प्रशांत किशोर के कथन का अर्थ यह भी तो है ?

निर्मल रानी

चुनावी रणनीतिकार एवं राजनैतिक परामर्शदाता के रूप में अपनी पहचान बना चुके प्रशांत किशोर कुछ दिनों पहले ही तब चर्चा में आये थे जब इसी वर्ष जुलाई के प्रथम सप्ताह में उन्होंने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी तथा  प्रियंका गांधी से मुलाक़ात की थी। उस समय यह क़यास लगाये जाने लगे थे कि कांग्रेस के इन सर्वोच्च नेताओं के साथ प्रशांत किशोर की मुलाक़ात किसी राज्य विशेष के लिए नहीं बल्क‍ि संभवतः किसी ”बड़ी रणनीति’ का हिस्सा भी हो सकती है। इसके अतिरिक्त यह अटकलें भी लगाई जाने लगीं थीं कि प्रशांत किशोर किसी भी समय कांग्रेस पार्टी में शामिल हो सकते हैं। यहां तक कि पार्टी  में उन्हें कोई महत्वपूर्ण पद दिये जाने की भी ख़बर आने लगी थी। ख़बर यह भी थी कि राहुल और प्रियंका तो प्रशांत किशोर को ‘ख़ास’ पद देने के लिये राज़ी हैं परन्तु पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को इस बात पर आपत्ति है। इसलिये अंतिम निर्णय सोनिया गांधी पर छोड़ दिया गया है। इसी दौरान नवज्योत सिंह सिद्धू को पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। कैप्टन अमरेंद्र सिंह को पंजाब के मुख्यमंत्री पद से हटाया गया  इसके फ़ौरन बाद  कैप्टन ने कांग्रेस को अलविदा कह दिया। उधर क्रन्तिकारी युवा नेता कन्हैया कुमार कांग्रेस में शामिल हुए। इसी के साथ ही लखीमपुर में किसानों पर भाजपाइयों द्वारा जीप चढ़ाये जाने के बाद गरमाई सियासत में प्रियंका गाँधी एक तेज़ तर्रार विपक्षी नेता के रूप में कूद पड़ीं। राजनैतिक विश्लेषक कांग्रेस में अचानक आई इस हलचल में कहीं न कहीं प्रशांत किशोर की ही भूमिका समझ रहे थे। हाँ,इन्हें विश्लेषकों के गले यह ज़रूर नहीं उतर पा रहा था कि बावजूद इसके कि प्रशांत किशोर, कैप्टन अमरेंद्र सिंह  के रणनीतिकार भी थे फिर भी कैप्टन कैसे कांग्रेस छोड़ गये ?                                                              अभी राजनैतिक फ़िज़ा में उपरोक्त चर्चायें हो ही रही थीं कि गत दिवस अचानक प्रशांत किशोर का एक नया वक्तव्य सामने आया जोकि कांग्रेस ही नहीं बल्कि पूरे विपक्ष को हतोत्साहित करने वाला भी है और आँखें खोलने का काम करने वाला भी। ग़ौरतलब है कि प्रशांत किशोर पश्चिम बंगाल के पिछले विधान सभा के चुनाव के दौरान ममता बनर्जी के रणनीतिकार व सलाहकार थे। भाजपा ने बंगाल फ़तेह करने के  लिये अपने सभी हथकंडे इस्तेमाल किये और बेपनाह पैसे भी ख़र्च किये। उसके बावजूद प्रशांत किशोर की रणनीति व ममता बनर्जी की लोकप्रियता ने भाजपा को धूल चटा दी। ख़बर है कि इस विजय से प्रभावित होकर ममता बनर्जी ने प्रशांत किशोर की संस्था आई पैक से अपना क़रार 2026 तक बढ़ा लिया है। और चूँकि उनका हौसला बुलंद है और अब उनकी नज़र दिल्ली के सिंहासन पर है इसलिये वे  बंगाल से बाहर भी अपने संगठन का विस्तार कर रही हैं। गोवा में फ़रवरी 2022 में  विधान सभा चुनाव  हैं और तृणमूल कांग्रेस 40 सीटों वाली गोवा में चुनाव लड़ने जा रही है। इसी सिलसिले में गत दिनों ममता बनर्जी ने गोवा में सभायें कीं और प्रशांत किशोर ने भी तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं को ‘गुरु मन्त्र ‘ दिये। इसी दौरान उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण बातें भी कहीं। प्रशांत ने कहा कि – ‘इस जाल में बिल्कुल  मत फंसिए कि लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नाराज़ हैं और उन्हें सत्ता से बाहर कर देंगे। हो सकता है लोग मोदी को सत्ता से बाहर कर भी दें,  लेकिन भाजपा अभी कहीं नहीं जा रही है। आपको इससे अगले कई दशकों तक लड़ना होगा। इस बयान के बाद उन्होंने ‘  एक अंग्रेज़ी अख़बार को दिए साक्षात्कार में कहा कि भाजपा भारतीय राजनीति में दशकों तक सत्ता के केंद्र में बनी रहेगी। उन्होंने राहुल गांधी के बारे में कहा कि वह जैसा समझते हैं वैसा होने वाला नहीं है। शायद उन्हें (राहुल गांधी को ) लगता है कि बस कुछ समय में लोग नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटा देंगे, लेकिन ऐसा नहीं है। प्रशांत किशोर ने आगे कहा कि जब तक आप मोदी की ताक़त का अंदाज़ा नहीं लगा लेते, आप उन्हें हराने के लिए कभी भी काउंटर नहीं कर पाएंगे । ज़्यादातर लोग उनकी ताक़त को समझने में समय नहीं लगा रहे हैं। जब तक आप यह ना समझ जाएं कि ऐसी कौन सी चीज़ है जो उन्हें लोकप्रिय बना रही है तब तक आप उनको काउंटर नहीं कर पाएंगे।                   
                    परन्तु प्रशांत किशोर के कथन को यदि मान भी लिया जाये तो क्या राहुल गाँधी या कांग्रेस ही अकेले इस स्थिति के लिये ज़िम्मेदार है ? प्रशांत किशोर जो कह रहे हैं वही  बातें अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा पहले कहते रहे हैं। कहने को तो ममता बनर्जी भी राष्ट्रीय विपक्षी एकता की बात करती रही हैं। परन्तु साथ  साथ कांग्रेस नेताओं को तोड़कर अपने साथ जोड़ने के अलावा गोवा के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश व पूर्वोत्तर के कई राज्यों में अपने दल का विस्तार भी कर रही हैं।ज़ाहिर है उनके इस क़दम से भी जहाँ कांग्रेस को नुक़सान होगा वहीँ इसका सीधा लाभ भाजपा को ही मिलेगा। इसी तरह धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वाले नितीश कुमार महज़ अपनी निजी महत्वाकांक्षा के लिये भाजपा की गोद में जा बैठे हैं। अखिलेश यादव को डर है कि कहीं कांग्रेस को साथ लेने से उनका जनाधार कम  न हो जाये और उनकी मुख्य मंत्री की कुर्सी खटाई में न पड़ जाये ,ओवैसी अपनी अलग डफ़ली बजा रहे हैं। लालू यादव को देश व लोकतंत्र बचाने से बड़ी चिंता अपनी राजनैतिक विरासत स्थापित करने की है। मायावती सिर्फ़ सत्ता के लिये कभी बहुजन तो कभी सर्वजन का राग अलापने लगती हैं।  भाजपा को मज़बूती प्रदान करने के यह सब कारण भी तो हैं ? इनके लिये अकेले राहुल गाँधी या कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराना क़तई मुनासिब नहीं। रशांत किशोर के कथन का अर्थ यह भी तो है कि लोकतंत्र,देश,संविधान तथा संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा करने लिये सभी धर्मनिरपेक्ष व तथाकथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियों को अपना व अपने दलों का निजी नफ़ा नुक़्सान सोचे बिना संगठित होने की ज़रुरत है।

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