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    जब महात्मा गांधी ने सजा के दरम्यान 18 दिन हरिजन सेवा करते मध्यप्रदेश में गुजारे

                                                                    आत्माराम यादव पीव

                    12 मार्च 1930 को गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू किया तो देश में स्वदेश प्रेम और नेतिक आदर्शवाद की भावना का ज्वार आ गया किन्तु लम्बा खिचने के कारण जनता का लगाव इससे कम होने लगा। भारत की जनता के समक्ष एक लड़ाई अस्पृश्यता के विरूद्ध धार्मिक आन्दोलन का स्वरूप दिये जाने की थी तो दूसरी आजादी के लिये अंग्रेजी शासन के खिलाफ कभी न खत्म होने वाला संघर्ष था। वाईसराय ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन को पूर्णतया असंवैधानिक करार देते हुये इसे बंद कराने या इसपर समझौता करने सहित किसी भी तरह की बातचीत को तैयार नहीं हुये तब गांधीजी ने इसे अंग्रेजी सरकार के समक्ष उनकी नजर में इस सम्पूर्ण आन्दोलन को असम्मानजनक ठहराने और आत्मसमपर्ण करने की कुचेष्टा समझा जिसे वे स्वीकारने को राजी नहीं हुये तथा अँग्रेजी हुक्मरानों को स्पष्ट जबाव दिया कि ‘’मैं मिट्टी में मिल जाऊॅगा पर आत्मसमपर्ण नहीं करूंगा‘’ उन्होंने इस आन्दोलन को जनता का पूर्ण सहयोग न मिलने का कारण बतलाकर अपनी हार न स्वीकारने वाले अंग्रेजों को व्यक्तिगत अवज्ञा एक अजेय शक्ति है सिद्ध करने के लिये के 1 अगस्त से नये रूप में सविनय अवज्ञा आन्दोलन की घोषणा की किन्तु घोषणा के तुरन्त बाद 31 जुलाई  को आधी रात के समय उन्हें गिरफ्तार कर यरवदा जेल पहुंचा दिया गया और उनपर वंदिश लगा दी कि वे पूना शहर की म्युनिसिपल सीमाओं के भीतर ही रहे और सविनय अवज्ञा आन्दोलन में हिस्सा न ले। सम्पूर्ण यात्राओं ओर प्रस्तुत वस्तुस्थिति को गांधी वाड्मय मे देखा जा सकता है जिसके अनुसार इस वंदिश को न मानने पर महात्मा गांधी को 4 अगस्त 1933 को न्यायालय में पेश किया गया  जहां उन्हें एक वर्ष के लिये सजा सुनाई गयी। गांधी जी ने अंग्रेजी हुकुमत से जेल में सजा के दरम्यान हरिजन सेवा करने की मांग करते हुये पूर्ववत सुविधायें उपलब्ध कराने को कहा जिसे अस्वीकार करते हुये उन्हें सॅख्त हिदायत दे दी गयी कि वे पहले की तरह राज्य के कैदी नही बल्कि एक दण्डित कैदी है जिसपर गांधी जी ने 16 अगस्त दोपहर में अनिश्चितकालीन अनशन शुरू कर दिया तब उनके स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ा और उनकी शारीरिक स्थिति बिगड़ने पर 23 अगस्त को उन्हें बिना शर्त रिहा कर अस्पताल में भर्ती कर दिया गया।

