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    जल-संकट गृहयुद्ध का कारण न बन जाये

    – ललित गर्ग –
    पिछले कई दिनों से गंभीर जल संकट से दिल्ली की जनता परेशान है। परेशानी का सबब यह है कि पानी पहुंचाने वाले टैंकरों को कड़ी सुरक्षा में चलाया जा रहा है, ताकि पानी को लेकर हिंसा की नौबत न आ जाए। दक्षिणी दिल्ली क्षेत्र में पानी की कमी से जूझ रहे लोग पानी की टंकियों और हेंडपंपों से बूंद-बूंद पानी इकट्ठा कर रहे है और  अपने-अपने पानी के डिब्बों को जंजीर से बांधकर रख रहे हैं। ऐसा ही नजारा मंगलवार को वसंत विहार के कुसुमपुर पहाड़ी इलाके में देखने को मिला। यह चिंताजनक इसलिए है कि अगर ऐसे ही हालात बने रहे तो यह जल संकट कभी भी जल संघर्ष एवं हिंसा में बदल सकता है। यह तो अक्सर देखने में आता ही रहा है कि पानी को लेकर लोग एक दूसरे की जान तक लेने में भी नहीं हिचकते। भीषण गर्मी और हरियाणा में नदी में कम पानी छोड़े जाने के कारण स्थिति दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। दिल्ली के जल-संकट को जल्दी-से-जल्दी दूर करना सरकार की प्राथमिकता होनी ही चाहिए।
    दिल्ली में जल संकट वैसे तो हर वर्ष गर्मी की समस्या है, पर इसका दुष्प्रभाव साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि बढ़ती जनसंख्या की वजह से दिल्ली में पानी की समस्या गंभीर होती जा रही है। अगर हम आंकड़ों पर गौर करें तो यह बात काफी हद तक सच भी है। जैसे दिल्ली की जनसंख्या में बीते दो दशकों में अत्यधिक वृद्धि हुई है। परंतु केवल जनसंख्या में वृद्धि ही दिल्ली में साल दर साल गहराते जल संकट का कारण नहीं है। विश्व के किसी भी शहर एवं खासकर राजधानी क्षेत्र की जनसंख्या में वृद्धि एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, पर इससे उपजने वाली विभिन्न समस्याओं एवं जल संकट का मूल आबादी की बजाय, आबादी द्वारा चुनी गई सरकार एवं उसके लिए कार्य करने वाली संस्थाएं हैं, जोकि जीवन के मूलभूत तत्वों एवं जीवन निर्वाह की मूल जरूरतों में से एक जल भी उपलब्ध नहीं करवा पाती है। यह सरकार की नाकामी को दर्शाता है।
    यह कैसी सरकार है जिसके शासन में एक-एक बाल्टी पानी के लिए लोग रात-रात भर जाग रहे हैं। जहां पानी पहुंच रहा है वहां लंबी-लंबी कतारें लगी हैं। जिनके पास पानी खरीदने को पैसे नहीं हैं, वे गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। जो खरीद सकते हैं, वे मुंहमांगा दाम दे रहे हैं। ऐसा नहीं कि ये हाल कुछेक इलाकों का है। आधी से ज्यादा दिल्ली पानी के लिए इसी तरह तरस रही है। यह हर साल का रोना है। लेकिन विडंबना यह है कि जल संकट के स्थायी समाधान के लिए क्या हो, इसकी फिक्र किसी को नहीं दिखती।
    दिल्ली में जल-संकट का कारण रजनीति भी है। पानी को लेकर विवाद दूसरे राज्यों में भी होते रहते हैं। नदियों के पानी पर किसका और कितना हक हो, यह मुद्दा जटिल तो है ही, राज्यों की राजनीति ने इसे और पेचीदा बना डाला है। दिल्ली को अतिरिक्त पानी देने को लेकर उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश के साथ चर्चा करीब तीन साल से चल रही है। हरियाणा सरकार के साथ भी लंबे समय से बात चल रही है। पर अब तीनों राज्यों ने अपनी मजबूरी जता दी है। मोटे तौर पर दिल्ली में पानी का संकट तब खड़ा होता है, जब यमुना में पानी कम हो जाता है। ताजा स्थिति यह है कि वजीराबाद बैराज पर यमुना नदी का जलस्तर सामान्य से छह फीट नीचे चला गया है। यहां पानी हरियाणा से आता है। हरियाणा तर्क यह दे रहा है कि पंजाब उसे उसके हिस्से का पानी नहीं दे रहा। यानी जब पंजाब हरियाणा को पानी देगा, तब वह दिल्ली को देगा। अगर वाकई ऐसा है तो यह बेहद गंभीर बात है। इससे तो यही लग रहा है कि पानी को लेकर सरकारें राजनीति कर रही हैं। गौरतलब है कि दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है, जबकि उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भाजपा की। जबकि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है और उसी की सरकार पंजाब में है तो वह समस्या के समाधान के लिये तत्पर क्यों नहीं होती? पंजाब हरियाणा को पानी दे तो दिल्ली को पानी मिल सकता है। लेकिन इस समस्या के समाधान के लिये गंभीरता क्यों नजर नहीं आ रही है? क्यो जल पर राजनीति की जा रही है? क्यों जनता को पानी के लिये त्राहि-त्राहि करने पर विवश किया जा रहाहै?
    ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे राजनीतिज्ञ, जिन्हें सिर्फ वोट की प्यास है और वे अपनी इस स्वार्थ की प्यास को इस पानी से बुझाना चाहते हैं। हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश  और दिल्ली का यह जल-विवाद आज हमारे लोकतांत्रिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दे उससे पूर्व आवश्यकता है तुच्छ स्वार्थ से ऊपर उठकर व्यापक राष्ट्रीय हित एवं जनता के हित के परिप्रेक्ष्य मंे देखा जाये। जीवन में श्रेष्ठ वस्तुएं प्रभु ने मुफ्त दे रखी हैं- पानी, हवा और प्यार। और आज वे ही विवादग्रस्त, दूषित और झूठी हो गईं। बहुत हो चुका है। अब बस। 2022 दिल्ली के जन-संकट का समाधान का वर्ष हो।
    भारत की नदियां शताब्दियों से भारतीय जीवन का एक प्रमुख अंग बनी हुई हैं। इन्हीं के तटों से ऋषियों-मुनियों की वाणी मुखरित हुई थी। जहां से सदैव शांति एवं प्रेम का संदेश मिलता था। इसमें तो पूजा के फूल, अर्घ्य और तर्पण गिरता था अब वहां निर्दोषों का खून गिरता है। हमारी सभ्यता, संस्कृति एवं विविधता की एकता का संदेश इन्हीं धाराओं की कलकल से मिलता रहा है। जिस जल से सभी जाति, वर्ग के लोगों के खेत सिंचित होते हैं। जिनमें बिना भेदभाव के करोड़ों लोग अपना तन-मन धोते हैं। जो जल मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी की भी प्यास बुझाता है, उसमें अलगाव, भेदभाव, राजनीतिक स्वार्थ का जहर कौन घोल रहा है?
    सभी इन राज्यों के अपने तकनीकी व अन्य कारण हो सकते हैं। हो सकता है कि वे उचित भी हों, लेकिन जिस तरह का रवैया दिल्ली एवं पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार एवं हरियाणा, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश की भाजपा सरकारें दिखा रही हैं, उसे शायद ही कोई जायज ठहराएगा। हालांकि देखा यह भी जाना चाहिए कि इन राज्यों के पास अपने लिए कितना पानी है। दिल्ली की अपनी भौगोलिक स्थिति और अन्य मजबूरियां ऐसी हैं कि बिना दूसरे राज्यों से पानी मिले उसका गुजारा चल नहीं सकता। सारे राज्य एक ही देश के हैं, पड़ोसी हैं, सभी के नागरिक भी एक ही हैं। ऐसे में कोई राज्य किसी जरूरतमंद राज्य को पानी नहीं देकर संकट खड़ा करता है, तो यह गंभीर बात है, यह प्रदूषित राजनीति का द्योतक है।
    देश की राजधानी में ही अगर इतना गंभीर जल संकट खड़ा हो जाता है और वह भी हर साल, तो सरकारों पर सवाल उठना लाजिमी है। जल-संकट के अलावा भी अन्य आम जनता से जुड़े अनेक संकट है जैसे प्रदूषण आदि। आखिर सरकारें कर क्या रही हैं? दिल्ली की अपनी सरकार है। केंद्र सरकार भी यहां है। देश की सर्वाेच्च अदालत भी यहां बैठती है। सत्ता और शक्ति का केंद्र होने के बावजूद लाखों लोग अगर पानी के लिए तरसते हैं तो निश्चित ही इसे व्यवस्था की नाकामी का नतीजा माना जाना चाहिए। नदियों ने विभिन्न प्रांतों को जोड़ा था पर राजनीतिज्ञ इसे तोड़ रहे हैं। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, हिमाचल एक अखण्ड राष्ट्र के उसी प्रकार हिस्से हैं जिस प्रकार मनुष्य शरीर के अंग हुआ करते हैं। कोई सरकार जनता की सुरक्षा एवं संरक्षण करने में असमर्थ है और दूसरी तरफ कोई सरकार अपनी कुर्सी को चमकाने के लिए जल विवाद का लाभ उठाना चाहते हैं। ये स्थितियां गृह युद्ध की तरफ बढ़ रही हैं। जिस पर नियंत्रण पाना किसी अथॉरिटी के लिए सम्भव नहीं होगा। ये स्थितियां हमारे संवैधानिक ढांचे के प्रति भी आशंका पैदा कर रही हैं। ”नदी जल“ के लिए कानून बना हुआ है। आवश्यक हो गया है कि उस पर पुनर्विचार कर देश के व्यापक हित में विवेक से निर्णय लिया जाना चाहिए।
    प्रेषकः

    ललित गर्ग
    ललित गर्ग
    स्वतंत्र वेब लेखक

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