लेखक परिचय

श्रीराम तिवारी

श्रीराम तिवारी

लेखक जनवादी साहित्यकार, ट्रेड यूनियन संगठक एवं वामपंथी कार्यकर्ता हैं। पता: १४- डी /एस-४, स्कीम -७८, {अरण्य} विजयनगर, इंदौर, एम. पी.

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श्रीराम तिवारी

भारतीय दार्शनिक परम्परा में कार्य-कारण का सिद्धांत सारे प्रबुद्ध संसार में न केवल प्रसिद्ध है बल्कि उस पर वैज्ञानिक भौतिकवाद की मुहर भी अब से १५० साल पहले तब लग चुकी थी जब जर्मन दार्शनिकों और खास तौर से मेक्समूलर ,कार्ल मार्क्स और एंगेल्स ने इस भारतीय वेदान्त प्रणीत दर्शन को अपने एतिहासिक द्वंदात्मक भौतिकवाद के केंद्र में स्थापित किया था. प्रकृति,मानव,समाज और स्थावर-जंगम के ध्य बाह्य -आंतरिक संबंधों को एतिहासिक विकाश क्रम में वैज्ञानिक तार्किकता के आधार पर परिभाषित किये जाने के तदनंतर उक्त भारतीय दर्शन -प्रणीत कार्य कारण के सिद्धांत को ’साम्यवाद’मार्क्सवाद के केंद्र में सबसे ऊँचा मुकाम हासिल है.

भारतीय उपमहादीप में अनेकानेक यायावर कबीलों के आगमन ,निरंतर आक्रमणों और अधिकांश के यहीं रच-बस जाने के परिणामस्वरूप आर्थिक,सामाजिक,सांस्कृतिक और राजनैतिक स्तर पर जहां एक ओर अपने-अपने कबीलों,गणों,जनपदों,महाकुलों और वंशों ने अपनी निष्ठाएं स्थापित,कीं वहीँ दूसरी ओर एक -दूसरे के संपर्क में आने तथा भौगोलिक-प्राकृतिक कारणों से वेशभूषा,रहन-सहन,विचार-चिंतन और ज्ञान-विज्ञान में भी समय-समय पर उल्लेखनीय समन्वय और तरक्की की है.हजारों सालों की सतत द्वंदात्मकता के परिणाम स्वरूप आज दुनिया में अधिकांस पुरातन समाजों-राष्ट्रों में जो भी -विचार,चिंतन या दर्शन मौजूद हैं उनका मूल जानना उतना ही कठिन है जितना की सदानीरा सरिताओं का मूल जानना.भारतीय और इंडो यूरोपियन तथा भारतीय सेमेटिक और भारतीय मध्य-एशियाई सभ्यताओं के द्वन्द का परिणाम ही वर्तमान भारतीय दर्शन है.यही ्रकारांतर से जर्मन और अन्य पाश्चात्य दर्शनों के वैज्ञानिक रूप से परिष्कृत होने का सशक्त उपादान भी रहा है.इसी से द्वंदात्मक -एतिहासिक -भौतिकवाद या मार्क्सवाद या साम्यवाद का जन्म हुआ है.भारत के कुछ दक्षिणपंथी ,कुछ पूंजीवादी और कुछ कोरे मूढमति एक ओर तो अपने राष्ट्रवाद को अंतर्राष्ट्रीयतावाद का बाप समझते हैं दूसरी ओर लगे हाथ अपनी कूपमंडूकता का प्रदर्शन करते हुए मार्क्सवाद या साम्यवाद को विदेशी विचारधारा, विदेशी सिद्धांत घोषित करने में एडी-चोटी का जोर लगाते रहते हैं.

वेदान्त का स्पष्ट कथन है –

सर्वे भवन्ति सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया.

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, माँ कश्चिद् दुःख भाग्वेत..

अयं निजः परोवेति ,गणना लघुचेतसाम.

उदार चरितानाम तू ,वसुधैव कुटुम्बकम..

भारतीय पुरातन दार्शनिक परम्परा में ऐंसे लाखों प्रमाण हैं जो सावित करते हैं की जिस तरह भारतीय मनीषियों ने ’जीरो’ से लेकर धरती के गोल होने या सूर्य से सृष्टि होनेऔर मत्स्य अवतार से कच्छप,वराह,नृसिंह वामन,परशुराम,राम,कृष्ण,बुद्ध और कल्कि का पौराणिक यूटोपिया प्रस्तुत करने में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया वो डार्विन के चिंतन को भी निस्तेज करने में सक्षम है.

