सलमान खुर्शीद किस देश के विदेश मंत्री हैं ?

डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

salman khushidलद्दाख में चीन की जन मुक्ति सेना की घुसपैठ और भारतीय क्षेत्र के बीस किलोमीटर ( पहले सूचना यह थी कि दस किलोमीटर के अन्दर) अन्दर आकर अपनी चौकियाँ बना लेने की घटना को हुये आधा महीना बीत चुका है । लेकिन इस पूरे प्रकरण पर भारत के विदेशमंत्री सलमान ख़ुर्शीद जो बोल रहे हैं , यदि उसे चीनी भाषा में डब करके सुनाया जाये और चैनल पर यह न बताया जाये कि भारत के विदेश मंत्री बोल रहे हैं , तो यक़ीनन कोई भी यह समझेगा कि बोलने बाला चीन का विदेश मंत्री है जो पूरे प्रकरण पर चीन का पक्ष दुनिया के समझा रहा है । लेकिन उनकी शक्ल हान चीनियों से नहीं मिलती , इस लिये सुनने वाले चीन की तारीफ़ भी कर सकते हैं कि शायद चीन ने पहली बार सिक्यांग प्रान्त से किसी को अपना विदेशमंत्री नियुक्त किया है । वे नौ मई को चीन की यात्रा पर जा रहे हैं । सारा देश मांग कर रहा है कि सलमान को अपनी यह यात्रा रद्द कर देनी चाहिये , लेकिन खुर्शीद भाई की चीन भक्ति का आलम यह है कि उसके आगे कृष्णा मेनन भी बौने लगते हैं । ख़ुर्शीद भाई कहते हैं कि चीन के साथ बातचीत का तंत्र काफ़ी मेहनत से तैयार हुया है और यह लम्बी अरसे से ठीक काम कर रहा है और इसके सही नतीजे भी आ रहे हैं । इसलिये इसे इस छोटी सी स्थानीय घटना के कारण त्यागा नहीं जा सकता ।

लम्बे अरसे से चीन के साथ सही दिशा में चल रही बातचीत का सबसे बड़ा सही नतीजा फ़िलहाल तो यही आया है कि चीन की मुक्ति सेना भारत के बीस किलोमीटर अन्दर अपनी चौकियां बना कर बैठी है । बैसे देश को सलमान खुर्शीद का शुक्रगुज़ार होना चाहिये कि उन्होंने यह कहना नहीं शुरु कर दिया कि यह साधारण सेना नहीं है , बल्कि यह तो मुक्ति सेना है जो लोगों को शोषण से मुक्त करवाने आई है , इसलिये चिन्तित होने की ज़रुरत नहीं है । वे ऐसा भी कह देते तब भी उनका कोई क्या बिगाड़ लेता ? हो सकता था सी.पी.एम पुन: सरकार को समर्थन देना शुरु कर देती । सी. पी.एम के मित्र सुन रहे हैं कि नहीं ? खुर्शीद भाई का सबसे ज़्यादा ज़ोर इस घटना को स्थानीय महत्वहीन घटना सिद्ध करने में लगा हुआ है । क्या खुर्शीद सचमुच यह विश्वास करते हैं कि भारतीय सीमा के बीस किलोमीटर अन्दर आकर चौकियाँ स्थापित करने का निर्णय चीनी सेना के सीमा पर तैनात किसी छोटे मोटे अधिकारी ने ले लिया होगा और इसका बीजिंग से कोई सम्बध नहीं है ? अब उनको लगता है कि जब वे नौ मई को बीजिंग में जाकर बड़े अधिकारियों से ‘इस छोटे मोटे अधिकारी’ की शिकायत करेंगे तो चीन सरकार उसे डाँटेगी और वह अपने तम्बू समेट कर वापिस अपने इलाक़े में चला जायेगा ? बैसे अब चीन सरकार ने इस घटना पर बोलना प्राय बन्द कर दिया है । उनको लगता होगा , जब अपने सलमान खुर्शीद बोल रहे हैं तो उन्हें बोलने की क्या ज़रुरत है ।

