क्या रिश्तों से अपराध की परिभाषा बदल जाती है ?

-राजेन्द्र बंधु-

lawदिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में दिए गए एक फैसले के अनुसार पति द्वारा पत्नी का बलात्कार अपराध की श्रेणी में नहीं आता। एक युवती को नशीला पेय पिलाकर उससे विवाह करने और उसके साथ बलात्कार करने के 21 वर्षीय आरोपी युवक को अदालत द्वारा दोषमुक्त कर दिया। इस फैसले से कई विधिक और समाजशास्त्रीय सवाल खड़े हो गए हैं। क्या दिल्ली उच्च न्यायालय का यह फैसला इस सिद्धांत को प्रतिपादित करता है कि किसी भी अपराध की परिभाषा आरोपी और पीड़ित के रिश्‍ते पर निर्भर करती है? क्या किसी पुरूष द्वारा किसी महिला का उत्पीड़न इसलिए अपराध नहीं है, क्योंकि उनके बीच पति-पत्नी का रिश्‍ता है? बलात्कार और यौन संबंधों के अंतर को समझे बिना इस सिद्धांत को स्थापित करना महिलाओं के जीवन जीने के अधिकार को प्रभावित करता है।

यह स्पष्ट है कि पितृसत्तात्मक समाज में पुरूषों को महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा अधिकार है। पितृसत्ता आधारित परिवार में बचपन से ही पुरूषों को शासक या सत्ताधारी के रूप में विकसित किया जाता है। इस स्थिति में विवाह के बाद पति-पत्नि के बीच के संबंध बराबरी के न होकर एक शासक और शासित के रूप में स्थापित हो जाते हैं, जिसमें स्त्री को पुरूष प्रधान समाज द्वारा स्थापित मूल्यों का पालन करना होता है। जब महिलाएं शासित होने से इंकार करती है तो उनके उत्पीड़न का सिलसिला शुरू हो जाता हैं। किन्तु उनके उत्पीड़न को मात्र इसलिए जायज नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि वह विवाहित है और उत्पीड़न करने वाला उसका पति है। तब भला पति द्वारा पत्नी के बलात्कार को कैसे जायज ठहराया जा सकता?

दिल्ली उच्च न्यायालय का यह फैसला कुछ कानूनी कमियों का नतीजा है, जिसके लिए सरकार उत्तरदायी है। दरअसल भारतीय दण्ड संहिता में वैवाहिक बलात्कार जैसी कोई अवधारणा है ही नहीं। यद्यपि भारत की संसद द्वारा घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम सहित कई ऐसे कानून बनाएं, जो महिलाओं को हिंसा की दशा में सुरक्षा और न्याय प्रदान करते हैं। किन्तु कुछ मुद्दों पर कानूनी विसंगतियां महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और समता के लिए बाधक बनी हुई है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 के अनुसार 16 वर्ष से कम उम्र की पत्नी से किए बलात्कार को अपराध की श्रेणी में माना गया है। जबकि 16 वर्ष से अधिक उम्र की पत्नी के साथ बलात्कार को अपराध नहीं माना गया है। यहां यह सवाल सामने आता है कि जब 18 वर्ष को वयस्कता की उम्र माना जाता है तो उससे कम उम्र की पत्नी के साथ होने वाले बलात्कार को अपराध के रूप में क्यों नहीं देखा जाता? भारतीय दण्ड संहिता में धारा 376(ए) भी कानूनी विसंगतियों की ओर इंगित करती है। इसके अंतर्गत पति से अलग रह रही स्त्री के साथ बलात्कार करने वाले पति को सात साल की सजा का प्रावधान है, जबकि धारा 376 के अंतर्गत किसी भी बलात्कारी को आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। यानी तलाकशुदा या पति से अलग रह रही पत्नी का पति द्वारा बलात्कार को हमारा कानून कम गंभीर मानता है।

