विजय-उद्बोधन के विजयी स्वर

 ललित गर्ग

अस्तित्व को पहचानने, दूसरे अस्तित्वों से जुड़ने, राष्ट्रीय पहचान बनाने और अपने अस्तित्व को राष्ट्र एवं समाज के लिये उपयोगी बनाने के लिये इस वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना दिवस विजयादशमी का उत्सव एवं नागपुर में स्वयंसेवकों के बीच सरसंघचालक मोहन भागवतजी का उद्बोधन संघ के दृष्टिकोण से अवगत कराने का एक सशक्त माध्यम बना है। एक सशक्त हिन्दुत्व राष्ट्र के निर्माण में संघ की सकारात्मक भूमिका को भी प्रभावी ढ़ंग से प्रस्तुति देने के साथ-साथ यह एक दस्तक है, एक आह्वान है जिससे न केवल सशक्त हिन्दुत्वमय भारत का निर्माण होगा, बल्कि इस अनूठे काम में लगे संघ, सरकार एवं सकारात्मक शक्तियों को लेकर बनी भ्रांतियांे एवं गलतफहमियों के निराकरण का वातावरण भी बनेगा। राष्ट्रीयता से ओतप्रोत संकल्पों की इस उद्बोधन की ध्वनि-तरंगों की अनूठी दिव्यता ने समूचे राष्ट्र को अभिप्रेरित किया।
चीन्हीं-अचीन्हीं कल्पनाओं एवं संभावनाओं के साथ देश एवं दुनिया के लोग इस खास दिवस एवं इस पर दिये जाने वाले उद्बोधन की प्रतीक्षा करते हैं। इस वर्ष यह प्रतीक्षा सार्थक भी रही, क्योंकि इस अधिकृत उद्बोधन से न केवल संघ की कार्य दिशा और विचार से लोगों को अवगत कराया गया बल्कि वर्तमान सरकार की नीतियों एवं कार्यक्रमों के प्रति भी देश और दुनिया के बीच एक प्रेरक सन्देश देने का उपक्रम हुआ। विशेषतः मोहन भागवत का यह विश्वास सामने आया कि जो सपने अब तक अधूरे हैं, वे भी पूरे होंगे। कैसे होंगे? इसकी प्रक्रिया भीतर-ही-भीतर चलती रहती है। एक दिन आता है, सपना सच बन जाता है। संघ एवं भाजपा के सपनों का समाज बनना निश्चित ही असंख्य कार्यकर्ताओं को आत्मतोष देने वाला है। भागवत ने कहा कि भारत हिन्दुस्तान या हिन्दू राष्ट्र है, उन्होंने कहा कि देश की प्रतिष्ठा बढ़ाने और विविधताओं का सम्मान करने वाला हिन्दू है। संघ का मानना है कि भारत के मुस्लिमों के पूर्वज भी हिन्दू थे, इसलिए उनका रक्त संबंध भी हिन्दू है। जिनका सरोकार भारत की संस्कृति परम्परा और आदर्शों से है, वे सब हिन्दू है। जब हिन्दुस्तान के कण-कण में हिन्दुत्व है तो इसे हिन्दुत्व राष्ट्र कहने एवं बनाने में दिक्कतें क्यों? संघ ने भारत के भविष्य को लेकर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के साथ ही अपनी नीतियों, अपने क्रियाकलापों और उद्देश्यों के बारे में जिस तरह विस्तार से प्रकाश डाला उसके बाद कम-से-कम उन लोगों की उसके प्रति सोच बदलनी चाहिए जो उसे बिना जाने-समझे एवं तथाकथित पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों के चलते एक खास खांचे में फिट करके देखते रहते हैं।
विजयादशमी का यह विजय-उद्बोधन स्वयंसेवकों के लिए पाथेय की तरह होता है। ‘खणं जाणाहि’ भगवान महावीर के इस आदर्श सूक्त- समय का मूल्य आंको- की डाॅ. भागवत ने प्रेरणा देते हुए एक-एक क्षण को सार्थक और सफल बनाने का जीवन-सूत्र दिया। इससे संकल्प-शक्ति का विकास होता है। आस्था मजबूत होती है और व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के आसपास जनमती एवं पनपती बुराइयों से बचने के लिये सुरक्षा कवच प्राप्त होता है। इस उद्बोधन का हार्द है सृजनचेतना को जगाना। अनुकरण की प्रवृत्ति एक मूर्ख में भी हो सकती है, पर उसमें सृजन की चेतना नहीं