लेखक परिचय

राजीव गुप्ता

राजीव गुप्ता

बी. ए. ( इतिहास ) दिल्ली विश्वविद्यालय एवं एम. बी. ए. की डिग्रियां हासिल की। राजीव जी की इच्छा है विकसित भारत देखने की, ना केवल देखने की अपितु खुद के सहयोग से उसका हिस्सा बनने की। गलत उनसे बर्दाश्‍त नहीं होता। वो जब भी कुछ गलत देखते हैं तो बिना कुछ परवाह किए बगैर विरोध के स्‍वर मुखरित करते हैं।

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राजीव गुप्ता

मेरे पति को ईसाईयों ने जान से ख़त्म कर दिया क्योंकि वो ईसाई नहीं बने ! गोद में दुधमुहे बच्चे को लेकर सिसकते हुए अर्चना भार्गव जी जो कि छतीसगढ़ राज्य के विलासपुर जिले के परसापन गाँव से दिल्ली के लोक कला मंच ( नजदीक जवाहरलाल स्टेडियम ) , में ५-६ सितम्बर , २०११ को Forum for Social Justice , New Delhi द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम ” National Tribunal & Workshop on Evangelism : Impact of faith, Culture Economy & Life of Indigenous Tribes Of India ” में Jury जिसमे Sh. K. P. S. Gill, IPS ( Retd.) , Sh. P.C.Dogra , Former DGP, Punjab , Justice V. K. Gupta ( Retd.) , Justice Soni ( Retd.) , Justice D.S. Tevatia ( Retd.) , J. P. Rajkhowa ( Former Chief Secretary , Assam) आदि लगभग १५ सदस्य मौजूद थे , से अपनी व्यथा बताने के लिए आई थी ! जैसे उन्होंने पति के क़त्ल की बात बताई एक पल के लिया चारो तरफ सन्नाटा छा गया , मानो समय ठहर सा गया ! सिर्फ बच्चा जो उनकी गोद में था बस उसी के रोने की आवाज पूरे हाल में गूं ज रही थी ! शायद उस बच्चे ने इतने जलते हुए बल्ब की रोशनी और इतनी भीड़ पहली बार देखी थी इसलिए उसका लगातार रोना जारी रहा ! जूरी सदस्यों के पूछने पर उन्होंने आगे जो बताया वो और भी रोंगटे खड़े कर देने वाला था ! उन्होंने बताया कि उनके गाँव में लगभग दो तिहाई ईसाई आबादी है , लगभग ५ गिरजाघर ( चर्च ) है ! विधायक को कभी देखा नहीं इसलिए उनके बारे कुछ जानती नहीं परन्तु गाँव का सरपंच भी ईसाई ही है , पुलिस-प्रशासन भी उन्ही बहूल आबादी की ही अर्थात ईसाई समाज की ही सुनता है ! वो आगे बताती है कि पहले गाँव के लोगों को लालच देकर जैसे कम्बल , वर्तन, प्लेट, गद्दा, दवाई इत्यादि देकर ईसाई धर्म स्वीकार करने के लिए कहते है , न मानने पर जान से मारने की धमकी देते है , फिर भी न मानने पर वो जान से मार देते है बताते हुए फूट – फूट कर रोने लगती है !

