कभी वज्र थी किसान की छाती, अब कमजोर क्यो ?

                                  आत्माराम यादव पीव     

कठिन दौर में भी भारत की विभूति से अलंकृत था किसान –

 भारत के किसान को देश का मेरुदंड माना गया है ओर उसके जीवन के संघर्षों से उबरकर साहसी बनने के कारण ही कभी उसकी छाती व्रज के समान कठोर हुआ करती थी, जो किसान को उसकी अपरिमित सहनशक्ति से प्राप्त हुई थी, आज वह किसान आधुनिकता की दौड़ में कमजोर हो गया है। आज देश में 70-80 प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर है तभी किसान की ओर यह देश बड़ी आशाओं के साथ देख रहा है ओर उसे राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक मानकर उसकी भुजाओं के बल पर उत्साह करता है कि वह मिट्टी की गोद में पला बढ़ा मिट्टी से अनाज पैदा करके परोपकार में लगा है। अपनी ननिहाल में बचपन में मामा जी के साथ मैंने किसानी का काम भी किया है, दराते से फसल काटने ओर बैलों से दामन कराकर फसल उड़ाने का अनुभव है वही हार्वेस्टर से फसल काटकर घर में रखने का अनुभव है इसलिए में किसान के दर्द को जानता हूँ – “का दुख जाने दुखिया का, का दुख जाने दुखिया माई, जाके पैर न फटी बिबाई , सो का जाने पीर पराई।“ दिन-रात खेत में अपना हाड़-मास गलाकर खेती करता है किसान। धूप में तपता है, कीचड़ में सड़ता है, जाड़े में ठिठुरता है किसान। सूखा पड़ने पर अत्यधिक बरसात होने पर फसल बर्बाद होने पर सहता है किसान। पुराने परंपरागत किसानी के लिए डाक कवि, भड़डरी कवि ओर घाघ कवि की लोकोक्तियों को वह कम्पुटर की तरह विश्वास करके वर्षा, सूखा पड़ने, अतिवृष्टि का अनुमान लगाकर खुद ही मौसमविभाग की तरह मौसम वैज्ञानिक की तरह प्रयोग कर खेती करता किसान भड्ड्ररी की कहावतों से जुड़ जाता है– “”कलसे पानी गरम है,चिरिया न्हावे धूर। अड़ा ले चींटी चढ़े,भड्ड्र्री बरखा पूर।“” घड़े में जल का गरम रहना, चिड़ियो का धूप में नहाना ओर चींटियों का पाने अड़ो को लेकर ऊपर चढ़ना सिद्ध करता है की बरसात अच्छी होगी। दूसरी ओर उनका यह भी कहना है की- “”सावन सुकला सप्तमी, छिपी के उगे जो भान, तब लगि भड्डरी बरसि है,जब उठी देव उठान।“” अर्थात अगर श्रावण शुक्ल सप्तमी को यदि बादलों के कारण उगता हुआ सूर्य दिखाई न दे तो समझिए की देवउठनी एकादसी तक बर्षा होती ही रहेगी। घाघ कवि के अनुसार-चौदस पूनो जेठ की, वर्षा वरसे जोय। चोमासे बरसे नही, नदीयन नीर न होय। अगर जेठ की चौदस ओर पूनो को वर्षा हो जाये तो चार महीने तक बरसात नहीं होती है ओर नदिया सुख जाती है। डाक कवि कहते है कि –“”सावन पछवा भादों पुरवा आसिन बहे इसान। कातिक कंत सीस न डोले, कहा का राखव धान।“” अर्थात जब सावन महीने में पछवा हवा बहने लगे ओर भादों के महीने मे पुरबा हवा बहने लगे ओर कार्तिक के महीन मे बिलकुल हवा न चले जिससे सीस भी न डोले तो समझना चाहिए कि इतना धान होगा कि किसान के घर में जगह कम पड़ जाएगी। तब किसान के लिए ये कविगण के वाक्य ही वैज्ञानिक के वाक्य थे आज आधुनिक तंत्र आ गया है ओर यह प्राचीन तंत्र मंत्र चला गया है। तब किसान हर परिस्थिति से तालमेल रखकर जीता था ओर कितनी भी विपत्ति आ जाये आत्महत्या जैसे कायराना विचारों से दूर रहते हुये जीने का संदेश देता था। खेती को लेकर परिवार में बटवारा,घरों में बटवारा जैसे गंभीर  हालत तब मुश्किल से 10 प्रतिशत देखने को मिलते ओर पूरा परिवार सयुंक्त परिवार की रीढ हुआ करता था।   

