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    Homeराजनीतिदेश में रतनलाल जैसे प्रद्यापक हैं फिर दुश्‍मनों की क्‍या जरूरत ?

    देश में रतनलाल जैसे प्रद्यापक हैं फिर दुश्‍मनों की क्‍या जरूरत ?

    डॉ. मयंक चतुर्वेदी

    भारतीय संविधान देश के प्रत्‍येक नागरिक को यह स्‍वतंत्रता देता है कि वह अपनी अभिव्‍यक्‍ति के लिए स्‍वतंत्र है, भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत लिखित और मौखिक रूप से अपना मत प्रकट करने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का प्रावधान किया गया है। किंतु यह अधिकार क्‍या कुछ भी बोल देने की अनुमति देता है? क्‍या ऐसी बातें बोली जा सकती हैं जो सीधे-सीधे किसी को नीचा दिखाएं, उसे अपमानित करें, उसे ठेस पहुंचाए? कहना होगा कि ऐसा बिल्‍कुल भी नहीं है। संविधान द्वारा प्रदत्‍त अभियक्ति की स्वतंत्रता का यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है इस पर युक्तियुक्त निर्बंधन हैं।

    यानी कि भारत की एकता, अखंडता एवं संप्रभुता पर खतरे की स्थिति में, वैदेशिक संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव की स्थिति में, न्यायालय की अवमानना की स्थिति में इस अधिकार को बाधित किया जा सकता है। भारत के सभी नागरिकों को विचार करने, भाषण देने और अपने व अन्य व्यक्तियों के विचारों के प्रचार की स्वतंत्रता प्राप्त है। किन्‍तु इस शर्त के साथ कि परस्‍पर सभी एक-दूसरे का सम्‍मान भी करेंगे।

    वस्‍तुत: यहां जिन लोगों का यह मानना है कि विचार की स्वतंत्रता का अधिकार, अंतरात्मा की स्वतंत्रता का अधिकार और असंतोष का अधिकार यह तीनों ही किसी भी स्वस्थ्य और परिपक्व लोकतंत्र के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। इसलिए लोकतंत्र में लोगों की सहभागिता बढ़ाने के लिए उन्‍हें अपनी हर कुछ बात कहने का हक है। अत: भारत जैसे सामाजिक संस्कृति वाले देश में सभी नागरिकों जैसे-आस्तिक, नास्तिक और आध्यात्मिक को अभिव्यक्ति का किसी भी हद तक अधिकार है। इनके विचारों को सुनना लोकतंत्र का परम कर्तव्य है। तब फिर विचार करना होगा कि जो यह कह रहे हैं यदि उस पर अमल किया जाने लगे तो वर्तमान और भविष्‍य का भारत कैसा होगा?

    वस्‍तुत: जब इस अभिव्‍यक्‍ति की आड़ में ”रतनलाल” जैसे प्रद्यापक खुले तौर पर लाखों नहीं करोड़ों लोगों की भावनाओं को आहत करने का काम करें तब फिर उन्‍हें क्‍या ”अभिव्‍यक्‍ति” के नाम पर यूं ही छोड़ देना चाहिए? क्‍या उनके कहे को सही माना जा सकता है? जिसके लिए लोग सड़कों पर उतर आए? क्‍या उनके समर्थन में बोले जा रहे यह शब्‍द और उनके वकील का कहना कि ‘प्रोफेसर के खिलाफ दर्ज केस झूठा है। एफआईआर में कोई भी शिकायत ऐसी नहीं है जो संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आती हो। पुलिस के पास अधिकार ही नहीं है कि वो गिरफ्तारी कर सके, उनकी गिरफ्तारी मतलब अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3 का उल्लंघन है।’ दूसरी ओर ”रतन लाल” की गिरफ्तारी के खिलाफ वामपंथी अखिल भारतीय छात्र संघ (आइसा) के कार्यकर्ताओं का दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय के बाहर धरना देना। छात्र कार्यकर्ता तख्तियां दिखाकर कह रहे थे, ‘हमारे शिक्षकों पर हमला बंद करो’, ‘लोकतांत्रिक आवाजों पर अंकुश लगाना बंद करो’ और ‘रिलीज प्रोफेसर रतन लाल’।

    ‘लोकतांत्रिक आवाजों पर अंकुश लगाना बंद करो’ की यह कमाल की दुहाई है! वास्‍तव में जिस तरह की प्रतिक्रिया प्रोफेसर ‘रतनलाल’ ने ”ज्ञानवापी” मामले में लिखकर फेसबुक पर दी है, उसके लिए उन्‍हें सजा दिलवाना यह उस प्रत्‍येक भारतीय नागरिक का संविधानिक अधिकार है जिनकी आस्‍थाओं पर सीधे तौर पर प्रहार और अनादर करने का कार्य इतिहास के इन प्राद्यापक महोदय द्वारा किया गया है।

    माना कि ”रतनलाल” जैसे तमाम लोगों की आस्‍था सनातन या हिन्‍दू प्रतीकों एवं आस्‍था केंद्रों में नहीं होगी। किन्‍तु क्‍या इससे उन्‍हें कुछ भी कहने का अधिकार मिल जाता है? भारत में तो पृथ्‍वी को चपटी माननेवाले और सूर्य द्वारा प्रतिदिन पृथ्‍वी का चक्‍कर लगाने का कहने वालों या कहें ऐसी तमाम मान्‍यताओं को मानने वालों का भी बराबर से सम्‍मान है। फिर जिसमें कि सनातन या हिन्‍दू धर्म में तो जो भी कुछ है उसके पीछे एक परम्‍परा ही नहीं बल्‍कि वैज्ञानिकता भी विद्यमान है। जब तक आप उसे धर्म की दृष्टि से धारण किए हो, अच्‍छी बात है करें और जब भी आपमें उसका चिंतन वैज्ञानिक अधुनातन सत्‍यता के आधार पर प्रकट होने लगे, तब फिर दर्शन से मिलनेवाले उस परम आनन्‍द का भी स्‍वागत है। यहां कह सकते हैं कि भारत का सनातन धर्म, उसकी प्राचीनता, प्रमाणिकता, उसमें निहित वैज्ञानिकता अद्भुत है । इसमें ऐसा कुछ भी निरर्थक नहीं, जिसे स्‍वीकार्य नहीं किया जा सकता ।

