लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-विजय कुमार-

चुनाव के समय प्रायः सभी राजनेता और दल युवाओं को नौकरी के आश्वासन देकर अपने पाले में खींचने का प्रयास करते हैं। कोई विशालकाय उद्योग के लिए गांव की भूमि लेते समय शासन और उद्योगपति कहते हैं कि इससे हजारों नौकरियां निकलेंगी। सरल ग्रामीण इस चक्कर में सस्ते में जमीन दे देते हैं। बाद में उनमें से कितनों को नौकरी मिली और उद्योगपति ने उसी जमीन का विकासकर कितने में बेचा, इसका हिसाब कोई नहीं करता।
जहां तक रोजगार की बात है, तो पिछले कुछ वर्षों से लोग नौकरी को ही रोजगार मानने लगे हैं। विशेषकर शिक्षित वर्ग में इसके प्रति आकर्षण बहुत बढ़ा है। सरकारी नौकरी में अच्छे वेतन के साथ पेंशन आदि की भी सुविधा है। इसलिए इस ओर आकर्षण स्वाभाविक है। कुछ निजी संस्थान भी अब अच्छा वेतन देने लगे हैं। अतः सरकारी नौकरी के अभाव में उस ओर भी युवक जा रहे हैं।

पर क्या रोजगार का अर्थ केवल नौकरी ही है ? जहां व्यापार या खेती की अच्छी घरेलू परम्परा है, वे लोग भी जब नौकरी ढूंढते हैं, तो अजीब लगता है। न जाने क्यों लोग खेती या व्यापार को बुरा मानते हैं। मेरे बाबा जी कहते थे कि नौकर बनने की बजाय चार लोगों को अपने पास नौकर रखना अच्छा है। जिनका परिवार तुम्हारे व्यापार या खेती के कारण पलेगा, वे जीवन भर तुम्हारे गुण गाएंगे और सुख-दुख में सदा तुम्हारे साथ खड़े होंगे; पर यह बात लोगों को समझ नहीं आती। बात बहुत पुरानी है। मेरा एक मित्र ने एमए किया और नौकरी ढूंढने लगा। यद्यपि उसके घर में अच्छा व्यापार था; पर वह देखता था कि इसमें व्यस्तता बहुत है। वह आराम की जिंदगी जीना चाहता था, इसलिए नौकरी की तलाश में था। उसके पिताजी ने कुछ नहीं कहा; पर जब साल भर कुछ नहीं हुआ, तो उन्होंने उससे पूछा कि तुम्हें अधिकतम कितने रुपये की नौकरी मिल जाएगी ? मित्र ने पांच हजार रुपये की बात कही। इस पर पिताजी ने कहा कि तुम कल से सुबह दस से शाम पांच बजे तक दुकान पर बैठो और मुझसे छह हजार रु. लो।
तब तक मेरा मित्र भी धक्के खाकर दुखी हो चुका था। वह समझ गया कि व्यापार में परिश्रम तो अधिक है; पर उसी तुलना में पैसा और सम्मान भी बहुत अधिक है। दुनिया में जितने भी सम्पन्न लोग हैं, सब व्यापारी ही हैं। नौकरी में प्रायः अफसर की धौंस सुननी पड़ती है, जबकि व्यापार में व्यक्ति स्वयं मालिक होता है। वह अगले ही दिन से दुकान पर बैठने लगा। धीरे-धीरे उसने सारा काम संभाल लिया। कुछ ही साल में उसने व्यापार कई गुना कर लिया। आज उस पर भगवान की भरपूर कृपा है।