वह समय भी इन किसानों के जीवन में दस्तक देता था जब ये शासकों से सताये जाते थे, उनकी आय का बटवारा उन्हे  कर्ज देने वाले गाँव के लाला,मुंशी, जमीदर लाठी के बलपर कर लिया करते थे, किसान कि उपज के बटवारे में किसान को उसके पसीने का मूल्य भी नहीं मिल पाता था। किसान जमीदारों- कर्जदारों की छीनाछपटी से भयभीत था, उसके पूरे परिवार का अस्तित्व दमित था, वह परिवार सहित भूखा रहता था ओर उसकी उपज पर हिस्सा लेकर पूरी फसल हथियाने वाले शोषणकर्ता मोहनभोग पाकर भी किसानको अपने कर्जे से मुक्त नहीं करते थे। ऐसे ही किसान के दर्द को सँजोती हुई एक फिल्म मदरइंडिया के लाला का जीवंत चरित्र हर किसान को अपने जीवन का ही हिस्सा लगता था। तब के किसान की हिम्मत वंदनीय थी जब वह मई जून कि आग बरसती गर्मी में अपने बैलों को हल में जोतकर खेतों में निकल जाता था। किसानों के शरीर से पसीना बहता पर उसके कदम आग उगलती गर्मी में कभी नही थमते ओर नंगे पाँव वह खेतों में काम करता था। घनघोर बरसात ओर आसमान से बिजली के चमकने-गिरने का जानलेवा शब्द भी उसे विचलित नही करता था। उसके तन पर लंगोटी होती,आज जैसे पूरे कपड़े उसने नहीं पहने होते, घर झोपड़ानुमा कवेलु का होता जिसके आधे भाग में वह रहता ओर आधे में उसके गाय-बैल बंधे होते ओर भूसा-चारा रखा होता। तब किसान अन्नदाता ओर देवता के तरह माना जाता था ओर उनके पैरो में युग कि शक्ति ओर हाथों में महानता होती जो देश कि आन-बान-शान कहलाती थी। इनके इरादे मजबूत होते थे लेकिन स्थिति इन्हे विपन्नता के दलदल में ले जाती थी ओर खेती पर निर्भर होने के कारण इनके पूरे परिवार के पास कोई अन्य रोजगार का साधन या व्यवसाय नहीं था, यही कारण था की अधिकांश किसानो के बच्चे पढ़ने के वंचित रहते थे तब परिवार का बड़ा बेटा खुद अपढ़ रहकर अपने छोटे अन्य भाई बहिनों को पढ़ाने में अपना जीवन होम कर दिया करते थे, लेकिन हर हाल में साहस बनाए रखते थे।

