लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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-बीनू भटनागर-
poem

नदिया के तीरे पर्वत की छांव,
घाटी के आँचल मे मेरा वो गांव।
बस्ती वहां एक भोली भाली,
उसमे घर एक ख़ाली ख़ाली।
बचपन बीता नदी किनारे,
पेड़ों की छांव में खेले खिलौने।
कुछ पेड़ कटे कुछ नदियां सूखीं,
विकास की गति वहां न पहुंची।

छूट चला इस गांव से नाता,
कोलाहल से घिर गई काया।
शहर के लोग बड़े अलबेले,
पर्वत के झरनों को घर में
लाकर वो अपना कक्ष सजोयें।
भीड़-भाड़ में चौराहों पर,
बिजली के फव्वारे चलायें।
गमलों मे वो पेड़ों को उगायें,
बौने पेड़ बौनसाई कहलायें।
बाल्कनी के गमलों मे यहां,
घनियां और हरी मिर्च उगायें।
पशु-पक्षी पले पिंजरों में,
इतवार को सब घूमने जायें।

No Responses to “गांव से शहर”

  1. अशोक आंद्रे

    गाँव और शहर के बीच के फर्क को इस कविता के माध्यम से आपने बड़े सार्थक ढंग से प्रस्तुत किया है.आज यही सब हमें देखने को मिल रहा है जिसे हमारे बच्चे देख कर कई तरह के सवाल उठाते हैं,सुन्दर.

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