लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

निदेशक, विश्व संवाद केन्द्र सुदर्शन कुंज, सुमन नगर, धर्मपुर देहरादून - २४८००१

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-विजय कुमार

पाकिस्तान इस समय भीषण बाढ़ के संकट से जूझ रहा है। भारत ने मानवता के नाते उसे अरबों रुपये की सहायता दी है; पर उसका दिल कितना काला है, यह इसी से पता लगता है कि उसने एक सप्ताह तक भारत से राशि नहीं ली। अब उसने इस शर्त पर इसे स्वीकार किया है कि यह पहले संयुक्त राष्ट्र के कोष में जाएगी और फिर वह इसे पाकिस्तान के राहत कार्यों में खर्च करेगा।

सचमुच हम कितने मूर्ख हैं। पाकिस्तान हमारा शत्रु देश है। वह हर समय भारत को परेशान करने का प्रयास करता है। 1947, 65, 71 और 99 में वह हमारे विरुद्ध खुला युद्ध कर चुका है। एक समय पंजाब में खालिस्तानी उभार के पीछे वही था। कश्मीर समस्या को खाद-पानी वही दे रहा है। वह हिन्दुओं को क्रमशः समाप्त कर रहा है। बाढ़ में फंसे हिन्दुओं को गोमांस खाने पर मजबूर कर रहा है। घुसपैठ का उसका नियमित कार्यक्रम जारी ही है; और हम मूर्ख उसे पैसे दे रहे हैं।

यही काम गांधी ने किया था। पाकिस्तान कश्मीर पर कब्जा करने के लिए सेना भेज रहा था और गांधी महोदय उसे 55 करोड़ रु0 दिलाने के लिए अनशन पर बैठे थे। इसी से नाथूराम गोडसे विचलित हो गया और….।

वस्तुतः हमारे पास यह सुअवसर था कि हम उस पर हमला कर अपना कश्मीर वापस ले लेते। शेष पाकिस्तान के भी दो-तीन टुकड़े कर उसे सदा के लिए अपंग बना देते, जिससे वह कभी भारत की ओर आंख तिरछी करने का साहस न कर सके। कोई कह सकता है कि दुख के समय तो पड़ोसी की सहायता करना मानवता है। बात ठीक है; पर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मानवता का व्यवहार मानवों से किया जाता है, शत्रुओं से नहीं।

यहां महाभारत का प्रसंग याद करना उचित होगा। जब कर्ण के रथ का पहिया धरती में धंस गया और वह उसे ठीक करने के लिए नीचे उतरा, तो श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा कि इस दुष्ट को दंड देने का यही समय उचित है। इस पर कर्ण धर्म की दुहाई देने लगा। वह बताने लगा कि जब विपक्षी के हाथ में शस्त्र न हों, जब वह किसी संकट में फंसा हो, तब उससे युद्ध नहीं किया जाता।

इस पर श्रीकृष्ण ने कहा – कर्ण, जब पांडवों को छलपूर्वक जुए में हराया गया था, तब तुम्हारा धर्म कहां था; जब द्रोपदी को भरी सभा में निर्वसन किया जा रहा था, तब तुम्हारा धर्म कहां था; जब अभिमन्यु को कई महारथियों ने घेर कर मारा था, तब तुम्हारा धर्म कहां था ? आज जब तुम स्वयं घिर गये हो, तो धर्म की दुहाई दे रहे हो।

ऐसे ही माहौल को देखकर कभी दुष्यन्त कुमार ने लिखा था –

कैसे मंजर सामने आने लगे हैं, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।

वे सलीबों के करीब आये तो हमको, कायदे-कानून समझाने लगे हैं।।

श्रीकृष्ण की खरी-खरी सुनकर कर्ण क्या कहता, उसने सिर झुका लिया; और फिर अर्जुन के अगले ही बाण से उसका सिर धड़ से अलग हो गया।

महाभारत का यह प्रसंग हमें बहुत कुछ सिखाता है; पर जो अपनी गलती को सुधार ले, वह मूर्ख कैसा; और हम ठहरे जन्मजात मूर्ख।

4 Responses to “हम कितने मूर्ख हैं?”

  1. Rajeev Dubey

    यह एक विचारधारागत समस्या है . इसका समाधान केवल एक राष्ट्रीयता को ध्यान में रख बनाई गयी विचारधारा के विकास से ही हो सकता है . इसके लिए बुद्धिजीवी वर्ग में वह लोग जो विदेशी विचारधाराओं से ऊपर उठ कर सोच सकने का सहस रखते हों एवं अपने भारतीय होने पर पिछड़ेपन की मानसिकता से ग्रस्त न हों; ऐसे लोग यदि काम करने को तैयार हों तो बात आगे बढ़ सकती है .