       हिंदुस्तान में किसान के त्याग ओर बलिदान ओर उसकी सेवा ने उसे धन्यता प्रदान की है ओर उसकी छाती को पाषाण के तरह व्रज सी कठोर मानते हुये उसका हृदय गेहूं की बाल के समान श्रीसंपन्न माना गया जो खेत कि मिट्टी में सोना पैदा कर दूसरों कि निर्धनता को समाप्त करता है जिसे किसी कवि ने कहा है –“”बांध कुदारी खुरपी हाथ, जो लाठी का राखे साथ। काटे घास निराबे खेत, बहै किसान करें निज हेत॥ जो अपने हाथे फावड़ा लईके,खेत में डारे माटी। ते करे घर मा कमला देवी, बइठे पारे पाटी॥“” किसान का रिश्ता धरती मैया से था, ओर धरती मैया को उसने कभी माटी नहीं माना। धरती मैया को ही मिट्टी के रूप में पूजनीय स्थान देते हुये उसने अपना स्नेह का नाता जोड़ा था, ठीक उसी प्रकार जैसे चातक का नाता मेघ से होता है। तब किसान के सामने अकाल पड़ता तो वह अपनी पूरी अंतरात्मा के साथ रो पड़ता था किन्तु धरती को मैया मानने के कारण वह धरती से संबंध जोड़े रखता ओर मिट्टी मैं अपने बैलों को लेकर श्रम करना नही भूलता था। कष्ट आने पर सामान्य व्यक्ति हार मान लेता किन्तु किसान अकेला था जो अपनी छाती को कठोर किए हारता नही था ओर हर संकट को चुनोती देकर अपनी हड्डियाँ गलाने से बाज नहीं आता था। वह यह नहीं सोचता था बरसात नही हुई, तो फसल कैसे मिलेगी? मिट्टी को अपने माथे पर लगाकर धरती मैया से बरसात की प्रार्थना करता ताकि फसल के आने के बाद लगान ओर कर्ज कि चिन्ता जो उसकी ओर उसके परिवार कि खुशियों को दर्द ओर पीड़ा में तब्दील न करे इस भाव को तत्समय के एक कवि ने किसान की व्यथा ओर उसके दर्द को अपने भावों में यूं सहेजा है –“”हमारी कैसे चुकत तिहाई। मेड़न-मेड़न हम फिर आए, डीमा देत दिखाई। हाय, कैसे चुकत तिहाई …।छोटी-छोटी बाल कड़ी नरवाई रई फरमाई॥ हमारी कैसे चुकत तिहाई …। मांते जिमीदार को आओ बुलउआ, को आ करत सहाई। हमारी कैसे चुकत तिहाई। टलिया-बधियाँ  साहू ने ले लई, रे गई पास लुगाई ॥ हमारी कैसे चुकत तिहाई॥“”

           किसान का जीवन गाँव के जमीदार ओर साहूकार के पास गिरवी होता था। बरसात के बाद फसल नही पैदा हो या फसल को कोई बीमारी लग जाये तो किसान पर इस साल का बीज का कर्जा तो होता ओर उसका व्याज भी बढ़ता जो अगले साल की फसल मैं जुड़ जाता था, परंतु पैदावार न होने के बाद भी किसान को किश्त चुकानी होती थी। किसान के जीवन मे प्रकृति का अनोखा खेल चलता था, या किसान की बातों का समर्थन करते तो उसपर परमात्मा का कोप भाजन होता था ओर वह अपने खेत की मेड पर बैठकर आपने जीवी की इस कालिमा को देखकर हताश नही होता था उसकी कठिनाइयों के विषय मे किसी कवि ने बड़ी ही गंभीर त्रासदी को व्यक्त किया है –“”माघ मास की झिर सहे,ओर क्वार की घाम।पानी डबरन को पीय, करे किसानी काम॥ किसान की तकलीफ़ों का तब अंत नही था ओर उसके पास पहनने को पर्याप्त कपड़े ओर पैरो में पन्हैया नही होती थी तब आज जैसे सिंचाई के साधन नही थे ओर उसे वर्षा जल पर ही निर्भर होना होता था। आज वसुंधरा धन से परिपूर्ण है ओर किसान धारिणी धारा से वैभव प्राप्त कर अपने पूर्वजों के दुख को समझ नहीं पाता है।  आज के किसानों को अपने पूर्वज किसान की पीड़ा को समझना है तो उनके अंतर में तब गूंजने वाले गीतों को भी जानना होगा जब पृथ्वी कठोरहृदया होती ओर किसान सहिष्णु की तरह कष्ट सहता धरती की कुटिल दृष्टि पर भी वह उसे रिझाता ओर तुलसीदास जी द्वारा लिखा यह गीत गुनगुनाता है –जियरा सुख गए खटका में । अरे मोड़ा-मोडी रोटी मांगे, नाज नहीं मटका में। जिनके घर के नाज बड़ा गए,मठा पिये अटका में । ऊन्ना फट गए,कपड़ा फट गए,दिन काटे फड़का में । मांगे उधार देत कोऊं नईया, दिल ना सटे अटका में । तुलसीदास आस रघुवर की,प्राण चले अटका में॥“” तब किसान को अपना भविष्य पता नही होता था। वह हल उठाता, अपने बैल खोलता ओर खुशी से खेत की ओर बढ़ जाता। उसकी एक ही सोच हुआ करती की अन्न जीवन है,अन्न में सबके प्राण है,ओर प्राणवायु अन्न की उत्पत्ति धरती माँ करती है ओर वह अन्न पैदा करके एक पुजारी की तरह सेवा कर धरती माँ से विश्व के पालन की कामना करता है।  अन्न की महत्ता को लेकर सब जानते है कि इंसान के पास कितनी भी दौलत आ जाये पर उसके प्राण अन्न ही पर निर्भर है, जब तक वह अन्न का भोजन गृहण नहीं करेगा तब तक सारे संसार का साम्राज्य कुछ भी नही है। दतिया के लोककवि वजीर ने किसान की पीड़ा को यूं लिखा है –“” सब से बज्जुर है छाती किसान की, खबर नही रहे जान की। ठनको कास्तकार को सीना, जब से लागो जेठ महिना। टपके एड़ी तलक सीना, खाद, कूरे में भूली सुध प्राण की॥ गाड़ी भर भर के ले जावे, चाहे लपट भलई लग जावे ।ठंडी चीज कभी नहि  खावे,जौ हिम्मत तो देखो बलवान की॥ करके बैलों की जब सानी, रोटी लए ठाडी सबरानी ।ठडौ चापिया मे भरपानी,सुखी रोटी पै ज़िंदगानी किसान की ॥खबर नही रहे किसान की …..।“”       कृषि की इसी अनिश्चितता के कारण अन्न का महत्व था ओर लोग कृषक को आराध्य मानते थे आज किसान पहले जैसा नहीं रहा पर अन्न का महत्व आज भी उतना है जितना पहले था। समय ने मोड ले लिया है ओर किसान का भाग्य परिवर्तित हुआ है जिसमें कृषक के दरिद्रता समाप्त हो गई है। कर्मयोगी पृथ्वीपुत्र को सुखी ओर सम्पन्न बनाने के लिए सरकारे पूरी तरह सजग ओर सतर्क है।

