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    ब्यूरोक्रेसी की नजर में नरेंद्र मोदी

    आंखों का तारा भी-कांटा भी
    आजाद भारत में देश चलाने के लिए शासन-प्रशासन के रूप में जिन स्तंभों का विकास हुआ, वे प्रमुख रूप से तीन हैं, जिन्हें विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के नाम से जाना जाता है। वक्त एवं परिस्थितियों के मुताबिक एक चौथा स्तंभ भी जुड़ गया, जिसे मीडिया के नाम से जाना जाता है। मीडिया को देश में लोकतंत्रा के रक्षक के रूप में एवं जिम्मेदार प्रहरी की भूमिका में जाना जाता है। जिम्मेदार प्रहरी की भूमिका किसी भी रूप में हो सकती है। विधायिका का काम कानून बनाना है तो न्यायपालिका का काम न्याय करना है। जहां तक कार्यपालिका की बात है तो इसकी भूमिका बहुत व्यापक एवं
    महत्वपूर्ण है। शासन-प्रशासन की गतिविधियों को संचालित करने में सबसे अधिक भूमिका इसी की होती है। इसी काम को करने के लिए उच्च अधिकारियों की भी व्यवस्था संविधान के तहत की गई है। मोटे तौर पर इसी व्यवस्था को ‘ब्यूरोक्रेसी’ कहा जा सकता है एवं जो लोग इससे संबद्ध हैं, उन्हें ‘ब्यूरोक्रेट’ कहा जाता है। हालांकि, अपने देश की आम जनता सामान्यतः उच्च स्तर के अधिकारियों को ही ब्यूरोक्रेट समझती है किंतु इसका दायरा निहायत व्यापक है। इस प्रकार देखा जाये तो देश का शासन-प्रशासन बिल्कुल सही तरह से काम करे, उसमें ब्यूरोक्रेसी की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है।
    हिन्दुस्तान की शासन व्यवस्था आजादी के बाद अंग्रेजों के द्वारा स्थानांतरित की गई है। आजाद हिन्दुस्तान की भी कार्यप्रणाली कमोबेश उसी तर्ज पर संचालित हो रही है, जैसी अंग्रेजी शासन के दौरान होती थी। अंग्रेजी शासन के दौरान जो लोग उच्च पदों पर आसीन थे, वे काफी हद तक अंग्रेजी शासन वाली मानसिकता से प्रभावित थे। निश्चित रूप से अंग्रेजों ने यह सारी व्यवस्था अपने हितों को ध्यान में रखकर बनाई थी। आजादी मिलने के बाद पं. जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में देश में कांग्रेस की सरकार बनी। देश में एक लंबे अरसे तक कांग्रेस का शासन रहा। ऐसी स्थिति में कांग्रेस की नीतियों, कार्यशैली, विचारधारा एवं अन्य क्रिया-कलापों से ब्यूरोक्रेसी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती है।
    आजाद भारत के शुरुआती वर्षों में जिन लोगों ने व्यूरोक्रेट के रूप में काम-काज संभाला, 1982 तक आते-आते या उसके इर्द-गिर्द सेवानिवृत्त हो गये। इसके बाद जो बैच आये, अमूमन वे भी उसी मानसिकता से प्रभावित हैं, जैसी 1982 के पहले ब्यूरोक्रेसी की थी। कुल मिलाकर कहने का आशय यही है कि कांग्रेस शासन के दौरान ब्यूरोक्रेसी के कार्य करने की एक प्रणाली विकसित हो गयी। यदि कुछ समय के लिए छोड़ दिया जाये तो अधिकांश समय तक देश में कांग्रेस का शासन रहा है। अतः यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ब्यूरोक्रेसी भी किसी न किसी रूप में कांग्रेसी सरकार की कार्यशैली से प्रभावित रही है। अतः आज वर्तमान परिस्थितियों में विचार किया जाये तो वर्षों से एक ढर्रे पर कार्य कर रही ब्यूरोक्रेसी की मानसिकता बदल पाना इतना आसान काम नहीं है।
