लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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अरुण कुमार सिंह 

भारत को आजाद हुए 64 वर्ष हो चुके हैं। हमें आजादी तो मिली पर एक बड़ा भू-भाग खोकर। पिफर भी भारतीयों ने सारे दुःख-दर्द को भूलकर आगे की सुध ली। यही कारण है कि भारतीयों ने आज दुनिया में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया है। भारतीय सपूतों ने कड़ी मेहनत और लगन से पूरे विश्व में अपनी विश्वसनीयता बनाई है, धाक जमाई है, प्रसिद्धि कमाई है और पैसा भी कमाया है। कई भारतीय कम्पनियों ने विदेशी कम्पनियों को खरीदा है। हवाई जहाज तक यहां बनने लगे हैं। प्रक्षेपास्त्रों की एक श्रृंखला खड़ी हो चुकी है। जिसके पास साइकिल थी, उसके पास मोटर साइकिल है। जिसके पास मोटर साइकिल थी, उसके पास कार है। जिस घर में पहले एक कार होती थी, उस घर में हर सदस्य के लिए अलग-अलग कारें हैं। जो हजारपति थे, वे लखपति हो गए हैं। जो लखपति थे, वे करोड़पति और करोड़पति अरबपति बन गए हैं।

वहीं दूसरी ओर कड़वा सच यह भी है कि देश के लगभग 70 प्रतिशत लोग केवल 20 रु. प्रतिदिन पर गुजर-बसर करने को मजबूर हैं। सेनगुप्ता आयोग की रपट के अनुसार, बेघरों की संख्या बढ़ रही है। बेरोजगारों की पफौज खड़ी है। गरीबी ऐसी है कि कुछ लोगों को अपने तन ढकने के लिए भी पर्याप्त कपड़े नहीं मिल रहे हैं। ऐसे लोगों को न तो स्वतंत्राता दिवस या गणतंत्रा दिवस से मतलब होता है और न उन्हें इन सबकी जानकारी होती है। ऐसे लोगों को यह भी नहीं पता कि स्वतंत्राता क्या होती है, और परतंत्राता किस चिड़िया का नाम है। इनकी दिनचर्या दो जून की रोटी का जुगाड़ करने तक ही सीमित है। ये लोग गोरे अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त तो हुए हैं, पर ‘काले अंग्रेजों’ के गुलाम अभी भी हैं। जब तक देश के समस्त संसाधनों का उपयोग सभी वर्गों के लिए उचित ढंग से नहीं होगा तब तक हमारी आजादी अधूरी है। शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा आदि सुविधाओं की ही बात ले लीजिए। कुछ अपवादों की बात छोड़ दें। क्या किसी गरीब का बच्चा पढ़ाई में तेज होते हुए भी आई.ए.एस., आई.पी.एस., डॉक्टर, इंजीनियर आदि बन सकता है? बिल्कुल नहीं। हां, समाज के कुछ सेवाभावी लोगों की सहायता से जरूर कुछ गरीब बच्चे सपफल हुए हैं। पर इन बच्चों के लिए सरकार ने क्या किया? एक इंजीनियर या डॉक्टर की पढ़ाई में लाखों रुपये खर्च होते हैं। किसी भी आई.आई.एम., जहां से वित्तीय विशेषज्ञ निकलते हैं, में एक साल की पफीस ढाई लाख रु. से कम नहीं है। इस हालत में भला एक गरीब आदमी अपने बच्चे को डॉक्टर, इंजीनियर या अर्थ विशेषज्ञ कैसे बना सकता है? जबकि जिनके पास धन है, उनके बच्चे देश ही नहीं, विदेश में पढ़ रहे हैं। जिस भारत को लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राज्य कहा जाता है, वहां सबका ‘कल्याण’ क्यों नहीं हो रहा है? सरकार यह क्यों नहीं सुनिश्चित कर रही है कि मेडिकल, इंजीनियरिंग आदि की प्रतियोगी परीक्षाओं में जितने भी विद्यार्थी सपफल होंगे उनकी आगे की पढ़ाई का खर्चा सरकार उठाएगी? कहने को तो सरकार उच्च शिक्षा के लिए बच्चों को शिक्षा-)ण उपलब्ध कराती है। किन्तु शिक्षा-)ण देते समय बैंक वाले ऐसे-ऐसे नियम बताते हैं कि उनमें एक गरीब आदमी कहीं नहीं टिकता है। जिस बच्चे को शिक्षा-)ण दिया जाता है उसके माता-पिता की पासबुक देखी जाती है कि लेन-देन का क्या स्तर रहता है? घर-मकान देखा जाता है। प्रतिमाह की आय देखी जाती है। इसके बाद ही शिक्षा-)ण स्वीकृत होता है। इस हालत में एक गरीब के होनहार बच्चे को शिक्षा )ण नहीं मिल पाता है। यदि किसी गरीब का प्रतिभाशाली बच्चा पैसे के अभाव में डॉक्टर, इंजीनियर नहीं बन सकता है, तो पिफर यह कैसी आजादी है?

