उन्मादी सोच व साजिश का हिंसक चेहरा

अरविंद जयतिलक

पैगंबर मोहम्मद पर आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट को लेकर कर्नाटक की राजधानी बंगलूरु में जिस तरह कुछ मजहबी उन्मादियों ने पुलिस स्टेशन को आग के हवाले कर अपनी अराजक मानसिकता का परिचय दिया है वह रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है कि ऐसे लोगों का न तो देश के कानून-संविधान में विश्वास है और न ही वे राष्ट्र के प्रति समर्पित हैं। इन्हें सिर्फ राष्ट्रद्रोही ही कहा जा सकता है। अगर उनमें तनिक भी संवेदनशीलता और कानून के प्रति सम्मान होता तो वे न तो पुलिस स्टेशन को आग के हवाले करते और न ही सार्वजनिक संपत्ति का दहन करते। देश जानना चाहता है कि जब पुलिस द्वारा आरोपी के खिलाफ एफआइआर दर्ज कर लिया गया था फिर इस तरह के हिंसक प्रदर्शन का क्या औचित्य था? क्या अपनी अभिव्यक्ति अन्य लोकतांत्रिक तरीके से जाहिर नहीं की जा सकती थी? आखिर उन्माद और कटुता पर आधारित हिंसक विरोध किसतरह कानून और समाजसम्मत हो सकता है? अब वक्त आ गया है कि देश की सभी सरकारें ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करे जो मजहबी आस्था की आड़ में देश में अराजकता का माहौल निर्मित कर समाज को विध्वंस करने पर आमादा हैं। हां, यह उचित है कि अगर कोई व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म या मजहब का क्यों न हो अगर वह दूसरे के धर्म या मजहब पर आपत्तिजनक टिप्पणी करता है तो उसके खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि कुछ लोग ही सजा देने का बीड़ा उठा लें और संवैधानिक व सार्वजनिक संस्थाओं पर हमला बोल दें। ऐसे तो फिर देश में न तो कानून का मतलब रह जाएगा और न ही फिर व्यवस्था का। बंगलुरु में ऐसा ही हुआ है। बेशक एक संवैधानिक व लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर नागरिक व समुदाय को अपनी बात सकारात्मक ढंग से रखने और जनतांत्रिक तरीके से प्रदर्शन करने का अधिकार है। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि वह हिंसक प्रदर्शनों के जरिए हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़ और निजी व सार्वजनिक संपत्ति का दहन कर हालात को बदतर और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाए। यह भी स्वीकार्य नहीं कि वह हिंसक प्रदर्शन की आड़ में जनजीवन को बाधित कर दिनचर्या को तहस-नहस कर दे। बंगलुरु के उपद्रवियों ने ऐसा ही कृत्य किया है। जिस तरह उग्र अराजक तत्वों ने पुलिस स्टेशन, प्रशासन और सार्वजनिक संपत्ति को निशाना बनाया है उससे साफ जाहिर होता है कि उनका मकसद अपनी बात कहना नहीं बल्कि अपने उग्र सांप्रदायिक आचरण से सामजिक वातारण को विषाक्त बनाना था। अच्छी बात यह है कि उनकी साजिश परत दर परत उघड़ने लगी है और उनका चेहरा सामने आ गया है। यहां जानना आवश्यक है कि कांग्रेस के विधायक श्रीनिवास मूर्ति के भतीजे पर आरोप है कि उसने फेसबुक पर इस्लाम के पैगंबर की आपत्तिजनक पोस्ट की। उसके बाद अराजक भीड़ ने विधायक के घर पर हमला बोल उन्हें जान से मारने की कोशिश की और साथ ही पुलिस स्टेशन को आग के हवाले कर दिया। क्या यह कृत्य देश और समाज विरोधी नहीं है? सजा देने का काम न्यायालय का है या अराजक भीड़ का? अराजक भीड़ को कानून हाथ में लेने का अधिकार किसने दिया? क्या ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा है कि यह हिंसा सोची-समझी साजिश का परिणाम है? अन्यथा अचानक इतने अधिक लोग इकठ्ठा होकर विधायक के घर और पुलिस पर हमला करने की हिम्मत कैसे जुटाते। माना कि आपत्तिजनक पोस्ट से उनकी आस्था को चोट पहुंची है? लेकिन एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते उन्हें अपनी जिम्मेदारी का पालन करना चाहिए। कानून पर भरोसा करना चाहिए। लेकिन उन्होंने सिर्फ कानून का ही मजाक नहीं उड़ाया है बल्कि देश की संपत्ति को भी नुकसान पहुंचाया है। इसका उन्हें दंड मिलना ही चाहिए। आस्था और भावनाएं देश के भविष्य से बढ़कर नहीं है। देश में अन्य धर्मावलंबी भी रहते है। उनकी आस्थाओं से भी मजाक होता है। लेकिन वे