           अस्पताल में गांधीजी की तबियत ज्यादा बिगड़ गयी और उन्हें लगा जैसे वे अब मृत्यु से नहीं बच पायेंगे। उनके पास जो भी था तब उन्होंने लोगों को बाँट दिया। अस्पताल से कुछ स्वस्थ्य होने के बाद वे पूना पर्णकुटी ले जाये गये। स्वस्थ्य होने पर उन्होंने एक साल की कैद की सजा को ध्यान में रखते हुये उसकी मियाद पूरी होने तक अपने आप को एक कैदी ही मानने और पूरी ईमानदारी के साथ किसी भी राजनीतिक कार्य से दूर रहकर अस्पृश्यता का दंश झेल रहे हरिजन भाईयों की सेवा करने के अपने संकल्प के अनुसरण करने का निर्णय सुना दिया ओर  अपनी यात्रा की तैयारी शुरू की। जिसके तहत 16 सितम्बर 1933 से 15 जनवरी 1934 तक उन्होंने हरिजनों के हितार्थ अपना तूफानी दौरा मध्यभारत, आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, मैसूर और केरल के लिये चुना। यात्रा के इस पड़ाव में वे 22 नवम्बर से 9 दिसम्बर 1933 तक 18 दिनों तक लगायत मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों में रहे और शेष दिनों में दूसरे प्रान्तों की यात्रायें की। गांधी जी की मध्यप्रदेश में यह 7वीं यात्रा थी इसके पूर्व वे 6 बार प्रदेश के विभिन्न नगरों में दौरा कर चुके थे इसलिये मध्यप्रदेश उनके लिये अन्जान नहीं रहा था।

                    महात्मा गांधी  की मध्यप्रदेश यात्रा का पहला पड़ाव 22 नवम्बर को उनके दुर्ग आगमन से शुरू हुआ जहां  वे सबसे पहले एक मेहतर के घर पहुचे जहां साफ-सफाई अभियान की शुरूआत करके वे नगरपालिका विद्यालय, आर्य समाजकन्या विद्यालय, खादी केन्द्र होते हुये हरिजन बस्ती में सभाओं को सम्बोधित करने के बाद हरिजन बस्ती में एक सार्वजनिक सभा में शामिल होकर कुमहारिका के दौरे पर रहे और रात को रायपुर पहुचकर विश्राम किया। 23 नवम्बर को प्रातः ही वे हरिजनों और सनातनियों से मिलने पहुचे जहा अभिनन्दन पत्रों का उत्तर दिया।  हरिजन बस्ती में हरिजन कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुये कहा कि यह वह आन्दोलन है जिसमें करोड़ों लोगों के हृदय परिवर्तन की अपेक्षा की गयी है जो केवल आत्मशुद्धि से ही संभव है। इसके बाद वे खादी भण्डार, हिन्दू अनाथालय, और सनातनी आश्रम देखने गये और शाम को अखिल भारतीय स्वदेशी प्रदर्शनी का उदघाटन कर सम्बोधित करते हुये कहा कि ऐसे देश में जहा 95 प्रतिशत जनता कृषि के सहारे जीती है यदि कृषि कार्य यंत्र के जरिये किये जाये तो एक सहायक कुटीर उद्योग की आवश्यकता होगी। अनादि काल से भारतीय किसान को चरखे के रूप में यह सहायक धंधा प्राप्त हो रहा है आज सहायक धन्धे के रूप में कई छोटे उद्योगों का सुझाव दिया जाता है लेकिन इनमें से कोई भी उद्योग उतने व्यापक पैमाने पर नहीं अपनाा जासकता जितना कि खादी उत्पादन का उद्योग। गाॅधी ने आगे कहा कि मैंने इस प्रदर्शनी का उदघाटन करना इस कारण स्वीकार किया क्योंकि मुझे ज्ञात था कि इस उद्योग में हजारों हरिजन खादी के सहारे जीविकोपार्जन कर रहे है। जो हरिजन अभाव में जीवन जी रहे थे उन्हें अभावमुक्त जीवन देने का काम खादी ने किया है और ऐसे ही अन्य अनेक तरह के घरों से किये जाने वाले धन्धों को शुरू किया जा सकता है परन्तु खादी  हमारे स्वदेशी आन्दोलन का मूलाधार है और स्वदेशी से प्रेम करने के लिये हम खादी को नहीं छोड़ सकते है।