वो प्रसव – पीड़ा के दर्द से चिल्ला रही थी , बार – बार अस्पताल ले जाने के लिए कह रही थी परन्तु वहाँ के स्थानीय लोगों ( ईसाई मतावलंबी ) ने जबरदस्ती उसे पास के ही चर्च में ले गए ! वहा के फादर ने उसे एक शीशी में कुछ यह कहकर दिया कि यह प्रभू यीशु का रक्त है इसे पीने पर उसे दर्द से मुक्ति मिल जायेगी ! और हुआ भी ऐसा ही उसे सदा के लिए इस दुनिया से ही मिक्ती मिल गयी , जब बुंदिया भाई तेजा जो कि गुजरात राज्य के दाहोद जिले के निवासी है ने यह बात जूरी को बताई तो वहा उपस्थित सभी लोगो का ह्रदय सिहर उठा ! बुंदिया भाई तेजा किसी निजी कंपनी में तीन हजार रूपये मासिक वेतन पर नौकरी करते है ! उन्होंने आगे आपबीती सुनायी कि किस प्रकार उन्हें वहां के फादर द्वारा एक मोटरसाईकिल , छः हजार रुपये मासिक की नौकरी का प्रलोभन दिया गया ! प्रलोभन के बहकावे जब धर्म परिवर्तन की बात उन्होंने नहीं मानी तो कुछ समय बाद घात लगाकर उन्हें जान से मारने के उद्देश्य से उनके सिर पर कुल्हाड़ी से वार किया गया ! संयोग से कुल्हाडी कान के पास लगी और वो जान बचाकर वहा से भागे तो जाकर उनकी जान बची , जूरी को घाव के निशान को दिखाते हुए बुंदिया भाई तेजा ने बताया ! वो आगे बताते है कि किस प्रकार चर्च के पादरी द्वारा हमारे देवी-देवताओं का अपमान जैसे उन्हें राक्षस , भूत-प्रेत आदि की संज्ञा देकर उन पर थूकते है तो वही अपने भगवान् को विश्व में शांति का दूत बताकर उन्हें धर्म बदलने के लिए उन पर दबाव डालते है !

ईसाई मिशनरियों द्वारा ईसाई न बनने पर किस प्रकार उनकी जबरदस्ती जमीन हड़प ली जाती है , उनके गाँव के गाँव जला दिए जाते है आदि आदि अपनी – अपनी व्यथा बताने के लिए देश भर के लगभग १०० जन – जातियों के लोग जूरी के सामने इकठ्ठा हुए थे !

मुझे अपने कानो पर विश्वास नहीं हो रहा था कि ये लोग आज भी अपने स्व – धर्म के लिए इतना अत्याचार सहते है ! एक पल के लिए मै इतिहास के पन्नो में खो गया , मुझे कभी उस छोटे से वीर बालक हकीकत राय की याद आती तो कभी मुगलिया क्रूर और अत्याचारी शासक औरंगजेब का ध्यान आता जिसकी वजह से धर्म की रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर और उनके दोनों बच्चे जोरावर सिंह और फ़तेह सिंह का बलिदान हुआ ! यह मैंने इतिहास की पुस्तकों में सिर्फ पढ़ा था परन्तु आज इनकी व्यथा इनकी जुबानी सुनते हुए महसूस भी कर रहा था ! इतिहास में तो पूरा मुग़ल कल उनके अत्याचओं से पटा पड़ा है !

महात्मा गांधी जी ने ( यंग इंडिया , २३ अप्रैल , १९३१ ) के अनुसार , ” मेरी राय में दया के कार्यों की आड़ में धर्म परिवर्तन करना अहितकर है ! देश के लोग इसे नाराजगी की दृष्टि से देखते है ! धर्म एक नितांत व्यक्तिगत मामला है ! अगर कोई डाक्टर मुझे किसी बीमारी से अच्छा कर दे तो इसकी एवज में मै अपना धर्म क्यों बदलूँ ? मेरे लिए यह समझ पाना मुश्किल है कि आखिर कोई डाक्टर मुझसे इस तरह की अपेक्षा ही क्यों रखे ? क्या डाक्टरी सेवा अपने आप में एक पारितोषिक प्रदायक वृत्ति नहीं है ? अगर मै किसी ईसाई शिक्षा संस्थान में शिक्षा ग्रहण कर रहा हूँ तो मुझ पर ईसाईयत क्यों थोपी जाय ?

