विकल्पों और आलोचनाओं के आभावों में डूबती भारतीय राजनीति!

इस देश ने एक और सशक्त विकल्प के रूप में आम आदमी पार्टी को देखा था जिसका परिणाम दिल्ली प्रदेश में इस बालपार्टी को कुर्सी पर आसीन कर दिया लेकिन यहाँ लोगों के भरोसे को जिस तरह मारा गया उसकी शायद किसी ने उम्मीद नहीं की होगी, आम जनमानस ने सोचा कि चलिए ये दल विरोध और आरोपों की परिपाटी से हटकर कुछ करने आया है,

ahinsaइन दिनों उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, गोवा में विधानसभा चुनावों की सरगर्मियां बेहद तेज हैं, पार्टी कार्यालयों पर रौनक भी दिखाई पड़ने लगी है और लोगों में टिकट बटवारों को लेकर भी चर्चाएं गर्म हैं। मैं प्रायः गांवों में आती जाती हूँ, इतने वर्षों में जो सबसे ज्यादा महसूस हुआ वो है राजनैतिक चातुर्य, एक ग्रामीण को किसी अन्य किसी चीज की समझ हो न हो लेकिन अपनी क्षेत्रीय राजनीति के विषय में वह किसी बड़े प्रोफेसर और विचारक की भांति ही चतुर होता है, गांवों की चौपालों पर, छोटी दुकानों में या किसी खेत खलिहान में कहीं भी जहां चार लोग जमा हैं वे राजनीति की चर्चा करते ही पाए जाएंगे । कुछ दिन पहले ही उत्तर प्रदेश के कुछ गांवों में जाना हुआ था लोगों से कई विषयों पर बात हुई लेकिन इस सबके बीच कुछ बातों ने मुझे इस नतीजे पर पहुँचाया कि हम मानें या न मानें लेकिन भारत की जड़ों में राजनीति है । मुझे याद है एक बुजुर्ग ग्रामीण ने बड़े ही दार्शनिक अंदाज से कहा था, अब राजनीति में आलोचनाएं नहीं होती विरोध होते हैं, आलोचनाओं और विकल्पों के आभाव से जूझती भारतीय राजनीति के कारण ही हम लोग मर रहे हैं । आज विपक्ष की भूमिका पर गौर करें तो विरोध से इतर कुछ नहीं यहां तक कि अपने विरोधों को ताकत देने के लिए लोग ऐसी विषबेलों को पोषित करने से भी बाज नहीं आ रहे जो सम्पूर्ण देश के लिए नहीं मानवता के लिए भी भयंकर खतरा हैं। संसद के भीतर और बाहर कहीं भी आलोचनाओं का स्थान ही नहीं दिखाई पड़ता, विपक्ष में बैठे दलों के लिए बस एक ही नियम है सत्ताधारी दल की प्रत्येक नीति और कार्य का विरोध करना, सबके सब दूसरे के दामन को काला बताकर अपने दामन की सफेदी साबित करने में लगे है। हमारे गांवों का ही मानना है कि हमारे पास न तो विकल्प हैं और न आलोचक, एक बार इसको देखा दूसरी बार दूसरे को करना तो सभी को एक ही काम है सो क्या फर्क पड़ता है वोट देने का अधिकार दिया है तो उंगली पे नीली, काली स्याही लगवा लेते हैं बाकी उम्मीद तो है ही कहां अब ।

