रिश्ते कब और क्यों स्थाई या अस्थाई होते है

“दो व्यक्तियों में रिश्ता तभी लंबे समय तक टिकता है, जब दोनों के विचार समान हों, और दोनों की रिश्ता बनाए रखने की इच्छा हो।”

उदाहरण के लिए, दो भाइयों में, दो बहनों में, भाई और बहन में, पति और पत्नी में, अथवा दो मित्रों में, तभी तक रिश्ता बना रहता है, जब तक दोनों में रिश्ता बनाए रखने की इच्छा हो, तथा दोनों के विचार भी मिलते हों।

यदि दो में से एक व्यक्ति की इच्छा तो रिश्ता बनाए रखने की हो, और दूसरे की न हो, तो ऐसी स्थिति में वह रिश्ता जबरदस्ती थोड़े ही दिन चल पाता है। “जिसकी रिश्ता रखने की इच्छा नहीं है, कुछ दिनों बाद वह व्यक्ति थक जाता है। और फिर कुछ और दिनों बाद वह रिश्ता/संबंध टूट जाता है।”

ऐसा क्यों होता है? इसका कारण है, कि “संसार में किन्हीं भी दो व्यक्तियों के विचार १००% तो मिलते नहीं। फिर जब दो व्यक्तियों के अधिकतर विचार एक समान होते हैं, अर्थात ७०/८० % मिलते जुलते होते हैं, तब उन दोनों से एक दूसरे को इतना ही अर्थात ७०/८०/% सुख मिलता है। जब दो व्यक्तियों को परस्पर एक दूसरे से सुख मिलता है, तभी उनमें रिश्ता बनता और टिकता है।” “क्योंकि सभी लोग सुख चाहते हैं। दु:ख को कोई भी नहीं चाहता। वे लोग आपस में ७०/८०/% सुख लेते देते रहते हैं। और २०/३०% दु:ख सहन कर लेते हैं, तो रिश्ता बना रहता है।”

और जब दो व्यक्तियों के परस्पर विचार नहीं मिलते, उनमें टकराव होता है, या टकराव बढ़ जाता है, तब उन्हें एक दूसरे से सुख भी नहीं मिलता। “जब एक दूसरे से सुख नहीं मिलता, तो परस्पर प्रेम, आकर्षण, श्रद्धा, समर्पण भी धीरे-धीरे कम होने लगता है। और कम होते होते ०१ दिन समाप्त हो जाता है। जब प्रेम, आकर्षण श्रद्धा, समर्पण समाप्त हो जाता है, तब फिर वह रिश्ता/संबंध टूट जाता है।”

यह स्थिति कभी-कभी दोनों ओर से होती है, अर्थात दोनों में दोष होते हैं, या कमियां होती हैं। “उन दोषों या कमियों के कारण से परस्पर प्रेम हट जाता है, और संबंध टूट जाता है। कभी-कभी यह स्थिति एक तरफ से भी होती है।”

उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति में गुण अधिक हैं, और दोष कम हैं। दूसरे व्यक्ति में दोष अधिक हैं, और गुण कम हैं। पहले पहले जब नया परिचय था, तब कुछ गुण दिखाई देने के कारण उनमें मित्रता हो गई। धीरे-धीरे जब दोषों का पता चलने लगा, तो दूसरे व्यक्ति को उसके दोषों से हानि परेशानी होने लगी, और दुख मिलने लगे। परिणाम यह हुआ, कि उसकी रुचि धीरे-धीरे घटने लगी। तो उसने उसे सहयोग देना भी कम कर दिया। “परंतु जो अधिक दोषी व्यक्ति था, उसे तो उस गुणवान व्यक्ति से लाभ हो ही रहा था। वह उस लाभ को क्यों खोना चाहेगा? वह चाहता था, कि मेरा संबंध बना रहे, और मुझे लाभ मिलता रहे।” परंतु मनोविज्ञान की बात है, कि दूसरा व्यक्ति उसके दोषों से दुखी होकर उससे संबंध नहीं रखना चाहेगा।

“फिर कभी ऐसा भी होता है, कि परिवार के लोग या समाज के लोग उस पर दबाव डालें, कि तुम इससे संबंध मत तोड़ो, बनाए रखो। ऐसी स्थिति में वह जबरदस्ती रिश्ता कब तक बना कर रखेगा? आखिर एक दिन रिश्ता टूट जाएगा।”

इसलिए ऐसी परिस्थिति आने से पहले ही सावधान रहें। “दोनों या जिसमें दोष हो, वह व्यक्ति अपने दोषों को दूर करें, और अपने अंदर उत्तम गुणों का विकास करें। जिससे कि संबंध लंबे समय तक, या जीवन भर भी टिका रहे।”

“जब कोई व्यक्ति दूसरे से बहुत दुखी हो जाए, तो प्रश्न उठता है कि उस समय क्या वह व्यक्ति जबरदस्ती रिश्ता चलाए रखे, या तोड़ डाले? तो इस प्रश्न का उत्तर है कि, ऐसी स्थिति में रिश्ता तोड़ देना ही अधिक अच्छा है। जबरदस्ती निभाए जाने वाले रिश्ते में अनेक बार व्यक्ति पागल हो जाता है, और वह कुछ भी गलत कदम उठा सकता है, जो कि अधिक हानिकारक होता है। इसलिए अधिक अच्छा यही है, कि वह रिश्ता तोड़कर अकेला रहे। तब भले ही उसे जीवन भर अकेले जीना पड़े, तो भी इस परिस्थिति में वह अपेक्षाकृत अधिक सुखी होगा और स्वाभिमान पूर्वक जीवन जीएगा। बजाए इसके कि, जबरदस्ती दूसरों के दबाव से रिश्ता जैसे तैसे निभाता रहे, और दुखी होता रहे।”

“हां, रिश्ता तोड़ने से पहले इतना जरूर सोच लेवे, कि उसके बिना मैं अपना जीवन ठीक-ठाक जी लूंगा या नहीं? यदि अकेला न जी सकता हो, तो जैसे तैसे रिश्ता निभाना पड़ेगा। तब रिश्ता न तोड़ना ठीक है।”

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