होती। संघ के कार्यकर्ता सृजनात्मक तरीके से नई शैली का विकास करें तो वे अपना वैशिट्य प्रमाणित कर सकते हैं। अपेक्षित है कि स्वयंसेवक विवेकजीवी बनें। वे भारतीय मनीषा तक पहुंचकर नई दृष्टि प्राप्त करें। वे इस बात को समझें कि अक्षर के बिना भी अक्षय की साधना हो सकती है। शब्दों की सिद्धि के बिना शब्द व्यर्थ हो जाते हैं। स्वयंसेवकों को करुणा की, सृजन की, सेवा की, राष्ट्र-निर्माण की लोकयात्रा को आगे बढ़ाना है, यही संघ की सार्थकता का आयाम है और संभवतः यही भागवतजी के उद्बोधन का आह्वान है। विश्व के सबसे बड़े समाजसेवी-सांस्कृतिक-राष्ट्रीय संगठन की सोच जब सकारात्मक होती है, तब एक नया समाज-एक नया राष्ट्र निर्मित होता है। संघ के स्वयंसेवक अनेक स्थानों पर सकारात्मक-रचनात्मक प्रकल्प चला रहे हंै, जो रचनात्मकता-सृजनात्मकता का प्रस्फुटन है। सरसंघचालक से प्रेरणा-पाथेय प्राप्त कर अब संघ के कार्यकर्ता और ऊर्जा के साथ समाज में एक सकारात्मक वातावरण बनाने के लिए जुटेंगे, यह विश्वास किया जा सकता है।
संघ दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक संगठन है, दुनियाभर में स्वयंसेवक सृजनयात्रा में जुटे हैं। भाजपा में भी संघ के स्वयंसेवक सक्रिय हंै, केन्द्र और सत्रह राज्यों में भाजपा का शासन है, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उपराष्ट्रपति और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री संघ के स्वयंसेवक है, स्वल्प समय में भाजपा ने जो कीर्तिमान स्थापित किये हैं, सफलता के नये मानक गढ़े हैं, उसका श्रेय संघ को जाता है, इसलिए संघ को जानने की जिज्ञासा लोगों की है। भागवतजी ने संघ की प्रभावी प्रस्तुति देते हुए भारतीय लोकतंत्र, सरकार और समाज के संबंधों पर प्रकाश डाला। जनाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध सरकार की सराहना भी की। एक सामाजिक संगठन के प्रमुख होने के नाते अच्छे कार्यों के लिए सरकार के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करना ही चाहिए। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने के सरकार के काम ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि देश में दृढ़ इच्छाशक्ति वाला नेतृत्व है और यह देशहित में बड़े निर्णय कुशलता से लेता है। अनुच्छेद 370 हटाना भारत की अखंडता के लिए जरूरी था। संघ भारतमाता के अखंड स्वरूप की वंदना करता है, प्रारंभ से ही संघ के स्वयंसेवक अनुच्छेद 370 को हटाने के पक्ष में रहे और इसके लिए जनसंघ के माध्यम से आंदोलन भी हुआ। मोदी सरकार ने इस बारे में जिस दृढ़ता का परिचय दिया, उसका समर्थन पूरा देश कर रहा है।
इस उद्बोधन में नये बनते भारत एवं उसमें कतिपय स्वार्थी एवं राष्ट्र-विरोधी लोगों द्वारा खड़ी की जारही बाधाओं और उनकी नयी-नयी शब्दावली पर सरसंघचालक ने तीखा प्रहार किया। भागवत ने स्पष्ट कहा कि माॅब लिंचिंग भारत का शब्द नहीं है। इसका प्रयोग हिन्दू समाज को बदनाम करने के लिए किया जाता है। संघ के स्वयंसेवकों का लिंचिंग की घटनाओं से कोई लेना देना नहीं है। इस तरह की घटनाएं रूकनी चाहिए। आवश्यक हो तो कठोर कानून बनाया जाए। यह उन लोगों को उत्तर था, जो बिना किसी प्रमाण के लिंचिंग की घटनाओं को संघ और राष्ट्रीय विचारधारा के संगठनों के माथे मढ़ देते हैं। भागवतजी ने कहा कि नई पीढ़ी में आत्म गौरव की