लेखक परिचय

उमेश चतुर्वेदी

उमेश चतुर्वेदी

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। संपर्क: द्वारा जयप्रकाश, दूसरा तल, एफ-23 ए, निकट शिवमंदिर कटवारिया सराय, नई दिल्ली – 110016

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मीडिया का जब भी कोई नया माध्यम सामने आता है, पुराने माध्यमों को अपने अस्तित्व की चिंता सताने लगती है। जाहिर है वेब माध्यम की खोज और तेजी से बढ़ते प्रचलन के बाद भी पुराने माध्यमों मसलन प्रिंट, रेडियो और टेलीविजन को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी थी। बीसवीं सदी के शुरू में जब रेडियो माध्यम आया था तो निश्चित तौर पर वह प्रिंट माध्यम से चरित्र और तकनीकी दोनों स्तर पर अलग था। इसी तरह 1930 के दशक में आया टेलीविजन भी रेडियो के ऑडियो गुणों से थोड़ा युक्त होने के बावजूद अपने पहले के दोनों माध्यमों से अलग था। लेकिन वेब माध्यम पहले से प्रचलित दूसरे माध्यमों के लिए सबसे बड़ा सहारा बनकर उभरा। 1969 में आया इंटरनेट माध्यम अपने पहले के तीनों माध्यमों से चाल और चरित्र में अलग होते हुए भी तीनों की संभावना और चरित्र को खुद में समाहित करके उनके प्रसार में भी अहम भूमिका निभा रहा है। यही वजह है कि इस माध्यम की पत्रकारिता दूसरे माध्यमों की तुलना में कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इस माध्यम की चुनौती को जिस पेशेवराना अंदाजा से जूझने की तैयारी होनी चाहिए, कम से कम भारतीय भाषाओं में यह चुनौती नदारद है। वेब पत्रकारिता की अलख अगर भारतीय भाषाओं में दिख रही है तो उसका सबसे बड़ा जरिया बने हैं इस माध्यम की ताकत और महत्व को समझने वाले कुछ शौकिया लोग। लेकिन यह भी सच है कि शौकिया और सनकी किस्म के लोग नए विचार और माध्यम को शुरूआती ताकत और दिशा ही दे सकते हैं, उसके लिए जरूरी आधार मुहैया करा सकते हैं, लेकिन उस विचार या माध्यम को आखिरकार आगे ले जाने की जिम्मेदारी पेशवर लोगों और उनके पेशेवराना अंदाज पर ज्यादा होती है।

वेब पत्रकारिता की चुनौतियों को समझने के लिए सबसे पहले हमें आज के दौर में मौजूद माध्यमों, उनके चरित्र और उनकी खासियतों-कमियों पर ध्यान देना होगा।

