क्या हंगामा ही सदन की नियति बन चुका है?

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तेलंगाना से लेकर जनलोकपाल, एससी-एसटी को आरक्षण, साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम विधेयक इत्यादि को लेकर संसद का काम लगातार छठवे दिन भी बाधित रहना यह बताता है कि पक्ष-विपक्ष के बीच की दूरी बढ़ती ही जा रही है। हाल ही में चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम जिस तरह कांग्रेस विरोधी रहे हैं; उससे कांग्रेस बैकफुट पर है| तमाम बड़े-छोटे राजनीतिक दल कांग्रेस की इस हालिया कमजोरी का फायदा उठाकर सदन में उसे आक्रामक होने का मौका नहीं दे रहे| फिर उपरोक्त विधेयकों को छोड़कर अन्य विधेयक भी कहीं न कहीं; किसी न किसी राजनीतिक दल के हितों पर कुठाराघात कर रहे हैं गोयाकि सभी को अपनी राजनीति की दुकान चलाना है फिर भले ही जनता की गाढ़ी कमाई जाए भाड़ में| चूंकि इसके आसार दूर-दूर तक नहीं हैं कि राजनीतिक दल स्वहितों की तिलांजलि देकर सदन की कारवाई सुचारु रूप से चलने देंगे अतः संभवतः आगे भी संसद में हंगामा होता रहेगा, ऐसा अनुमान है|  यूपीए २ के कार्यकाल में वैसे ही संसद अबाध गति से नहीं चल पाई है व किसी न किसी कारण से जनहित के मुद्दों पर राजनीतिक मुद्दे हावी हुए हैं| फिलहाल वर्तमान हंगामे की स्थिति को देखते हुए प्रतीत होता है कि इस बार का सत्र भी २जी स्पेक्ट्रम आवंटन में घपलेबाजी और कोयला आवंटन घोटाले के हंगामे की भांति बलि चढ़ जाएगा| हालांकि यह कहना मुश्किल है कि संसद का हंगामा कब समाप्त होगा किन्तु विपक्ष और खासतौर पर क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक पिपासा अतिरेक ही नज़र आती है| हां, इतना अवश्य है कि इन तमाम मुद्दों पर हंगामे से कुछ हासिल नहीं होने वाला है| थोडा पीछे पलटकर देखें तो २जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में जेपीसी की मांग पर एक पूरा सत्र बर्बाद हुआ था व अगले सत्र में सरकार विपक्ष की इस मांग पर राजी हुई थी कि घोटाले की जांच जेपीसी से करवाई जाए मगर देश के समक्ष २जी स्पेक्ट्रम आवंटन का सच न्यायपालिका द्वारा ही सामने आया था| ऐसा ही कुछ कोयला आवंटन घोटाले के मामले में भी हुआ था| फिर मनमोहन सरकार के ९ वर्षों के कार्यकाल में ९ बार बढ़ती मंहगाई पर संसद में हंगामा हुआ पर हर बार सार्थक नतीजा सिफर रहा| तब समझा जा सकता है कि संसद में होने वाले हंगामों से कितने मुद्दों की हकीकत सामने आ पाती है? वैसे भी मौजूदा राजनीतिक हालातों में किसी को यह उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए कि हंगामे आपको जनता के प्रति जवाबदेह बनाएंगे| केंद्र सरकार के कामकाज को लेकर सत्ता अपनी अहमियत खोती जा रही है और विपक्ष इसका अधिक से अधिक लाभ उठाना चाहता है|
