कोठे पर “रखैल” और “चादर ” प्रथा

अनिल अनूप
बिना किसी दलाल के हमलोग सामने वाली गली के ही एक पक्के दो मंजिली मकान में जा घुसे। अंदर जाते ही सामान्य साज सज्जा के एक बड़े हॉल में बैठी दो उम्रदराज महिलाओं ने स्वागत किया। मेरे साथ वाले छायाकारों ने दनादन इनकी तस्वीर समेत हॉल के रंग रूप को कैमरे में बंद कर ली। इस पर ये महिलाएं एकदम घबरा सी गयी। ये क्या कर रहे हो बाबू ? मैंने इन्हें भरोसा दिलाया कि आप एकदम चिंता ना करो कुछ नहीं होगा। फिर भी ये अंदर से डर जाहिर करने लगी। जब हमलोगों ने अपना परिचय और कार्ड धराया तो उनके मन का डर दूर हुआ। मैंने कहा कि कोई तुम्हें तंग करे तो मेरे को फोन पर बताना मैं दिल्ली से ही तेरा काम करवा दूंगा। फिर जोडा कोई बहुत जरूरी काम हो तो मेरा कार्ड लेकर तुम डीआईजी यादव के पास भी चली जाओगी तो वे तेरी सुनवाई करेंगे,मगर बहुत टेढ़ा आदमी हैं गलत शिकायत करोगी तो हमें भी तेरे ही साथ गालियां देगा। । वे मेरे सहारनपुर से दोस्त हैं।


मेरी बातों से उसको भरोसा होने लगा था। उसने फौरन किसी को आवाज लगाकर चाय के लिए बोली। इस पर हमलोगों ने हाथ जोड़कर चाय के लिए मना किया, तो वह बोली आपलोग मेरे मेहमान हो बाबू बिना जल दाना ग्रहण किए तो जा ही नहीं सकते। अजीब सा धर्मसंकट खड़ा हो गया था। उसने कहा कि हम ग्राहकों के साथ चादर का रिश्ता बनाते हैं। जब तक वह साथ में रहता है तो वह एक दामाद की तरह हमारा अतिथि होता है। उसके जाने के साथ ही चादर और संबंधों का खात्मा होता है। महिला ने कहा कि मेरे यहां तो दर्जनों नियमित ग्राहक हैं जो माह में दो तीन बार दो चार दिन रहकर जाते हैं। इनके लिए लड़कियां भी रखैल की तरह एक ही होती है। वे लोग अपनी लाड़ली की देखरेख और खान पान के लिए हर माह दो चार पांच हजार दे भी जाते है। वो लोग एक तरह से हमारे घर के सदस्य की तरह है। किसी कोठे पर रखैल और किसी ग्राहक के यहां दो चार दिन रूकने की बात एकदम अटपटी सी लगी। मैंने इस पर हैरानी प्रकट की। तो दोनों महिलाएं हंसने लगी। इसमें हैरान होने की क्या बात है बाबू अब तो कहो कि यह प्रथा खत्म होने के कगार पर है, नहीं तो पहले हमलोग केवल माहवारी सदस्यों के लिए ही होती थी। और राजस्थान पंजाब हरियाणा यूपी से आने वाले लोग यहां न केवल ठहरते थे बल्कि हमारे घर की देखभाल भी करते थे। हम सब एक तरह से उनकी बांदिया थी। मैं इस रहस्योद्घाटन पर चौंक पड़ा। तो यह बताओ कि कोई ग्राहक बनकर तुम्हारे यहां आता है वो किस तरह घर का सदस्य या दामाद सा बन जाता है। इस पर वे खिलखिला पड़ी। अरे बाबू इसमें क्या हैं हमारी लड़कियां पूरी ईमनदारी से सेवा करती हैं तो मुग्ध होकर वे हमारे यहां ही नियमित आने लगते है और कईयों के साथ रहने के बाद दो एक से अपना लगातार वाला रिश्ता बना लेते है। एक ने कहा कि हमलोग के समय के भी कुछ मर्द कभी कभार अभी भी आकर कुछ रुपए और घंटो बैठकर हाल चाल पूछ कर चले जाते हैं।