अब यदि डार्विन के ’ओरिजन आफ स्पेसीज’या sarvival is the fittest में उस भारतीय चिंतन की झलक विद्यमान है जो कहता कि ;-

यद्द्विभूतिमात्सत्वाम श्रीमदूर्जितमेव वा.

तत्तदेवावगच्छ त्वम् मम तेजोअश्सम्भ्वम..

गीता-अध्याय १०-४१

तो इसमें ओर डार्विन के विशिष्ठ जीवन्तता सिद्धांत में असाम्य कहाँ है? कुछ डार्विन से ,कुछ यूनानियों से,कुछ रोमनों से,कुछ जर्मनों से और बाकि का सब कुछ भारतीय दर्शन से लेकर हीगेल और ओवेन जैसे आदर्श उटोपियेयों ने जो आदर्शवादी साम्यवाद का ढांचा खड़ा किया था उसमें वैज्ञानिक भौतिक वाद ,एतिहासिक द्वंदात्मकता,सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक चेतना के पञ्च महाभूतों का समिश्रण कर, उसमें उच्चतर मानवीय संवेदनाओं का प्रत्यारोपण कर जो अनुपम विचारधारा प्रकट हुई उसका अनुसंधान या सम्पादन भले ही कार्ल मार्क्स और एंगेल्स ने किया हो किन्तु इस दर्शन का सार तत्व वही है जो भारतीय वेदान्त ,बौद्ध,जैन,सिख और सनातन साहित्य की आत्मा है.

जब तक भारत में और दुनिया में वेदान्त,दर्शन का,बौद्ध,जैन,और सनातन दर्शनों का महत्व रहेगा तब तक असमानता के खिलाफ ,शोषण के खिलाफ और दरिद्रनारायण के पक्षधर के रूप में ’मार्क्सवाद’और उसके पैरोकार वामपंथ का अस्तित्व अक्षुण रहेगा.कोई भी विचारधारा सिर्फ विधान सभा चुनाव की हार जीत से जीवित या मृत घोषित कर देने वालों को यह सदैव स्मरण रखना चाहिए.इतिहास उन्हें झूंठा सावित करेगा जो अभी वाम की हार पर उसके अवसान के गीत लिख रहे हैं.उन्हें भी निराश होना पड़ेगा जो पूँजी के आगे नत्मश्तक हैं.

यह दर्शन फ्रांसीसी क्रांति,सोवियत क्रांति,क्यूबाई क्रांति,चीनी क्रांति,वियेतनामी क्रांति,बोलिबियाई और लातिनी अमेरिकी राष्ट्रों समेत तमाम दुनिया {भारत समेत} के स्वधीनता संग्रामों का प्रेरणा स्त्रीत रहा है .इसके दूरगामी सकारात्मक प्रभावों ने सामंतवाद के गर्भ से पूंजीवाद और पूंजीवाद के गर्भ से साम्यवाद के उद्भव की भविष्वाणी भले ही वक्त पर सही सावित न की हो किन्तु यह कहना जल्‍दबाजी होगी की ’मार्क्सवाद का अब कोई भविष्य नहीं’ ३५ साल में एक बार बंगाल में और २ सीट से केरल में माकपा के हारने का मतलब मार्क्सवाद का पराभव नहीं समझ लेना चाहिए.बल्कि वामपंथ और मार्क्सवादियों को भविष्य में बेहतर पारी खेलने के लिए जनता रुपी कोच ने वाम रुपी खिलाडियों को कसौटी पर कसे जाने का फरमान ही जरी किया है.

5 Responses to “जब तक दुनिया में असमानता रहेगी -वामपंथ तब तक अमर रहेगा.{भाग-१}”

  1. श्रीराम तिवारी

    shriramt tiwari

    श्री आर सिंह उर्फ़ रमेश सिंह जी की गवेक्षनात्मक प्रतिक्रिया दिशाहीन और वितंडावादी होने से न तो मार्क्सवाद के साथ और न ही आध्यात्मिक दर्शन के भाववाद के साथ संगति बिठा सकी और मेरे आलेख के मूल उद्देश्य को समझने की तो रंच मात्र चेष्टा नहीं की गई.फिर भी उनकी टिप्पणी से मुझे मेरी अल्पज्ञता का कुछ आभास तो अवश्य हुआ है ,अतएव पेनिट्रेसन का शक्रिया.