महात्मा गांधी जी ( हरिजन , २० अप्रैल , १९४० ) कहते है कि ” धर्म – परिवर्तन ओ जहर है जो सत्य और व्यक्ति की जड़ों को खोखला कर देता है ! मिशनरियों के प्रभाव से हिन्दू परिवार की भाषा , वेशभूषा , रीतिरिवाज के द्वारा विघटन हुआ है ! यदि मुझे कानून बनाने का अधिकार होता तो मै धर्म – परिवर्तन बंद करवा देता ! इसे मिशनरियों ने एक व्यापर बना लिया है ! ” धर्म तो आत्मा की उन्नति का विषय है ! रोती , कपडा और मकान के बदले में उसे बेचा या बदला नहीं जा सकता और धर्म – परिवर्तन द्वारा ऊँच – नीच की भावना कभी दूर नहीं हो सकती ! ”

महात्मा गांधी ( गांधी वांग्मय , खंड ४५ , पेज ३३९ ) के अनुसार ” यदि वे पूरी तरह से मानवीय कार्यों तथा गरीबी की सेवा करने के बजाय डाक्टरी सहायता , शिक्षा आदि के द्वारा धर्म – परिवर्तन करेंगे तो मै निश्चित ही उन्हें चले जाने को कहूँगा ! प्रत्येक राष्ट्र का धर्म अन्य किसी राष्ट्र के धर्म के समान ही श्रेष्ठ है ! निश्चित ही भारत के धर्म यहाँ के लोगों के लिए पर्याप्त है ! हमें धर्म – परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं है !

तो क्या ऐसा मान लिया जाय कि आज गांधी जी की ये विचार प्रासंगिक नहीं रहे ? यदि ये प्रासंगिक है तो इन पर विचार क्यों नहीं किया गया ? ये वनवासी भाई ऐसी यातनाये सहने के लिए क्यों मजबूर है ?

आज २०११ में तो हम स्वतंत्र है ! हम लोकतान्त्रिक देश की श्रेणी में आते है , हमारा अपना संविधान है , हमारे मौलिक अधिकार है , धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार संविधान द्वारा हमें मिला हुआ है परन्तु जबरदस्ती धर्मांतरण का अधिकार ये कहा से आ गया जैसा कि उपरलिखित वाकयों से पता चलता है ( ईसाई मिशनरी धर्म – परिवर्तन को अपना अधिकार मानते है ) ? जबकि इन वनवासियों के अनुसार धन का बार – बार प्रलोभन इन्हें दिया जाता है , अमेरिका, इंग्लैण्ड, इटली , आस्ट्रेलिया आदि जगहों पर इन्हें बड़े बड़े सेमीनार में ले जाने के लिए प्रेरित किया जाता है , तो क्या ऐसा हो सकता है कि चर्च के इस षड्यंत्र के बारे भारत सरकार को न पता हो ? और अगर पता है तो उनके पैसों का हिसाब या उसकी देखरेख क्यों नहीं करते जबकि बाबा रामदेव , श्री अन्ना हजारे, श्री अरविन्द केजरीवाल इत्यादि के खातों की बराबर सी. बी. आई . / अन्य एजेंसियों द्वारा जाँच कराई जा रही है ? अरुणाचल राज्य के एक वनवासी ने यहाँ तक बताया कि वो भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री , और राज्य के मुख्यमंत्री से भी मिलकर इस विषय पर हस्तक्षेप करने के लिए प्रार्थना की है , परन्तु अभी तक किसी ने सुध भी नहीं ली ! इसलिए तो मै सोच ही नहीं पा रहा हूँ कि क्या स्वतंत्र भारत में ऐसा भी होता है ?

१६ अगस्त २०११ से लेकर २७ अगस्त २०११ , श्री अन्ना हजारे के नेतृत्व में व्यवस्था परिवर्तन और भ्रष्टाचार की मुक्ति की बात देश भर में सड़क से लेकर संसद तक की गयी , परन्तु क्या कभी किसी ने इन वनवासियों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ कोई अनशन या धरना प्रदर्शन इत्यादि किया ? क्या ये हमारे देश का हिस्सा नहीं है ? कभी इस षड्यंत्र की तरफ क्यों नहीं ध्यान दिया गया ?