इस पर मैं हंस पड़ा अरे तब तो तुमलोग की तो चांदी ही चांदी है कि जो यहां आया वो बस तुमलोग का ही होकर रह जाता है। मेरी बात पर वे दोनों हंसने की बजाय बोली कि यह तो बाबू हमलोग की सेवा और ईमानदारी का फल है कि लोग भूल नहीं पाते। मैंने फिर पूछा कि अभी तुम बोल रही थी कि माहवारी सदस्यों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। इस पर रूआंसी सी होकर वे बोल पड़ी कि अब जमाना बदल रह है बाबू नए लोगों में रिश्तों को लेकर ईमानदारी कहां रह गयी है। अब के लोग तो केवल दो चार घंटे की ही मौज चाहते है । अब तो जो बहुत पहले से यहां आते रहने वाले लोग ही रह गए है, जो आज भी हमारे सदस्य हैं । नया तो कोई अब कहां ग्राहक बन पाता है। मैं तुरंत बोल पड़ा इसका कारण तुमलोग क्या मानती हो? अरे बाबू शहर ज्यादा आधुनिक और बड़ा हो गया है। रात में रूकने के लिए होटल धर्मशाला भी काफी हो गए है जिससे लोगों को यहां आकर रूकने की अब जरूरत नहीं पड़ती। पहले तो वे यहां आकर खुद सुरक्षित हो जाते थे।
चादर और रखैल प्रथा के बारे में पूछा कि जो तुम्हारे यहां की कईयों के दिल की रानी कहो या रखैल सी है। यह तो बताओ कि क्या वे लोग जो दो चार घंटे के लिए आने वाले ग्राहक के लिए भी राजी होती है? इस पर दोनों एक साथ बोल पड़ी क्यों नहीं हमलोग किसी की अमानत नहीं हैं। हमारा रिश्ता तो केवल चादर वाला है जब तक वे लोग हैं तो हर तरह से हमारी लडकियां उनकी है। मैंने जिज्ञासा प्रकट की एक महिला के करीब कितने यार होते हैं जो माहवरी देते हैं ? इस सवाल पर वह हंसने लगी ,यह कोई तय नहीं होता, मगर दो तीन यार तो होते ही हैं। इस रखैल प्रथा पर मेरी उत्सुकता और बढ़ गयी थी मैंने फिर पूछा क्या कभी इस तरह का भी धर्मसंकट आ खड़ा होता है क्या कि एक साथ ही किसी के दो-दो आशिक आ जाते हो तब जबकि वह किसी और की रखैल बन अपने माहवारी आशिक के साथ हो ? इस पर दोनों औरतें फिर हंस पड़ी। क्या करें बाबू इस तरह की दिक्कत तो हमेशा आ खड़ी होती है। इसीलिए तो हमलोग किसी एक को दो-दो के साथ चादर वाला रिश्ता बनाने को कहते हैं ताकि कोई दिक्कत ना हो। रखैल प्रथा के इस अजीब त्रिकोण में मैं भी उलझता जा रहा था। मैंने फिर पूछ डाला कि अच्छा यह बताओ कि किसी के साथ दो-दो का रिश्ता हो और एक समय में दोनों खाली हो तब उनके एक आशिक के आने के बाद रखैलों का चुनाव किस तरह होता है? इस पर महिलाओं ने कहा कि यह तो बाबू पर है कि वो किसके साथ रहना चाहे, मगर एक साथ वह किसी एक के ही चादर में रह सकता है। यदि वह दो या किसी और से भी चादर बदलना चाहे तो? इस पर महिलाएं खीज सी गयी तू यहां के कानून को नहीं जानते हो बाबू। ये मर्द एय्याश तो होते हैं मगर यहां पर वे दिल हार कर ही सालों साल तक आते जाते हैं, क्योंकि बहुत सारे मामले में वो काफी ईमानदर भी होते हैं।