चिकित्सा भी इतनी महंगी है कि एक गरीब बीमार आदमी इलाज के अभाव में दम तोड़ रहा है। सरकारी अस्पतालों में भी तरह-तरह की जांच के नाम पर पैसा जमा कराया जाता है। निजी अस्पतालों की ओर तो गरीब आदमी आंख उठाकर देख भी नहीं सकता है। यह कैसी आजादी है? देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित अस्पताल एम्स में हर राज्य से अमीर-गरीब हर तरह के लोग इलाज के लिए आते हैं। यहां कई ऐसी जांचें होती हैं, जिनके लिए मरीजों को पैसा जमा करना पड़ता है। गरीब से गरीब मरीज को भी कोई छूट नहीं मिलती है। किन्तु यहीं उन लोगों को इलाज के लिए कुछ नहीं देना पड़ता है, जो सरकार से मोटी तनख्वाह पाते हैं। यह कैसी आजादी है?

महंगाई बढ़ती है, तो सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों और संगठित क्षेत्रा में काम करने वालों को महंगाई भत्ता दिया जाता है। किन्तु मजदूरों, किसानों और इस तरह के अन्य लोगों को कोई महंगाई भत्ता नहीं मिलता है। ये लोग किस हालत में जीते हैं, इसकी भी सुध लेने वाला कोई नहीं है। यह कैसी आजादी है?

यह कहने में बहुत शर्म आती है कि आज की व्यवस्था से अच्छी व्यवस्था अंग्रेजों के समय थी। अंग्रेजों ने जो भवन, पुल, स्मारक आदि बनवाए थे, वे आज भी शान के साथ मजबूती से खड़े हैं। किन्तु आजादी के बाद बने भवन या पुल जर्जर घोषित हो चुके हैं। करोड़ों रु. से कोई फ्रलाइओवर बनता है और 5-7 साल में ढह जाता है। यह कैसी आजादी है, जिसमें लोग राष्ट्रहित से ज्यादा स्वहित को महत्व दे रहे हैं? चाहे नेता हों या अभिनेता, अमीर हों या गरीब, दुकानदार हों या ग्राहक – सभी अपने हित के लिए लड़-झगड़ रहे हैं, किन्तु कोई राष्ट्रहित के लिए नहीं लड़ रहा है।

नई पीढ़ी को शिक्षा तो ऐसी दी जा रही है कि वह काम करने वाली ‘मशीन’ बनती जा रही है। शिक्षा में न तो अपने संस्कार शामिल हैं, न अपनी परम्परा और न अपनी सदियों पुरानी संस्कृति, न ही वह आध्यात्मिकता, जो लोगों को सही-गलत का ज्ञान देती है, अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित करती है, और देशभक्ति का पाठ पढ़ाती है। इस कारण एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है, जिसमें संवेदनशीलता, धैर्यशीलता की कमी दिखने लगी है। कुछ बच्चे इतने असंवेदनशील हो रहे हैं कि उन्हें सिपर्फ और सिपर्फ अपनी सुविधाओं से मतलब है। घर में मां बीमार रहती है और ऐसे बच्चे उससे पूछते तक नहीं हैं कि मां तुम कैसी हो? हां, जब भूख लगेगी तो जोर-जोर से चिल्लाकर बीमार मां के कांपते हाथों को रोटी बनाने के लिए मजबूर कर देंगे। आज मैकाले यह महसूस कर अपनी कब्र में मुस्कुरा रहा होगा कि उसकी षड्यंत्राकारी शिक्षा नीति आज भारत में पूरी तरह हावी है। क्योंकि उस शिक्षा नीति के कारण कुछ भारतीय आज अपनी सदियों पुरानी संस्कृति को ‘दकियानूसी’ मानने लगे हैं।

रही-सही कसर भ्रष्टाचारियों और वोट बैंक की राजनीति ने पूरी कर दी है। गोरे अंग्रेजों के जाने के बाद इस देश को काले अंग्रेज जम कर लूट रहे हैं। लूट का पैसा विदेशी बैंकों में जमा कर रहे हैं। काम के समय काम नहीं करते हैं और चुनाव के समय ‘बांटो और राज करो’ की नीति पर चलकर वोट प्राप्त कर रहे हैं। इनकी नीतियों से देश भले ही कमजोर हो जाए, खंड-खंड हो जाए, पर इनका वोट और नोट का बैंक लबालब भरा रहे। यही इनकी नीति है। मजहब के नाम पर सरकारी नीतियां बनाई जा रही हैं। इस कारण ऐसी-ऐसी मांगें होने लगी हैं, जो 1947 से पूर्व होती थीं। और वे मांगें मानी भी जा रही हैं। इस कारण देश पिफर एक बार 1947 के दौर में पहुंचता दिख रहा है। क्या इन्हीं दिनों के लिए क्रांतिकारियों ने अपनी जान देकर भारत को 1000 वर्ष की गुलामी से मुक्त कराया था?

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