काश मेरे इन सवालों का जबाब मिल पाता …….!

15 Responses to “क्या स्वतंत्र भारत में ऐसा भी होता है….?”

  1. Ajay Kumar Mishra

    नेहरु , मौन्त्बतें , गाँधी एंड जिन्नाह का सच्चा इतिहास पर रौशनी आवश्यक है या नहीं .?.

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  2. आर. सिंह

    आर.सिंह

    इस सन्दर्भ में अपनी पहली टिप्पणी को आगे बढाते हुए मैं पूछना चाहता हूँ की छतीस गढ़ में यानि वहाँ जहाँ भारतीय जनता पार्टी का राज्य है,ऐसा होना कैसे संभव है ? फिर भी अगर ऐसा हो रहा है, तो क्या मैं इसका यह निष्कर्ष निकालूँ की यह सब वहां के शासक वर्ग की अनुमति के साथ हो रहा है?अगर ऐसा है तो फिर हो हल्ला मचाने से भी क्या होगा?

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  3. vimlesh

    राजीव जी आप किस मुगालते में है की आप आजाद है .
    पहले भी गुलाम थे और आज भी गुलाम हो बस समय समय का फेर है .
    पहले शक्ति से गुलाम बनाये गए आज नीति से गुलाम बनाये जा रहे हो .
    पहले भी जुल्म सहना प्रजा का धर्म था आज भी वाही है क्या बदल गया .
    पहले भी यही भारतीय विदेशियों के आगे दुम हिलाते थे उनके तलुए चाटते थे आज भी हम विदेशियों के सामने दुम हिला रहे है तलुए चाट चाट कर अपने आप को धन्य कर रहे है .

    धन्य थे पहले के गुलाम जो केवल शारीरिक श्रम की ही गुलामी करते थे .
    किन्तु आज के फैशन परश्त गुलाम मानशिक रूप से गुलामी कर रहे है .
    उसी मानशिक गुलामी की नाजायज पैदाईश का नाम है “क्रिश्चयन ”

    सुकर मनाईये की ये नाजायज औलादे अभी आपके आस पास नहीं है अन्यथा लेख लिखने की बजाय आप भी इसी तरह किसी ज्यूरी के सामने खड़े हो कर रिरिया रहे होते .

    धन्यवाद

    उत्तिष्ठ कौन्तेय

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  4. Sunil gupta

    वाकई इन दिनों छत्तीसगढ़ में धर्मपरिवर्तन का कार्य बड़ी तेजी से उभरा है और इस कार्य में सम दम दंड भेद सब तरीके इस्तेमाल किये जा रहे है जबकि धर्म तो स्वेच्छा का मुद्दा होना चाहिए. हलाकि शायद हमें भी आत्म मंथन करना होगा की आखिर हमारी क्या कमी है. इस विडम्बना के लिए शायद हम सब भी कही न कही जिम्मेदार है. यह वाकई दुखद पहलू है किसी भी धर्म के आधारभूत सिद्धांत के खिलाफ. ऐसे कार्य करने वालो के खिलाफ कड़ी करवाई की जनि चाहिए.

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  5. shikha varshney

    बेहद शर्मनाक और अफसोसजनक स्थिति.क्या वाकई हम स्वतंत्र हो चुके हैं.?देश में कुकुरमुत्तों की तरह खुलते हुए कोवेंट स्कूल और उनके प्रति जनता का क्रेज क्या इसी उद्देश्य से नहीं हो सकता?

