरकतें पसन्द नहीं आ रहीं। भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस तरह जनता ने अन्ना हजारे ही नहीं अपितु रामदेव तक का स्वागत किया उससे उसके मूड का पता चलता है। मीडिया घरानों की सम्पत्तियां जिस ढंग से उत्तरोत्तर बढ रही हैं और वे आईपीओ तक लाने लगे हैं, दूसरी ओर नये पत्रकारों की बेरोजगारी का लाभ लेते हुए उसे छोटी छोटी राशि का लाली-पाप पकड़ा कर मन चाहा लिखने को मजबूर कर रहे हैं। इससे लगता है कि जस्टिस मार्कण्डेय के विचार को जनता का समर्थन मिलेगा। यदि हम अच्छे और बुरे मीडिया के बीच के अंतर को उजागर कर नियम बनवा सकें तो गेंहू के साथ घुन पिसने से बच सकता है।

 

 

5 Responses to “मीडिया पर जस्टिस मार्कण्डेय के विचार और घालमेल का संकट”

  1. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbal hindustani

    मनोज शर्मा जी बीजेपी समर्थक लग रहे हैं. वेह पूर्वाग्रह भी रखते है, ऐसे में उनपर क्या कहा जा सकता है. समझदार को इशारा काफी है. मुझे विश्वाश है के मधुसूदन जी बहुत समझदार हैं.

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  2. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbal hindustani

    काटजू साहब जो कुछ कह रहे हैं वह आधा सच है। पूरी व्यवस्था जब भ्रष्ट हो तो अकेले मीडिया को कोसने का कोई फायदा नहीं है। यह बात एक मिसाल से समझी जा सकती है जैसे एक बच्चा स्कूल में फेल होता है तो इसके लिये सदा अकेले उसे ही ज़िम्मेदार, नाकारा और अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। दरअसल इसके लिये उसके अभिभावकों से लेकर घर का माहौल, टीचर, प्राचार्य, प्रबंधतंत्र, कोर्स, उसकी रूचि, ट्यूशन और शिक्षा विभाग की नीतियां तक सभी की भूमिका होती है। ऐसे ही आज मीडिया को जिन कमियों के लिये कोसा जा रहा है उसके लिये पूरी व्यवस्था और समाज की संरचना ज़िम्मेदार है। जब सरकार ने पूंजीवाद की नीतियां अपना ली हैं तो मीडिया इसकी बुराइयों से कैसे बच सकता है। मीडिया तो इस रोग का लक्षण मात्र है, रोग तो पूरी व्यवस्था है। मिसाल के तौर पर आप देखिये विधायिका, कार्यपालिका और खुद काटजू साहब जिस न्यायपालिका से आये हैं उसकी हालत कितनी ख़राब हो चुकी है। ऐसे ही उद्योगपति, व्यापारी , वकील, शिक्षक, साहित्यकार यानी सभी पेशे कितनी गिरावट का शिकार हैं? हम यह नहीं कह रहे कि चंूकि सब गड़बड़ हैं तो मीडिया को भी गड़बड़ होना चाहिये बल्कि हमारा कहना यह है कि यह स्वाभाविक है कि जहां पावर होती है वहां करप्शन भी होता है। यानी शक्ति होगी तो दुरूपयोग भी होगा अब जब उसको रोकने वाले ही गले तक भ्रष्टाचार में डूबे हैं तो रोकेगा कौन? एक शेर याद आ रहा है कि दूसरों पर जब तब्सिरा कीजिये, आईना सामने रख लिया कीजिये।-इक़बाल हिंदुस्तानी, संपादक, पब्लिक ऑब्ज़र्वर, नजीबाबाद।यूपी

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  3. आर. सिंह

    R.Singh

    मिडिया हो अन्य कुछ.सभी का केवल एक ही ध्यान है की अपना अपना वर्चस्व कैसे स्थापित किया जाये .यहाँ निष्पक्ष कोई भी नहीं है,अगर गलती सेकुछ लोग हैं भी तो अन्य लोगों लोगों में यह खलबली रहती है की कैसे उनलोगों को दायरे में बांधा जाये.इस देश की लगभग पूरी मानसिकता पूर्वाग्रह से पीड़ित है.ऐसे में काटजू जैसे लोगों की आवाज भी नकार खाने में तूती की आवाज बन कर रह जाने की संभावना ज्यादा है.मीडिया और न्यायपालिका को पवित्र गाय मानने में भी सच पूछिए तो भय है जिससे सब ग्रस्त लगते हैं.भय का सबसे बड़ा कारण हमारी नैतिक कमजोरी है.जबतक हम स्वयं ईमानदारी नहीं बरतते तब तक कुछ भी नहीं हो सकता.यह सच है की आज मिडिया भी एक व्यापार बन गया है और उसमे पूंजी लगाने वाले पहले अपना मुनाफा देखते है और जब उनको समाज के उन लोगों का साथ मिल जाता है जिनसे हम नैतिकता की उम्मीद लगाये रहते हैं तो यह सम्मिकरण वास्तव में घातक बन जाता है.निराकरण या निदान एक ही है ,समाज को भ्रष्टाचार से मुक्ति .जब तक भ्रष्टाचार है,गंदगी है ,स्वार्थ सर्वोपरी है तब तक चाहे मिडिया हो या न्यायपालिका,यहाँ भी वही हाल रहेगा जो अन्य जगहों पर है.

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  4. B K Sinha

    जस्टिस मार्कंडेय ने एक बड़े सत्य का उद्घाटन इस लेख के द्वारा किया है क़ि प्रजातंत्र क़ि आड़ में किस प्रकार फासीवादी नीतिया और शोषण के पूंजीवादी तरीके काम में लाये जा रहे है भारत का दुर्भाग्य है क़ि इसके पास एक तरफ बेरोजगार और गरीब किसान है तो दूसरी तरफ दुनिया के सर्वोच्च अमीरों में से एक और आमिर अख़बार घराने है जो भारतीय राजनिति और समाज के लोगो का चिंतन जिधर उनका स्वार्थ होता है उधर हांक कर ले जाते है पूरा मुल्क एक बड़े विभ्रम क़ि स्थिति में जी रहा है पर जब तक जस्टिस काटजू जैसे लोग है प्रकाश क़ि किरण मिलती रहेगी मिडिया को सावधान हो जाना चाहिए क़ि उसकी करतूत को लोग समझने लगे है उसकी ईमानदारी शक के घेरे में आ चुकी है नहीं तो प्रभु चावला और बरखा दत्त जैसे लोगो का महत्व कहा चला गया लकड़ी की हांड़ी सिर्फ एक बार ही चढ़ती है
    बिपिन कुमार सिन्हा

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