अनुभूति कराने के लिए शिक्षा पद्धति में बदलाव की जरूरत है। संस्कारों के क्षरण और जीवन मूल्यों में गिरावट पर चिंता व्यक्त करते हुए भागवतजी ने कहा कि नारी सम्मान की परम्परा वाले देश में महिलाओं की असुरक्षा लज्जा का विषय है। मातृशक्ति को सशक्त बनाने एवं पुरुष दृष्टि में बदलाव की जरूरत है। उन्होंने कहा कि 2014 में सत्ता परिवर्तन तत्कालीन सरकार से मोहभंग से हुआ था, लेकिन 2019 का जनादेश मोदी सरकार के कार्य, साहसिक निर्णय और नई अपेक्षाओं का परिणाम है। उन्होंने कहा कि भारत पहले से अधिक सुरक्षित, सशक्त एवं प्रगतिशील है। भागवतजी ने चंद्रयान 2 का उल्लेख करते हुए कहा कि हम चांद तक पहुंचने में सफल हुए। इसी तरह लोकतंत्र के बारे में कहा कि लोकतंत्र हमारी सदियों की परम्परा का हिस्सा है। सरसंघचालक ने शांति और सौहार्द बढ़ाने की चर्चा की। सरसंघचालकजी का उद्बोधन भारत की संस्कृति, परम्परा और हिन्दू राष्ट्र पर केन्द्रित था। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने संयुक्त राष्ट्र में संघ को बदनाम करने की कोशिश की, इसकी निंदा करते हुए भागवतजी ने कहा कि ऐसी देशी-विदेशी ताकतें है जो भेदभाव पैदा कर आपस में झगड़े पैदा कराना चाहती है। ऐसे षड्यंत्र चल रहे हैं। संघ के चिंतन और कार्य के केन्द्र में राष्ट्रहित, राष्ट्र-चरित्र रहता है। जिस राष्ट्रवाद के विचारों के साथ देश की जनता खड़ी है, उसका आधार हिन्दुत्व है।
विजयादशमी पर्व पर संघ में शस्त्र-पूजन की परम्परा है। शक्ति की पूजा का इस वर्ष नया स्वरूप दिखाई दिया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने फ्रांस में सबसे अधिक मारक क्षमता के लड़ाकू विमान राफेल का पूजन किया। इस विमान से राजनाथ सिंह भारत आए। फ्रांस से दिल्ली की दूरी राफेल ने केवल 28 मिनिट में पूरी की। राफेल से वायुसेना की शक्ति काफी बढ़ गई है। ऐसा लगा कि शक्ति की देवी का प्रवेश भारत में हुआ है। लेकिन विडंबना यह है कि कांग्रेस ने राफेल खरीदी को लेकर मोदी सरकार को घेरने का प्रयास किया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन आरोपों की परवाह किए बिना राफेल के करार पर दृढ़ रहे।
संघ को राष्ट्र की चिंता है, उसके अनुरूप उसकी मानसिकता को दर्शाने वाले इस विजय-उद्बोधन से निश्चित ही भारत के भविष्य की दिशाएं तय होगी। संघप्रमुख ने राष्ट्रीयता, भारतीयता के साथ समाज एवं राष्ट्र निर्माण की आवश्यकता पर जिस तरह अपने विचार व्यक्त किए उससे यह स्पष्ट है कि इस संगठन की दिलचस्पी राजनीति में कम और राष्ट्रनीति में अधिक है। इस क्रम में उन्होंने हिंदू और हिंदुत्व पर जोर देने के कारणों का भी उल्लेख किया। क्योंकि हिंदुत्व सब को जोड़ता है और संघ एक पद्धति है जो व्यक्ति निर्माण का काम करती है। भागवतजी ने स्पष्ट किया कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और रहेगा। हिंदुत्व समाज को एकजुट रखता है, लेकिन हम समाज में संघ का वर्चस्व नहीं चाहते, बल्कि समाज के हर व्यक्ति का वर्चस्व चाहते हैं। यहां भी उनका संदेश साफ था- सबका साथ- सबका विकास। उनका एक-एक शब्द आलोक-स्तंभ बना, भविष्य की अजानी राहों में पांव रखते समय यदि हम उस आलोक को साथ रख पाए तो कहीं भी अवरोध नहीं आ सकेगा। इसी से राष्ट्र वर्चस्वी एवं यशस्वी बन सकेगा।

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