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  6. आर. सिंह

    R.singh

    यह कहानी दर्दनाक है.इसतरह के कृत्यों की जितनी भ्रतष्णा की जाये वह कम है,पर लेख के अंतिम अनुच्छेद में जो निष्कर्ष है,उससे मैं सहमत नहीं हूँ.देश के क़ानून के अनुसार जबरदस्ती या प्रलोभन द्वारा धर्म परिवर्तन कराना जुर्म है.फिर भी वैसा हो रहाहै.किसीने सोचने का कष्ट किया की ऐसा क्यों है?यह हमारी भ्रष्ट व्यवस्था है जो इन सबको बढावा दे रही है.जब तक इसपर आघात नहीं होगा छिटपुट कुछ करने से किसी का भला नहीं होगा.अन्ना का आन्दोलन भ्रष्ट व्यवस्था के जड़ पर आक्रमण करता है,जिसको कुछ लोग तो वाकई समझ नहीं पा रहे हैं,पर उसके विरुद्ध में बोलने वाले अधिकतर वे हैं,जो इस व्यवस्था से लाभान्वित हैं और इसमे कोई परिवर्तन नहीं चाहते.कुछ ऐसे उत्साही भी अवश्य हैं जो आनन फानन सबकुछ बदल डालना चाहते हैं.उन उत्साहियों से मेरा केवल यही अनुरोध है की यह लड़ाई इतनी आसान नहीं हैऔर न इसका परिणाम इतनी जल्दी निकलने वाला है.आवश्यकता हर स्तर पर अपनी मानसिकता बदलने की और परिवर्तन के लिए निष्काम भाव से प्रयत्न करने की. अभी तक का प्रयत्न तो उस दिशा में एक सशक्त कदम मात्र है.अभी बहुत अडचने पार करनी है तब शायद इस अंधेरी रात के पार सुबह का उजाला दिखे…

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  7. SANJAY SINGH

    दुर्भाग्य से सत्ताधारियों की तुष्टीकरण नीति के कारण हिन्दू अपने ही देश में दोयम दर्ज़े का नागरिक बन गया है। हिन्दुओं की सहिष्णुता की सद्‌गुण विकृति भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। यह बात स्वयंसिद्ध है कि देश के जिस भाग में हिन्दू अल्पसंख्यक हुआ, वह भाग देश से ही कट गया या कटने की तैयारी कर रहा है। हिन्दुओं के अपनी कुरीतियां दूर कर संगठित होने पर ये सारे कष्ट अपने आप समाप्त हो जाएंगे।बहुत ही मार्मिक लेख है, हमारी निकम्मी सरकार ऐसे मुद्दों पर ध्यान नहीं देगी वो तो राष्ट्रभक्तों को जेल भेजने और राष्ट्रवादी हिन्दुवों को सांप्रदायिक सिद्ध करने पर ही अपना सारा ध्यान केन्द्रित किये हुए है, लगता है ये तभी जागेंगे जब, हिन्दू आतंकवाद का भी व्यापक प्रचार प्रसार होगा, क्योंकि जब तक समस्या बहुत बड़ी नहीं हो जाती तब तक कोई भी सरकार उस पर ध्यान नहीं देती.

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  8. SURESH KULKARNI.

    रामराम, आपने बहुत अच्छा विषय सबके सामने लाया है. हिन्दू समाज जागृत होकर विचार करेगा तो, तब ऐसे प्रश्न पर उत्तर मिल सकता है. समाज जागृत हो इसकी आवश्यकता है.

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  9. Rajiv Tuli

    निश्चय ही ऐसे इसाई पादरियों के कुकृत्य सामने आने चाहियें आयोजकों को साधुवाद..