कृषि कल्याण आयोग गठित कर किसान को दी जा सकती है सुरक्षा –

       आज का किसान असंभावनाओं की खेती से मुक्त हो गया है लेकिन खेती ओर किसानों के हालत पहले की अपेक्षा अब बदतर होते जा रहे है। अगर बरसात न भी हो तो उसके पास सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध हो चुके है। लेकिन जो भी सुविधाये किसानो को मिली है वह उसके लिए अपर्याप्त है। भले उसे अच्छा बीज ओर खाद की व्यवस्था के लिए देश के सभी प्रदेशों में सहकारिता के माध्यम से हर गाँव में नगदी न भी हो तो उधारी पर सब उपलब्ध हो रहा है ओर सरकार उसकी फसल खरीद कर सहयोग कर रही है ओर जमीदार ओर साहूकार का डर नही है इसके बाद भी वह भारत की खराब राजनीति का शिकार हो गया है जिसमें पार्टी ओर नेताओ के आश्वासनों की चक्की में वह पीसकर अपना भविष्य चौपट किए हुये है ओर आज पारिवारिक बटवारों के कारण ज्यादा उपज पैदा करने के लिए उसने गाय-बैल पालना बंद कर उनके चारे के लिए इस्तेमाल होने वाली मेड़ों को मिटाकर खेती शुरू की जो उसके लिए घाटे का सौदा बनते जा रही है। वह अपने पसीने की भरपाई की उम्मीद सरकार से रखता है ओर चाहता है की उसे मिलने वाला कर्ज हर साल माफ हो जाये, उसे खाद बीज मुफ्त मिले। जरा सा मौसम गड़बड़ हुआ, फसल काटने के समय बरसात हो जाये, फसल की बिक्री में देरी हो जाये तो वह अपना धैर्य खो आत्महत्या जैसे कदम उठाकर अपने पूर्वजों को शर्मसार करता है जो अभावों में खेती करके भी जिंदा रहना जानते थे ओर ये आधुनिक कृषि यंत्रो के माध्यम से खेती करने के बाद भी हार चुके होते है।

