लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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 शादाब जफर ‘‘शादाब’’

न जाने क्यो बाबा रामदेव जी ने छत्तीसगढ़ दुर्ग से अपनी महीने भर लम्बी यात्रा की शुरूआत में ही देश की संसद और सांसदो से पंगा लेते हुए ये कह कर पूरे देश में भूचाल मचा दिया कि ‘‘देश की सांसद में बैठे ये वो लोग है जो देश की परवाह नही करते, किसान से प्यार नही करते, देश के श्रमिको और लोगो को नही चाहते, ये लोग धन के दोस्त और गुलाम है। ये लोग अशिक्षित, डकैत और हत्यारे है। ये लोग मानव रूप में राक्षस है जिन्हे हमने चुना है वो इस लायक नही है।’’ इस बीच बाबा ने अपने बचाव के लिये ये भी कहा कि कुछ अच्छे सांसद भी है जिन का हम सम्मान करते है। आखिर ये सब क्या है, ये कैसी परम्परा डाली जा रही है। कभी अरविंद केजरीवाल एक कार्यक्रम के दौरान सांसदो को हत्यारे बलात्कारी कहते हुए 14 मंत्रियो पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते है। कभी किरन बेदी रामलीला मैदान में सांसदो को ये कह कर ज़लील करती है कि सांसदो के दो चेहरे होते है ये लोग एक मंच पर कुछ कहते है तो दूसरे पर कुछ। कभी प्रशांत भूषण कथित रूप से आपत्तिजनक टिप्पणी करते है। अन्ना हजारे और उन की टीम के बाद अब बाबा रामदेव ने सांसदो पर निशाना साधकर जिस प्रकार एक नये विवाद को जन्म देने के साथ संसद और सांसदो पर उन्हे डकैत और हत्यारे कह कर हमला बोला है उसे किसी प्रकार से सही नही कहा जा सकता और न ही बाबा के इस बयान को देश हित में कह सकते है। दरअसल लोकपाल बिल, काले धन और भ्रष्टाचार को लेकर देश में जब से संघर्ष होना शुरू हुआ है तभी से टीम अन्ना के सदस्य बिना सोचे बिना विचारे सांसदो और संसद को निशाना बना रहे है। जब कि किसी को भी संसद और सांसदो का इस प्रकार अपमान करने का अधिकार नही क्यो कि ये सब जनता के प्रतिनिधि है। वही ये सब लोग देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही सांसद बने है। हम ऐसे बयानो से कह सकते है कि इस तरह के बयानो से संसद रूपी लोकतंत्र के मंदिर, देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और देश की जनता का अपमान है।

ये सही है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और लोकतांत्रिक देश में सब को अपनी आवाज बुलंद करने का पूरा हक है बाबा रामदेम के भी अपनी बात के पीछे अपने तर्क हो सकते है। पर क्या इस प्रकार से संसद और सांसदो को अपमानित किया जा सकता है ये तो कोर्ट और कानून ही बेहतर बता सकता है वैसे अब इस मुद्दे पर सरकार और सांसदो को गम्भीर होना और सोचना चाहिये। बाबा रामदेव योग गुरू है वो बाबा कब क्यो और कैसे बने ये तो राम जाने या रामदेव पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि जो बाबा लोगो को पैसे लेकर इंद्रियो पर नियंत्रण करना सिखाता हो जिस का ये धंधा हो वो खुद अपनी इंद्रियो पर नियंत्रण क्यो नही कर पा रहा है। क्यो बार बार ऐसे विचार प्रकट कर रहा है जिस से समाज और देश को नुकसान पहुँच सकती है। बाबा का ये कहना संसद में चोर है सही है मौजुदा 15वी लोकसभा में 162 सांसदो पर कई प्रकार के केस दर्ज है। पर इस के लिये पूरी संसद को बदनाम करना उन्हे चोर, डकैत, बालात्कारी, हत्यारे, राक्षस कहना न्याय संगत नही कहा जा सकता है। आज हमारे देश में कितने बाबा गोरख धंधो में लीन है कितने बाबा रोज सेक्स कांडो में पकडे जाते है, कितने बाबा धर्म की आड़ लेकर अधर्म करते है ये रोज हम अखबारो और टीवी चैनलो पर देखते है। अगर न्यायालयो के रिकॉर्ड का अध्यन करे तो 162 नही हजारो लाखो बाबाओ पर हत्या, बलात्कार, चार सौबीसी, अवैध हथियारो के, आय से अधिक सम्पत्ती के मुक्क्दमे मिलेगे तो क्या हम देश की पूरी की पूरी बाबा जाती को चोर, डकैत, बालात्कारी, हत्यारे, राक्षस कह कर उन का अपमान कर सकते है शायद नही, क्यो ये सही तरीका नही है। बाबा रामदेव, अन्ना हजारे और टीम अन्ना के लोगो को ये बात सोचनी समझनी होगी।

