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    कब पूरी होगी नदियों के संरक्षण की योजनाएं!

    लिमटी खरे

    देश में नदियों को पुण्य सलिला का दर्जा दिया गया है। एक समय था जब कल कल करती नदियों का नीर साफ सुथरा हुआ करता था। इन्हीं नदियों के भरोसे नदी के किनारे ही शहर बसाए जाते थे। आप अगर पुराने शहरों को देखें तो उन शहरों के आसपास नदी होती थी। आजादी के पहले तक इन्हीं नदियों के जल से लोगों की प्यास बुझती थी, खेती किसानी होती थी यह बात सभी जानते हैं। कालांतर में ये नदियां प्रदूषित होना आरंभ हुईं और अनेक नदियों का जल तो आज मवेशियों के पीने लायक भी नहीं रह गया है।

    1985 में आई राम तेरी गंगा मैली चलचित्र ने जमकर धूम मचाई। इस सिनेमा में दिए गए संदेश के बाद केंद्र सरकार जागी और सरकार के द्वारा 1986 में गंगा एक्शन प्लान बनाया गया, ताकि पुण्य सलिला गंगा मैया को साफ सुथरा रखा जा सके। इसके बाद एक एक करके योजनाएं बनती रहीं, राशी आवंटित होती रही किन्तु 2014 में आरंभ किए गए नमामि गंगे योजना के बाद भी हजारों करोड़ पानी में बहते चले गए पर नदियों के हालात जस के तस ही रहे।

    हाल ही में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के द्वारा 20 हजार करोड़ रूपए की लागत से दो केंद्र शासित प्रदेशों और दो दर्जन राज्यों से होकर बहने वाली नर्मदा, यमुना, रावी, व्यास, झेलम, चिनाव, ब्रम्हपुत्र, सतलज, गोदावरी, महानदी, कृष्णा, कावेरी, लूणी आदि 13 नदियों का संरक्षण वानिकी के जरिए करने की घोषणा की गई है। धर्मेंद्र प्रधान का कहना है कि एक दशक में 7414 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वनों की वृद्धि होगी, जो 50.21 मिलियन कार्बन डाय आक्साईड को सोख सकेगी। इससे 1.887 वर्ग घन मीटर भूजल स्तर हर साल रिचार्ज होगा तो वहीं दूसरी ओर 964 वर्ग घन मीटर क्षेत्र में मिट्टी के क्षरण में कमी आएगी। इस अभियान का आगाज नर्मदा नदी से किए जाने की बात उनके द्वारा कही गई है।

    11 दिसंबर 2016 से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के द्वारा नमामी देवी नर्मदे अभियान का आगाज किया था। इस दौरान उनकी पहल पर देश के हृदय प्रदेश में नर्मदा नदी के किनारे पौधे लगाने का अभियान आरंभ हुआ और विश्व कीर्तिमान भी बना। आज इस अभियान के तहत लगाए गए पौधों की क्या स्थिति है इस बारे में सत्ताधारी और विपक्ष दोनों ही मौन दिखता है। 2016 में लगाए गए पौधे आज 06 साल बाद तो काफी बड़े हो चुके होंगे। जाहिर है नर्मदा किनारे अब पौधे लगाने के लिए जमीन शायद ही बची हो!

    नर्मदा नदी मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलती है और इस पुण्य सलिला के प्रवाह क्षेत्र की चौड़ाई का औसत 20 किलोमीटर के लगभग है। नर्मदा नदी के दक्षिण में सतपुड़ा की पर्वत श्रृंखलाएं हैं तो उत्तर में विन्ध्याचल पर्वत है। अमूमन यही देखा जाता है कि बरसात के बाद जब नदी में पानी कम हो जाता है तब उसके किनारों पर उपजाऊ भूमि पर किसानों के द्वारा खेती की जाती है। अब अगर प्रदेश के आडिटर जनरल या भारत के नियंत्रक एवं महालेखा संपरीक्षक के द्वारा इस पूरे मामले में खर्च की गई राशि, लगाए गए पौधे और वर्तमान में जीवित पौधों की संख्या का मिलान अगर कर लिया जाए तो दूध का दूध पानी का पानी हो सकता है।