    प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती है कि वे ब्यूरोक्रेसी की मानसिकता को अपने मुताबिक कैसे बदल पायेंगे? किसी भी काम को करने के लिए दो ही स्थितियां बनती हैं। परिस्थितियों के मुताबिक या तो स्वयं को बदल लिया जाये या फिर अपने हिसाब से परिस्थितियों को ही बदल दिया जाये। प्रधानमंत्राी भले ही अभी ‘वेट एन्ड वाच’ की नीति पर चल रहे हों किंतु उन्हें कुछ समय बाद दोनों में से एक स्थिति को स्वीकार करना ही होगा। ब्यूरोक्रेसी को अपने मुताबिक बदलने के लिए श्री नरेंद्र मोदी को बहुत सावधानी बरतनी होगी। उन्हें तब तक ‘इंतजार करो और देखो’ की नीति पर चलना होगा, जब तक उनके अनुरूप सभी परिस्थितियां बन नहीं जाती हैं।
    प्रधानमंत्राी जो कुछ करना चाहते हैं, उसे पूरा कर पाने में शायद उन्हें समय लगे और यह भी पूरी तरह सत्य है कि उन्हें अपने मन-मुताबिक कार्य इसी ब्यूरोक्रेसी से करवाने हैं। ब्यूरोक्रेसी के बारे में यह बहुत प्रचलित कहावत है कि वह निष्ठाएं बदलने में माहिर हैं, यानी कि जो भी दल सत्ता में आता है, उसी से प्रभावित होना शुरू हो जाती है या सरकार को ही अपने मुताबिक प्रभावित करना शुरू कर देती है, परंतु इन सब के बावजूद प्रमुख बात यह है कि उस मानसिकता का क्या होगा, जिस मानसिकता से ब्यूरोक्रेसी इतने लंबे अर्से से प्रभावित रही है।
    प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जबसे केंद्र में एनडीए की सरकार बनी है, तभी से देखने में आ रहा है कि नरेंद्र मोदी जो कुछ भी करना चाहते हैं, पूरी तरह कर नहीं पा रहे हैं, क्योंकि उसका सबसे प्रमुख कारण ब्यूरोक्रेसी का ढीला-ढाला रवैया है। प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्राता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से कहा कि नई सरकार बनने के बाद अधिकारी एवं कर्मचारी समय से दफ्तर पहुंचने लगे हैं। श्री मोदी ने कहा कि अधिकारियों एवं कर्मचारियों का समय से दफ्तर पहुंचना यदि मीडिया की सुर्खियां बनने लगे तो आसानी से यह समझा जा सकता है कि स्थिति कहां तक पहुंच चुकी है।
    नई सरकार की यदि बात की जाये तो कहा जा सकता है कि हिन्दुस्तान की यह पहली सरकार है, जिसे पूर्ण रूप से गैर कांग्रेसी सरकार कहा जा सकता है। एनडीए सरकार को 2014 के लोकसभा चुनावों में देशवासियों का बहुत व्यापक समर्थन मिला। चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्राी ने आम जनता से जो भी वायदा किया था, उस पर वह बहुत तेजी से काम कर रहे हैं परंतु ऐसा लगता है कि काम करने की रफ्तार को मोदी जी और बढ़ाना चाहते हैं परंतु यह सब तभी संभव है, जब ब्यूरोक्रेसी काम करने की गति तेज करे और बाबूगिरी की मानसिकता से निकलकर आम आदमी की सेवा की मानसिकता में आये। आज पूरे देश के समक्ष जबसे प्रमुख प्रश्न यही है कि ब्यूरोक्रेसी अपनी पुरानी मानसिकता को कितना बदल पाती है और इस ब्यूरोक्रेसी से श्री नरेंद्र मोदी किस हद तक काम करवा पाने में सफल हो पाते हैं?