क्या तुमलोग से रिश्ता रखने में उन्हें कोई खतरा नहीं होता? हमलोग से तो कोई खतरा नहीं होता है कि हमलोग उनके घर में जाकर हंगामा करेंगे या पेट रह गया है का नाटक करेंगे। अरे बाबू यह तो एक दुकान है जब तक चाहो आ सकते हो, ना चाहो ना आओ, मगर हमारे आतिथ्य और प्यार को वे हमें नहीं भूल पाते।
जिस तरह की बातें तुम मेरे साथ कर रही है तो क्या यही कानून और रस्मोरिवाज सबों के यहां भी है या इसमें कुछ अंतर भी आ रहा है ? इस पर विलाप करती हुई महिलाओं ने कहा कि मैं पहले ही बोल रही थी न बाबू कि जमाना बदल रहा है। कुछ तो कॉलगर्ल बन होटलों में जाती है। आगरा में इतने लोग बाहर से आते हैं कि चारों तरफ से इनकी मांग है। मैंने उनसे पूछा कि क्या तुम अपनी सुदंरियों को हमलोगों को नहीं दिखाओगी ? इस पर चहकती हुई बोल पड़ी अरे तुमलोग से ही तो उनकी रौनक हैं बेटा मैं तुमलोग से बात कर रही हूं और वे सारी अंदर अंदर हमें गरिया रही होंगी कि लगता है कि ये बुढिया ही इन सबको खा जाएगी। अभी बुलाती हूं पर क्या कुछ …….। इसका तात्पर्य मैं समझ गया। मैंने अपने फोटोग्राफरों की तरफ देखा फिर इनसे कहा कि एक शर्त है कि इनकी फोटो उतारने दो? वे हंस पड़ी और बोली जो चाहो करो। मैंने तुरंत प्रतिवाद किया लगता है कि तुम गलत ट्रेन पकड़ रही है। हमलोग केवल बात करेंगे । फिर तुरंत बोल पड़ा अरे बात भी क्या करेंगे तुमलोग ने तो इनका पूरा इतिहास भूगोल तो सब बता ही दी। इस पर उनलोग ने कहा कोई बात नहीं बाबू जो चाहो बात कर लो। पर अब तो चाय पी सकते हो न ? यहां आए करीब एक घंटा हो चुका था। दिन के 11 बज गए थे, लिहाजा आंख मारकर मैंने फोटोग्राफरों से यहां से अब रूखसत होने का संकेत दिया। इन महिलाओं ने कहा कि मैं यहां पर ही बुला दूं कि तुमलोग उनके पास जाओगे ? मैंने फौरन कहा नहीं नहीं हमलोग ही वहां जाएंगे, तो दोनों हाथ फैलाकर हंसने लगी। मैंने पूछा क्या दूं तू ही बोल न। हम तो तेरे ग्राहक है नहीं तेरी बात सुनने वाले है, जो तेरी , जो तेरी मर्जी पर यह तो एक दुकान हैं न बोहनी तो होनी ही चाहिए। हम तीनों दोस्त उसकी बात सुनकर हंस पड़े, और जेब से मैंने अपनी जेब से दो सौ रूपया निकलकर उनके हाथों में रख दिए। वे लोग मायूस होने की बजाय खुश हो गयी, और हमलोग उनके पीछे पीछे एक दूसरे कमरे में चले गए।
कमाल है देखते ही आंखें चौंधिया गयी। एकदम सामान्य साज सज्जा और सामान्य पहनावा में वे लोग कहीं से भी वेश्या या रंडी नहीं लग रही थी। सात आठ वेश्याओं में ज्यादातर 30 पार कर चुकी थी, मगर कम उम्र वाली भी 20 से 25 के बीच होगी। मैं इनको देखकर यही तय नहीं कर पा रहा था कि सामने बैठी कन्याएं क्या सचमुच में रंडियां हैं या आंखों को धोखा देने के लिए ही हमें रंडी बताया गया है। इन्हें गांव से बाहर कहीं भी आगरा में इन्हें कोई न रंडी कह सकता है और न ही मान सकता है। मैंने तुरंत टिप्पणी की कमाल है यार तुमलोग तो एकदम मेनका रंभा जैसी बेजोड़ अप्सराएं सी हो। मैंने तो कहीं और कभी सोचा तक