    बहरहाल, केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री का एक दावा यह भी है कि देवी समतुल्य मानी जाने वाली गंगा मैया आज विश्व की दस स्वच्छ नदियों में से एक है। जिन तेरह नदियों के संरक्षण का आगाज करने की बात उनके द्वारा कही गई है वह गंगा मैया की स्वच्छता अभियान की शत प्रतिशत सफलता के बाद ही उनके द्वारा किया गया है। आज गंगा मैया की स्थित वाराणसी, इलहाबाद आदि शहरों में क्या है यह बात सभी बेहतर तरीके से जानते हैं। इन शहरों में स्नान करने वालों को किस किस तरह के रोग हो रहे हैं यह बात भी किसी से छिपी नहीं है। यह महज आंकड़ों की बाजीगरी ही माना जा सकता है। मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के द्वारा भी गंगा मैया को स्वच्छ बनाने की दिशा में प्रयास किए गए थे, किन्तु कुछ समय बाद वे भी पूरी तरह मौन ही हो गईं इस महत्वपूर्ण मसले में।

    एक बात समझ से परे ही है कि सरकारों के द्वारा जो भी जतन किया जाता है वह जनता के लिए और जनता के पैसों से ही किया जाता है, फिर जनता से इस बारे में रायशुमारी क्यों नहीं की जाती है! क्यों जनता पर फैसले थोप दिए जाते हैं। प्रधानमंत्री अगर चाहें तो सांसदों को दी जाने वाली सांसद निधि में कोविड काल में जिस तरह की कटौति कर कोरोना कोविड 19 से जंग लड़ी गई थी, उसी तरह सांसदों की निधि से हर साल बीस फीसदी राशि निकाल ली जाए और इसका अनुसरण हर सूबे के विधायकों को दी जाने वाली विधायक निधि से भी किया जाए। उन्हें भी निर्धारित से बीस फीसदी कम राशि दी जाए।

    इस तरह केंद्रीय स्तर और सूबाई स्तर पर जो राशि जमा होगी। उसका उपयोग उन सांसदों के संसदीय क्षेत्रों या विधायकों के विधानसभा क्षेत्रों में बहने वाली नदियों में पांच या दस किलोमीटर की दूरी पर एक एक बड़ा स्टापडेम बनाने में किया जाए। चूंकि बारिश में नदियों में पानी लबालब रहता है पर बारिश के उपरांत एक दो माह में ही नदियां उथली नजर आने लगती हैं। अगर स्टाप डेम बनाए जाएंगे वह भी दस या पांच किलोमीटर की दूरी पर तो उन स्टाप डेम के कारण नदी का जलस्तर साल भर एक सा बना रह सकता है। इससे भूजल स्तर को रीचार्ज भी किया जा सकेगा और किसानों को खेतों के आसपास पानी मुहैया हो सकेगा।

    हर साल इस तरह के स्ट्रक्चर बनाए जाने से कुछ ही सालों में एक से डेढ़ किलोमीटर में ही एक एक स्टाप डेम नजर आने लगेंगे और तेजी से नीचे जाता भूजल स्तर भी बढ़ेगा तथा बड़े बांधों के कारण जो समस्याएं सामने आतीं हैं उन समस्याओं से भी निजात मिल पाएगी। अभी 13 नदियों के संरक्षण की योजना की महज घोषणा हुई है इसलिए जरूरी है कि इस मामले में जनता जनार्दन, जिसके लिए यह कराया जा रहा है उससे भी मशविरा कर लिया जाए तकि इस वृहद परियोजना के गुण दोष भी इसके आरंभ होने के पहले ही सामने आ सकें।

    लिमटी खरे
    लिमटी खरेhttps://limtykhare.blogspot.com
    हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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