लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी साहब को जॉच में क्लीन चिट देने के बावजूद आखिरकार दारूल उलूम के मोहतमिम की कुर्सी के नाकाबिल समझते हुए शुरा के 14 सदस्यो में से 9 ने वस्तानवी के खिलाफ वोट देकर दारूल उलूम के 145 साल के इतिहास में अब तक का सब से बडा फैसला कर उन्हे मोहतमिम के पद से हटा दिया। इस फैसले के बाद भले ही ऑखो में आंसू और दिल में दर्द छुपाकर वस्तानवी साहब ने साफ साफ कह दिया की वो शूरा के फैसले का सम्मान करते है और वो इस फैसले के खिलाफ कोर्ट नही जायेगे। पर बिना किसी गलती के इतनी बडी सजा अपने लोगो द्वारा उन्हे इस प्रकार देकर पूरी दुनिया में रूसवा कर दिये जाने का दर्द उनके चेहरे पर पद से हटने के बाद साफ साफ नजर आयां रहा था। वस्तानवी साहब के मोहतमिम पद से हटने की अहमीयत और इस का असर दारूल उलूम पर फौरी तौर पर भले ही न पडे पर इस में कोई शक नही कि आने वाले समय में दारूल उलूम सहित पूरे हिन्दुस्तान के मुसलमानो और मुस्लिम इदारो पर इस का असर देखा जा सकता है। क्यो की गुजरात के मुस्लिम विद्वान साधन सम्पन्न होने के साथ ही इस्लामी तालीम और तरक्की के लिये दिल दारूल उलूम और मुल्क के तमाम मुस्लिम इदारो की दिल खोलकर मदद करते है। वस्तानवी साहब को दारूल उलूम के मोहतमिम पद से हटाने के मुद्दे पर अगर इन लोगो ने अपनी बेइज्जती समझकर गुजरात से दारूल उलूम देंवबंद सहित तमाम मुस्लिम इदारो को दी जाने वाले मदद से हाथ खीच लिया तो समस्या गम्भीर हो सकती है।

वस्तानवी साहब आखिर उन्ही लोगो की ऑखो में क्यो चुभने लगे जिन्होने उन्हे दारूल उलूम के मोहतमिम पद पर बैठाया इस के दो कारण थे। वस्तानवी की नियुक्ति के पहले दिन से ही ये लोग दारूल उलूम देवबंद की फिजा में बदलाव देख रहे थे। इन सियासी तोतो का ये भी यकीन पक्का हो गया था कि दारूल उलूम में मुखिया के तौर पर वस्तानवी की नियुक्ति भारत की मुस्लिम राजनीति में कुछ न कुछ बदलाव जरूर लायेगी। दीनी तालीम के माहिर गुलाम मौहम्मद वस्तानवी आर्थिक मामलो पर गहरी पकड रखते है। एक ओर वस्तानवी साहब का मोहतमिम चुना जाना दारूल उलूम के चेहरे में एक बदलाव का संकेत था वही इसे इस्लामिक जगत में नए परिवर्तन के रूप में भी देखा जा रहा था। क्योकि दारूल उलूम के इतिहास में पहली बार कोई एमबीए डिग्रीधारी मोहतमिम बना था। दूसरा यह कि सियासी गलियारो में मदनी खानदान का कद एक वस्तानवी के आने से बौना लगने के साथ ही घटने लगा था। ये ही वजह थी कि नरेंद्र मोदी की आड लेकर कुछ कट्टरपंथी मुस्लिमो के साथ मिलकर इन लोगो ने मोहतमिम के पद पर बैठने के बाद से ही गुलाम मौहम्मद वस्तानवी को कई प्रकार के विवादो में उलझ दिया। उन्होने सिर्फ इतना क्या कह दिया कि ॔॔गुजरात में विकास हो रहा है और राज्य के लोग, चाहे हिन्दू हो या मुसलमान सभी इस बात से इत्तेफाक रखते है कि गुजरात में विकास के मामले में कोई भेदभाव नही किया जा रहा है। ’’वस्तानवी के इन चन्द अल्फाजो ने दारूल उलूम देवबंद में कोहराम मचा दिया। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ और एक सम्मान समारोह में वस्तानवी द्वारा राधा कृष्ण की एक मूर्ति स्वीकार करने से गुस्साए देवबंद के तलबाओ ने दारूल उलूम के दो उस्तादो की उस्तादी के कारण रविवार 23 जनवरी 2010 को दारूल उलूम देवबंद में मोहतमिम वस्तानवी के समर्थक तलबाओ के साथ मारपीट करते हुए नये मोहतमिम वस्तानवी के विरोध में नारे बाजी की। जब कि वस्तानवी ने नरेंद्र मोदी और गुजरात के बारे में जो कुछ भी कहा था वो सिर्फ एक बयान भर था। वस्तानवी के विरोधी दरअसल उन के सुधारवादी एजेंडे के पहले से ही खिलाफ थे। वस्तानवी के इस ब्यान ने बिल्ली के भाग से छीका टूटने का काम किया। क्यो कि

