जब व्यक्ति का विरोध बन जाता है -‘राष्ट्र का विरोध’

जब कांग्रेस के नेता या कांग्रेस समर्थक लोग प्रधानमंत्री श्री मोदी पर निशाना साधते हुए यह आरोप लगाते हैं कि किसी व्यक्ति विशेष का विरोध करना राष्ट्र का विरोध नहीं है तो कुछ अजीब सा लगता है । सचमुच किसी व्यक्ति का विरोध राष्ट्र का विरोध नहीं हो सकता ,परंतु जितना यह सच है उतना यह भी सच है कि कभी-कभी व्यक्ति का विरोध राष्ट्र का विरोध भी हो जाता है । यह तब और भी स्पष्ट हो जाता है जब किसी व्यक्ति का समर्थन करना राष्ट्र का समर्थन करने जैसा माना जाता है। जैसे कभी गांधी जी का विरोध या समर्थन करना राष्ट्र का विरोध या समर्थन करने जैसा माना जाता था ।हमारे क्रांतिकारियों के साथ इतिहास आज तक जिस अन्याय को करता चला आ रहा है , वह भी किसी व्यक्ति विशेष के विरोध या समर्थन करने के एक दुष्परिणाम के रूप में ही हमारे सामने है। कभी हमें बताया गया था कि पाकिस्तान बनाया जाना अनिवार्य हो गया है , इसलिए गांधी नेहरू जो भी निर्णय ले रहे हैं , उसके साथ जुट जाओ । उसी समय हमें बताया गया कि पाकिस्तान से आते जितने भी हिंदू रास्ते में मार दिए गए हैं , उन सबको भूल जाओ। फिर हमें बताया गया कि पाकिस्तान को तोड़कर हमने बांग्लादेश को अलग कर दिया है , इसे हमारी उपलब्धि के रूप में गीत गाकर दुनिया को सुनाओ। विभाजन के बारे में कांग्रेस और उनके नेताओं ने हमें बताया कि यह मजहब के नाम पर देश का किया गया बंटवारा नहीं है बल्कि कुछ उन्मादी लोगों के द्वारा करा दिया गया बंटवारा है। इसके बाद भी जब बंटवारे की आवाज कश्मीर और देश के दूसरे भागों से उसी मजहब के लोग उठाने लगे जो 1947 में पाकिस्तान लेकर गए थे तो उनके बारे में भी हमसे कहा गया कि यह कुछ ‘गुमराह नौजवानों’ की आवाज है , इससे मजहब का कोई लेना देना नहीं है। आतंकवाद को आर्थिक स्थिति से जोड़ कर दिखाने का मूर्खतापूर्ण कार्य किया गया और सारे देश को उसी मूर्खता के साथ मिलकर ताली बजाने के लिए प्रेरित किया गया।
जो लोग आज यह कहते हैं कि किसी व्यक्ति का विरोध करना राष्ट्र का विरोध नहीं है, उनसे यह भी पूछा जा सकता है कि क्या नेताओं की मूर्खताओं के साथ सहमति व्यक्त करते रहना ही राष्ट्रभक्ति है ? इन्हीं लोगों के आकाओं ने कभी धारा 370 संविधान में असंवैधानिक रूप से स्थापित कराई थी। उन्होंने ही संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द को स्थापित करवाया , उन्होंने ही अल्पसंख्यक शब्द को संविधान में स्थान दिया। इन्होंने ही मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड बनवाया , अल्पसंख्यक मंत्रालय बनवाया । भाषायी आधार पर प्रांतों के बंटवारे किये , सांप्रदायिक आधार पर जम्मू कश्मीर में जानबूझकर ऐसी स्थिति पैदा कीं कि वहां का मुख्यमंत्री मुसलमान ही बन सके। केरल के भीतर मुस्लिम बहुल जिले का नाम मल्लपुरम रखवाया । देश में जहां – जहां मुस्लिम बहुल आबादी होती गई वहां एसएसपी और डीएम भी मुसलमानों के मन माफिक नियुक्त किये।
देश और समाज को तोड़ने वाले इन सारे कामों का जब लोगों ने विरोध किया तो उस समय इस प्रकार का विरोध करने वाले लोगों को भी व्यक्ति का विरोधी न मानकर राष्ट्र का विरोधी मानने की मूर्खता की गई थी।
कांग्रेस के इन सारे ‘पापों’ का परिणाम यह हुआ कि देश तेजी के साथ ‘गजवा- ए- हिंद’ की ओर बढ़ने लगा । देश के भीतर रहकर जो लोग ‘मुगलिस्तान’ की बात कर रहे थे ,उन्हें ‘अच्छा खाद पानी’ मिलने लगा। परिणाम स्वरूप जनसंख्या को तेजी से बढ़ाने के लिए एक वर्ग विशेष ने विशेष मेहनत की । जिससे जनसांख्यिकीय आंकड़ा बिगाड़ कर देश को ‘गजवा ए हिंद’ में परिवर्तित किया जा सके।
, बहुत बड़ी क्षति उठाकर देश के हिंदू में कुछ राजनीतिक जागृति आई । उसे अनुभव हुआ कि 1947 की बीमारी देश में फिर से बड़ी तेजी से फैलती जा रही है । देश कभी भी टुकड़े-टुकड़े हो सकता है , इतना ही नहीं उसे यह भी आभास हो गया कि इस बार टुकड़े नहीं होंगे , बल्कि सारे हिंदुस्तान को मुगलिस्तान में बदल दिया जाएगा । ‘हिंदू’ की उस ‘राजनीतिक जागृति’ का परिणाम केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार है । इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि कांग्रेस के पापों ने देर से ही सही पर हिंदू को जगा दिया और ‘मुगलिस्तान’ व ‘गजवा ए हिंद’ की योजनाओं को साकार करने में लगे लोगों के नित्य प्रति के बढ़ते जा रहे अत्याचारों ने हिंदू को ‘एक’ होने की प्रेरणा दी । जिसने देश में ‘राजनीतिक क्रांति’ पैदा कर 2014 में सत्ता मोदी के हाथों में दे दी।