                      अगल दिन 24 नवम्बर को वे सुबह 10 बजे धमतरी पहुचे जहा महिलाओं की सभा और सार्वजनिक सभा में भाषण देने के बाद वे धमकती की हरिजन बस्ती में गये और वहा साफ-सफाई के सम्बन्ध में बात करते हुये उनके योगदान को लेकर प्रोत्साहित किया। इसके बाद वे दोपहर दो बजे राजिम पहुचे वहा लोगों से मुलाकर कर आधे घन्टे रूके और उनके भाषण के बाद वे 5 बजे रायपुर पहुचे जहा हरिजनों के हनुमानमंदिर और दो कुओं का उदघाटन किया तथा शाम को 7 बजे रायपुर में उनकी एक सार्वजनिक सभा थी जिसमें उन्होंने कहा जब से मैं यहा आया हॅू तबसे आपने मुझे अपने प्रेम से नहला दिया है और अभी तक मैं इस प्रेम से तरबतर हॅू। यहा पर भी आपने यह थैली देकर मुझे अधिक आंनन्द प्रदान किया है। यदि आप ऐसा मानते है कि इस व्यक्ति को संतुष्ट करने के लिये पैसे देने चाहिये तो यह बात सच है लेकिन साथ ही एक शर्त है जिस व्यक्ति ने पैसे दिये उसके मन में शुद्धि का भाव हो कि उसने शुद्धि यज्ञ में यह न्यौछावर किया है। अगर पैसा देकर कोई सोचे की उसने अपना फर्ज पूरा किया है तो यह बनियापन है मानो पैसा देकर उसने स्वच्छन्द अथवा स्वेच्छाचार को मोल ले लिया,ऐसा दान हरिजनों की सेवा नहीं कर सकता। 30 मिनिट के भाषण में उन्होंने सबसे यही संकल्प लिया कि वे अपने मन से अस्पृश्यता को नेस्तनाबूद कर दें,भेदभाव को दूर करे ताकि मेरी यात्रा का यह उद्देश्य पूरा हो सके।

                    25 नवम्बर को गांधी जी सुबह बलौडाबाजार में गोपाल मंदिर पहुचे। इस मंदिर में हरिजनों का प्रवेश वर्जित था गांधीजी ने इस मंदिर में हरिजनों को हरिजनों के लिये द्वार खोलने के बाद वहा पर रखी गयी सभा में सम्बोधित करते हुये कहा कि एक निजी मंदिर में ऊॅच-नीच के भाव से हरिजनों को प्रवेश नहीं मिलता था आज यह मंदिर हरिजनों के लिये खोल दिया गया है और आज से ही यह मंदिर हरिजनों के प्रवेश के साथ ही ईश्वर का सच्चा आवास बन गया है। इस मंदिर में प्रवेश को लेकर जो तन शर्ते लागू होतीहै सभी उसका पालन करें। यहाॅ गाॅधी जी ने कहा कि शर्म  के साथ स्वीकार करता हॅू कि इनमें से बहुत सी बुरी आदतों के लिये सवर्ण हिन्दू जिम्मेदार है फिर भी आपको अपने हिस्से का काम करना है और मुर्दा पशु और गाय का माॅस खाना छोड देना है और सफाई तथा स्वच्छता के सामान्य नियमों का पालन करता है ये नियम सभी हिन्दूओं पर लागू है जो हिन्दू मंदिरों में पजा करने का अधिकार चाहते है उन्हें माॅस के साथ मद्यपान का त्याग करना चाहिये। गाॅधी जी ने भाषण के अन्त में कहा कि मैं पूरे दिल से हरिजनों से अनुरोध करता हॅू कि वे इस प्रकार की सारी बुराईयों को त्याग दे और सवर्ण हिन्दुओं के सामने ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के सामने एक उदात्त आदर्श प्रस्तुत करें। भाषण समाप्त कर वे भाटापाडा और साकटी का दौरा करने गये जहाॅ भी हरिजनों से मुलाकात के बाद वे ंगंदी बस्तियों में पहुॅचे ओर साफ-सफाई का सन्देश दिया। शाम को उन्होंने