‘हम राम मंदिर बनाने के बहाने फंडामेंटलिज्म के मार्ग पर चल पड़े हैं’

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बैंच का जब से फैसला आया है। रामभक्त अब लखनऊ बैंच के भक्त हो गए हैं। मैं उन्हें लखनऊभक्त के रूप में ही चिह्नित करूँगा। वे लखनऊ बैंच के जजमेंट को यूनीवर्सल बनाने में लगे हैं। आस्था के सिद्धांत को कानून का सिद्धांत बनाना चाहते हैं। यह लखनवी न्याय है। इसके लिए वे किसी भी हद तक जाने की सोच रहे हैं। वे लखनऊ बैंच के जजमेंट को न्याय का आदर्श आधार बता रहे हैं।

लखनवी न्याय में अनेक संभावित खतरे छिपे हैं। पहला खतरा तो यही है कि इसमें न्याय बुद्धि से काम नहीं लिया गया। यह भारत के अब तक के न्याय पैमाने को अमान्य करके लिखा गया फैसला है। दूसरी बात यह है कि इस फैसले को अंतिम फैसला नहीं मान सकते। तीसरी बात यह कि इसमें विविधता के सिद्धांत की उपेक्षा हुई है। चौथी बात यह है कि इस फैसले का आधार रामकथा और उससे जुड़ी मान्यताएं हैं।

उपरोक्त चारों बातों की रोशनी में लखनऊ बैंच का जजमेंट न्याय नहीं है, राय है। उस पर पक्ष-विपक्ष में जो कुछ बोला जा रहा है वह भी न्याय नहीं है राय है। यह अतीत को आधार बनाकर, धार्मिक मान्यताओं को आधार बनाकर दी गई राय है। इसने न्याय की बहस को कानून के बाहर कर दिया है।

अब लोग न्याय पर नहीं राय पर बातें कर रहे हैं। राय के आधार पर मंदिर-मसजिद का तर्क रचा जा रहा है। बाबरी मसजिद के गिराए जाने के बाद से न्याय की बातें नहीं हो रही हैं आस्था की बातें हो रही हैं। बाबरी मसजिद के अस्तित्व के बारे में रथयात्रा के पहले न्याय और विविधता पर केन्द्रित होकर ज्यादा बातें होती थीं लेकिन बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद विविधता और न्याय की बजाय आस्था और राय पर बातें होने लगीं। लखनऊ बैंच के जजों का फैसला इसी अर्थ में न्याय नहीं राय है।

लखनवी राय को राम के जन्म के साथ कम राम के राज्य या एंपायर के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। जिन जजों ने रामजन्मस्थान के रूप में बाबरी मसजिद की विवादित जमीन को रामजन्म स्थान चिह्नित किया है। उन्होंने राजा दशरथ, उनके पुत्र राम, अयोध्या राजधानी और राम के शासन को ध्यान में रखकर फैसला लिखा है। न्याय बुद्धि में राम के एंपायर का आना स्वयं में ही समस्यामूलक है। न्यायबुद्धि किसी राजा के देश के आधार पर जब फैसलादेने लगे तो कम से कम उसे न्याय नहीं कहते राय कहते हैं।

राम के एंपायर को आधार बनाते समय न्यायाधीशों ने अपने लिए धार्मिक मुक्ति का मार्ग चुन लिया। वे अपना फैसला राम के एंपायर को, उनके भक्त समुदाय को सुनाकर चले गए। वे इस बात को भूल गए कि न्याय को एंपायर का आधार नहीं बनाया जा सकता। रामभक्त जब बाबर के युग की बातें करते हैं राममंदिर के पक्ष में तर्क गढ़ते हैं तो वे भूल ही जाते हैं कि बाबर के बहाने न्याय को नहीं एंपायर को आधार बना रहे हैं। एंपायर के आधार पर न्याय नहीं किया जा सकता। फैसले का आधार तो न्याय और विविधता ही हो सकती है।

जज यह जानते थे कि बाबरी मसजिद का फैसला एक राजनीतिक फैसला है और राजनीतिक फैसले एंपायर के आधार पर नहीं न्याय और विविधता के आधार पर ही किए जाने चाहिए। एंपायर के आधार पर फैसला करने के कारण ही लखनवी न्याय में आधुनिककाल, आधुनिकबोध, भारत का संविधान और न्याय सब एकसिरे से गायब है। इस फैसले में राय की एकता और भाषा की एकता भी है। इस अर्थ में जजों ने भाषिक वैविध्य को भी अस्वीकार किया है।

इस जजमेंट के बाद जिस तरह की राय राजनीतिक सर्किल से आई है उसे राजनीतिक राय ही कह सकते हैं न्यायकेन्द्रित राय नहीं कह सकते। यहां तरह-तरह की राजनीतिक राय व्यक्त की गई है। कांग्रेस से लेकर कम्युनिस्टों तक, आरएसएस से लेकर मुलायम सिंह तक सबने राजनीतिक राय व्यक्त की है। न्याय को आधार बनाकर राय नहीं दी है। इसमें राजनीतिक विचारों की चर्चा खूब हो रही है।