    वर्तमान परिस्थतियों में देखा जाये तो विपक्ष एकदम बिखरा हुआ है, ऐसे में जन-कल्याण के काम और तेजी से किये जा सकते हैं परंतु बार-बार सवाल वही आता है कि जो ब्यूरोक्रेट आज तक कांग्रेसी शासन, उसके नेताओं की कार्यप्रणाली, नीतियों एवं विचारधारा से प्रभावित हैं, उनसे कितनी उम्मीद की जा सकती है? इस बात को बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। अतः प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी एवं उनकी सरकार को ऐसी मानसिकता वाली ब्यूरोक्रेसी से निहायत सतर्क रहने की आवश्यता है। जितना ब्यूरोक्रेसी पर नजर रखने एवं सतर्क रहने की आवश्कता है, विपक्ष से उससे कम सतर्क रहने की आवश्यकता है। कहने का आशय यही है कि विपक्ष की बजाय ब्यूरोक्रेसी से अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है। सतर्क रहने की आवश्यकता तब तक है जब तक वर्तमान सरकार की कार्यप्रणाली एवं उसकी नीतियों के मुताबिक ब्यूरोक्रेसी को काम करने की आदत न पड़ जाये।
    हालांकि, देश की पूरी ब्यूरोक्रेसी के बारे में यह बात नहीं कही जा सकती है, क्योंकि ब्यूरोक्रेसी में तमाम ऐसे लोग हैं जो मेहनत, निष्ठा एवं ईमानदारी से काम करना चाहते हैं, किंतु उन्हें उनके मुताबिक वातावरण नहीं मिल पा रहा था, किंतु अब ऐसे लोग बेहद खुश हैं। अब वे अपना काम अपनी इच्छाओं के अनुरूप कर रहे हैं। श्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्राी बनते ही स्पष्ट रूप से यह कह दिया था कि अधिकारी बिना किसी भय एवं किसी के दबाव में आये बिना फैसले लें। अन्यथा इसके पहले तो अधिकारी कोई भी फैसला लेने से पहले सौ बार सोचते थे। इस सोच वाले जितने भी ब्यूरोक्रेट हैं, वे श्री नरेंद्र मोदी का ही शासन चाहते हैं यानी कि श्री नरेंद्र मोदी ऐसे अधिकारियों की आंखों के तारे बने हुए हैं किंतु सवाल इस बात का है कि देश में ऐसे अधिकारियों की संख्या कितनी है? मोटे तौर पर विचार किया जाये तो ऐसे अधिकारियों की संख्या निहायत ही कम मिलेगी।
    इसके विपरीत दूसरी श्रेणी के ब्यूरोक्रेटों की बात की जाये तो श्री नरेंद्र मोदी उनकी नजरों में कांटे की तरह चुभ रहे हैं। जो अधिकारी जन-कल्याण की बजाय स्व-कल्याण का ध्यान ज्यादा रखते हैं, उन्हें मोदी जी की कार्यप्रणाली बिल्कुल भी पसंद नहीं है। ‘न खाऊंगा – न खाने दूंगा’ की बात पर ऐसे अधिकारी कितना अमल कर पायेंगे, अपने काम में यह बेहद गंभीर प्रश्न है। निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ऐसे लोग ‘खाओ और खिलाओ’ वाली
    कार्यप्रणाली की मानसिकता से काफी प्रभावित हैं। इसी प्रकार की ब्यूरोक्रेसी को सही राह दिखाने की नितांत ही आवश्यकता है। यदि मोदी सरकार ऐसा कर पाने में कामयाब हो जाती है तो राष्ट्र एवं समाज के लिए यह बहुत लाभकारी साबित होगा। निःसंदेह यह भी कहा जा सकता है कि इस मानसिकता के ब्यूरोक्रेटों की संख्या अधिक है।
    अतः नरेंद्र मोदी सरकार की दीर्धकालीन सफलता के लिए यह निहायत जरूरी है कि वर्षों से घिसी-पिटी मानसिकता से व्याप्त ब्यूरोक्रेसी को सुधारा जाये ओर उसमें तीव्र गति से काम करने का जज्बा पैदा किया जाये। हालांकि, यह कोई आसान काम नहीं है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि यह काम किया ही नहीं जा सकता है। बहरहाल जो भी हो, सरकार की कार्यप्रणाली एवं उसके इरादों पर गौर किया जाये तो कहा जा सकता है कि ऐसा कर पाने में सरकार निश्चित रूप से कामयाब होगी।

    • अरूण कुमार जैन
    अरूण कुमार जैन
    अरूण कुमार जैन
    इंजीनियर लेखक राम-जन्मभूमि न्यास के ट्रस्टी हैं

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