पूरे देश ने जिस प्रकार से वस्तानवी का सर्मथन किया उस की ये ही वजह थी के मुल्क के दानिशवर लोगो को वस्तानवी में आशा की वो किरण नजर आई थी जिस से मुसलमानो और उन के बच्चो का भविष्य आने वाले वक्त में उज्जवल दिखाई दे रहा था। मुसलमान दंगो और कुछ कटटरपंथी हिन्दू और मूस्लिम लोगो की विचार धारा के आगे बेबस, लाचार तालीम और तरक्की में आजादी से आज तक पिछड रहा है लाख कोशिशो के बावजूद सामाजिक और धार्मिक बेडियो में जकडा होने के कारण ऊबर नही पा रहा है। मुसलमानो की तरक्की के लिये कई कमीशन बने। कई आयोग गठित किये गये पर इस सब से भी मुस्लिमो को कोई फायदा नही हो पाया। मुस्लिमो में तालीम की कमी होने के कारण सिर्फ कागजो पर खाना पूरी कर ली गई। पिछले दिनो मुस्लिम आरक्षण का झुनझुना भी मुस्लिमो के हाथो में चुनावो के आस पास दिया गया पर कितना आरक्षण मुसलमानो को मिला। आज आजादी के 64 साल बाद भी मुसलमान की समाजी, आर्थिक और तालीमी हैसियत में कोई खास बदलाव नही आया है। दारूल उलूम के नये मोहतमिम की शक्ल में वस्तानवी का चुना जाना जहॉ दारूल उलूम के चेहरे में एक बदलाव का संकेत था वही दारूल उलूम में प रहे मुस्लिम बच्चो की तालीमी तरक्की में काफी हद तक इजाफा होता। दीनी तालीम के साथ साथ डाक्टर, इंजीनियर, प्रौफेसर,बिजनेस मैनेजमेंट में इन बच्चो का भविष्य बनता साफ साफ नजर आ रहा था।

मुस्लिम समाज की ये भी बदकिस्मती है की जिन लोग ने पर्द के पीछे से वस्तानवी साहब का विरोध दारूल उलूम के तलबा से करा ये तमाम लोग मुस्लिम समाज की तरक्की के नाम पर सरकार से बडे बडे पद हासिल करने के साथ साथ सिर्फ सरकार के तोते बने हुए है और विदेशो से मुस्लिमो की तरक्की समाजी हैसियत को बाने के नाम पर बडा बडा चंदा जमा करते है। लेकिन अपने पेट भरने के अलावा आज तक इन लोगो ने अपनी पिछडी कौम की तरक्की के लिये कुछ नही किया। आज मुस्लिम शिक्षा के क्षोत्र में इतना पिछड चुका है की उसे मुस्लिम आरक्षण से कोई सरोकार नही, वो तो ये भी नही जानता की आखिर ये आरक्षण क्या बला है। दरअसल सब से पहले हमे मुस्लिम समाज में जागृति लानी होगी। मुसलमानो को आरक्षण मिले या ना मिले ये अलग बात है पर मुस्लिमो के लिये आधुनिक शिक्षा की शुरूआत हमे करनी होगी। जो सिर्फ और सिर्फ वस्तानवी ही कर सकते है। आज कुछ मुस्लिम नौजवान अपनी आर्थिक स्थिति और शिक्षा की कमी के कारण गलत रास्तो पर चल पडे है। इन मुस्लिम नौजवानो का मुॅह अगर वस्तानवी तालीम और तरक्की की तरफ मोड रहे थे तो क्या गलत था। पर इन लोगो के दिलो में उसी दिन से खौफ ने जगह घर कर गई थी जिस दिन से वस्तानवी को दारूल उलूम का मोहतमिम बनया गया था। खौफ ये कि अगर प लिख कर मुस्लिम कौम बेदार हो गई तो इन लोगो की पिछडे हुए मुस्लिमो के नाम पर देश विदेश से चंदा बटोरने केनामू पर खुली दुकाने बन्द हो जायेगी। कौम के बच्चो की ऑखो में अगर प लिखकर तरक्की की रोशनी आ गई तो इन लोगो का हल्वा मां खत्म हो जायेगा। क्यो कि आज मदरसो में प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद मुसलमान का बच्चा 8 या 9 वर्ष का होते होते परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण माध्यमिक वर्ग की शिक्षा भी पूरी नही कर पाता और दो वक्त की रोटी के चक्कर में पड जाता है ऐसे में यदि नये मोहतमिम मदरसो में पने वाले मुस्लिम नौजवानो को प्रोफेशनल व्यवसाय में भविष्य बनाने के हिमायती है तो क्या बुरा है इस के साथ ही अगर वो दीनी तालीम के साथ साथ डाक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, बिजनेस मैनेजमेंट समेत प्रबंधन में पाई की वकालत करते है तो उनका पूरा दुनिया के मुसलमानो को मिल कर समर्थन करना चाहिये।