लखनवी राय के पक्ष-विपक्ष में जो कुछ भी बोला जा रहा है वह राजनीतिक विचारों की अभिव्यक्ति है। लखनऊ बैंच का फैसला जजमेंट नहीं राजनीतिक राय है। न्याय में कनवर्जेंस नहीं होता। विविधता होती है। लखनऊ बैंच ने डायवर्जेंस को अस्वीकार किया है। वहां तीन जजों की राय में कनवर्जंस हुआ है।

जो लोग अल्पसंख्यकों की बात कर रहे हैं। मुसलमानों की बात कर रहे हैं वे भी मुसलमानों को सामाजिक इकाई के रूप में नहीं देख रहे हैं बल्कि भाषिक इकाई के रूप में देख रहे हैं। अल्पसंख्यक या मुसलमान को सामाजिक इकाई मानने की बजाय भाषिक इकाई मानना स्वयं में इस समुदाय का अवमूल्यन है। भारत की सामाजिक विविधता को अस्वीकार करना है।

सब जानते हैं भारत में एक नहीं अनेक अल्पसंख्यक समुदाय हैं लेकिन वे सिर्फ अब हमारे भाषिकगेम का हिस्सा मात्र हैं। हिन्दू संगठनों के द्वारा रथयात्रा के साथ अल्पसंख्यकों को भाषिकगेम में तब्दील करने की जो प्रक्रिया आरंभ हुई थी उसने अल्पसंख्यकों की सामाजिक इकाई के रूप में पहचान ही खत्म कर दी,लखनवी न्याय उस प्रक्रिया की चरम अभिव्यक्ति है। इस फैसले ने अल्पसंख्यकों पर हिन्दुओं के प्रभुत्व की मुहर लगा दी है।

हमारे देश की समग्र राजनीति ने अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का वर्गीकरण कुछ इस तरह किया है कि उससे कोई भी अल्पसंख्यक समूह कभी भी बहुसंख्यक नहीं बन सकता है। अब अल्पसंख्यकों के पक्ष में खड़े होने के लिए जिस दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है उसका राजनीतिक दलों से लेकर न्यायाधीशों तक में जबर्दस्त अभाव दिखाई देता है। अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के आधार पर वर्गीकृत राजनीति ने न्याय की नजर से अल्पसंख्यकों को देखने का नजरिया ही छीन लिया है। हमें साठ साल के बाद सच्चर कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद पता चला कि मुसलमानों को 60 सालों में हमारी राजनीतिक व्यवस्था ने किस रौरव नरक में ठेल दिया है। लखनऊ बैंच का फैसला उसी बृहत्तर प्रक्रिया हिस्सा मात्र है। अब हमारे देश में अल्पसंख्यक हैं लेकिन वे भाषिकगेम में हैं, सामाजिक समूह के रूप में उन्हें विमर्श और न्यायपूर्ण जीवन से बेदखल कर दिया गया है।

अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक केटेगरी में बांटकर देखने के कारण ही धीरे-धीरे अल्पसंख्यक हाशिए पर गए हैं और आज स्थिति इतनी बदतर है कि अल्पसंख्यकों के पक्ष में खुलकर बोलने वाले को बेहद जोखिम उठाना पड़ता है। खासकर जब न्याय देने का सवाल आता है तो अल्पसंख्यकों को भारत में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। अल्पसंख्यकों को अपने समुदाय के अंदर और बाहर दोनों तरफ से खतरा है। मजेदार बात यह है कि लखनऊ बैंच में तीन जज थे, दो की एक राय और एक जज की अलग राय थी लेकिन तीनों की भाषा एक ही है। भाषिकगेम में उनकी अंतर्वस्तु में कोई बुनियादी अंतर नहीं है। तीनों जज बाबरी मसजिद के बारे में राम कथा की विवरणात्मक -कथात्मक भाषा का इस्तेमाल करते हैं। न्याय में इस तरह के भाषिकखेल के अपने अलग नियम हैं। उत्तर आधुनिक विचारक जे.एफ.ल्योतार के अनुसार इस तरह के भाषाखेल और कथानक के बारे में न्याय के आधार पर विचार नहीं किया जा सकता।

राम हमारे कथानक का हिस्सा हैं, कथानक में राम इतने ताकतवर हैं कि उनकी सत्ता को अस्वीकार करना मुश्किल है। लखनऊ बैंच के जजों ने रामकथानक को जजमेंट का आधार बनाकर न्याय की ही विदाई कर दी। कथानक के आधार पर न्याय नहीं हो सकता। कथानक भाषिक खेल का हिस्सा होता है न्याय का नहीं। जब आप कथानक के खेल में फंसे हैं तो उसे तोड़ नहीं सकते। न्याय पाने के लिए कथानक के खेल के बाहर आना जरूरी है लेकिन तीनों जज और उनके लिए जुटे वकीलों का समूचा झुंड रामकथानक को त्यागकर बाबरी मसजिद की बातें नहीं कर रहा है।