सलमान खुर्शीद की बिरादरी ( बिरादरी का मजहबी अर्थ न लिया जाये , इसका अर्थ विदेश नीति के आलिम फाजिल लोगों से है ) के लोगों का दिल्ली में इस समय एक ही तर्क है । क्या इस घटना पर चीन से लड़ाई की घोषणा कर दें ? आलिम फाजिल जानते हैं कि १९६२ में चीन के हाथों हारा हुआ देश , कितना भी ग़ुस्से में क्यों न हो , इस प्रश्न पर अपने आप चुप्पी साध लेगा । यह चुप्पी इसलिये भी निश्चित लगती है कि १९६२ के बाद भी क्या भारत ताक़त के महाज पर चीन के समकक्ष हो गया है , यह अभी भी बहस का विषय है । परन्तु देश सलमान खुर्शीद और उनकी बिरादरी के लोगों को चीन पर हमला करने के लिये बिलकुल नहीं कह रहा । देश तो यह कह रहा है कि इस वक़्त विदेश मंत्री चीन की तथाकथित सद्भावना यात्रा पर न जायें क्योंकि चीन पहले ही जिस प्रकार की सद्भावना लद्दाख में दिखा रहा है , हो सकता है , उनकी यात्रा के बाद वह इस प्रकार की ज़्यादा सद्भावना दिखाना शुरु कर दे ? क्योंकि उसे इतना तो समझ आ ही गया है कि भारत के खुर्शीदों और एंथोनियों के लिये इस प्रकार की घटना सदा स्थानीय घटना ही रहेगी । स्थानीय घटनाओं के हल तो मुहल्ला समितियों की फलैग बैठकों में निकाले जाते हैं राजधानियों में उन पर चर्चा नहीं होती । इस से चर्चा करने वालों की तौहीन होती है । देश को शक है कि अब जब खुर्शीद बीजिंग जा ही रहे हैं , वे वहाँ इस स्थानीय घटना की चर्चा भी करेंगे या अपने रुतबे की तौहीन के डर से , सारा कीमती समय चीन के प्रधानमंत्री की भावी भारत यात्रा के छोटे छोटे विवरणों को तैयार करने में ही ख़र्च करेंगे ?

जब हम सलमान खुर्शीद को ही चीन जाने से नहीं रोक सकते तो भारत सरकार से यह आशा करना कि वह चीन के प्रधानमंत्री को फ़िलहाल अपनी भारत यात्रा रोकने के लिये कहेगा , शेरनी का दूध माँगने के समान होगा । दिल्ली के साउथ ब्लाक ने चीन पर गहरी नज़र रखने के लिये जो दल बना रखे हैं , और जो समय असमय सरकार को चीन के साथ किस प्रकार व्यवहार करना चाहिये , इसकी सलाह देते हैं , उनमें से बहुत से आचार्य अब यह तर्क दे रहे हैं कि दौलत बेग ओल्डी तक चीन के आ जाने में चीन का दोष नहीं है , क्योंकि चीन सचमुच यह समझता है कि उसकी सीमा इससे भी कहीं आगे है । उनके अनुसार चीन का यह प्रसैप्शन ग़लत हो सकता है , लेकिन क्योंकि वह इस ग़लतफ़हमी का शिकार है , इससे लिये दौलत बेग तक आने में उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता । शुक्र है साउथ ब्लाक के इन सलाहकार आचार्यों ने चीन को इससे भी आगे आने का निमंत्रण नहीं दे दिया । कम से कम वे वहाँ तक तो आ ही जायें , यहाँ तक उनके अपने प्रसैप्शन के मुताबिक़ उनकी सीमा है । चीन के इन प्रसैप्शनों पर इसी प्रकार की उलटी सीधी बातें करने बाले उस समय के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि लद्दाख से जम्मू होते हुये , चीन दिल्ली में आपके दरवाज़े तक पहुँच जायेगा , क्या तब आपकी आँख खुलेगी ?

देश का दुर्भाग्य है कि संकट की इस घड़ी में दिल्ली में निर्णय लेने वाला कोई नहीं है । जिन दिनों नेहरु प्रधानमंत्री थे , उन दिनों वे स्वयं निर्णय लेने में सक्षम थे । निर्णय ग़लत था या ठीक था , यह विवादास्पद हो सकता था , लेकिन निर्णय होता था । लालबहादुर शास्त्री भी निर्णय लेने में सक्षम थे । इंदिरा गान्धी ने तो अमेरिका की भी परवाह न करते हुये बंगलादेश का निर्माण करवा दिया था । मोरारजी भाई , अटल विहारी वाजपेयी तक सभी प्रधानमंत्री निर्णय ले सकते थे , क्योंकि वे अपने अपने राजनैतिक दलों का नेतृत्व करते थे और वहाँ से शक्ति ग्रहण करते थे । राजनैतिक दलों की शक्ति का आधार देश की जनता होता है । लेकिन इस समय जो सज्जन प्रधानमंत्री के पद पर विराजमान हैं वे उस राजनैतिक दल के नेता भी नहीं हैं , जिसने उन्हें प्रधानमंत्री बनाया है । इसके कारण उनके पास निर्णय लेने की शक्ति का कोई आधार नहीं है । तब प्रश्न है कि इस समय देश में निर्णय लेने की नैतिक या सांविधानिक शक्ति किसके पास है ? क्या सोनिया गान्धी के पास ? उपर से देखने पर लग सकता है कि यह शक्ति उनके पास है । लेकिन उनका विदेशी मूल का होना उनके रास्ते की सबसे बड़ी , सांविधानिक न सही , मनोवैज्ञानिक बाधा तो है ही । ऐसी स्थिति में कोई भी व्यक्ति अपने इर्द गिर्द विश्वस्त सलाहकारों की देशी टोली एकत्रित करेगा जो महत्वपूर्ण मामलों में सलाह दे सके । सोनिया गान्धी ने भी ऐसा ही किया हुआ है । राजनैतिक निर्णयों के लिये इस टोली में राजनैतिक व्यक्ति ही हो सकतें हैं । अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राजनैतिक व्यक्ति तो हैं नहीं , इस लिये वे सोनिया गान्धी की निर्णय लेने में सक्षम टीम का हिस्सा नहीं हो सकते । उनको केवल निर्णय पर हस्ताक्षर भर करने होते हैं और वे बेचारे पूरी ईमानदारी से ऐसा करते रहते हैं । विदेशी मूल के कारण सोनियागान्धी ख़ुद भी निर्णय नहीं ले सकती । इसलिये सारी ताक़त इस टोली के हाथ में आ जाती है , जिसमें कुछ नौकरशाह , व्यक्तिगत मित्र और कुछ राजनैतिक लोग हैं । इस समय सोनिया गान्धी की उस टोली में कौन कौन लोग हैं ? चीन की सेना की जो घुसपैठ हो रही है , उस पर भारतीय प्रतिक्रिया को समझने के लिये यह ज़रुरी है ।