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  10. आर. सिंह

    R.Singh

    यह कहानी दर्दनाक है.इसतरह के कृत्यों की जितनी भ्रतष्णा की जाये वह कम है,पर लेख के अंतिम अनुच्छेद में जो निष्कर्ष है,उससे मैं सहमत नहीं हूँ.देश के क़ानून के अनुसार जबरदस्ती या प्रलोभन द्वारा धर्म परिवर्तन कराना जुर्म है.फिर भी वैसा हो रहाहै.किसीने सोचने का कष्ट किया की ऐसा क्यों है?यह हमारी भ्रष्ट व्यवस्था है जो इन सबको बढावा दे रही है.जब तक इसपर आघात नहीं होगा छिटपुट कुछ करने से किसी का भला नहीं होगा.अन्ना का आन्दोलन भ्रष्ट व्यवस्था के जड़ पर आक्रमण करता है,जिसको कुछ लोग तो वाकई समझ नहीं पा रहे हैं,पर उसके विरुद्ध में बोलने वाले अधिकतर वे हैं,जो इस व्यवस्था से लाभान्वित हैं और इसमे कोई परिवर्तन नहीं चाहते.कुछ ऐसे उत्साही भी अवश्य हैं जो आनन फानन सबकुछ बदल डालना चाहते हैं.उन उत्साहियों से मेरा केवल यही अनुरोध है की यह लड़ाई इतनी आसान नहीं हैऔर न इसका परिणाम इतनी जल्दी निकलने वाला है.आवश्यकता हर स्तर पर अपनी मानसिकता बदलने की और परिवर्तन के लिए निष्काम भाव से प्रयत्न करने की. अभी तक का प्रयत्न तो उस दिशा में एक सशक्त कदम मात्र है.अभी बहुत अडचने पार करनी है तब शायद इस अंधेरी रात के पार सुबह का उजाला दिखे.

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  11. ram naraaran suthar

    बहुत बहुत धन्यवाद सवंत्त्र भारत का कडवा सच

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  12. kaushalendra

    भा.ज.पा. शासित राज्यों में भी यदि यह स्थिति है तो चिंता का विषय है. सरकार को विचार करना चाहिए कि भारत को “हिन्दू-राष्ट्र” क्यों नहीं घोषित किया जाना चाहिए ? यह कैसा संप्रभुता संपन्न राष्ट्र है जो अपने देश के मूल धर्म के मानने वालों के जीवन की रक्षा करने में असमर्थ है ? यदि सरकार के पास न्यायिक शक्तियों या संविधान में पर्याप्त सक्षम धाराओं का अभाव है तो वह इन्हें बदलने की दृढ़ता और साहस का परिचय दे अन्यथा उसे इस देश के मूल नागरिकों, उनके धर्म और उनकी संस्कृति के साथ खिलवाड़ करने का कोई अधिकार नहीं है. यह सब कल दिल्ली में घटी बांग्ला देश की हूजी की पैशाचिक घटना के सन्दर्भ में और भी प्रासंगिक है.

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  13. विपिन किशोर सिन्हा

    दुर्भाग्य से सत्ताधारियों की तुष्टीकरण नीति के कारण हिन्दू अपने ही देश में दोयम दर्ज़े का नागरिक बन गया है। हिन्दुओं की सहिष्णुता की सद्‌गुण विकृति भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। यह बात स्वयंसिद्ध है कि देश के जिस भाग में हिन्दू अल्पसंख्यक हुआ, वह भाग देश से ही कट गया या कटने की तैयारी कर रहा है। हिन्दुओं के अपनी कुरीतियां दूर कर संगठित होने पर ये सारे कष्ट अपने आप समाप्त हो जाएंगे।

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  14. मुकेश चन्‍द्र मिश्र

    Mukesh Mishra

    बहुत ही मार्मिक लेख है, हमारी निकम्मी सरकार ऐसे मुद्दों पर ध्यान नहीं देगी वो तो राष्ट्रभक्तों को जेल भेजने और राष्ट्रवादी हिन्दुवों को सांप्रदायिक सिद्ध करने पर ही अपना सारा ध्यान केन्द्रित किये हुए है, लगता है ये तभी जागेंगे जब, हिन्दू आतंकवाद का भी व्यापक प्रचार प्रसार होगा, क्योंकि जब तक समस्या बहुत बड़ी नहीं हो जाती तब तक कोई भी सरकार उस पर ध्यान नहीं देती.

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