हमने कांग्रेस को साठ साल देखा क्योंकि हमारे सामने कोई सुदृढ़ दूसरा रास्ता था ही नहीं। कांग्रेस एक ऐसी पार्टी जिसके पास भारत के सबसे सशक्त एवं विद्वान नेताओं की जमात है, लेकिन पारिवारिक अंधवाद के चलते वे सभी हाशिए पर हैं और वे नेता कहीं जा नहीं सकते क्योंकि विकल्प नहीं है, ये अंधवाद की पराकाष्ठा ही कहेंगे कि डॉ मनमोहन सिंह जैसे विद्वान प्रधानमंत्री को कांग्रेस ने हास्य का केन्द्र बना डाला, सचिन पायलट, माधवराव सिंधिया, शशि थरूर जैसे नेताओं को अपने क्षेत्र के दायरों में समेट रखा है, आज कांग्रेस मरणासन्न स्थिति में है लेकिन पारिवारिक मोह से पार्टी को ऊपर नहीं आ पा रही इसका भी कारण आलोचनाओं का अभाव है।
देश ने साठ सालों तक कांग्र्रेस को अवसर दिए लेकिन जब अंततः कोई विकल्प नहीं मिला तो जनता ने नरेन्द्र मोदी को विकल्प के तौर पर चुना और ये विशेष रूप से गौर करने वाला विषय है कि देश ने नरेन्द्र मोदी को विकल्प के रूप में चुना न कि भारतीय जनता पार्टी को, आज की विडम्बना ये है कि सत्ताधारी बीजेपी के अंधविरोधी तो हैं लेकिन आलोचकों की संख्या न के बराबर है, और शायद यही बीजेपी को अधिक शक्ति प्रदान कर रही है। हम विदेश नीतियों पर घण्टों की बहस करते दिख रहे हैं, आम जनता जिसे विदेश नीति की गूढ़ता के विषय में न के बराबर ज्ञान है वह विदेश नीतियों का समर्थन और विरोध करती दिखाई पड़ रही है लेकिन घरेलु नीतियों पर कोई चर्चा नहीं, क्यों रोजगार के आंकड़ों पर सरकार की आलोचना नहीं होती दिखती, क्यों महंगाई की मार पर सरकारी असफलताओं को नहीं गिनाया जा रहा, क्यों आलोचनाओं के स्वर इतने ऊंचे नहीं उठ पाते जैसे ऊरी हमलों के बाद उठे थे क्योंकि आलोचनाएं आंकड़े एवं अध्ययन मांगती हैं और उसके लिए किसी के पास समय नहीं, ऐसे में रास्ता निकल कर आता है अंधविरोध का, और ये अंधविरोध और समर्थन ही समाज को उन्माद की ओर ले जा रहा है।
अब नजर पड़ती है समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी पर लेकिन ये दोनों भी अपने जातीय समीकरणों से कभी ऊपर ही नहीं उठीं, दोनों एक दूसरे को तू झूठी, तू झूठी कहकर उत्तर प्रदेश में पांच-पांच साल का बटवारा किए हुए हैं। एक अवधि में आप दलित टूरिज्म के मजे लिजिए, दूसरी अवधि में हम यादव और मुस्लिम टुरिज्म करेंगे, और सत्ता भोग के समय सभी को अपने पंजों के नीचे दबाकर रखेंगे । इस तरह बारी-बारी ये दोनों दल उत्तर प्रदेश की जनता को भुनाते रहते हैं, अब यदि कहें कि जनता मूर्ख है तो इससे बड़ी बेवकूफी और क्या होगी, जब विकल्प ही नहीं होगा जनता जाएगी कहाँ आखिर जल में रहकर मगर से बैर भी तो नहीं कर सकती । ऐसा ही हाल हर प्रदेश का ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश का है ।
इस देश ने एक और सशक्त विकल्प के रूप में आम आदमी पार्टी को देखा था जिसका परिणाम दिल्ली प्रदेश में इस बालपार्टी को कुर्सी पर आसीन कर दिया लेकिन यहाँ लोगों के भरोसे को जिस तरह मारा गया उसकी शायद किसी ने उम्मीद नहीं की होगी, आम जनमानस ने सोचा कि चलिए ये दल विरोध और आरोपों की परिपाटी से हटकर कुछ करने आया है, मैं भी ‘आप’ की एक ऐसी समर्थक थी कि मुझसे मेरे कार्यालय में लोग कहने लगे थे कि आप पूजा की थाली लेकर आया करें इनके लिए तब मेरा तर्क यही होता था ये विरोध आरोप प्रत्यारोप से परे हमारे आपके लिए कुछ करेंगे अन्य दलों की तरह माइक उठाकर बस चिल्लाएंगे नहीं, जब 49 दिन की आप की सरकार बनी, तब वाह क्या माहौल था, लेकिन आज जब पूर्ण बहुमत की सरकार दिल्ली में बनी तो इनकी छुपी महत्त्वाकांक्षाओं पर से सारे नकाब उतर गए, जिस दल को राजनीति के नए आयाम गढ़ने थे, वे राजनीति के उस छिछले स्तर तक चले गए जिसकी किसी को उम्मीद भी नहीं रही थी, अब अन्य दलों की भांति इनके लिए भी कुर्सी जनता से अधिक महत्त्वपूर्ण दिखाई पड़ने लगी। आज आम आदमी पार्टी के लोग उसी मीडिया को पानी पी-पी कर कोसते नजर आते हैं जिसकी बदौलत इन्होंने आन्दोलन खड़ा किया, दिल्ली की सत्ता हासिल की। आगे भविष्य में इस पर भी कोई आश्चर्य नहीं कि यदि किसी अन्य राज्य में इनकी सरकार बन जाए और ये तब भी अपनी जिम्मेदारियों से भागते हुए भारत के संघीय ढांचे को ही ढहाने की मांग करने लगें ।
इस तरह राजनैतिक अभावों से गुजर रही भारतीय राजनीति को आज अच्छे एवं महत्त्वाकांक्षाओं से परे राजनैतिक विकल्पों और आलोचकों की आवश्यकता है न कि विरोधियों की क्योंकि कहीं न कहीं विरोध की जड़ें हिंसा को जन्म दे रही हैं, जो देश की राजनीति के लिए कम बल्कि समाज के लिए अधिक हानिकारक हैं।

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