नहीं था कि बसई की वेश्याएं दिल फाड़कर घुस जाने वाली होती है। मेरी बातों को सुनकर सब हंसने लगी । इससे क्या होता है बाबू हैं तो हमलोग नाली के ही कीड़े। मैंने फिर पूछा क्या केवल तुमलोग ही इतनी हसीन रंगीन हो कि यहां कि और भी तुम जैसी ही इतनी ही मस्त है? मेरी बात सुनते ही सब खिलखिला पड़ीं। एक ने कहा एक औरत कभी दूसरी औरत की तारीफ नहीं करती बाबू तुम तो एकदम बमभोले हो, फिर हम तो वेश्याएं है कैसे कह दें कि हमसे भी कोई सुंदर हैं यहां। यह कहकर सभी फिर जोर से हंसने लगी। और मैं इनकी बातें सुनकर झेंप सा गया।
फिर एक बार पूछा कि धंधा कैसा चल रहा है यहां के लोग तो कह रहे हैं कि बड़ी मंदी का दौर है। मेरी बात सुनकर ये लोग फिर जोर से हंस पड़ी। अरे बाबू खाना के बगैर लोग रह सकते हैं मगर ….। हमारा धंधा ना कल कम था न आज कम है और मान लो कि हम बुढिया भी जाएंगी न तो भी यह कम नहीं होगा। हां रंग रूप अंदाज जरूर बदल जाएगा। इससे पहले कि मैं कुछ और पूछने के लिए मुंह खोलता उस,पहले ही दो तीन वेश्याओं ने बड़ी अदा से गुनगुना चालू कर दिया कि या तो साथ चलो ऊपर नहीं तो चले चलो चले चलो चले चलो चले चलो….. गाते हुए सब कमरे से बाहर निकल गयी।
हमलोग भी कमरे से बाहर होकर फिर आंटियों की शरण में थे। मैंने फिर आंटी से कहा आह कहे या वाह कहे आंटी तुमने तो पूरे चांद को ही अपने कोठे पर बैठा लिया है। इस पर वो भी हंसने लगी। बेटा इनको देखकर तो लोग अपने घर का रास्ता ही भूल जाते हैं। मैंने फौरन पूछा इनको लाई कहां से ? यह सुनते ही दोनों उकता सी गयी। चल बाबू चल तू भी चल इनको देखते ही ये तेरे दिमाग में नाचने लगी है और अब तू केवल अंड शंड बकेगा। वेश्याओं की मालकिन की गुर्राहट पर हम तीनों जोर से हंसे और घर से बाहर निकल पडे।

तभी मुझे कुछ याद आया तो हम तीनों फिर अंदर आ गए। । हमलोगों को देखकर वो सवालिया नजर से देखने लगी। मैं आराम से जाकर बैठ गया। अपने स्वर को नरम करती हुई पूछी कुछ सामान छूट गया क्या बाबू ? मैंने कहा आंटी तुम घर में घुसते ही बोली थी कि हम मेहमानों से दाना पानी का रिश्ता बनाते हैं। तो हमारे लिए बन रही चाय किधर गयी ? बस यही चाय पीने आ गया नहीं तो तुम बाद में चाय फेंकने पर हमलोग को ही गरियाती। मेरी बाते सुनकर वो एकदम मस्त हो गयी। और हंसते हुए बोली हाय री मर ही जावां क्या मस्त है तू भी इन हसीनाओं से कम नहीं है रे बात करने और छेड़ने में। इस पर मैं झेंपते हुए बोला अरी आंटी मेरे से तुलना करके तू उन रूपसियों की बेइज्जती कर रही है कहां वे और कहां मैं। मैं मुंहफट वाचाल बक बक करने वाला। कहकर हंस पडा। मेरे उपर निहाल होती हुई बोली सब कहां बोल पाते हैं बेटा तेरे दिल में किसी तरह का लोभ नहीं है न तभी इतना साफ और सीधे कह डालता है।