    युवा वर्ग ऐसी पहल को स्वीकार करेगा . मेरे विभिन्न लोगों एवं प्रान्तों में भ्रमण के दौरान यह बात बार बार सामने आती रही है .

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  2. sunil patel

    श्री विजय जी सत्य कह रहे है.
    * अगर राजनेतिक इच्छाशक्ति हो तो कुछ भी असम्भव नही.
    * क्यो हम पुराने प्रेमी की तरह पाकिस्तान से मिलने की आस लगा कर अपना घर बर्बाद कर रहे है. कहावत है की बिच्छू को कितना भी चूमो वोह पूंछ से डंक ही मारेगा.
    * कारगिल युद्ध (जी हाँ पूर्ण युद्ध) में भारत का कम से कम ४० से ५० हजार करोड़ खर्च हुआ है. क्या एक भर भी किसी भी नेता ने, किसी भी बुद्धिजीवी ने कहा की हमें पाकिस्तान से यह राशि वसूलनी चहिये. यह अलग बात है की पाकिस्तान किसी भी सूरत में देने की स्तिथि में नहीं है. हाँ अगर भारत की जगह अमेरिका, चाइना, या दुनिया का कोई दूसरा देश होता तो इसका कई गुना वसूल लेता.
    ठीक है हमे कुछ नहीं चहिये, किन्तु दुनिया के दुसरे देशो को भी पता तो चल जाता की भारत आइन्दा इस तरह की जुर्रत को बहुत ही गंभीरता से लेगा.
    * हमारे देश में करोडो लोग रोज भूखे रहते है किन्तु हमें पाकिस्तान के लोगो ही दिखाई देते है.
    * अब तो सुना है सरकार जम्मू और कश्मीर को स्वायत्ता देने जा रही है.

    ऐसे निर्णय क्या मूर्खतापूर्ण नहीं होंगे और लेने वाले ……………………

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  3. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    विचारके लिए प्रश्न: (१) चाणक्य नीति नितांत स्पष्ट है।(सुना है; हमारी ही चाणक्य नीति चीन पढता है।) हम पढते हैं?
    (२) मान लीजिए, कि हम ऐसी अवस्था में होते, तो पाकीस्तान क्या करता? स्पष्ट है।
    (३) हमने इसके साथ कोई शर्त क्यों नहीं लगायी? कमसे कम उन्हे सोचने के लिए तो कह ही सकते थे।
    (४) हम जब एक तिहाइ कश्मिर खो चुके थे। बंगला देशको स्वतंत्रता दिलाने के बाद, जब ९२ हज़ार युद्ध बंदियों को मुक्त कर पाकीस्तान भेजा था, तो अवसर था, बदलेमें बलात घुसपैठसे कब्जे किया कश्मिर वापस मांगनेका।क्यों नहीं मांगा?
    (५) अंग्रेज़ीमें कहावत है, “Beggars are not choosers”भिखारी को पसंद/ना पसंद का प्रश्न नहीं होता। पर इस भिखारी को तो भीख लेने में भी शर्त है!
    तो फिर आप ताड गए होंगे, हमारी सरकारने, ऐसा क्यों किया होगा?
    उत्तर: वोट बॅंक पक्की करनी है।
    एक गढ्ढेमें हम बार बार गिरते हैं। एक ही पत्थरकी दिवालसे हम बार बार टकराते हैं। ऐसे को मूर्ख कहा जाता है, सरदारजी? मैं आपको सरदारजी नहीं मानता। सरदारों का तो हम सम्मान करते हैं।

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  4. Anil Sehgal

    हम कितने मूर्ख हैं – by – विजय कुमार

    आपने लिखा है कि :
    पाकिस्तान इस समय भीषण बाढ़ के संकट से जूझ रहा है। उसने सहायता इस शर्त पर स्वीकार की है कि यह पहले संयुक्त राष्ट्र के कोष में जाएगी और फिर वह इसे पाकिस्तान के राहत कार्यों में खर्च करेगा।

    Sir, the article has not mentioned as to whether Pakistan Govt. has mentioned any reasons for routing the Indian help for the floods in Pak thr. UN

    It would be quite interesting as to what grounds have been cited by Pak diplomats.

    Pakistan have outwitted many genius deputed by Manmohan Singh Government in international parlance, in recent past.

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