संघ परिवार की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उसने बाबरी मसजिद विवाद को न्याय के पैराडाइम के बाहर कथानक के पैराडाइम में ठेल दिया है। अब राम कथानक के पैराडाइम में घुसकर आप संघ परिवार को पछाड़ नहीं सकते। राम कथानक के पैराडाइम के कारण ही बाबरी मसजिद का विवाद भाषिकगेम में फंस गया। कोई भी दल रामकथा को अस्वीकार नहीं कर सकता। रामकथा का भाषिकगेम सभी रंगत की राजनीति को हजम करता रहा है। यह टिपिकल पोस्ट मॉडर्न भाषिकगेम है। इस भाषिकगेम के बाहर निकलकर ही न्याय की तलाश की जा सकती है। लेकिन यदि रामकथानक के आधार पर बातें होंगी तो भाषिकगेम में फसेंगे और ऐसी अवस्था में जज कोई भी हो जीत अंततः संघ परिवार की होगी।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि भाषिकगेम हमेशा मिलावटी होता है। उसमें शुद्धता नहीं होती। रामजन्म के भाषिकखेल में भी मिलावट है। यह बहुस्तरीय मिलावट है। इस गेम में तैयार राम कहानी में न्याय के लिए भी सुझाव हैं और वे ही सुझाव लखनऊ बैंच ने माने हैं। राम कहानी का भाषिकगेम जिन्होंने तैयार किया उन्होंने अपने विरोधियों को भी अपनी बातें मानने के लिए मजबूर किया ।

कथा का भाषिकखेल छलियाखेल है। वे इसके जरिए कांग्रेस को छल चुके हैं,राजीव गांधी को छल चुके हैं। अब उसी भाषिकगेम ने जजों को भी छला है। रामकथा के भाषिकगेम को संघ परिवार और भारत के पूंजीपतिवर्ग ने वैधता प्रदान की है और संघ परिवार ने रामगेम में जो कहा उस पर अपनी सिद्धाततः सहमति दी है व्यवहार में निर्णय लिया है। रामकथानक के भाषिकखेल की यह विशिष्ट उपलब्धि है।

न्यायपालिका, राजनीतिक दलों और जनता से कहा जा रहा है कि राममंदिर अयोध्या में नहीं बनेगा तो क्या पाकिस्तान में बनेगा। न्यायपालिका की जिम्मेदारी बनती है कि वह रामकथा की पवित्रता की रक्षा करे। यही वह दबाब है जिसके गर्भ से लखनवी न्याय आया है।

लखनवी न्याय के आने के साथ ही रामकथा पर न्याय की भी मुहर लग गयी है। अब राम कथा भी कानूनी हो गयी है। अब राम जन्म को कानूनी मान्यता मिल गयी है। इस कानूनी मान्यता के बड़े दूरगामी परिणाम होंगे। यह न्याय की भाषा के बदलने की सूचना भी है।

रामकथानक की आंतरिक प्रकृति है ‘रिपीट मी’, संघ परिवार ने बड़े ही कौशल के साथ रामकथा को अपना विचारधारात्मक अस्त्र बनाया है और रामकथा को बार-बार दोहराने के लिए सबको मजबूर किया और उसका प्रभाव जजमेंट में भी पड़ा है अब भविष्य में अन्य जजों पर यह दबाब रहेगा कि ‘रिपीट मी’।

आप राम कहानी को पढ़ने जाते हैं तो उसे दोहराने को मजबूर होते हैं। अब रामकथा और आस्था के आधार पर न्याय आया है तो यह भी दोहराने की मांग करेगा और अब हम भविष्य में एक नए किस्म के न्याय से मुखातिब होंगे जिसका आधार रामकथा या ऐसी ही कोई पौराणिक या मिथकीय कथा होगी जिसके आधार पर न्याय का पाखंड रचा जाएगा। इस तरह की बेबकूफियां अनेक इस्लामिक देशों में होती रही हैं। धार्मिक कथानकों और मान्यताओं के आधार पर वहां पर न्याय होता रहा है और इससे न्याय घायल हुआ है। संभवतः हम राम मंदिर बनाने के बहाने फंडामेंटलिज्म के मार्ग पर चल पड़े हैं।

26 thoughts on “‘हम राम मंदिर बनाने के बहाने फंडामेंटलिज्म के मार्ग पर चल पड़े हैं’

  1. प्रणाम।

    यहा मे पहलि बार लिखता हु।

    जो व्यक्ति वेदिक है – हिन्दु है – वो कभि fundamentalist नहि हो सकता।
    इस मुद्दे पर श्री वामदेव शास्त्री ने अंगरेजि मे एक लेख लिखा है वो यहा है :
    http://skanda987.wordpress.com/2011/06/25/hindu-fundamentalism-what-is-it/