तो कभी देश की संपत्ति का दहन नहीं करते? पुलिस पर हमला नहीं बोलते? अभी पिछले दिनों ही असम के एक प्रोफेसर ने प्रभु श्रीराम पर आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट की लेकिन किसी ने भी उस पर हमला नहीं बोला और न ही प्रतिकार स्वरुप सार्वजनिक संपत्ति का दहन किया? फिर अन्य धर्मावलंबियों को भी इसी तरह की सहिष्णुता का परिचय देते हुए कानून पर विश्वास क्यों नहीं करना चाहिए? गौर करें तो हिंदू देवी-देवताओं के विरुद्ध भी अकसर अपमानजनक टिप्पणी की जाती है। उनके अश्लील चित्र बनाए जाते हैं। बावजूद इसके कभी भी हिंदू समुदाय के लोगों ने इस तरह का भीड़ इकठ्ठा कर कानून-व्यवस्था को न तो चुनौती दी है और न ही सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है। इसका मतलब यह नहीं कि उनमे ंआक्रोश पैदा नहीं होता। लेकिन वे संविधान व कानून में विश्वास करते हैं, अराजकता और विध्वंस में नहीं। जबकि बंगलूरु में ऐसा नहीं हुआ। आखिर क्यों? इन परिस्थितियों के बीच अगर राज्य सरकार इस नतीजे पर पहुंचती है कि इस हिंसा के पीछे सोशल डेमोक्रटिक पार्टी आफ इंडिया (एसडीपीआई) और पापुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) के सदस्यों का हाथ हो सकता है तो इससे इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसा इसलिए कि इन संगठनों का कई हिंसक घटनाओं में संलिप्तता उजागर हो चुकी है। ऐसे में अगर कर्नाटक सरकार उचित समझती है कि जिन लोगों ने सार्वजनिक संपत्ति का दहन किया है उन्हीं से नुकसान की भरपायी भी होगी तो यह स्वागतयोग्य कदम है। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा ही आदेश भी दे रखा है। इस आदेश के परिप्रेक्ष्य में ही उत्तर प्रदेश सरकार ने सीएए के विरोध प्रदर्शन के दौरान उपद्रवियों द्वारा किए गए नुकसान की भरपायी उन्हीं से कर रही है। विचार करें तो यह पहली बार नहीं है जब मजहबी उन्मादियों द्वारा कानून-व्यवस्था को धत्ता बता देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की हरकत हुई है। याद होगा अगस्त 2012 में देश भर में रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में हिंसक विरोध प्रदर्शन को अंजाम दिया गया था जिसमें कई लोगों की जानें गयी थी। इसके अलावा असम में दंगों के खिलाफ मुंबई समेत देश के अन्य स्थानों पर हुए प्रदर्शनों में भी रोहिंग्या मुसलमानों के साथ हो रही ज्यादती का सवाल उठाकर माहौल को अराजक बनाया गया। तब उपद्रवियों ने बेस्ट की चार दर्जन से अधिक बसों को क्षतिग्रस्त किया था और मीडिया के उपकरणों एवं वाहनों को आग के हवाले कर दिया था। इन प्रदर्शनों में जेहादी तत्वों की भूमिका स्पष्ट रुप से उजागर हुई थी। याद होगा गत वर्ष पहले पश्चिम बंगाल के माल्दा में जेहादी भीड़ ने पुलिस स्टेशन पर हमला बोल उसे आग के हवाले कर दिया। जबकि पैगंबर मोहम्मद के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाला शख्स जेल की सलाखों के पीछे था। उस पर रासुका जैसे कड़े कानून भी लगाए गए थे। बावजूद इसके मालदा के कलियाचक में मुस्लिम समुदाय के लाखों लोग इकठ्ठा होकर अराजकता का प्रदर्शन किया। सांप्रदायिकतापूर्ण नारे लगाए, पुलिस के हथियारों को लूटा और महिला कांस्टेबलों के साथ छेड़छाड़ की। याद होगा असम दंगे के विरोध में मुंबई के आजाद मैदान में जेहादी अराजकवादियों द्वारा किस तरह धरना-प्रदर्शन कर कानून-व्यवस्था की धज्जिया उड़ायी गयी। अमर ज्योति को भी नुकसान पहुंचाया गया। वर्ष 2006 में डेनमार्क के एक अखबार ने पैगंबर साहब की तस्वीरें छाप दी और उसकी आंच भारत तक आ पहुंची। तब भी मजहबी उन्मादियों ने देश भर में तांडव मचाते हुए  सार्वजनिक संपत्ति का दहन किया था। अब यह हिंसक विरोध का सिलसिला थमना चाहिए। देश में रहने वाले सभी धर्मावलंबियों को समझना होगा कि देश कानून से चलता है मनमर्जी से नहीं। उचित होगा कर्नाटक की सरकार बंगलूरु के गुनाहगारों को उनके किए की कड़ी से कड़ी सजा दे ताकि देश में नफरत घोलने की उन्मादी सोच और साजिश की कमर टूट सके। 

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