इधर शुक्रवार को राज्यसभा में पेश हुआ लोकपाल बिल भी हंगामे की भेंट चढ़ गया| समाजवादी पार्टी किसी भी कीमत पर लोकपाल बिल का विरोध कर रही है| दरअसल मजबूत लोकपाल के जिस मुद्दे पर देश के जनमानस में उबाल आया था, समय के साथ उसकी धार कमजोर होती चली गई है और दिल्ली में हुए सामूहिक दुष्कर्म के मुद्दे पर उबले आक्रोश ने यह मुद्दा और इसकी गंभीरता को ही बिसरा दिया। अतः ऐसे समय में जनता भी लिकपाल बिल को लेकर गम्भीर नहीं है| अण्णा हज़ारे का रालेगण सिद्धि में हालिया अनशन भी इक्का-दुक्का समर्थकों को लेकर चल रहा है| खैर लोकपाल विधेयक का संशोधित मसौदा राज्यसभा में पेश हो चुका है, तो इसके स्वरूप की बजाए इसके पास होने के बारे में ही सोचा जाए। इतिहास गवाह है कि किसी भी विधेयक को कठोर प्रावधानों के साथ पास करवाने में कोई भी सरकार कामयाब नहीं हुई है। हां, समय के साथ ही उसमें संशोधनों द्वारा सुधार हुआ है। हालांकि इसकी भी सम्भावना बन रही है कि यदि लोकपाल विधेयक किसी तरह राज्यसभा से पास हो भी गया, तो इसे कोर्ट में चुनौती मिलेगी। इसकी प्रबल संभावना है, क्योंकि सरकार ने लोकपाल में कानूनी दांव-पेंचों के भंवर को डाला है। लोकपाल में धर्म के आधार पर आरक्षण का जो मसौदा सरकार ने तय किया है, वह संविधान सम्मत कदापि नहीं है और इसे निश्चित रूप से न्यायालय में चुनौती मिलेगी। यदि सरकार को लोकपाल में आरक्षण देना ही था, तो उसे चक्रीय प्रणाली के तहत इसका अनुमोदन करना चाहिए था, ताकि सभी को समान अवसर प्राप्त हों। तब हो सकता था कि सरकार को लोकपाल में आरक्षण के मुद्दे पर विपक्ष का इतना तीखा विरोध नहीं झेलना पड़ता। जहां तक विपक्षी पार्टियों के रुख का सवाल है, तो यह मुद्दा पुन: उठ सकता है कि लोकपाल के नाम पर केंद्र सरकार राज्यों में हस्तक्षेप कर सकती है, जबकि इसमें ऐसा कुछ नहीं है। इतनी आशंकाओं के मध्य, जबकि लोकपाल के गठन और उसके स्वरूप के बारे में संशय की स्थिति है, इसे कम से कम पास तो होने ही देना चाहिए, ताकि देश के समक्ष लोकपाल अस्तित्व में तो आए। सरकार को भी लोकपाल से जुड़े संभावित विवादों पर पहले से ही रणनीति बना लेनी चाहिए, ताकि इस कानून से जुड़ी जो भी भ्रांतियां या कानूनी दांव-पेंच हों, उन्हें दूर किया जा सके। इसलिए भी कि कमजोर ही सही, पर देश को लोकपाल नाम की संस्था मिल ही जाए। किन्तु लगता है कि हमारे माननीय संसद को न चलने देने का प्राण करके आये हैं| वे किसी भी जनहितैषी मुद्दे को सार्थक बहस की बजाये हंगामे को तहरीज दे रहे हैं| हालांकि इस हंगामे को लेकर कमोबेश सभी राजनीतिक दल निशाने पर हैं और जनता सभी को देख रही है| ऐसे में  जबकि सदन के हंगामे को लेकर सभी पार्टियां निशाने पर हैं तो उन्हें सदन की कार्रवाई सुचारू रूप से चलाकर संदेश देना चाहिए कि हमारा लोकतंत्र अभी इतना कमजोर नहीं हुआ कि किसी भी मुद्दे पर इसकी धज्जियां उड़ाई जाएं| सदन के क्षरण को रोकने की जिम्मेदारी ने केवल एक पार्टी की जवाबदेही है वरन इसे सामूहिक सहयोगात्मक रवैये से ही दूर किया जा सकता है| संसदीय लोकतंत्र के क्षरण दौर में सभी दलों की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि इसकी गरिमा बरकरार रखी जाए|
सिद्धार्थ शंकर गौतम 

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