मेरे एक मित्र की देहरादून के पल्टन बाजार में पांच गुणा दस फुट की दुकान है। एक बार मैंने हंसी में कहा कि तुम्हारी दुकान बहुत छोटी है। वह इस पर नाराज होकर बोला – फिर कभी ऐसा न कहना। इस दुकान से हमारा मकान बना है। मेरी तीन बहिनों और बड़े भाई का विवाह हुआ है, और अगले महीने मेरा विवाह है। यह दुकान हमारी मां है, और मां कभी छोटी या बड़ी नहीं होती। मैंने अपनी भूल मान ली और उससे क्षमा मांगी। मैं ऐसे कितने ही लोगों को जानता हूं, जो व्यापार के बल पर खाकपति से करोड़पति बने हैं। विभाजन के समय पंजाब और सिन्ध से जो हिन्दू आये, उनके पास शरीर के कपड़ों को छोड़कर कुछ नहीं था; पर आज उनमें से 99 प्रतिशत के पास अपने मकान, दुकान और गाडि़यां हैं। उन्होंने किसी भी काम को छोटा नहीं समझा और जो व्यापार हाथ लगा, उसी में जुट गये। हां, उन्होंने परिश्रम खूब किया; और परिश्रम करने वाले का साथ ईश्वर भी देते हैं।
फिर भी नौकरी के प्रति लोगों में आकर्षण क्यों है ? मुझे लगता है नयी पीढ़ी अब परिश्रम, संघर्ष और खतरे उठाने से बचना चाहती है। सरकारी नौकरी यदि ऐसी मिल जाए, जिसमें कुछ काम न करना और पड़े और दो नंबर के पैसे की भी गुंजाइश हो, तब तो कहना ही क्या ? इसके लिए लोग साल भर का वेतन तक रिश्वत में देने को तैयार रहते हैं। एक जैसा काम करने वाले सरकारी और निजी कर्मियों के वेतन और सुविधाओं में अंतर भी बहुत अधिक है। सरकारी कर्मचारी युवक और युवतियों के विवाह भी अच्छे हो जाते हैं। service and employment

मेरे एक मित्र ने अपनी बहिन के लिए सजातीय, अच्छी पै्रक्टिस वाला डाॅक्टर युवक देखा; पर उसके पिताजी ने कहा कि जब हमें शादी में दस लाख खर्च करने हैं, तो हम सरकारी कर्मचारी ही लेंगे; और पांच हजार रु. रोज कमाने वाले डाॅक्टर की बजाय 25 हजार सरकारी वेतन वाले युवक को उन्होंने दामाद बना लिया। पर्वतीय क्षेत्र में काम का अर्थ ही सरकारी नौकरी है। यदि कोई युवक घर में खेती या किसी निजी संस्था में काम कर रहा है, तो वह खुद को बेरोजगार मानता है। खेती बहुत छोटी होने के कारण यह वहां की मजबूरी भी है। यद्यपि पर्वतीय मूल के बहुत से लोगों ने मैदानी नगरों में आकर अपने कारोबार शुरू किये हैं और वे खूब सफल हैं; पर स्वभाव में व्यापार न होने के कारण वे इसमें हाथ डालने से डरते हैं। कुछ युवक पूछते हैं कि यदि हमें अपना पुश्तैनी कारोबार या खेती ही करनी है, तो फिर इतनी बड़ी डिग्री क्यों ली ? वस्तुतः शिक्षा का अर्थ डिग्री नहीं है। शिक्षा से व्यक्ति की विचार क्षमता बढ़ती है। ऐसा व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में काम करे, वहां सफलता ही मिलती है। एम.बी.ए. की डिग्री लेकर लोग जब बड़े उद्योगपतियों के व्यापार को बढ़ा सकते हैं, तो वे अपना कारोबार क्यों नहीं कर सकते ? यद्यपि बहुत से लोग अपने मां-बाप के पैसे के बल पर डिग्रियां खरीद लेते हैं, ऐसे लोग कहीं सफल नहीं होते।

यह सच है कि व्यापार में पूंजी चाहिए; पर पूंजी का अर्थ केवल नकद धन या धरती नहीं है। शिक्षा, परिश्रम, धैर्य और दिमाग भी बहुत बड़ी पूंजी है। इनके सदुपयोग से भी सफलता मिलती है। साल-दो साल कष्ट उठाने पड़ सकते हैं; पर फिर केवल अपना ही नहीं, तो भावी पीढ़ी का भविष्य भी सुरक्षित हो जाता है।
क्या दस-बीस हजार रु. की नौकरी के लिए दर-दर ठोकर खा रहे युवक मेरी बात को समझ सकेंगे ?

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