    हम वेदिक लोग – हमारी सभ्यता या वेदिच् धर्म – जो धर्म या विचारधारएं सहिष्णु है वे दब से सहुष्णु है। जो धर्म असहिष्णु है – जो वेदिक धर्म को सदन्तर मिटा देना चाहता है उन धर्मो को सहन करने का वेदिक धर्म नहि सिखाता है। याद रहे कि जब अर्जुनने कहा कि वो नहि लडना चाहता है तो भगवान कृष्ण ने कहा कि उसे लडना हि पडेगा। मतलब कि असुरोके साथ लडना धर्म है। हिंसा ये सदुपयोग है। धर्म और वेदिक समाज या देश के लिये असुरोके साथ लडने वाला मरे तो भी स्वर्ग मे जाता है वो गीता कहती है।

    शास्त्र कहता है :
    अहिंसा परमो धर्म ।
    धर्म हिंसा तथैव च ॥

    ये ऊपरवाली पंक्ति गान्धी बुद्ध और महवीर स्वामी ने ना कही परन्तु शास्त्र और गीता कहते है।

    हम हिंदुओ ने कभी किसीको जबर्दस्ति वेदिक नहि बनाया । जो कोई हमारे धर्म के बारेमे जानना न चाहता हो उसे हम कभी अपने धर्म के बारे मे कुछ नहि कहते । हमने कभी किसी देश छिन लेनेके इये आक्रमण नहि किया। ईस किये हम हिंदु लोग कभी fundamentalist नहि थे और न कभि होंगे । असुरो के साथ लडना हि चाहिये – नहि तो वेदिक धर्म और सन्क्रिति और देश का नाश हो जायेगा।
    नीचेकि लिंक पर एक छोटि कविता पढे।

    http://skanda987.wordpress.com/2011/04/09/a-poem-%E0%A4%8F%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AD%E0%A5%80%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%A4%E0%A4%BE/

    जय श्री कृष्ण
    सुरेश व्यास

  2. “अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक केटेगरी में बांटकर देखने के कारण ही धीरे-धीरे अल्पसंख्यक हाशिए पर गए हैं और आज स्थिति इतनी बदतर है कि अल्पसंख्यकों के पक्ष में खुलकर बोलने वाले को बेहद जोखिम उठाना पड़ता है।”

    —– झूठ, बल्कि सच्चाई तो यह है की हिन्दुओ की बात करने वालों को इस देश मैं अच्छुत समझा जाता है. और मुसलमानों की खुल कर बात करने वालों को सराखों पर बैठाया जाता है.

    “कोई भी दल रामकथा को अस्वीकार नहीं कर सकता”

    ——– वामपंथी दल खुले आम अस्वीकार करते है.

    “लखनवी न्याय के आने के साथ ही रामकथा पर न्याय की भी मुहर लग गयी है। अब राम कथा भी कानूनी हो गयी है। अब राम जन्म को कानूनी मान्यता मिल गयी है। इस कानूनी मान्यता के बड़े दूरगामी परिणाम होंगे। यह न्याय की भाषा के बदलने की सूचना भी है।”

    ——– अपने इस कथन मैं आपने खुद अस्वीकार किया है.

    आज न्यायलय को गली सिर्फ इस लिए दी जा रही है की उसने हिन्दुओं के पक्ष मैं निर्णय देने की हिम्मत कैसे की.

  3. 4 प्रश्न 4 उत्तर! पहला. इसमें न्याय बुद्धि से काम नहीं लिया गया, इसे अंतिम फैसला नहीं मान सकते, विविधता के सिद्धांत की उपेक्षा, फैसले का आधार रामकथा और उससे जुड़ी मान्यताएं हैं,… प्रश्न ही अविवेकी हैं। जगदीश्वर जी, क्या अपने वह निर्णय पड़ा है? ASI, पुरावेताओं के प्रस्तुत प्रपत्र जिनमें ढांचे के नीचे से निकले मंदिर अवशेष के प्रमाण दिए गए, उन्हें देखा होता तो ऐसा शायद न कहते। शायद शब्द इसलिए कहा कि जब कोई शर्मनिरपेक्ष हो जाये तो किसी सीमा तक गिर सकता है। बस मानवाधिकारवादी , शर्मनिरपेक्ष, बुद्धिभोगियों की तो भारतीय संस्कृति का विरोध करने की परिपाटी बनी हुई है। चौथी बात यह है कि बिना किसी प्रमाण के वक्फ बोर्ड को 1/3 भूमि मिल गई, इसे विविधता का सिद्धांत कहें या अल्पसंख्यकवाद का, किन्तु हिन्दू शांति के लिए चुप हो गया किन्तु फिर भी NDTV और आप जैसे शांति भंग करने हेतु मुस्लिमों को भड़काते रहे, क्या आपने न सुधरने की कसम खा रखी है?

