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     भारत विरोध पर आमादा पश्चिमी मीडिया

     बीते दिनों अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने नौकरी का एक अनोखा विज्ञापन दिया। उसने भारत समेत दक्षिण एशिया क्षेत्र में बिजनेस संवाददाता की नियुक्ति के लिए उसके गुण और हुनर पर जोर नहीं दिया, बल्कि भारतीय राजनीति और समाज पर एक लंबा भाषण देते हुए स्पष्ट किया कि वह ऐसे पत्रकार को ढूंढ रहा है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत को लेकर आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाए। विज्ञापन के विवादास्पद वाक्य ये हैं, ‘मोदी

    का राष्ट्रवाद भारत के हिंदू बहुसंख्यकों पर केंद्रित है। यह देश के स्वाधीनता सेनानियों की सहिष्णुता और बहुसांस्कृतिक परंपरा के विपरीत है। मोदी सरकार मीडिया और ऑनलाइन टिप्पणियों पर पाबंदियां लगा रही है। इसके कारण भारत में वाक् स्वतंत्रता पर कठिन प्रश्न उठ खड़े हुए हैं।’ 

    दरअसल इस विज्ञापन का मूल संदेश यह है कि पश्चिमी मीडिया में भारत के प्रति पूर्वनिर्धारित धारणाएं हैं और भिन्न विचार वाले आवेदन करने का कष्ट न करें।

    न्यूयॉर्क टाइम्स की स्थापना 1851 में हुई थी। इसे कथित तौर पर ‘स्वतंत्र’ पत्रकारिता का स्तंभ माना जाता है, पर आज इसकी पहचान भारत को अत्यंत असहिष्णु और घृणा से पेश करने वाले मीडिया संस्थान की बन गई है। जबसे मोदी सरकार आई है, तबसे इसकी कलम भारत की बुराई के लिए ही चल रही है। भारत पर इसमें जितनी खबरें और संपादकीय लेख प्रकाशित होते हैं, उनमें यही धारणा रहती है कि मोदी एक कट्टरवादी और तानाशाह नेता हैं। वह देश की पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा हैं। हालांकि सच्चाई यह है कि प्रधानमंत्री मोदी वर्षों से भारत की जनता के चहेते नेता हैं और आज भी जनमत सर्वेक्षण उन्हें विपक्षी नेताओं से काफी आगे बताते हैं, लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स को उनकी लोकप्रियता और कार्यकुशलता से कोई लेना-देना नहीं है। दरअसल अमेरिका के उदारवादी खेमे की जंग दक्षिणपंथी विचारधारा से है। यही वजह है कि वह भारत के मतदाताओं को ज्ञान बांटने से बाज नहीं आ रहा।

    भारत से संबंधित किसी भी विषय पर न्यूयॉर्क टाइम्स के लेखों को आप देख लीजिए। उनमें मोदी के निंदकों की राय प्रमुख रूप से रहती है। चाहे नोटबंदी और जीएसटी जैसे आर्थिक मामले हों, पाकिस्तान के बालाकोट में वायुसेना की एयर स्ट्राइक हो, कश्मीर में अनुच्छेद 370 को खत्म करना हो, नागरिकता संशोधन कानून लाना हो, या कोरोना महामारी से निपटना और विश्व की सहायता करना हो-इन सबको न्यूयॉर्क टाइम्स और उसके बंधुओं ने असफल, विनाशकारी और आत्मघाती ही घोषित किया।

    कश्मीर हमारे देश के सबसे संवेदनशील मुद्दों में है, लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स में कश्मीर के बारे में जब भी खबरें छपती हैं तो उनमें मोदी और भारतीय सेना को खलनायक की तरह पेश किया जाता है और पाकिस्तान-प्रायोजित अलगाववादियों और आतंकियों के अभिप्राय ही उद्धृत होते हैं। भारत को कश्मीर में जुल्मी ‘हिंदुत्ववादी’ शक्ति और वादी के मुसलमानों को शोषित दिखाने का खेल कोई न्यूयॉर्क टाइम्स से बेहतर नहीं रच सकता। भले ही कश्मीर धीरे-धीरे भारत का अभिन्न अंग बन रहा हो, पर पश्चिमी मीडिया ने पहले से ही तय कर लिया है कि कश्मीर में ‘आजादी’ की पुकार को अंतरराष्ट्रीय पटल पर प्रोत्साहित करना उसका उदारवादी कर्तव्य है।