इंटरनेट के आने से पहले तक सभी माध्यमों की अपनी स्वतंत्र पहचान और स्पेस था। लेकिन इंटरनेट ने इसे पूरी तरह बदल डाला है। इंटरनेट पर स्वतंत्र समाचार साइटें भी हैं तो अखबारों के अपने ई संस्करण भी मौजूद हैं। स्वतंत्र पत्रिकाएं भी हैं तो उनके ई संस्करण भी आज कंप्यूटर से महज एक क्लिक की दूरी पर मौजूद हैं। इसी तरह टेलीविजन और रेडियो के चैनल भी कंप्यूटर पर मौजूद हैं। कंप्यूटर का यह फैलाव सिर्फ डेस्क टॉप या फिर लैपटॉप तक ही सीमित नहीं रहा। बल्कि यह आम-ओ-खास सबके हाथों में मौजूद पंडोरा बॉक्स तक में पहुंच गया है। 2003 में बीएसएनएल की मोबाइल फोन सेवा की लखनऊ में शुरूआत करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने मोबाइल फोन को पंडोरा बॉक्स ही कहा था। भारत में मोबाइल तकनीक और फोन सेवा की संभावनाओं का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के बड़े टेलिकॉम ऑपरेटरों ने 3G सेवाओं के लाइसेंस के लिए हाल ही में करीब 16 अरब डॉलर यानी 75,600 करोड़ रुपए की बोली लगाई। संचार मंत्रालय के एक आंकड़े के मुताबिक देश में जून 2010 तक मोबाइल फोन उपभोक्ताओं की संख्या 67 करोड़ तक पहुंच गई थी। इस बीच मोबाइल के जरिए भी इंटरनेट के इस्तेमाल की प्रवृत्ति बढ़ी है। एक अमरीकी संस्था ‘बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप’ ने ‘इंटरनेट्स न्यू बिलियन’ नाम से जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक इस समय भारत में 8.1 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं। यहां इस तथ्य पर गौर फरमाने की जरूरत यह है कि यह आंकड़ा सिर्फ बेसिक टेलीफोन और ब्रॉडबैंड के जरिए ही मौजूद है। टेलीकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी ट्राई के मुताबिक मोबाइल के जरिए जून 2010 तक 21.4 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे थे। जिसमें 70 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी की उम्मीद जताई जा रही है। वहीं बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के मुताबिक 2015 में भारत में बेसिक टेलीफोन कनेक्शनों के जरिए इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या बढ़कर 23.7 करोड़ हो जाएगी। इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का मौजूदा इंटरनेट उपभोक्ता रोजाना आधे घंटे तक इंटरनेट का इस्तेमाल करता है। जिसके बढ़ने की संभावना अपार है। इस रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 2015 तक ही भारत का आम इंटरनेट उपभोक्ता रोजाना आधे घंटे की बजाय 42 मिनट इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगेगा। इसकी वजह भी है। दरअसल आज भी दिल्ली-मुंबई या लखनऊ-जयपुर जैसे शहरों को छोड़ दें तो तकरीबन पूरा देश बिजली की किल्लत से जूझ रहा है। इंटरनेट के पारंपरिक माध्यमों को चलाने के लिए बिजली जरूरी है। ऐसे में कंप्यूटर निर्माता कंपनियां ऐसे कंप्यूटरों के निर्माण में जुटी हैं, जिन्हें बैटरियों या ऐसे ही दूसरे वैकल्पिक साधनों से चलाया जा सके। इस दिशा में तकनीकी विकास जैसे हो रहा है, जाहिर है कि ऐसा होना देर-सवेर संभव होगा ही। कल्पना कीजिए कि अगर ऐसा हो गया तो देश में कंप्यूटर क्रांति आ जाएगी और फिर इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ना लाजिमी हो जाएगा। विविधतावादी भारत देश में तब इंटरनेट पाठकों, स्रोताओं और दर्शकों का विविधता युक्त एक बड़ा समूह होगा, जिनकी जरूरतें और दिलचस्पी के क्षेत्र विविध होंगे। जिनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। हालांकि इसकी एक झलक आज भी प्रिंट माध्यमों में दिख रहा है। जहां पाठकों की विविधरंगी रूचियां और जरूरतें साफ नजर आती हैं। अखबार और पत्रिकाएं अपने पाठकों को लुभाने के लिए उनकी दिलचस्पी और जरूरत की पाठ्य सामग्री मुहैया करा रही हैं।

इंटरनेट की एक और खासियत है, समय की मजबूरियों से मुक्ति। अखबार या पत्रिकाएं एक निश्चित अंतराल के बाद ही प्रकाशित होते हैं। टेलीविजन ने इस अंतराल को निश्चित तौर पर कम किया है। रेडियो ने भी वाचिक माध्यम के तौर पर इस अंतराल को घटाया ही है। लेकिन वहां अब भी तकनीकी तामझाम ज्यादा है। विजुअल को शूट करना, उसे एडिट करना और उसे सॉफ्टवेयर में लोड करना अब भी ज्यादा वक्त लेता है। लेकिन इंटरनेट ने वक्त की यह पाबंदी भी कम कर दी है। खबर आई या उसका वीडियो या ऑडियो शूट किया गया और उसे इंटरनेट पर लोड कर दिया गया। हालांकि अभी तक उपलब्ध 2 जी तकनीक के चलते इस पूरी प्रक्रिया में थोड़ी दिक्कतें जरूर होती हैं। लेकिन 3 जी के आने के बाद इन दिक्कतों के कम होने का अनुमान लगाया जा रहा है। तब निश्चित तौर पर इस माध्यम के लिए कंटेंट जुटाने और तैयार करने वाले लोगों की परेशानियां थोड़ी कम हो जाएंगी।