    1. शुक्रिया तिलक जी…. अपने सही कहा हमें तो चतुर्वेदी जी बाबर के संबंधी लगते हैं…………..

  4. chaturvediji, is pahalu par aap belagaam itnaa kuchh likh rahe hain ki aap ke aalekhon par tippani karnaa ham jaison ke liye jaraa muskil pad rahaa hai aur jab uska jawaab nahi de pate to kisi ko bhi ap andh bhakt karaar dekar bach nikalate hain,atah is baar main koi tippani ke pahle apni sthiti saaf kar denaa chaahataa hoon.
    Main ishwar ke kisi roop mein viswaas nahi kartaa.Ve hinduon ke ishwar hon ya unke vibhin awataar.Allah hon ya God. Par Ram ko ek Rajputra aur baad mein ek Raja ke roop mein main maanyataa detaa hoon aur uskaa kaaran Valmiki likhit Ramayan aur isi tarah ki anya praachin Granth hain jo na kewal Bharat balki anya deshon mein bhi hain.Main Ramkathaa ke sambandh mein sabse popular Granth Tulsi krit Ramcharitramanas ko us category mein nahi rakhtaa,kyon ki yah bahut baad ki rachnaa hai.
    Ab main aataa hoon Lakhnavi nyay par.Is nayaay ke liye judjon ke paas aadhaar kyaa tha?Babri masjid,jisko todaa gayaa tha.Par yah bhi to judjon ko hi sochnaa tha,ki usi jagah ko Ram bhakt apne araadhyaa deo ka janm sthaan kyon maanate hain? Kisi doosari jagah ko kyon nahi.Rambhakton ne Delhi ke JAAMAAMASJID KO RAMJANBHUMI KYON NAHI KAHAA?Ve kisi bhi Masjid ko Ram ka janm sthaan kah sakate the,kyonki Ram ka janm toBharat mein kisi masjid ke banane ke bahut pahale ho chukaa tha.Aur agar mere jaise naastikon ki bhaasaa mein kahaa jaye jo ishwar ko maanav nirmit maanataa hai to yahi kahaa jaayega ki Allah ka khoj hi Ramjanm ke bahut baad huaa. AAp maane ya na maane par jaj log masjid ke aadhaar par fisalaa nahi kar sakte the,isiliye puraatatav vibhag ki madad li gayee.usme kya nikalaa,ispar apnaa mat dene ki jaroorat nahi kyonki vah lipibadh hai.Usme murti nahi nikal sakataa thaa,kyonki islaam kisi tarah ki murti ko maanayataa nahi detaa atah,masjid banaane ke samay sabse pahle murtiyan hataai gayee hongi aur mandir ka vah ansha bhi bhang kiya gayaa hogaa jahan murti poojaa ka koi bhi chihna ho.Is najariye se dekhiyegaa to aapko pataa chal jayegaa ki jajon ne jo faisalaa diyaa hai vah aashthaa aadhaarit nahi hai.Aise main Advaaniji ko kaanoon kaa koi aisaa expert nahi maanataa ki main unki bat ko jajon ke faisale kaa aadhaar maan loon,parr mere vichaar se jajon ne faisale ke liye jo aadhaar choonaa hai vah ekdam theek hai.Suprim kort kya kahegaa yah main nahi jaanataa par mere vichaar se vahaan se bhi kuchh isi tarah ka faisalaa aayegaa.

  5. पंकज जी का निर्णय दूरदर्शितापूर्ण और सुनिश्चित परिणामकारी मुझे लगता है.
    निसंदेह बेचारे वामपंथी बुरी तरह बौखला ही नहीं गए , पगला गए हैं. बुझता दीपक अधिक तेज़ी से जलता है. इनको भी शायद अपने अवसान का आभास हो गया है जिसके कारण अंतिम छट -पटाहट प्रकट हो रही है.
    – हमारे विद्वान लेखक-विश्लेषक पंकज जी का निर्णय अनुकरणीय है. इन पगला गए वामपंथियों के लेखों पर टिप्पणी न करके इनकी उपेक्षा के जाये और प्रवक्ता.काम को भी सन्देश मिले कि इस प्रकार के निम्न कोटी के पूर्वाग्रही लेखन को जो वे इतना अधिक प्रकाशन का अवसर दे रहे हैं, वह न तो उचित है और न ही इसे पाठक पसंद कर रहे हैं.