       इसलिए आज आवश्यक हो गया है की देश में ऐसे विषय पढ़ाए जाये जिनका जीवन में हमेशा प्रयोग हो ओर किसानों को उच्च तकनीकी से जोड़कर खेती की पद्धति ओर क्या उपज की जाय ताकि किसानों को अपने परिवार के जीवन यापन के अलावा पर्याप्त आमदनी हो जिससे उसका जीवन खुशहाल हो, ओर खेती उसके लिए घाटे का सौदा न बने। किसान को भी चाहिए की वह बैंको, सहकारी बैंको, समितियों के अलावा कृषि से संबन्धित विभागों के अफसरों से किसी योजना का लाभ लेने के लिए आवश्यक हो तभी संपर्क कर लाभ या कर्ज जो भी हो, उसकी व्याज आदि की समस्त शर्तों को जानने-समझने के बाद ही उसे प्राप्त करना चाहिए। बिना आवश्यकता के कर्ज या सुविधा का लाभ प्राप्त करने के लिए अधिकारियों के प्रलोभन देने पर फर्जी तरीके से धन प्राप्त करने की कोशिशों से बचना चाहिए। ये वे प्रलोभन होते है जिसे अधिकारी या किसान के बीच का ही कोई मित्र या परिचित बिचोलिया बनकर किसान की जमीन को गिरबी रखकर जाल में फसाकर तुरंत तो कुछ राशि नगदी देकर कुछ बाद खुद प्राप्त कर किसान को कर्जदार बना देते है जिससे किसान उलझकर अपने इस गलत निर्णय से आत्महत्या कर परिवार को अपने भाग्य के रहमो करम पर छोडकर चला जाता है, जिसके लिए उसे जागरूक होने की आवश्यकता है। इसके अलावा जब किसान हर साल अपनी फसल बोने से पहले उसका बीमा करा लेता है तब बुआई के बाद किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा के कारण फसल की नुकसानी या बरबादी होने पर उसका पूरा मुआवजा दिलाने की गारंटी प्रदेश सरकार की होनी चाहिए। अगर सरकार यह करने में सक्षम नही तो उसे चाहिए की हर प्रदेश में किसानों के लिए एक कृषि कल्याण आयोग गठित हो जिसमें कृषि वैज्ञानिक अध्यक्ष हो तथा हर जिले में आयोग का कार्यालय हो। आयोग कार्यालय में सिर्फ वे ही व्यक्ति अधिकारी कर्मचारी सेवारत हो जो जमीन को, उसकी मिट्टी को, उसकी सतह को पहचानता हो, ये मिट्टी के पारखी अधिकारीयों के साथ कृषि कल्याण आयोग के सदस्यों में जिले के वास्तविक किसानों को भी शामिल किया जाये ताकि किसानों के साथ न्याय हो सके। पाँच सितारा होटलों में एयरकंडीशन में बैठने वाले लोग जिनके शरीर से एक बूंद पसीना नहीं बहता वे आग उगलते सूरज की गर्मी में पसीना बहाते किसान का दर्द क्या समझेगा, वह उनकी समस्या को कैसे जानेगा? इसलिए सरकार को इनसे हटकर आयोग बनाकर देश में लाभ की किसानी को प्रोत्साहित करते हुये काम कर किसान ओर खेती को जीवित रखना होगा, तो केंद्र सरकार को चाहिए कि वह कृषि विभाग से हटकर इन किसानों के लिए एक कृषि कल्याण आयोग गठित करे। देश में आज किसानों के द्वारा इतना अनाज पैदा किया जाता है कि जहा देश की पूरी जरूरत को आपूर्ति के बाद अन्य देशों कि भी जरूरत पूरी करने में हम सक्षम है।  किसान देश के लिए पसीना बहाता है अगर वह कमजोर होगा तो देश की सीमाए कमजोर होगी, अगर सीमाए कमजोर हुई तो देश कि सुरक्षा भी कमजोर रहेगी। अगर देश बचाना है तो किसान को बचाना जरूरी है, अगर किसान बचेगा तो उसका बेटा भी बचेगा। किसान मजबूत होगा तो उसका बेटा भी मजबूत होगा, बेटा बजबूत होगा तो वह सीमा पर जाकर लड़ेगा ओर दुश्मनों के छके छुड़ा कर देश को बचा सकेगा, इसलिए देश बचाना है तो किसान को बचाना जरूरी है 

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