यह सरकार में बैठे लोगों की पितृसत्तात्मक विचारधारा का नतीजा है कि एक जैसे अपराध के लिए आरोपी और पीड़ित के बीच रिश्‍तो के आधार पर दण्ड की मात्रा अलग-अलग तय की गई है। इसके साथ ही सरकार ने वैवाहिक बलात्कार को मानने वाला कोई भी कानूनी प्रयास अब तक नहीं किया। दिल्ली में 16 दिसम्बर 2012 के निर्भया कांड के बाद जस्टिस वर्मा कमेटी ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई अनुशंसाएं की और उसके आधार पर सरकार द्वारा आपराधिक कानून (संशोधन) विधेयक पारित किया गया। जस्टिस वर्मा ने वैवाहिक दुष्कर्म को भी अपराध की श्रेणी में रखते हुए उसके लिए दण्ड की अनुशंसा की, किन्तु गृह मंत्रालय ने विधि आयोग की 172 वीं रिपोर्ट का हवाला देते हुए वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने से इंकार कर दिया।

यह स्पष्ट है कि घरेलू हिंसा महिलाओं के जीवन जीने के अधिकार में सबसे बड़ी बाधा है और उसके चलते उनका शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य, पोषण एवं सम्पत्ति का अधिकार प्रभावित होता है। भारत सरकार द्वारा घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम की में यौन हिंसा को शामिल तो किया गया है, किन्तु आईपीसी में वैवाहिक बलात्कार के लिए दण्ड का कोई प्रावधान न होने से महिला को समझौते के लिए विवश होना पड़ता है। यूनाईटेड नेशंस पापुलेशन फंड द्वारा किए गए शोध के अनुसार भारत 15 से 49 वर्ष की दो तिहाई से अधिक महिलाओं को पति द्वारा यौन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है।

यदि हम दुनिया के परिदृश्‍य पर नज़र डालें तो 52 देशों में वैवाहिक बलात्कार को अपराध मान गया है। इनमें अमेरिका के 18 राज्य और आस्ट्रेलिया के 3 राज्य शामिल है। साथ ही न्यूजीलैंड, कैनेडा, ईसराइल, फ्रांस, स्वीडन, डेनमार्क, नॉर्वे, सोवियत यूनियन, पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया में भी वैवाहिक बलात्कार को अपराध माना गया है और उसके लिए कठोर दण्ड का प्रावधान है।

आज जबकि हमारे प्रधानमंत्री भारत को दुनिया में तेजी से विकसित हो रहे देश के रूप में पहचान बनाने के लिए प्रयासरत हैं। भारत में विज्ञान, तकनीकी और व्यापार-व्यवसाय का विकास भी तेजी से हो रहा है, ऐसे में महिलाओं के मामले में पुरातन सोच से बाहर निकलना जरूरी है। देश और उसके नागरिक आर्थिक रूप से कितने ही सशक्त क्यों न हो, जब तब महिलाएं अपने घरों में सुरक्षित नहीं होगी, तब तक समस्त विकास बेमानी होगा। अतः वैवाहिक बलात्कार की सचाई को स्वीकार कर उसे कानूनी रूप देना सरकार का उत्तरदायित्व है।

1 thought on “क्या रिश्तों से अपराध की परिभाषा बदल जाती है ?