बिलासपुर में आकर महिलाओं की सभा, सार्वजनिक सभा एवं  रेलवे कर्मचारियों की कुल तीन सभाओं को सम्बोधित किया। महिलाओं की सभा में नारी शक्ति को लेकर महिलाओं में उत्साहवर्धन किया वहीं सार्वजनिक सभा में अस्पृष्टयता को अभिश्राप बताकर उससे मुक्ति के उपायों सहित हरिजनों के कल्याण की बातें कहीं एवं रेल्वे मजदूर संघ के समक्ष दक्षिण आफ्रिका के संस्मकरण सुनाते हुये किस प्रकार मजदूरों ने उन्हें अपना भाई मानकर प्रेम किया और हजारों की सॅख्या में आकर उन्हें घेर लिये जाने का जिक्र करते हुये कहा कि मैं अपने किस्म का मजदूर हॅू और आप परिस्थ्तििजन्य मजदूर है। मेरी महत्वकांक्षी सोच का मैंने त्याग दिया और मालिक बनना अस्वीकार कर दिया। उन्होने संस्मकरण सुनाा कि अहमदाबाद के मजदूरों से मिला था वे हरिजन और गैर-हरिजन में भेद करते थे,मैंने उनसे भेदभाव मिटाने का संकल्प लिया है और साम्प्रदायिक आधार पर मजदूरों को विभक्त करना शर्मनाक बात ठहराते हुये उन्होंने इसे श्रम को एकता में पिरौने की बात कहीं। सभा में मौजूद एक मुस्लिम भाई ने गाॅधी जी से पूछा आप राष्ट्र के नेता है फिर आपने क्यों राष्ट्र के एक वर्ग के लिये काम करने का निर्णय लिया?गाॅधी जी ने उत्तर देते हुये कहा कि मैं सभी जातियों की सेवा कर रहा हॅू ,ये सभी एक ही विशाल परिवार की शाखायें है जिसकी एक शाखा हिन्दू है जिसमें ऐसा रोग देखा जो सभी समाज में फैल सकता है इसलिये उसका इलाज करने आया हॅॅू, क्योंकि इस शाखा में अस्पृष्यता मर्यादा से ज्यादा बढ़ गयी है जो हिन्दू समाज को नष्ट कर देगी। एक बार यह नासूर हिन्दू समाज से निकल आये फिर हिन्दू, मुसलमान और अन्य सभी लोग अपने विरोधों को भूलकर सगे भाईयों की तरह एक दूसरे के गले मिलेंगे और भारत की सभी जातियों के लोग यह जीवन में अपना ले कि वे एक ही वृक्ष की शाखायें है।

                                    26 नवम्बर को वे रायपुर पहुंचे जहां अनेक संगठनों, हरिजन संघ के पदाधिकारी एवं महिलाओं से मुलाकात के बाद रात्रि विश्राम किया और 27 नवम्बर को दोपहर महिलाओं की सभा को सम्बोधित कर उनके हित की बात कर अस्पृष्यता मिटाने का आव्हान किया। शाम को छत्तीसगढ़ हरिजन कार्यकर्ताओं की सभा में शामिल होकर भाषण दिया और उसके बाद रविशंकर शुक्ल जी के आमंत्रण पर राजकुमार कालेज पहुॅचे और बोले आपका निमंत्रण मिलने पर विचार आया कि स्वागत समिति थोड़ा समय दे तो छात्रों को सन्देश दे सकू कि शिक्षा समाप्त करने के बाद उनकी क्या जिम्मेदारिया है। मुझे एक घन्टे बोलने का समय दिया गया है इसके लिये रविशंकर शुक्ल जी को धन्यवाद। गाॅधी जी बोले चॅूंकि यह राजघराने से आये राजकुमारों की कालेज है जो अंगे्रजी समझते है इन्हें देश की जनता के प्रति मानवीय व्यवहारिकता समझनी होगी ताकि ये ऊॅच-नीच, जाति-वर्ग में भेदभाव न कर समानता का व्यवहार करें। उन्होंने प्रिन्सिपल और शिक्षकों से कहा कि वे विचार करें कि देशी नरेशों के लिये हिन्दी जानना किन्त जरूरी