इस टोली में सलमान खुर्शीद ़ ,ए.के.एंटोनी, ग़ुलाम नबी आज़ाद,अहमद पटेल , विसेंट जार्ज, शकील अहमद इत्यादि लोग शामिल हैं । यह सोनिया की किचन कैबीनट के लोग हैं और वे जो निर्णय ले सकते हैं ले रहे हैं । यही कारण है कि सलमान खुर्शीद चीन की सफाई देते हुये देश में घूम रहे हैं और उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है । चीन भी भारत में निर्णय के इस संकट को समझ ही रहा होगा ? इसलिये उसने दौलतपुर बेग में अब अपनी पाँचवीं ‘स्थानीय’चौकी स्थापित कर ली है और चौकियों की रक्षा के लिये चीनी कुत्ते भी लगा दिये हैं । भारत की सीमा के भीतर चीनी सैनिक और और चीनी कुत्ते दोनों ही भौंक रहे हैं और हमारे शेर सलमान खुर्शीद चीन के प्रधानमंत्री की अगवानी करने के लिये बीजिंग जाने के लिये नये कपड़े सिलवा रहें हैं ।

2 thoughts on “सलमान खुर्शीद किस देश के विदेश मंत्री हैं ?

  1. इस निकम्मी, भ्रष्ट,दिशाहीन, अलोकतांत्रिक सर्कार से देश के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए चीन से आँख में आँखें डालकर बात करने का साहस दिखने की अपेक्षा करना बहुत बड़ा काम है.इस सर्कार से किसी कठोर कार्यवाही के लिए कहना बेकार है.बेहतर होगा देश के अभी लोकसभा क्षेत्रों में सत्तारूढ़ मोर्चे के सांसदों के घरों का घेराव किया जाये और उन्हें इस बात के लिए मजबूर किया जाये की वो अपने दल के नेतृत्व को चीन के विरुद्ध सख्त जवाब देने के लिए बाध्य करें. उनके क्षेत्रों की जनता को भी बताया जाये की किस प्रकार सत्तारूढ़ मोर्चा देश की सीमाओं की सुरक्षा में लापरवाही कर रहा है. ऐसा न करके विपक्षी दल, विशेषकर भाजपा, भी अपने कर्त्तव्य का सही ढंग से निर्वाह नहीं कर रही है.याद करें किस प्रकार पचपन वर्ष पूर्व तत्कालीन जनसंघ ने बेरूवाडी के मुद्दे पर देश भर में जनजागरण किया था.

  2. लगता है खुर्शीद चीन और पाक के संयुक्त विदेश मंत्री हैं जो भारत से सम्बंदित मामलों को देखते हैं.यह जिम्मेदारी शायद खुद हो ओढ़ रखी है.यह तो सभी समझते हैं कि शक्तिशाली नेता के अभाव में ऐसे चापलूसों की बन आती है,तब ही तो कानून मंत्री के रूप में असफल व्यक्ति विदेशमंत्री जैसे पद पर पहुँच जाता है.सोनिया भी ऐसे ही सब लोगों से घिरी हुई है.यह देश का दुर्भाग्य है की हम आज एक ऐसे कॉकस से शासित हो रहें हैं जिसकी न तो विश्व राजनीती में कोई समझ है,और न कोई सोच.तब ही भारत को अब सब देशों से मात खानी पड़ रही है.चाहे वह इटली के नौसैनिकों का मामला हो या सर्वजीत का,चीन का हो या बांग्लादेश का.लंका का हो या पाक का.सब देश आज हमें ही आँखें दिखाते हैं,और हम गर्दन नीची कर चुप हो जाते हैं.चीन सीमा पार कर अन्दर आकर बैठ गया,और हम देखते रहे.पीऍम साहब कह रहे है की इस बात को इतना तूल देने की जरूरत नहीं ,विदेशमंत्री सैर सपाटे के लिए उसी चीन में जाने की बात कह रहें हैं.क्यों न इसका बहिष्कार किया होता,क्यों न व्यापारिक सम्बन्ध बंद कर देते,तो चीन सीधा हो जाता. अब वह हमारे ही घर में घुस कर शर्तों पर वापस लौटने की बात करता है,देखते रहिये हम स्वीकार भी कर लेंगे,और अपनी भद्ध पिटवाते रहेंगे.

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