, आज केंद्र की मोदी सरकार जो भी राष्ट्रवादी निर्णय ले रही है या कांग्रेस के शासनकाल में बोई गई राष्ट्रघाती फसल को काटने का जितना भी प्रयास कर रही है , उस पर यदि देश के राष्ट्रवादी लोगों की सहमति और स्वीकृति प्रधानमंत्री मोदी के साथ जाती है तो यह किसी व्यक्ति का समर्थन न होकर सचमुच राष्ट्र का समर्थन करना है । क्योंकि राष्ट्रहित के दृष्टिगत ही कई बार हिन्दू महासभा जैसे राजनीतिक दल भी प्रधानमंत्री मोदी के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं जिनका मौलिक विरोध भारतीय जनता पार्टी से है। ऐसे में राष्ट्र हित में लिए जा रहे निर्णय का विरोध करना राष्ट्र का विरोध करने के समान ही माना जाना चाहिए।
हमें ध्यान रखना चाहिए कि कांग्रेसी शासन काल में देश को – “ चुपचाप “ इस्लामिक देश बनाने की तैयारी थी। कांग्रेस को ‘इस्लामिक राष्ट्र’ तो स्वीकार था परंतु ‘हिंदू राष्ट्र’ कभी स्वीकार नहीं हो सकता। इसका कारण यह है कि कांग्रेस के नेता गांधी और नेहरू का चिंतन इस्लामपरस्त था। यही कारण था कि पूर्व प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई ने , अपनी किताब ” मेरा जीवन वृतांत ” में पृष्ठ संख्या 456 पर लिखा है , कि :- पता नही क्यों ? नेहरु को – “ हिन्दू धर्म “ के प्रति – एक “ पूर्वाग्रह “था।
नेहरु ने – “ हिन्दुओं को दोयम नागरिक “बनाने के लिए – “ हिन्दू कोड बिल ” लाने की बड़ी कोशिश की थी .., लेकिन – “ सरदार पटेल “ ने नेहरु को चेतावनी देते हुए कहा था कि :- यदि मेरे जीते जी .., आपने – “ हिन्दू कोड बिल “ के बारे में सोचा ., तो मैं – “ कांग्रेस “ से “ इस्तीफ़ा “ दे दूंगा … और – इस बिल के “ खिलाफ “ सड़कों पर -” हिन्दुओं “ को लेकर उतर जाऊँगा .., फिर पटेल की धमकी से – नेहरु जी “ डर “ गये थे … और उन्होंने सरदार पटेल जी के “ देहांत “ के बाद – “ हिन्दू कोड बिल “ संसद में पास किया था ! इस बिल पर चर्चा के दौरान आचार्य जेबी कृपलानी ने – “ नेहरु “ को “ कौमवादी “और“ मुस्लिम परस्त “कहा था ! उन्होंने कहा था कि :- आप – “ हिन्दुओं को धोखा “ देने के लिए ही – “ जनेऊ “ पहनते हो .., वरना – आपमें ” हिन्दुओं ” वाली -” कोई बात “ नहीं है … यदि आप – सच में -“ धर्म निरपेक्ष ”होते तो – “ हिन्दू कोड बिल “ के बजाय – सभी धर्मो के लिए “ कामन कोड “ बिल लाते ।
जिन नेहरू को जे.बी. कृपलानी ने भरी संसद में इस प्रकार लताड़ा था वही नेहरू था देश के लिए ‘कश्मीर समस्या’ को बो कर गया । यह समस्या को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाने वाले नेहरू जी ही थे। 1962 में देश को चीन के हाथों पराजित करवाने वाले भी नेहरू थे। चीन को सारे भेद बताकर और उसकी मित्रता के झूठे भ्रम में फंसकर उस समय नेहरू ने पूर्णतया ‘अपरिपक्व राजनीतिज्ञ’ का परिचय दिया था। आज जब उनके इन राष्ट्रविरोधी कार्यो की चर्चा होती है तो कई लोगों को अनावश्यक ही मिर्ची लगती है। पूरे देश को आज कांग्रेसी नेतृत्व की मूर्खताओं का परिणाम भुगतना पड़ रहा है । देश की व्यवस्था को जिस प्रकार शीर्षासन करा कर उल्टा किया गया , उसे सीधा करने में पूरे राष्ट्र को कड़ा परिश्रम करना पड़ रहा है।
ऐसे में हम सबका उद्देश्य एक ही होना चाहिए कि राष्ट्रहित में कार्य करने वाले लोगों का समर्थन किया जाए , राष्ट्रवादी सोच को बढ़ावा दिया जाए ,भारतीय धर्म व संस्कृति के प्रति समर्पित राजनीतिक शक्तियों व संगठनों को साथ लेकर राष्ट्र निर्माण के कार्य में जुटा जाए और जो राजनीतिक दल व संगठन ऐसे कार्यों का विरोध करें ,उन्हें राष्ट्र विरोधी घोषित किया जाए।

राकेश कुमार आर्य

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