  1. परिभाषा कभी नहीं बदलती है :—– आज की अङ्ग्रेज़ी माध्यम से पढ़ी कुछ तथाकथित एडवांस महिलाओं ने पूरी भारतीय संस्कृति – विरासत को नेस्तनाबूद कर दिया है –Sudesh Malik जिनकी नहीं भागी है वो भी अच्छे हालात में नहीं हैं — पर शरम के मारे बोलते नहीं हैं — अंदर-अंदर घुट के आत्महत्या तक कर लेते हैं ??? — पाकिस्तान केवल सीमाओं पर युद्ध नहीं कर रहा है — पेट्रोडालर के सहारे अब वो हमारे घरों तक पहुँच गया है —- काश हिन्दुस्तानी महिलाएं समझ पातीं कि किस तरह बगदाद – काबुल के गुलाम बाज़ारों में उनकी पूर्वज महिला-पुरुषों को पूर्ण नग्न करके — एक -एक अंग की जांच – पड़ताल करके बेचा गया था और यही हाल रहा तो दस सालों के बाद फिर वही भयानक समय आने वाला है — आज भी क्वान्टम थ्योरी पर रिसर्च करने वाले डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह ( जो भारत का नाम ऊंचा कर सकते थे ) पटना के डीआईजी की बेटी (अपनी पत्नी) के कारण एम्स दिल्ली में विक्षिप्त पड़े हैं वो तथाकथित एडवांस महिला न तलाक देती है जिससे कि कोई अन्य गरीब महिला की सेवा से वे ठीक हो जाएँ न मदद में आती है ( पर सोशल मीडिया पर महिलाओं के हक में लंबी-लंबी हाँकने वाली और महिला समितियों की नेत्रियाँ चुप हैं ????? ) क्यों — रास्ता चाहिए – असम के आईएएस मुकेश कुमार – कानपुर के आईपीएस दास साहब –और अब डीएसपी राजपाल सिंह तथा दिल्ली के बिल्डर को पत्नी प्रताड़ना के कारण आत्महत्या करनी पड़ती है — एक जज की पत्नी सड़क पर अखबार बिछाकर ड्रामा कर रही है — याद कीजिए इतिहास को —- तराइन की दूसरी लड़ाई में मुहम्मद गौरी की पत्नी ईरान जाकर अपने अब्बा हुजूर की सारी फौज उनके मुख्य सिपहसालार के साथ गौरी की मदद में भेजवा दी थी 👌 दूसरी तरफ पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता अपने पिता जयचंद से मदद नहीं ला सकी थी ( संयोगिता को लाने में ही पृथ्वीराज के 12 सिपहसालार तथा नरनाह कान्ह – जिनके बराबर का योद्धा उस समय पूरे उरेसिया में नहीं था और तराइन की पहली लड़ाई में इन्होंने ही गौरी को बांधकर पृथ्वीराज के सामने ला पटका था वे शूरवीर भी मारे जा चुके थे ) फलत: महान सम्राट पृथ्वीराज के हारने के बाद संयोगिता और उनकी बेटियों को नग्न करके पूरी सुलतानी फौज के हवाले कर दिया गया था — क्या हुआ होगा सोचकर ही मन दहल जाता है 😂– कहाँ थे देवी – देवता — अमर शक्तियाँ ——– परंतु इन सब दुर्दशा के लिए आज की कुछ तथाकथित एडवांस महिलाएं तैयार हैं पर अपने पति का साथ देने को तैयार नहीं हैं ( गोंडा उत्तर प्रदेश में दो पुलिस की विधवाएँ स्थानीय लेखपाल-वकीलों से मिलकर 82 साल के दंपत्ति ( 9451838619 ) का जीना मुश्किल किए हैं जबकि उनके पति के जीवित रहते सब ठीक था, पति के मरने के बाद प्रतिदिन कचहरी में घूमना —- , आसपास के दबंग – अविवाहित सब उन महिलाओं के ही साथ हैं – क्यों मत पूछिएगा नहीं तो सच कहने के लिए मुझपर केस दायर हो जाएगा ) — हाय रे तकदीर 😴 विनाश काले विपरीत बुद्धि 👏👏👏 दूर की छोड़ो कश्मीर में क्या हुआ था तथाकथित एडवांस महिलाओं के साथ:—–संख्या कम होने की कीमत क्या कीमत चुकानी पड़ती है — इस लड़की से सुनिए :—-
    https://youtu.be/4pRJ0XZJSoo

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