  6. चतुर्वेदीजी के लेख मैं पहले भी पढ़ लेता था और एक बार टिपण्णी भी कर चुका हूँ.पर जब से अयोद्या फैसला आया है लगता है चौबेजी बौखलाए ही नहीं बौराए गए हैं. अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं. उनका वामपंथी दृष्टि कोण हिन्दू वैर तथा मुस्लिम प्रेम की सब सीमायें लांघ कर नित नए जोश से प्रकट हो रहा है. पाकिस्तान बनने से पहले और उसके बाद मुसलमानों का हिन्दुओं के प्रति कैसा रवैया रहा इस को चतुर्वेदीजी जैसों को छोड़ कर सभी जानते हैं. भारत में तो अधिकतर मुसलमान premi सेकुलरिस्टों का hi शासन रहा है. सोनिया ji के राज में तो सब संवैधनिक मर्यादाओं का उल्लंघन करते हुए जिस प्रकार से मुसलमानों का तुष्टिकरण हुआ और हिन्दुओं को जिस प्रकार सुविधाओं से वंचित रखा गया वह कौन नहीं जानता. सेकुलर भारत के अतिरिक्त विश्व का कौन सा देश है जो हज के लिए अरबों रूपए की sabsidi देता है. हमारे प्रधान मंत्रीजी घोषणा कर चुके हैं की देश की सम्पदा पर पहला अधिकार मुसलमानों का है. कोई पूछे की हिन्दुओं ने क्या अपराध किया है.पर चतुर्वेदी जी की राय में यह sab मुसलमानों के साथं घोर अन्याय के प्रमाण हैं अब ऐसे व्यक्ति से वाद विवाद से क्या भला होगा. अंधे के आगे रोईये अपने ही नैन खोइए

  7. aapke aalekh ka jo bhi saar hai vo shayad aap logo tk nahin pahuncha paaye kitu aapko badhai ki shri aadvani ji ne bhi sweekaar kar liya hai ki haan -lucknow faisla kaanoon dwara aastha ki sweekaarokti hai ab smsya unki hai ki jo aapke aalekh ko theek se padhte bhi nahin or danadan nakaaraatmk tippni pesh karte rahte hain .aise bigdelon ko chahiye ki apne aastha purush shree aadvani ji ke aaj 6 octombar ki post jarur padhen .

    1. चलिए आपने स्वीकार तो किया की अडवाणी जी जो बोलते है सही बोलते है और उसे सभी को मान लेना चाहिए
      धन्यवाद्

      1. आपसे किसने कब कहा की आडवानी जी ने कोई झूंठ बोला ?उनके विचार और मेरे विचारों में सिर्फ साधन का फर्क है ..साध्य का नहीं …यदि आप उनके अधकृत प्रवक्ता हैं तो आपको ये बात जानना और जरुरी हो जाती है की १९८० के भाजपा स्थापना अध्वेशन में गांधीवादी समाजवाद का नारा देने पर आडवानी जी सहमत नहीं थे .लेकिन हम भाजपा से कोसों दूर होने के वावजूद खुस हुए थे .खेर छोडो कल की बातें …नए दौर में ….

        1. सीताराम तिवारी जी को आडवाणी जी ने यह जानकारी व्यक्तिगत रूप से दी है, क्योंकि और तो किसी ने इसका जिक्र किया नही, अपितु उन्होने स्वयं इस फैसले मे अपनी सहमति स्वीकार की थी १९९६ रथ यात्रा के बाद एक साक्षात्कार मे।

        2. पहले सही और गलत एवं सच और झूठ का अंतर समझिये
          “मेरे विचारों में सिर्फ साधन का फर्क है ..साध्य का नहीं” ईश्वर की प्राप्ति के लिए हिन्दू और मुसलमानों में भी यहीं फर्क है जब आप ये कामना करते है कि बीजेपी जैसी पार्टी को ख़त्म हो जाना चाहिए तो केवल साधन बदल जाने पर ही आप बीजेपी से इतने नाराज हो गए तो हिन्दुओ और मुसलमानों को एक दुसरे के खिलाफ ऐसा सोचने से कैसे रोका जा सकता है दुनिया में कोई भी हर जगह निरपेक्ष नहीं हो सकता भगवान बनने की कोशिश न करे
          सबका अपना अपना झुकाव होता है
          और जहाँ तक लेख को ठीक से पढ़े बिना टिप्पणी का आरोप आपने लगाया है वो गलत है जबकि आपको भी ये मालूम है की जगदीश्वर जी ने अब तक जो भी लेख लिखे है वो न्यायलय के फैसले को पूरी तरह पढ़े बिना लिखे है लेकिन आप ने अपनी ये ख़ूबसूरत राय चतुर्वेदी जी को नहीं दी है
          अब भी विचार करें

  8. माननीय, जगदीश्वर जी,
    आप जैसे महान लेखकों को बिना पढ़े टिका टिप्पणी शोभा नहीं देता, पूरा जजमेंट 8,००० पेज में है, जिसको पढ़ने के लिए समझने के लिए कम से कम २ वीक चाहिए, आप तो जजमेंट पढ़े बिना शुरू हो गए, अभी इतना भी महान नहीं हुए हैं सर, जो बिना पढ़े सब समझ जाएँ, ये लिंक है फुल जजमेंट का http://elegalix.allahabadhighcourt.in/elegalix/DisplayAyodhyaBenchLandingPage.do
    इस जजमेंट में सारे framed issues और सारे issues पर तीनों माननीय जजों का निष्कर्ष है, पुरे जजमेंट में ये कंही नहीं लिखा है की चूँकि हिन्दूओं की आस्था है इसलिए ये जगह उनहें दे दी जाए,