फिलहाल भारतीय भाषाओं की वेब पत्रकारिता की सबसे बड़ी परेशानी कमाई के स्रोतों की कमी है। भाषाई प्रिंट माध्यमों में विज्ञापनों की बाढ़ आई है। भारत में इस वक्त करीब चालीस करोड़ लोगों का ऐसा उपभोक्ता समूह है, जिसकी जिंदगी के सपने बढ़े हैं और उसकी खरीद क्षमता का विकास हुआ है। उपभोक्ताओं के इस नए वर्ग के चलते टेलीविजन की ओर भी विज्ञापनों का प्रवाह बढ़ा है। लेकिन अभी इंटरनेट की दुनिया में विज्ञापनों का यह प्रवाह नहीं दिख रहा है। हालांकि प्राइस वाटर हाउस कूपर की पिछले साल जारी रिपोर्ट ने इंटरनेट विज्ञापनों की दुनिया में 12.4 फीसद बढ़त का आकलन किया था। लेकिन इस क्षेत्र में उम्मीदें लगाए रखने का कारण मौजूद है। क्योंकि पश्चिमी दुनिया में जहां मीडिया के पारंपरिक माध्यमों का विकास अपने चरम पर पहुंच गया है, वहां इंटरनेट की तरफ विज्ञापनों की आवक बढ़ी है। हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन के साथ-साथ अब अमेरिका में भी इंटरनेट पर के विज्ञापनों ने टेलीविजन के विज्ञापनों को पीछे छोड़ दिया है। यानी टेलीविजन की तुलना में ऑनलाइन साइटों को ज्यादा विज्ञापन मिलने लगे हैं। इसका मतलब ये है कि विज्ञापन के लिहाज से ब्रिटेन में इंटरनेट पहला माध्यम हो गया है जबकि टेलीविजन दूसरा माध्यम। ऑनलाइन एड स्पेंड सेट टू ओवर टेक प्रिंट नाम से प्रकाशित इस रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि सितंबर के महीने में यूके में जो रिपोर्ट जारी करके बताया गया था कि टेलीविजन के विज्ञापन से इन्टरनेट पर का विज्ञापन कहीं ज्यादा है,यही कहानी अब यूएस में भी हो गयी है। आउटसेल के सर्वे में बताया गया है कि 2010 में वहां की कंपनियां 119.6$ विलियन ऑनलाइन और डिजिटल विज्ञापनों पर खर्च करने जा रही है जबकि प्रिंट माध्यमों पर 111.5$ विलियन। यानी भारत में भी आने वाले कुछ साल में इंटरनेट की दुनिया में भी विज्ञापनों की बढ़ोत्तरी की उम्मीद की जा सकती है।

लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसे हालात में कंटेंट को लेकर जैसी तैयारी होनी चाहिए, वैसी तैयारी नहीं दिख रही है। चूंकि यह माध्यम खासा चुनौतीपूर्ण है, लिहाजा उसके लिए कंटेंट जुटाने और उसे पेश करने का पारंपरिक तरीका नहीं चल पाएगा। इस माध्यम के लिए कंटेंट पेश करने का नया तरीका अख्तियार किया जाना कहीं ज्यादा जरूरी होगा। भाषाई कौशल और चमत्कारिक प्रस्तुतिकरण के बिना इस माध्यम में उपस्थिति को बनाए रखना आसान नहीं होगा। इतना ही नहीं, वह कंटेंट ऐसा होगा, जो एक साथ प्रिंट, टेलीविजन और रेडियो के साथ ही वेब माध्यम को भी शुट कर सके। इस दिशा में अभी खास काम नहीं हुआ है। लेकिन यह भी सच है कि यह माध्यम अपनी जरूरत के मुताबिक कंटेंट को तराश भी लेगा और उसे स्वीकार भी कर लेगा। जाहिर है कि इसके लिए खास पेशेवराना कौशल भावी पत्रकारों में चाहिए होगा। सबसे बड़ी बात यह है कि अब तक के पारंपरिक मीडियमों को लांच करने और बाजार में पाठकों, श्रोताओं या दर्शकों का चहेता बनाने के लिए भारी पूंजी की जरूरत प़ड़ती है। इस मायने में वेब माध्यम को खासी छूट हासिल है। छोटी पूंजी में एक कमरे के दफ्तर या सिर्फ एक लैपटॉप और वेब कनेक्शन के जरिए भी वेब पत्रकारिता की जा सकती है। ऐसे में पूंजी का महत्व गौण हो जाता है। यह जरूरी नहीं कि मोटी पूंजी बेहतर कंटेंट जुटा सके। इसके लिए कल्पनाशील दिमाग और बौद्धिक कौशल चाहिए होगा। वेब माध्यम में इसी कौशल की सबसे ज्यादा जरूरत है। जिसने बात कहने का नया और प्रभावी तरीका अख्तियार कर लिया, प्रिंट, टीवी और रेडियो तीनों माध्यमों के लिए एक ही खांचे में प्रभावी तरीके से फिट हो सकने वाला कंटेंट तैयार कर लिया…भविष्य उसका होगा…

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

2 Responses to “वेब पत्रकारिता : चुनौतियां और संभावनाएं – उमेश चतुर्वेदी”

  1. sunil patel

    आदरणीय उमेश जी बधाई स्वीकारे. वाकई बहुत अच्छा लिखा है.

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  2. अनिल कुमार

    Anil Kumar

    वाकई में बहुत जानकारी पूण लेख लिखा है आपने…. इस लेख से मेरे कल्पना शक्ति का और विकास होगा… धन्यवाद…

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