है क्योंकि देश 33 करोड़ लोग हिन्दी बोलते व समझते है। जीवन के विभिन्न क्षैत्रों में अंग्रेजी का साथ होता है मैं अग्रेज शासकों की नीति की आलोचना करने के कटु कर्तव्य का पालन करता हॅू। यह बात सही है कि मैरे कई अंग्रेज मित्र भी है मैं इंग्लैण्ड में था तब उन मित्रों, कई बड़े पूंजीपतियों, नेताओं के घर जाता रहा हॅू वहा मुझे इस बात को देखकर ज्यादा खुशी होती कि उनके घरेलू नौकरों से उनका परिवारवालों की तरह सम्बन्ध थे और कोई भी नौकर हीनभावना से ग्रसित न रहकर स्नेह बंधन में होते और अस्पृश्यता तो कहीं भी नहीं थी। यहाॅ भारत में ही हम इसे धर्मशास्त्र सम्मत कहकर इस बुराई को पाले है जो दुनिया के दूसरे किसी देश में नहीं है। यही कारण है कि उनमें एकता है लेकिन यहा हम ऊॅचा-नीचा मानने में उलझे है, यदि हिन्दू अछूतपन से मुक्त नहीं होगा तो हिन्दूधर्म समाप्त हो जायेगा। यदि मैं तुम्हें अंग्रेजों के गुण ग्रहण करने का कह रहा हॅू तो उनके दोष से बचने का भी कहॅूगा। आप अंग्रेजों के दुर्गुणों-बुराईयों में न फॅसे जैसा कि वे शराब पीते है,घुडदौड़ के रूप में जुआ खेलते है। तुम्हें याद रखना होगा कि दुर्गुणों के कारण देश के कई नरेशों का सर्वनाश हो चुका है आशा करूगा सब दुगुर्णो-दुव्र्यसनों से बचोगे। इस कार्यक्रम के समापन के बाद वे आमगाव के लिये रवाना हो गये।

                    28 नवम्बर को महात्मागाॅधी प्रातः 10बजे आमगाव पहुचे जहा ग्रामीणों की सभा में भाषण दिया। उसके बाद रिसम में गणेश मंदिर का उदघाटन करने पहुचे और वहा से लाजी पहुचे और हरिजन बस्ती का दौरा कर हरिजनों को सम्बोधित किया। इस कार्यक्रय के बाद वे किरणापुर पहुचे और हरिजनों की बस्ती में अस्पृश्यता को लेकर अपनी बात कहकर बालाघाट पहुचे जहा महिलओं की सभा और सार्वजनिक सीाा में भाषण देने के बाद हरिजन बस्ती का दौरा करने पहुचे। वहा से बाड़ासेवनी का दोरा कर सिवनी पहुचे। 29 नवम्बर को उन्होंने दो स्थानों पर भाषण देने के बाद सनातनियों से मुलाकात की। जहा से छिन्दवाड़ा रवाना हो गये और छिन्दवाड़ा पहुचकर कार्यकर्ताओं तथा सार्वजनिक सभा में भाषण दिया और वहा से निवृत्त होकर हरिजन बस्ती का दौरा किया। दौरा पूरा करके वे खेरवाणी और मुलतापीका का दौरा कर बैतूल पहुचे। 30 नवम्बर को वे खेडी, सावलीगढ और बारालिहग का दौर करने के बाद बैतूल में सार्वजनिक सभा को सम्बोधित करने पहुचे। सभा की समाप्ति के बाद वे बैतूल की हरिजन कालोनी गये जहां लोगों से मुलाकात की। इन सारी सभाओं में उनका उद्देश्य सिफर अस्पृश्यता मिटाकर छुआछूत और जातियों का भेदभाव मिटाना रहा। उसी रात 30 नवम्बर को वे इटारसी ओर रात गौठी धर्मशाला में बिताई तथा1 दिसबर को को सुबह उठने के बाद प्रार्थना आदि कर ट्रेन पकड़कर करेली पहुचे जहां रखी गयी सभा में हजारों की सॅख्या में लोग उनकी सभा को सुनने आये जिसे सम्बोधित कर वे देवरी पहुचे और मुरलीधर मंदिरका उदघाटन कर सार्वजनिक सभा को सम्बोधित किया वही उन्हें किसी हरिजन कन्या के आहत होने पर अस्पताल में गंभीरावस्था में भर्ती होने की खबर मिलने पर वे उसे देखने पहुचे और कार्यकर्ताओं को निर्देश देने के बाद अनन्तपुर गये जहा भाषण देने के बाद वे खादी निवास और ग्रामीणों के घरों का दौरा करने गये एवं खादी कार्यकर्ताओं से बातचीत की। 