    तुलना के लिए स्पेन को ले लीजिए, जहां कातालोनिया प्रांत में दशकों से आजादी की मुहिम छिड़ी है। वहां न्यूयॉर्क टाइम्स दोनों पक्षों-स्वाधीनता मांगने वालों और स्पेन की अखंडता एवं संप्रभुता चाहने वालों को बराबर प्रमुखता देता है और निष्पक्ष रवैया रखता है, लेकिन भारत के प्रति उसकी मानसिकता ठीक इसके उलट है। संभवतः वह मोदी विरोध की घृणा में ही ऐसा कर रहा है, क्योंकि वह पहले ही मानकर चल रहा है कि उनकी हर नीति में धार्मिक बैर, बहुसंख्यकवादी षड्यंत्र और फासीवाद है।

    पिछले आम चुनाव में लगभग 10 प्रतिशत मुसलमानों (दो करोड़ लोगों) ने भाजपा को मत दिए। आम अल्पसंख्यकों को विचारधारा की लड़ाई में कठपुतली बनना अस्वीकार है, पर न्यूयॉर्क टाइम्स को इससे फर्क नहीं पड़ता। वह सत्य की अनदेखी करता है। अमेरिका के ही वाशिंगटन पोस्ट और सीएनएन एवं ब्रिटेन के गार्जियन और बीबीसी भी इसी प्रकार मोदी और भारत को नकारात्मक स्वरूप में दिखाते हैं। ये सभी राष्ट्रवाद और ‘लोक लुभावनवाद’ को पिछड़ी सोच बताकर उनसे इतर पश्चिमी मूल्यों से ओतप्रोत नई दुनिया बनाने का स्वप्न देखते हैं।

    बीते वर्षों में जब कई देशों में राष्ट्रवादी चुनावी लहर चल पड़ी, तब इन उदार मीडिया घरानों ने इससे मुकाबला करने का एक तरह से ठेका ले लिया। इस परिप्रेक्ष्य में कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शेरी बेरमेन ने लिखा है कि ‘अनियंत्रित उदारवाद आसानी से आभिजात्य कुलीनतंत्र में तब्दील हो सकता है।’ यह बात न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे संस्थानों पर सटीक बैठ रही है। दुख की बात यह है कि पश्चिमी मीडिया के इस कुलीनतंत्र में कुछ भारतीय और भारतीय मूल के टिप्पणीकार भी शामिल हैं। जिन भारतीयों को भारत के उत्थान से परेशानी है, वे पश्चिमी मीडिया में लिखते हैं, ताकि भारत की छवि पर लगातार आघात हो। पत्रकारिता का पहला उसूल है निष्पक्षता, पर विचारधारा की पट्टी ने पश्चिमी मीडिया को एक तरह से अंधा बना दिया है।

    हालांकि बहुत कम भारतीय पाठक न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट, गार्जियन जैसे विदेशी अखबार पढ़ते हैं। भारत इन पश्चिमी मीडिया घरानों के लिए महत्वपूर्ण बाजार नहीं है। लिहाजा मोदी और देश के भविष्य को बदलने में बाहरी मीडिया नाकाम रहेगा, पर इसका मतलब यह नहीं कि उनके पत्रकार भारत में रहकर हमारा अपमान और चरित्र हनन करते रहें। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारी साख को खराब करने के लिए इन्हें खुली छूट नहीं मिलनी चाहिए। ‘फेक न्यूज’ के दौर में पश्चिमी सूचना योद्धाओं की अनदेखी नामुमकिन है। भारत जैसे लोकतंत्र में इन्हें प्रतिबंधित तो नहीं किया जा सकता, पर उनकी निगरानी जरूरी है। हमारी कहानी विश्व को अपनी जुबानी भी सुनानी है। सरकार ‘दूरदर्शन इंटरनेशनल’ चैनल खोलने के प्रस्ताव पर अगर शीघ्रता और बुद्धिमानी से अमल करे तो भारत के अनुकूल अंतरराष्ट्रीय लोकमत बनाना संभव है। विश्वगुरु को न्यूयॉर्क टाइम्स और उसकी बिरादरी को विश्वरूप दिखाने का समय आ गया है। 

    उपरोक्त लेख में वरिष्ठ स्तंभकार श्रीराम चौलिया जी ने भारत विरोधी पश्चिमी मीडिया का भ्रमित करने वाली पत्रकारिता पर अपने विचार लिखे है l भारत भक्तों को राष्ट्र की सम्प्रभुता और अखंडता के लिए मीडिया जगत में बढ़ रहे भारत द्रोह के प्रति सतर्क रहना होगा और ऐसी पत्र-पत्रिकाओं का बहिष्कार भी करना होगा जो अभिव्यक्ति के नाम पर हमारे देश के टुकड़े-टुकड़े करने के लिए षडयंत्र रचते है l

    लेखक::श्रीराम चौलिया

     प्रोफेसर और डीन

    (जिंदल स्कूल ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स)

    साभार ::दैनिक जागरण 

     6 जुलाई, 2021

    विनोद कुमार सर्वोदय
    विनोद कुमार सर्वोदयhttps://editor@pravakta
    राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक ग़ाज़ियाबाद

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