    आप स्‍वयं विचार करें कि कैसे एक प्रोफेसर स्‍तर का व्‍यक्‍ति सार्वजनिक मंच पर किसी भी धर्म या पंथ को लेकर इतना हल्‍का और निम्‍नस्‍तर का लिख सकता है। ”रतनलाल” जो लिखते हैं, वह उनके असमानता से भरे उस मतिष्‍क की ओर इंगित करता है जोकि वस्‍तुत: स्‍वस्‍थ लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। आप स्‍वयं पढि़ए और विचार करिए कि उन्‍होंने जो लिखा वह कितना सही है ? “यदि यह शिवलिंग है तो लगता है शायद शिव जी का भी खतना कर दिया गया था।” साथ ही फेसबुक पोस्ट के बाद चिढ़ाने वाला इमोजी भी वे लगाते हैं। फिर वह यहीं नहीं रुकते, जब इस पोस्ट पर विरोध और विवाद उठा तब माफ़ी माँगने से मना कर देते हैं । वे अभी भी अपनी कही बात को दूसरे ढंग से सही ठहराने में लगे हुए हैं।

    यहां हद तो यह है कि ”रतन लाल” यह कहते हुए दिखाई देते हैं कि उन्होंने इतिहास के छात्र के रूप में केवल एक प्रश्न रखा था। ‘लोग किसी भी चीज से आहत हो सकते हैं। इस कारण अकादमिक डिस्‍कोर्स को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। मैंने एक साधारण सा प्रश्न पूछा था कि तथाकथित शिवलिंग तोड़ा गया या काटा गया। मुल्लाओं और पंडितों को इस पर टिप्पणी करने की जरूरत नहीं है। एक आर्ट हिस्‍टोरियन को इस प्रश्न का उत्तर देना चाहिए।’ मतलब यहां जो समझा जा सकता है या वे कहना चाह रहे हैं कि मैं इतिहास का प्राद्यापक हूं, मेरे कहे पर कोई प्रश्‍न नहीं उठा सकता। भारत के आम नगरिक फिर वे यदि मुल्लाजी और पंडितजी हैं तो उन्‍हें तो उनके कहे पर ना बुरा मानना चाहिए और ना ही उन्‍हें कुछ भी बोलने का हक है। मतल‍ब कि अभिव्‍यक्‍ति, वाक् की स्‍वतंत्रता के लिए ”आर्ट हिस्‍टोरियन” होना जरूरी है।

    यहां प्रोफेसर ”रतन लाल” के कहने से तो यही लग रहा है कि भारत के संविधान ने सभी अधिकार उन्‍हें अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत दे रखे हैं, (जैसा कि उनके वकील ने बोला है)। वे जो चाहें कहने के लिए और करने के लिए स्‍वतंत्र हैं, फिर इस पर मजाल है कि कोई उनका विरोध कर पाए। यदि आप विरोध करेंगे तो मतलब साफ है, दलितों पर अत्‍याचार किया जा रहा है।

    वस्‍तुत: यहां ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है क्‍यों कि उनके ट्वीटर खाते में प्रवेश करते ही यही प्रतीत हो रहा है। ट्वीटर पर उनकी यह पोस्‍ट आप भी देख सकते हैं। इन्‍होंने जो लिखा, उस पर माफी मांगना तो दूर आप लिख रहे हैं कि ”मैंने सिर्फ राय रखी है, आलोचना तो कबीर, पेरियार आंबेडकर ने किया है और भारत सरकार उनकी किताबों को छापती है.” अब कोई इनसे पूछे कि कबीर के साहित्‍य में ऐसा क्‍या लिखा है? पेरियार और आंबेडकर ने भी क्‍या ऐसा लिख दिया, जिसे पढ़कर किसी को आहत किया जाता है और सरकारें उसे छापकर पढ़वा रही हैं ?

    यहां वस्‍तुत: कहने के लिए बहुत कुछ है, किंतु हम सभी को यह सोचना है कि हम कौन सा भारत गढ़ रहे हैं। क्‍या वह असहमति में सहमति ढूंढकर विकास के रास्‍ते पर आगे बढ़नेवाला है ? या फिर वह सहमति में भी असहमति ढूंढने निकला है ? कमियों पर विचार करने बैठेंगे तो सदियां गुजारी जा सकती हैं, किंतु इससे किसका भला होगा? यह अवश्‍य ही सोचनीय है। बहुलतावादी संस्‍कृति वाले अपने महान देश में अच्‍छा हो सभी के विचारों का सम्‍मान संविधान के दायरे में रहकर किया जाए। अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का अर्थ यह कदापि नहीं है कि कोई भी किसी से भी जो मन में आएगा कहेगा और सामने वाला चुपचाप सुनने के लिए बाध्‍य होगा।

    मयंक चतुर्वेदी
    मयंक चतुर्वेदीhttps://www.pravakta.com
    मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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