    आपको ये जानकार काफी दुःख हुआ होगा की तीनों जजों ने ये माना की यंहा पहले हिन्दुओं का मंदिर था,

    तीनों जजों ने ये भी माना की वो टोम्ब मंदिर के ऊपर बनाया गया था,
    और सबसे बड़ा धमाका तो ये टोम्ब एक सिया नवाब के द्वारा बनाया गया था, जबकि दावा ठोंका एक शुन्नी वक्फ बोर्ड ने, और तो और उस प्रोपर्टी का कभी वक्फ ही क्रियेट नहीं हुआ,

    शुन्नी वक्फ बोर्ड कोई भी सबूत नहीं दे सकी वक्फ क्रियेसन का ?

    इस जजमेंट में अगर कुछ गलत है तो बस बिना किसी सबूत के वक्फ बोर्ड को १/३ जमीन मिल गया.

    और जगदीश्वर जी आपको ये जान कर शोक्क लगेगा की, इस देश में एक law है adverse possession का जो सारे law पर supercede करता है, उस जगह पर हिन्दू १२ साल से भी ज्यादा सालों तक पूजा करते रहे उस प्रोपर्टी को manage करते रहे, पर वो सुन्नी वक्फ बोर्ड वाले सोये रहे, वो जागे भी तो अपने कारण से नहीं कुछ तथाकथित समाजवादियों व वामपंथियों के politicization से,

    मुझे उम्मीद है आप पढ़े लिखे हैं पहले पूरा जजमेंट पढेंगें फिर कोई बात कहेंगे, अगर सच के साधक हैं तो अपने सारे लेख जो बिना पढ़े लिखे गए हैं use wapas lete hue samaaj और देश court से maafee भी mangen ge.

  9. वास्तव में धर्म से शांति होनी चाहिए .मुस्लिम भाइयों को यह समझना चाहिए की देश के दुसरे हिस्सों से मुस्लिम भाई नमाज़ पढने अयोध्या नहीं जायेगे परन्तु पुरे देश के हिन्दू वहां पहले भी जाते रहे हैं फिर हम दूसरी मस्जिद बनाने के खिलाफ तो नहीं हैं वह भी अयोध्या में ही सिर्फ स्थान परिवर्तन का प्रश्न है जिसका उनकी अश्था से उनका सम्बन्ध नहीं है जितना की हिंदूयों की.

  10. चतुर्वेदी जी बधाई हो!
    कितने सटीक और दो टूक होते हैं आपके शब्द
    किसी के भी विचारो से सभी का संतुस्ट होता तो सुव्भाविक नहीं
    लेकिन आपके लेख में जो नई नई जानकारी मिलती है उसका में कायल हूँ
    लेकिन अफ़सोस! कुछ लोग गुलाब के पेड़ में सिर्फ कांटे ही ढूंढते हैं

  11. अयोध्या निर्णय आने के बाद आपके द्वारा “धड़ाधड़” लिखे गये लेखों को देखकर मैं आपके दुख-हताशा-निराशा-कुण्ठा-गम को समझ सकता हूं… मुझे आपसे पूरी सहानुभूति है…।

    “फ़ण्डामेंटलिज़्म” – हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा… मुझे लगता है कि आपको कम से कम एक बार सऊदी अरब, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, लीबिया, सूडान में 6-6 माह वहाँ के स्थानीय लोगों के साथ बिताने चाहिये… शायद तब आप “फ़ंडामेंटलिज़्म” का अर्थ समझ पायें…

    अभी तो आप किसी विदेशी विचारक द्वारा बताये गये फ़ण्डामेंटलिज़्म का अर्थ समझ और समझा रहे हैं…। सदमे की हालत में अक्सर ऐसा हो जाता है…

    1. सुरेश जी खाडी के देश क्यों, यहीं यही महोदय एक दूसरे लेख पर मेरे प्रश्नों से ऐसे आहत हुए कि मेरे comments को दबाने हेतु तकनीकी ज्ञान का सहारा ले कर उसे low priority मे डाल दिया, पर उन्हे मालूम नही था कि low priority वाले भी comments अंततः छप ही जाते हैं।

      इस प्रकार दूसरों की आवाज़ दबाने का निकृष्ट प्रयत्न करने वाले दूसरों को शिक्षा देने चले हैं।

      और अगर कोई इनसे इनके धर्मस्थानों पर हुए तिएन-आन-चौक, सिंगूर, नंदीग्राम के विषय मे पूछ ले तो यह लोग आक्रामक भी हो उठते हैं।