वस्तानवी साहब को मात देकर भले ही नौमानी साहब ने मोहतमिम का ताज पहन लिया है। पर दारूल उलूम के जिम्मेदारान को इस की बात की गौरओ-फिक्र करनी चाहिये की दारूल उलूम में अनुसाशन की डोर क्यो और किस के कहने पर टूटी। इन लोगो को दारूल उलूम की फला के लिये इस बात का भी पता लगाना चाहिये कि वस्तानवी साहब के मुद्दे पर तलबा को भडकाने वाले वो दो उस्ताद कौन थे जिन के कहने पर तलबा ने वस्तानवी साहब की शान में गुस्ताखी की। मेरा ये मानना है कि पिछले 6 महीने और 13 दिन में दारूल उलूम में जो कुछ हुआ अगर वो शरअई था तो सही लेकिन अगर ये सारा प्रकरण गैर शरअई रहा तो हमे गौर ओ फिक्र करना चाहिये कि क्या एक कुर्सी के लिये दारूल उलूम में इस प्रकार का तमाशा मुस्लिम समाज और हमारे हम वतन लोगो पर क्या असर डालेगा।

 

2 Responses to “वस्तानवी की विदाई”

  1. vimlesh

    सादाब साहब नमस्कार
    आज अगर इस्लाम बदनाम है तो क्यों कम से कम ये बात तो साफ हो गयी .
    किस तरह शरई को हथियार बना कर कठमुल्ले अपना पेट पलते है
    ऐसा ही कभी हिन्दुओ में भी पोंगा पंडित धर्म के नाम पर कर्म के नाम पर लोगो को लूटते थे .
    जो हिन्दू इन धर्म के ठेकेदारों को समझ गए वो तरक्की कर गए और जो नहीं समझे बेचारे अपने हालत पर तरस खा रहे है

    मुस्लमान कब समझेगे इन कठमुल्लों की साजिश को जो शरई को हथियार बना कर मुसलमानों का शोषण कर रहे है

    इस्लाम के दुश्मन कौन है ?

    हिन्दू !

    नहीं जनाब इस्लाम के दुश्मन है आज के मुस्लमान जो अपने आप को सच्चा मुस्लमान कहते है

    हिन्दू भी मुस्लमान की इज्जत करता है

    लेकिन सच्चे मुस्लमान की नहीं

    मुज़फ्फर हुसैन,अब्दुल कलाम,गुलाम दस्तगीर, मोहमद रफ़ी ,वास्तान्वी ये केवल मुस्लमान है (सच्चे मुस्लमान नही थे ) ऐसे ही मुसलमानों की जरूरत है जो अपने साथ साथ सारे समाज,देश और कौम को नसीहत दे

    वरना रोड पर लाखो सच्चे मुस्लमान आवारा घूमते है कोई घास तक नहीं देता

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  2. Anil Gupta,Meerut,India

    वस्तान्वी का हटाया जाना ये साबित करता है की देश का मुस्लिम समाज आज भी कठमुल्लों के कब्जे में है.और उस पर अपनी पकड़ बनाये रखने वाला कट्टरपंथी वर्ग न तो विचारों, अभिव्यक्ति पंथनिरपेक्षता में विश्वास नहीं रखता है.यही कारन है की वस्तान्विजी जैसे तरक्कीपसंद मुसलमान को मुस्लिम समाज के चौधरी हजम नहीं कर सके. क्या मदनी या कोई और मुस्लमान ये साबित कर सकता है की उनके डी एन ऐ और हिन्दुओं के डी एन ऐ में फर्क है. हाल में एक परिक्षण में ये पाया गया की देश के सभी धर्मावलम्बियों का डी एन ऐ एक ही है. अर्थात नस्ली तौर पर सभी एक ही नस्ल के हैं. और इस देश के मुस्लमान भी हिन्दू पुरखों की ही संतान हैं. तो फिर केवल राधाकृषण की मूर्ति स्वीकार कर लेने या गुजरात में हिन्दू मुसलामानों की बिना भेदभाव के तरक्की की बात कहना कोई गुनाह तो नहीं है. लेकिन मुसलामानों को खुली हवा में सांस लेने की आदत ने पड जाये इसलिए खुली हवा लाने का प्रयास करने वाले वस्तान्वी को हटाना आवश्यक था. यह केवल वोट बैंक की राजनीती के कारन होता है. अगर हिन्दुओं व मुसलामानों में गलतफहमियां दूर हो जाएँ और आपस में खुलकर संवाद से अपने बीच के मसले हल करने का प्रयास शुरू हो जाये तो फिर फूट डालो और राज करो की नीति चलने वालों का क्या होगा. उनकी तो दुकान ही बंद हो जाएगी. इसीलिए कोई हामिद दलवाई, मुज़फ्फर हुसैन या पंडित गुलाम दस्तगीर या फिर वस्तान्वी इन वोट बैंक के ठेकेदारों की दुकानदारी में रूकावट के रूप में नजर आने लगते हैं.

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