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  2. आर. सिंह

    आर.सिंह

    अपनी टिप्पणी में एक दो पंक्तियाँ जोड़ने की इजाजत चाहता हूँ.यह सही है की जब तक असामानता रहेगी तब तक असंतोष भी रहेगापर जिस साम्यवाद की कल्पना तिवारी जी जैसे लोग करते हैं,वह इस को कभी भी मिटा सकेगा उसमे मुझे संदेह है.साम्यवाद फिर अपना सर उठा सकता है,पर मेरे विचारानुसार अपने ही अन्तर्विरोध के कारण फिर से वर्तमान दशा से भी अधिक दुर्गति को प्राप्त होगा

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  3. आर. सिंह

    आर.सिंह

    श्रीराम तिवारी जी आपकी वाक्पटुता का लोहा तो मैं हमेशा मानता हूँ.इस बार भी आपने ऐसा शब्दजाल बुना है की लोग चारो खाने चित हो गए हैं.ऐसे तो मुझे न आप जैसा ज्ञान है और न मैं उल्टा पुल्टा तर्क देकर लोगों पर अपनी विद्वता की धाक जमाने की कला में ही माहिर हूँ.विज्ञानं और बाद में अभियांत्रना से सम्बन्ध होने के कारण दो को पांच बनाने की कला भी नहीं आती है. पर अपनी समझ से मैं कुछ बाते साफ साफ कहना चाह्ताहूँ.मेरी अल्प बुद्धि के अनुसार पूर्ण प्राच्य दर्शन आध्यात्मिकता और आत्मा परमात्मा के मिलन पर आधारित हा,जबकि मार्क्स का साम्यवाद इनको पहचानता ही नहीं.मार्क्स का साम्यवाद जहां वर्ग संघर्ष और एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग की पराजय को प्रधानता देता है या यो कहिये की एक वर्ग जिसको मार्क्स शोषित वर्ग कहता है उसके द्वारा शोषक वर्ग के पराजय में समानता की राह ढूढता है ,वही पूर्ण भारतीय परम्परा या पूर्ण प्राच्य दर्शन जिसका उपयोग तिवारीजी ने मार्क्स के सिद्धांतों के प्रतिपादन के लिए किया है,एक दूसरे के परस्पर भाईचारे पर आधारित है.मार्क्स जहां वर्ग संघर्ष की बात करते हैं ,वहीं हमारे प्राचीन महिषी वसुधैव कुटुम्बकम..को महत्व देते हैं, जिसमे संघर्ष और खून खराबे के लिए कोई स्थान नहीं है.मैं इस बात में तिवारी जिसे सहमत हूँ की प्राच्य दर्शन इतना समृद्ध था की जर्मन विद्वान इससे बहुत प्रभावित थे,पर उसमे से उन्होंने जो ग्रहण किया वह सब कुछ वैसा ही नहीं रहा जैसाभारतीय ऋषियों ने कल्पना की थी.मार्क्स वाद या साम्यवाद के उत्थान पतन का भी कारण मार्क्स के सिद्धांतों के प्रतिपादन की त्रुटियाँ है.इससे भारतीय या प्राच्य दर्शन को कुछ लेना देना नहीं है.प्राच्य या भारतीय दर्शन का मूल है सर्वे भवन्ति सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया.,जबकि मार्क्सवाद या साम्यवाद बुर्जुआ के पतन में ही सर्वहारा वर्ग का उत्थान देखता है.यह एक ऐसी भूल थी जिसके कारण व्यक्तिगत तानाशाही के बदले पार्टी तानाशाही का जन्म हुआ.व्यक्ति का एक स्वतंत्र इकाई के रूपमें अस्तित्व ही नहीं रहा और कल के सर्वहारा आज के बुर्जुआ बन गये.रूस और चीन में क्या हुआ यह तो केवल वहां के समाचारों के जरिये ज्ञात हुआ,पर बंगाल में मार्क्स वादियों के कैडर को विशिष्ठ बुर्जुआ के रूप में साक्षात दर्शन का सौभाग्य हमलोगों में से बहुतों को प्राप्त है.

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  4. B K Sinha

    बधाई हो तिवारी जी अपने संछेप में जो कहने योग्य बात थी कह डाली .अब उन तथाकथित बुर्जुवा और छद्म राष्ट्रवादिओं को समझ लेना होगा
    की वास्तविकता क्या है चिंतन में गभीरता रह
    नहीं गयी है सतही लेखों की बाद आ गयी है
    मै एक सजग पाठक और गैरराजनीतिक हूँ
    चाहता हूँ की जो भी कहा जाये वह तथ्यात्मक हो यदि सोवियत रूस में सत्ता परिवर्तन को वे
    समाजवाद के पराभव की शुरुआत के रूप में देखते है और फतवा भी जारी कर देते है उन्हें यह भी बताना चाहिए की वहा की अभी वर्तमान स्थिति क्या है .क्या स्थिति पहले से और बेहतर हुई है या बदतर हुई है जहा तक मुझे मालूम हे की वहा मफिओं का राज चल रहा हे सार्वजानिक संपत्ति की जबरदस्त बन्दर बाँट हुई है जैसा की हम अपने देश में एन दी ए के शासन काळ में dekh चुके है क़ि सार्वजानिक उद्योगों को बेचने का बाकायदा एक मंत्रालय अरुन्शौरी के netratva में खुल .आज स्थिति यह सब जगह mafion