वही आज हमारे देश की ये बदकिस्मती भी है कि आज अधिकतर राज्यसभा और लोकसभा सदस्य केवल शपथ ग्रहण करने तो आते है फिर कभी उन्हे सदन में नही देखा जाता। पिछले दिनो एक संस्था सोशल वॉच इंडिया और गवर्नेस नाउ ने अपने एक अध्यन में सिर्फ चार सांसदो को ही वर्तमान (15वी) लोकसभा में चुने जाने योग्य माना था। जिन चार सांसदो को इस संस्था ने योग्य ठहराया था वो थे शिवसेना के आंनद राव अड्सुल, समाजवादी पार्टी के शैलेंद्र कुमार, भाजपा के हंसराज गंगाराम अहीर, और माकपा के वासुदेव आचार्य, इन सांसदो को संस्था सोशल वॉच इंडिया और गवर्नेस नाउ ने उन की उपस्थिति, सत्र के दौरान उन की ओर से पूछे गये प्रशन-पूरक प्रशन समेत उन की तरफ से लाए गये प्राईवेट विधेयक और चर्चा में भागीदारी के आधार पर यह मूल्यांकन किया गया। पर आज लोग बार बार क्यो हमारे माननीय पर ऐसे गम्भीर आरोप लगा रहे है, क्यो लोग उन्हे डाकू, लुटेरे, हत्यारे, बालात्कारी कह रहे है, क्यो इन पर पैसे लेकर प्रशन पूछने, सांसद निधि में गडबडी करने, इन के पास काला धन होने के आरोप लगते रहते है, क्यो आज कुछ अपराधी किस्म के दबंग लोग पुलिस से बचने के लिये संसद को अपने लिये अच्छी पनाहगाह समझने लगे है, इस पर भी गम्भीरता से सोचना होगा। ऐसा नही की देश की संसद में सारे जनप्रतिनिधि उग्र और अज्ञानी लोग ही है। चंद लोगो को छोड दे तो आज भी बडे पैमाने पर ऐसे लोग सांसद बनते है जो सभ्य, मिलनसार पढे लिखे ईमानदार अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाने वाले रहम दिल होते है। जो तमाम पहलुओ की जानकारी रखते है और जो संसद भवन में सरकार से जनता के लिये तर्क-वितर्क करते है। लेकिन कुछ शातिर प्रवृति के संासदो ने सांसद मे हिंसा और गडबडी को इन दोनो सदनो का हिस्सा बना कर रख दिया है। देश के सब से बडे लोकतंत्र के मन्दिर यानी हमारी संसद का आज बहुत बुरा हाल है।