2 दिसम्बर को अनन्तपुर से वे गढाकोटा होते हुये दमोह  पहुॅचे जहाॅ हरिजनों के लिये मंदिर का शिलान्यास किया तथा सार्वजनिक सभा में सम्बोधित करने के बाद हिन्दू हरिजन बस्ती का दौरा करने गये। जहाॅ से वे शाम 4 बजे सागर पहुॅचे और महिलाओंकी सभा कर हजारों की सॅख्या में उपस्थित लोगों की एक सार्वजनिक सभा में उन्होंने हिन्दू समाज में अस्पृश्यता  के अभिश्राप को निकालकर फैकने की बात करते हुये कहा कि परमात्मा की आॅखों में हम सब बराबर है और सभी को कुओं, पाठशालाओं और मंदिरों के उपयोग का समान अधिकार है। इस सभा के बाद हरिजनों द्वारा बनाये मंदिर का शिलान्यास करने के बाद मंदिर के बाहर सभा में बोले कि आप सभी सफाई की आदत डाले और मुर्दार माॅस खाना छोड़ दे तथा नशे का त्याग करें। उन्होंने प्रार्थना के महत्व को प्रतिपादित करते हुये सलाह दी कि हरिजनों को भी रोज सबेरे प्रार्थना करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि संकट के पलों में ईश्वर किस प्रकार सहायता करता है यह मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता है क्योंकि मैंने कई बार संकट के समय उन्हें याद किया और उन्होंने मेरी मदद की। मेरे 50वर्षो का अनुभव है जो मैं आपको कह रहा हॅू  और सभी से कहा कि मंदिर जाने से पहले स्नान करके साफ-सुथरे कपड़े पहनकर जाये तब ईश्वर की प्रार्थना में मन अच्छा लगता है। इस सभा को सम्बोधित करने के बाद महात्मा गाॅधी रात को कटनी के लिये रवाना हो गये।

                      3 दिसम्बर को कटनी में सार्वजनिक सभा को सम्बोधित करते समय उन्होंने हरिजनों के हित की बात कर अस्पृश्यता के भेदभाव न रखन की बात की। इसके बाद तूफानी दौरे के तहत वे सिहोरा,बूढागर, और पानागारका का दौरा कर सभायें ली और शाम को 4 बजे जबलपुर पहुॅचकर सभा को सम्बोधित करते हुये कहा कि मैं देश में ऊॅच-नीच को समाप्त करने के लिये सभी क्षैत्रों में भ्रमण कर रहा हॅू और मुझे इसकी स्वस्थ्य प्रतिक्रिया प्राप्त हो रही है यदि हम अस्पृश्यता के विरूद्ध इस लडत्राई के सारे परिणामों को समझ ले तो यह जानने में कोई कठिनाई नहीं होगी कि जन्म पर आधारित अस्पृश्यता अभिश्राप के असॅख्य रूपों में एक है। मुझे स्वतंत्रता और साम्प्रदायिक एकता का लक्ष्य अत्यन्त प्रिय है इसलिये इस आन्दोलन में मेरा विश्वास दिन व दिन मजबूत हो रहा है। देश में आज साम्प्रदायिक लड़ाई खत्म करना है तो हिन्दू मुसलमान के बीच, पूॅजी तथा श्रम के बीच के मतभेद समाप्त करना होगा तभी एकता स्थापित हो सकेगी। इस दरम्यान गाॅधी जी ने अपने कई अनुभवों का उदाहरण देने के साथ शास्त्रों के प्रसंग रखकर विरोधिों के लिये दया की भावना और सदभावना रखते हुये सभी कठिनाईयों से धैर्य के साथ सामना करने की बात की। 4 दिसम्बर को गाॅधी जी द्वारा मौन व्रत रखा तथा शाम को डाक्टर मुहम्मद अब्दुल अन्सारी से भेंट की। अगले दिन  5 दिसम्बर को उन्होंने जवाहर लाल नेहरू, डाक्टर मोहम्मद अब्दुल अंसारी, सैय्यद मेहमूद, के.एफ.नरीमन और जमनालाल बजाज के साथ बातचीत की।