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  5. Bipin Kishore Sinha

    साम्यवाद और उच्च भारतीय दर्शन में तालमेल (वस्तुतः घालमेल) का आपने अच्छा प्रयास किया है। क्या आपके अन्य वामपंथी सहयोगी भी ऐसा ही सोचते हैं? कदापि नहीं। चीन, रुस में समानता या क्रान्ति के नाम पर जो करोड़ों हत्याएं हुईं क्या उसका औचित्य सिद्ध कर पाएंगे आप? तिब्बत पर चीन का कब्जा और वहां अभियान के तहत चलाए जा रहे नरमेध किस विश्व-बन्धुत्व का संदेश देते हैं। माओवाद के नाम पर भारत के नक्सलवादियों द्वारा चीनी समर्थन से नित्य किए जा रहे कत्लेआम को आप किस श्रेणी में रखेंगे। आज की तारीख में साम्यवाद है कहां, यह तो बताइये। यदि आप चीन की वर्तमान व्यवस्था को वाममार्गी व्यवस्था समझते हैं, तो आप भयंकर गलतफ़हमी में हैं। वह कम्युनिज़्म के नाम पर दुनिया भर के कम्युनिस्टों को बेवकूफ़ बना रहा है। वहां पूंजीवाद फल-फूल रहा है और इस मामले में वह अमेरिका से भी दो कदम आगे बढ़ गया है। दुनिया में सबसे सस्ते मज़दूर चीन में ही उपलब्ध हैं। यही कारण है कि सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपनी कार्यशालाएं चीन में लगा रखी हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा मज़दूरों का शोषण आज चीन में हो रहा है। साम्यवाद दुनिया से इतने कम समय में ही इसलिए लुप्त हो गया क्योंकि यह अव्यवहारिक ही नहीं मानवता के भी विरुद्ध है। इसमें मानवीय संवेदनाओं और मनुष्य के आध्यात्मिक विकास का कोई स्थान नहीं है। भारत के सनातन दर्शन से दुनिया के सभी धर्म निकले हैं। मार्क्स और हेगेल पर उसका प्रभाव रहा होगा लेकिन हाथी की पूंछ पकड़कर पूरे हाथी की कल्पना करना क्या हास्यास्पद नहीं है? दुनिया से असमानता कभी समाप्त नहीं की जा सकती। ईश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति का निर्माण अलग-अलग सांचे में किया है। हर आदमी के सोचने और काम करने का तरीका भी अलग है। अगर एक समय में सबको बराबर संपत्ति दे भी दी जाय, तो कुछ ही समय के बाद फिर असमानता दिखाई पड़ने लगेगी। अपने स्वभाव से मज़बूर एक आदमी शराब पीकर अपने पैसे खर्च कर देगा और उसका पड़ोसी उसी पैसे से व्यवसाय शुरु करके कई गुना धन अर्जित कर लेगा। असमानता तो मिट नहीं सकती। यह अप्राकृतिक है। यही कारण है कि साठ वर्षों में ही असमानता दूर करने का खोखला नारा देनेवाला वाममार्ग ही मिट गया। वैसे भी वाम का हिन्दी में अर्थ होता है – उल्टा। उल्टा को या तो सीधा होना पड़ता है या मिटना होता है। अपने कथन के समर्थन में बुद्ध और महावीर का नाम न लें तो अच्छा रहेगा। सदा बन्दूक की नाली से सत्ता प्राप्त करने का सपना देखने वालों को इन अहिंसक महपुरुषों का अपने पक्ष में संदर्भ देना बुद्धि का दिवालियापन ही है। दुनिया से कम्युनिज़्म का लोप न अमेरिका के कारण हुआ है न इंगलैण्ड के कारण। यह अपने अन्तर्विरोधों, अव्यवहारिकता, मानवता विरोधी और अप्राकृतिक कृत्यों और चिन्तन के कारण ही अधोगति को प्राप्त हुआ है। इसके पुनः उभरने की कोई संभावना नहीं है।

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