क्या विभीषण राष्ट्रद्रोही थे?

विभीषण रामायण के एक ऐसे पात्र हैं, जिनके प्रति लोकमान्यताओं में बहुत द्वंद्व है. समाज में उन्हें एक ही साथ अच्छा और बुरा दोनों माना जाता है. राम का साथ देने के कारण भारतीय मानस एक तरफ उनके पक्ष में रहता है, तो दूसरी तरफ संकटकाल में अपने देश को छोड़ने के कारण उनकी निंदा भी होती है. ‘घर का भेदी लंका ढाए’ जैसी मशहूर कहावत इस विभीषण-निंदा से ही उपजी है.

परन्तु, क्या वास्तव में विभीषण राष्ट्रद्रोही थे? पहली चीज हमें यह समझनी होगी कि राजा, राष्ट्र नहीं होता, वो केवल राष्ट्र की एक इकाई होता है. राजा का विरोध, राष्ट्र का विरोध नहीं होता. अगर राजा अयोग्य या निरंकुश हो तो उसे उसके पद से हटा देने अथवा मृत्युदंड देने में भी नैतिक रूप से कोई दोष नहीं. दुर्भाग्यवश रावण लंका के लिए ऐसा ही राजा सिद्ध हुआ था. अपनी एक अनुचित इच्छा को पूरा करने के लिए वो राष्ट्र को विनाशकारी युद्ध में ढकेलने पर तुला हुआ था. इस प्रकार असल में देशद्रोही वो खुद था.

अब आते हैं विभीषण पर तो बात ये है कि विभीषण ने कभी भी अपने राष्ट्र यानी लंका का त्याग नहीं किया, उन्होंने केवल वहां के पतनशील राजा का त्याग किया था. अगर वे लंका का त्याग किए होते तो अकेले वहाँ से नहीं निकलते वरन अपनी पत्नी और पुत्रों को लेकर निकलते और राम के पास जाने की बजाय कहीं जंगल-पहाड़ में जाकर बस जाते. लेकिन उन्हें लंका से मोह था. वाल्मीकि रामायण से रामचरितमानस तक आप देख लीजिये, विभीषण कहीं भी आपको लंका-विरोधी बात कहते नहीं दिखाई देंगे. विभीषण जानते थे कि राम के साथ रहकर लंका को न्यूनतम हानि के साथ बचाया जा सकता है. इसलिए अपने परिवार को वहीं छोड़कर लंका को बचाने के लिए निकल पड़े.

अब आप कहेंगे कि राक्षसों के सब भेद राम को बताकर उन्होंने लंका की कौन-सी रक्षा की भला? तो जवाब ये है कि यदि उन्होंने भेद नहीं बताए होते तो भी युद्ध का परिणाम नहीं बदलता क्योंकि तब ये काम रावण का कोई और शत्रु जैसे कि देवता कर देते. यानी कि विभीषण के भेद बताने न बताने से युद्ध के परिणाम में कोई अंतर नहीं आने वाला था, सभी स्थितियों में रामचन्द्र की विजय निश्चित थी.

लेकिन विभीषण ने कुछ भेद बताए और अपनी विश्वसनीयता बनाई जिसके परिणामस्वरूप रावण के बाद उन्हें लंका का राजा बनाया गया. यदि वे राम के पक्ष में न आते तो रावण के पक्ष में मरने वालों में वे भी शामिल होते और लंका की प्रजा पर संभवतः अयोध्या या किष्किन्धा का राज्य स्थापित हो जाता. क्या ऐसे में लंका की सभ्यता-संस्कृति अपने मूल रूप में सुरक्षित रहती? क्या एक बाहरी शासन वहां अपने अनुकूल नवीन सांस्कृतिक मूल्यों व समाज की स्थापना नहीं करता? राक्षस संस्कृति क्या अस्तित्व में रह पाती? यक़ीनन नहीं.

निष्कर्ष यह है कि विभीषण रावण के पक्ष में रहते तब भी युद्ध का परिणाम वही होता जो होना था. लेकिन राम के पक्ष में जाकर उन्होंने न केवल एक निरंकुश-अत्याचारी एवं राष्ट्रद्रोही राजा का विरोध किया, वरन लंका की सभ्यता-संस्कृति को भी बचा लिया.

अब जहां तक रही भाई वाले कर्तव्य की बात तो लक्ष्मण और भरत जैसे भाई उसीको मिलते हैं, जो राम होता है. रावण जैसे दुष्ट के प्रति विभीषण के लिए लक्ष्मण जैसी कर्तव्य की कसौटी रखना न केवल राम-लक्ष्मण का अपमान है, बल्कि विभीषण के साथ अन्याय भी है.

अंत में इतना ही कि यदि भावनाओं में बहकर विभीषण के चरित्र का मूल्याकन करेंगे तो वो जरूर आपको राष्ट्रद्रोही लगेंगे, लेकिन नीति और नीयत के धरातल पर देखेंगे तो उनसे बढ़कर लंका में दूसरा कोई राष्ट्रप्रेमी आपको नहीं मिलेगा.

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