हमें एक नयी जीवन शैली अपनानी होगी

कोरोना महामारी के कहर ने सब कुछ बदल दिया है। बहुत सारी अपरिहार्य चीजें भी आज एक अलग दुनिया की हो गई है। यह एक यक्ष  प्रश्न है कि क्या हम  अपनी पहले जैसी जीवन शैली प्राप्त करेंगे? क्या लॉकडाउन में ढील दिए जाने या खत्म होने के बाद जीवनशैली फिर पुराने ढर्रे पर लौटेगी? क्या हम इस महामारी से पहले की तरह बाहर जा पाएंगे? क्या पहले ही तरह माल-सिनेमा जा पाएंगे, क्या कोई पार्टी होगी, क्या कोई लॉन्ग ड्राइव होगा, कोई प्रवचन, धर्मसभा या मन्दिरों के दर्शन होंगे? क्या निकट भविष्य में सड़कों पर भीड़, खचाखच भरा सार्वजनिक परिवहन, रेलवे स्टेशन पर जबरदस्त भीड़, बस अड्डों पर लोगों की कतारें, एयरपोर्ट पर लोगों की भीड़, ऑफिस, कैंटीन्स, रेस्तरां, शॉपिंग मॉल्स, रिक्शा में बच्चे, स्कूल में बच्चे और भी कई दृश्य देखने को मिलेंगे ? जिनके बिना जीवन असंभव-सा लगता है। लेकिन हमे लम्बे समय तक वर्तमान परिस्थिति मे ही जीवन जीना पडेगा। यह हमारे लिये परीक्षा की घड़ी है,
कोरोना संकट पर विजय प्राप्त करने के लिए चुनौतियों को देखकर हमे विपरीत दिशा में भागने की अपेक्षा चूनौतियों का डट कर मुकाबला करना चाहिए , अभी हमारे सामने घना अधेरा है,तथा निराशा के बादल मंडरा रहे हैं। क्योंकि वैक्सीन और इलाज अभी तक मिला नहीं है, जब तक इलाज संभव नहीं होगा जन-जीवन लॉकडाउन जैसा ही होगा। भले ही प्रतिबंधों को हटा दिया जाए। कई जगह यह छह माह से एक साल तक रहने वाला है। हम घर के अंदर वाली दुनिया में जीवन जी रहे हैं। घर से काम कर रहे हैं। जरूरी सामानो के लिए मास्क लगाकर भले ही खरीदारी कर रहे है। लेकिन आनेवाले दिनों में सामाजिक दूरी एवं आत्मसंयम ही जीवन का हिस्सा बना रहने वाला है।
कोरोना महामारी एक विराट वास्तविक त्रासदी एवं हमारी आँखों के सामने घटित होने वाला एक महा प्रकोप है।  विश्व स्वास्थ्य संगठन और दुनिया के स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना महामारी जल्द खत्म होने वाली नहीं है। इस संकट ने जीवन जीने का मानक ही  बदल दिया है। अपनी रोजमर्रा की खुशियों से पहले उनके जोखिम का आकलन जरूरी हो गया है। वैज्ञानिक या डॉक्टर मन से किसी न किसी चमत्कार की प्रार्थना कर रहे है? पुजारी, तांत्रिक, धर्मगुरु आदि मन ही मन में विज्ञान के आगे समर्पण कर चुके है । जो बडें-बडे मन्दिर,मस्जिद, गिरजाघर, गुरूद्वारा प्रेरणा देते थे आज वो बन्द पडे है
             किसको कोरोना वायरस के संक्रमण के दौरान भी पक्षियों के गीत, खेतों मे नृत्य करते मयूर, प्रकृति की खिलखिलाहट , नदियों का कलरव एवं आकाश की नीरवता रोमांचित नहीं कर रही है? बदल तो सब गया है। लेकिन हम चाह कर भी अपने हिसाब से जीवन यापन नही कर पा रहे है। यह बदलाव ही है कि इस महामारी के कहर के दौरान  एक गरीब इंसान की बीमारी एक अमीर समाज के स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रही है। बड़े-बड़े धनबली-बाहूबली भी इस महामारी के सामने घुटने टेकते दिखाई दे रहे है । दुनिया के अधिक संकीर्ण एवं स्वार्थी होने की संभावनाएं भी व्यक्त की जा रही है। शासन-व्यवस्था पर भी ग्रहण लगता हुआ दिखाई दे रहा है, संकट के दौर मे महाशक्तियां निस्तेज एवं धराशायी होते हुए दिखाई दे रही हैं, अचानक हमारी ऊर्जा तथा काम करने का उत्साह घट गया है। लेकिन इससे हार मानना उचित रास्ता नहीं है। हमें अपने को तैयार करना होगा कि हम एक ढर्रे पर ना चलकर। नई चुनौतियों को स्वीकार करें। क्योंकि  वैक्सीन की खोज करने के बाद भी रोगियों को निरोगी करने में समय लगेगा। दुनिया की इतनी बडी आवादी को दवा कम्पनियों द्वारा तुरंत इम्युनिटी की दवा उपलब्ध कराने मे सालों लगेंगे। येसे मे क्या किसी सरकार द्वारा लाकडाऊन खत्म करना उचित होगा ?
      1918 के स्पैनिश फ्लू गर्मी के महीने में थम तो गया था लेकिन सर्दियों में इसका दूसरा वेव आ गया था। ऐसा ही कोरोना को लेकर संभव है, चीन और जापान मे कोविड-19 की स्थिति नियंत्रण के बाद सभी प्रतिबंधों को हटा दिया। स्कूल , रेस्तरां आम दिनों की तरह खुल गए, लेकिन कोविड-19 के दूसरे वेव ने जल्द ही ज्यादा ताकत से हमला किया और यहां पहले चरण की तुलना में ज्यादा सख्ती से लॉकडाउन लागू करना पड़ा। भारत भी येसे ही मुहाने पर खडा है । आज प्रवासी मजदूरों की गांव वापसी तथा उनके उचित स्वास्थ्य परिक्षण न होने के कारण महामारी शहरों से निकल कर गावों की तरफ बढती जा रही । जो देश के लिए चिन्ता का विषय है।
       हर शताब्दी में एक महामारी ने इंसानी जीवन को संकट में डाला। प्लेग , आई ब्लैक डेथ आदि बीमारियों ने यूरोप का नक्शा ही बदल दिया, लेकिन अधेरे के बाद प्रकाश उत्पन्न हुआ, अनेक राजनीतिक,आर्थिक, एवं सामाजिक जीवन शैली मे बदलाव हुए, क्या हम कोरोना महामारी से विश्व को बचाने के लिये एक मानवीय अर्थव्यवस्था, सादगी, संयमित जीवनशैली,एवं प्रकृतिमय जीवन की ओर नहीं बढ़ सकते?
कोरोना वायरस से लडने के लिए समाजिक दूरी आवश्यक है लेकिन समाजिक दूरी के नाम पर मजदूरों और गरीबों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाना भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में उचित नहीं है।
       यह सही है कि  हम अपनी बधी-बधाई जिन्दगी से हतोत्साहित हो गये है। हमारी ऊर्जा तथा काम करने का उत्साह घट गया है, आत्मविश्वास डगमगाने लगा है लेकिन डर कर भागने से कही अच्छा है कि हम आत्मसंयम, एवं अनुशासन के साथ चुनौतियों को स्वीकार करते हुए एक नवीन जीवन शैली स्थापित करें।

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