कर के वे प्रगति अग्रगति आत्म कब लिये !

कर के वे प्रगति अग्रगति, आत्म कब लिये;
उर लोक की कला के दर्श, कहाँ हैं किये !

वे अग्रबुद्ध्या मन की झलक, पलक कब रचे;
नेत्रों से मन्त्र छिड़के कहाँ, विश्वमय हुए !
है द्रष्ट कहाँ इष्ट भाव, भास्वरी भुवन;
कण-कण की माधुरी का रास, भाया कब नयन !

कर के सकाश चिदाकाश, चूर्ण चित विहँस;
ब्रह्माण्ड गोद ले के सहसा, सुलाया कहाँ !
अगणित अखण्ड ब्रह्म पिण्ड, सदाशिव हिये;
जब नृत्य करें भूमा जिए, ‘मधु’ घृत पियें !

रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’

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