बाबा रामदेव जी का कहना सही है पर कहने का अंदाज गलत था जिसे उन्होने बाद में माना भी उन्होने कहा कि जिस प्रकार मैने सांसदो पर आरोप लगाया वो गलत था मुझे कुछ सांसद सांसद में गलत है ऐसा कहना चाहिये था पर सवाल ये नही उठता कि सवाल गलत था या सही सवाल ये उइता है कि आने वाली पीढी इस से क्या सबक लेगी ये विचारणीय मुद्दा है। माननीयो द्वारा संसद में बिना बात शोर शराबा मारपीट एक दूसरे पर अशोभनीय टिप्पणी ने जनता की उम्मीदो और विश्वास का हमेशा सांसद में कुछ गैर जिम्मेदार सांसदो ने मखौल उडाया है। जनता के ये प्रतिनिधि भारतीय कानून और सरकार के दावा की किस प्रकार खुले आम धज्ज्यिा उडाते है हम सब लोग टीवी पर लाईव संसद से इस का रोज सीधा प्रसारण देखते है। आखिर ऐसा व्यवहार तो देश के छोटे छोटे बच्चे भी नही करते। फिर ये लोग जो कानून के रक्षक है देश के कर्णधार है हमारे जनप्रतिनिधि है इन पर देश और समाज दोनो की जिम्मेदारिया है वो आखिर ऐसा क्यो करते है। बुनियादी बात यह है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था बनी ही इस लिये है कि तमाम मुद्दो पर सभ्य और लोकतांत्रिक तरीको से चर्च हो सके और फैसले किये जाये। विद्यायी संस्थाए हमारे लोकतंत्र की सर्वोच संस्थाए है क्योकि यहॅा वे लोग होते है जिन्हे जनता चुनती है और जो जनता के प्रतिनिधि होने के नाते उस के प्रति जवाबदेह होते है। जाहिर है जनता यह कतई नही चाहॅगी कि उन के प्रतिनिधि संसद भवन या विधान सभाओ में कुर्सिया, माईक, और जूते चप्पल फेके। दरअसल जनता जिस विश्वास के साथ अपना प्रतिनिधि चुनती है आजकल कुछ जनता के प्रतिनिधि और कुछ राजनीतिक पार्टिया उस विश्वास का खून कर रही है। इन के इस अशोभनीय व्यवहार, शोर शराबे और हंगामे कंे चलते ही लोकतंत्र का मन्दिर मानी जाने वाली हमारी संसद का कीमती वक्त और जनता का लाखो रूपया रोज रोज संसद की कार्यवाही के नाम पर बर्बाद हो रहा है। वही भारतीय लोकतंत्र की आत्मा भी रोज रोज संसद में जूत पतरम होने से आहत होती रहती है। एक बहुत ही पुरानी कहावत है कि जब अपना पैसा ही खोटा तो परखने वाले को क्या दोष पर इस सब के बावजूद सांसद और संसद देश की सर्वोच संस्था है इस कारण भी हमे संसद और सांसदो की गरिमा रखनी होगी।

2 Responses to “हमे फिर भी संसद और सांसदो की गरिमा रखनी चाहिये……………”

  1. vimlesh

    सादाब जी बेहतरीन समालोचना

    निश्चित तौर पर बाबा का तरीका असंसदीय है किन्तु आज प्रत्येक जाती धर्म वर्ग का व्यक्ति प्रत्येक दिन कही न कही इन महानुभावो को दो चार गालिया अवश्य देता है वो चाहे किसी भी सन्दर्भ में क्यों न हो देश को बर्बाद करने में इन महानुभावो का शत प्रतिशत योगदान आप सहित देश का कोई भी नागरिक नकार नहीं सकता इन सांसदों से अच्छे तो वह चोर डकैत होते है जो कम से कम गरीबो पर तो रहम करते है उनके यहाँ चोरी नहीं करते किन्तु किन्तु संसद में बैठे भेडिये सबसे पहले गरीबो को ही निशाना बनाते है क्योकि वह निर्बल लाचार होता है किन्तु बाबा न तो निर्बल है ना ही लाचार
    अन्यथा कोई किसी चोर को चोर कह कर देखे किसी थानेदार को लुटेरा कह कर देखे .

    रहो बात गलत परम्परा की तो तो परम्पराव को नष्ट करने के लिए ही ये महानुभाव पैदा हुए है

    गलत को गलत न कहना ही सबसे गलत परम्परा है जो इस देश पर थोप दी गयी है
    अन्यथा कितने लोग है जो गलत को गलत कह कर उसका विरोध करते है
    यदि बाबा के द्वारा ही आम व्यक्ति जागरूक हो जायेगा तो संसद जैसी पवित्र जगह पर इन असंसदीय महानुभाओ का आगमन स्वयमेव रुक गायेगा .

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  2. LAIQ CHODRY

    शादाब भाई बाबा की नीयत एकदम साफ है बाबा देश की उन्नती के लिये ये सब कुछ रहे है आप का लेख वास्तव में अच्छा है आप का कहना भी सही है संसद सर्वोच है हमे इस की गरिमा का ध्यान रखना चाहियैं

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