                    7 दिसम्बर को सुबह कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करने के बाद मण्डला के लिये निकल गये और और मण्डला पहुचकर सभा को सम्बोधित करते हुये लोगों को आडे हाथों लिया कि आप लोग मेरे राजनैतिक प्रशंसक के रूप में मुझे सुनने मेरी सभाओं में आते है जबकि आपको चाहिये कि आप अस्पृश्यता निवाकरण में मेरे विश्वास को मजबूत करने में शामिल होना चाहिये, यह आप अपने साथ छलावा कर रहे हैं इस मौके पर उन्होंने पण्डितों के दो दलों पर टिप्पणी करते हुये कहा कि कहा कि शास्त्रों की व्याख्यायें करने में ये एक दूसरे से भिन्न है। दैनिक जीवन में पग-पग पर अस्पृश्यता और छुआछूत को लेकर लोगों के मतान्तर पर चोट करते हुये गाॅधी जी ने सभी से इसका परित्याग कर एकता स्थापित कर भाईचारे एवं वसुदैव कुटुम्बुक भावना के साथ रहने का सन्देश दिया। यहाॅ की सभा लेने के बाद गाॅधी जी वापिस जबलपुर लौट आये जहाॅ नारायणगंज, बरेला और व्योहारजी के मंदिर गये एवं इन मंदिरों को हरिजनों के लिये ख्ुालवाया गया था वहाॅ निरीक्षण करने के बाद गुजराती समाज के लोगों की सभा में शामिल हुये। 7 दिसम्बर को जबलपुर में गाॅधीजी से हरिजन नेताओं ने भेंट की। कुछ समय बाद वे स्वदेशी संग्रहालय गये जहाॅ से हरिजन कालोनी का दौरा करके वे खादी भण्डार पहुॅचे और भण्डार प्रमुख के कहने पर खादी बेचने का निवेदन किया, कुछ समय उन्होंने खादी बेची जिसे अनेक लोगों ने खरीदी। खादी भण्डार के बाद वे लक्ष्मीनारायण मंदिर पहुॅचे और मंदिरके द्वार हरिजनों के लिये खोले। महिलाओं की सभा को सम्बोधित करने के बाद वे लियोनार्ड थियोलाजिकल कालेज में भाषण देने पहुॅचे। कार्यक्रम जल्द समाप्त कर ट्रेन से सोहागपुर के लिये रवाना हुये। सोहागपुर से माखनलाल चतुर्वेदी के जन्मस्थली बाबई पहुॅचे। बाबई पहुूचकर वे दादा माखनलाल चतुर्वेदी के जन्मस्थली पहुॅचे जहाॅ कुछ समय रूकने के बाद वे हरिजन बस्ती गये एवं साफसफाई करने के बाद वापिस सोहागपुर आये जहाॅ से ट्रेन से हरदा निकल गये। 8 दिसम्बर को वे हरदा पहुॅच कर सार्वजनिक सभा में सम्बोधित किया। हरदा के बाद खण्डवा और बुरहानपुर पहुॅचकर गाॅधी जी ने अस्पृश्यता को लेकर लोगों को जागृत किया तथा खण्डवा से ट्रेन में सवार हुये और 9 दिसम्बर को भोपाल आये जहाॅ विशाल आमसभा को सम्बोधित कर वे विदिशा एवं गंजबसौदा में सभायें लेकर वापिस रात को ही दिल्ली रवाना हो गये।    

    आत्माराम यादव पीव
    आत्माराम यादव पीव
    स्वतंत्र लेखक एवं व्यंगकार

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