  12. जैसे कुछ किसानो की जमीन सरकार सेज(स्पेशल इकोनोमिक ज़ोन) के नाम पर अधिग्रहित कर लेती है और उनको मुआवजा दे देती है या उतनी ही जमीन कहीं और दे देती है क्योंकि सेज के लिए वही जगह ज्यादा उपयुक्त होती है
    उसी तरह मंदिर के लिए वही जगह महत्वपूर्ण है जबकि हिन्दू मुसलमानों को उससे ज्यादा जमीन देने और मस्जिद निर्माण में सहयोग करने को तैयार है और जब मुसलमान भी इसके लिए तैयार है तो ममता बनर्जी टाइप कुछ नेताओ और पत्रकारों के पेट में दर्द होने लगता है की अरे अब हमारा क्या होगा
    जगदीश्वर जी रिटायर होने के बाद पेंसन तो मिलेगी न हा हा हा हा …….

    1. पेंशन का मालूम नही, पर टेंशन जरूर मिल गया है वामपंथी लोगो को, न्यायालय ने न्याय जो कर दिया।

  13. वामपन्थी विचारधारा वाले लोग माननीय उच्चन्यायालय के निर्णय से बौखलाये हुए लगते है. धर्म अफीम है का सिद्धान्त जनता और वामपन्थी खुद मानने को तैयार नही है. उन्हे विचारधारा का अन्त साफ दिख रहा है, अब समय आ गया की वो फैसला कर ले की वे विचारधारा की मौत के बाद किस धर्म के सिद्दान्त के अनुसार अन्तिम सन्सकार करेन्गे….जलायेन्गे तो हिन्दु, दफनायेन्गे तो मुस्लिम, ईसाई या अन्य…..
    ममता बनर्जी का विरोध करते हुए मरना है तो लाश को दफनाना उचित रहेगा, क्योन्कि जाते जाते एक धर्म को प्रसन्न कर सकते है.
    और अगर मार्क्स की विचारधारा के अनुसार मरना है तो लाश का क्या होगा, यह प्रश्न अनुत्तरित रह जायेगा..

  14. आस्था और कानून का एक और पहलू भी ध्यान देने योग्य है … आस्थाओं से परम्पराएं बनती हैं और परम्पराओं से क़ानून जो हर देश में अलग अलग उस देश की परम्पराओं के अनुरूप बदल जाते हैं … मुस्लिम पर्सनल ला या हिंदू मेरिज एक्ट के कानूनों में आस्थाएं ही आधार बनती हैं …. शाहबानो केस में परिस्तिथियों को स्वीकार करते हुए कानून बदला गया … कानून बनाने वालों को आस्था और कानून में टकराव का मौक़ा देना ही नहीं चाहिए ….

  15. अब एक घोषणा करने का मन हो रहा है. नुकसान ज़रूर व्यक्तिगत होगा. चतुर्वेदी जी उद्भट विद्वान हैं इसमें कोई संदेह नहीं है. उनकी ऊर्जा का भी कायल हुआ जा सकता है. काफी नयी-नयी जानकारी मिलती है उनके लेख से. लेकिन अफ़सोस ‘नीयत’ उनकी सही नहीं है. और ना ही संपादक किसी भी तरह का संयुलन इस मामले में दिखाने को तैयार हैं. तो प्रवक्ता का बहिष्कार तो संभव नहीं है. लेकिन अपनी तरफ से यह ज़रूर घोषित करता हूँ कि चतुर्वेदी जी का कम से कम राम मंदिर मसले पर किसी भी लेख पर ना कोई टिप्पणी करूँगा और न ही पढूंगा. इसके अलावा अपन और कर ही क्या सकते हैं.

    1. पंकज तुम्हे रोष करने की कोई जरूरत नहीं … सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है इसमें उस बेचारे का क्या कसूर है ? वह हरियाली का जितना चाहे ढोल पीटे आँख वाले सब जान लेते हैं

    2. कृपया हमे अकेला मत छोड़िये अर्जुन को याद करिए

      1. शैलेन्द्र जी ये किसने कहा कि आप अकेले हैं. आपके साथ एक अरब से ज्यादा भारतीयों की फौज है.चुकि इनलोगों से निपटने का एक बड़ा अस्त्र ये भी है कि इनकी उपेक्षा की जाय. इसीलिए ऐसे दुराग्रहियों के मुकाबले सत्याग्रह भी एक तरीका है. खास कर यह इसलिए भी ज़रूरी है कि ‘प्रवक्ता’ किसी तरह का संतुलन इस मामले में दिखाने को तैयार नहीं है. तो ऐसे लेखकों से लड़ना तो आसान है लेकिन अपने ही साईट से कैसे लड़ा जाय? इसलिए अपना यह फैसला है. आप याद रखें…शांति और सद्भाव की बात करने वाले कभी अकेले नहीं होते….मेरी शुभकामना.

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