मैं भी माहौल को जरा मस्तानी बनाने के लिए कहा अरे तेरे चरण किधर हैं आंटी मेरी इस तरह तारीफ करने वाली तू दुनियां की पहली औरत है लाओ तेरे पैर छू ही लूं। मेरी बातों को सुनकर वो बाहर भाग गयी और कमरे के बाहर ठहाके लगाने लगी। मैं प्रसंग को मोड़ने के लिए जरा हड़बड़ाते हुए कहां आंटी चाय पिलानी है तो जरा जल्दी कर नहीं तो हम लोग निकल रहे है। एकदम एक मिनट के अंदर चाय आ गयी। बेटा मैं सैकड़ों लोगों को चाय पीला चुकी हो मगर जिस प्यार लगाव और स्नेह से तुम्हें पिला रही हूं वह आज से पहले कभी नहीं । मैं भी गद गद होते हुए उन पर मोहित सा था और बिन चाय को पीए ही बोल पड़ा आहा क्या स्वाद है चाय का। तभी दूर खड़ी एक जवान वेश्या ने फौरन आंटी को बताया कि बिना चाय पीए ही तारीफ करने लगे हैं। मैं उसकी तरफ देखकर बोला चाय को पीने की क्या जरूरत हैं आंटी के प्यार से चाय तो बेमिसाल हो गयी है। तू चाय पी रही है और मैं तो आंटी के प्यार को पी रहा हूं। इस पर वे उठकर मुझे गले लगा ली। जीते रहो बेटा जीवन भर फलो फूलो। उनके इस आशीष पर मैं भी झुककर उनके पैर छू ही लिए तो वो मुझसे लिपटकर रोने लगी। मैंने उनको चुप्प कराया और बोल पड़ा पता नहीं क्यों आंटी मुझसे लिपटकर ज्यादातर लोग रो ही जाते हैं।
इस पर वो मेरे को साफ दिल का नेक इंसान बोली। तब मैं भी ठठाकर बोला कि तेरे यहां तो लोग लड़कियों से चादर वाला रिश्ता बनाते हैं और मैं तेरे संग ही रिश्ता बना गया। इस पर वो बैठे बैठे सुबक पड़ी। और मेरे लिए न जाने कौन-कौन सी दुआएं देने लगी। बेटा लोग यहां पर तो दिल हार कर जाते हैं पर तू तो सबके दिल को लेकर जा रहे हो। इस पर मैंने अपना थैला तुरंत खोलकर फर्श पर रख दिया कि भाई जिसका जिसका भी दिल मेरे साथ जा रहा है वे निकाल ले। इस पर हॉल में ठहाकों की गूंज फैल गयी और दोनों उम्रदराज आंटियों ने अपने हाथ से मेरे चेहरे को लेकर जितना हो सकता था लाड प्यार जताया। प्यार का नाटक खत्म होते ही मैंने उनसे पूछा कि किस किस घर में चलूं आप कुछ बताएंगी। इस पर वे दोनों अपनी एक खास सहेली के यहां अपने साथ लेकर चलने को राजी हो गयी।
इस बार हम तीनों आंटियों के संग इस घर के पीछे वाले एक मकान में घुस गए। वहां की भी दो तीन उम्र दराज महिलाओं ने इनका भरपूर स्वागत किया। एक आंटी ने मेरा नाम पूछा तो मैंने कहा अनूप। इस पर वह अपनी सहेली को बताने लगी है तो ये सब पत्रकार मगर (मेरी तरफ संकेत करती हुई) यह अनूप बहुत मस्त है। हमारे यहां तो लोग दिल हार कर जाते हैं मगर इस अनूप ने तो सबक दिल ही जीत लिया। मैं भी जरा ज्यादा शिष्ट सभ्य और सुकुमार दिखाने के लिए इस ने कोठे की तीनों उम्र दराज आंटियों के पैर छू लिए और हाथ जोड़कर कहा कि एकदम खरा और तीखा पत्रकार हूं आंटी पर यह तो इनका प्यार दुलार है कि ये हमें इतना मान दे रही हैं। नए कोठेवाली आंटियों ने कहा कि बेटा हम तो मर्दों की चाल से पूरा हाल जान लेती हैं पर जब ये तुम्हें इतना दुलार दे रही हैं तो जरूर तू खास है। मैं लगभग पूरी तरह उनके सामने झुकते हुए हाथ जोड़ दिए। इस पर मोहित होती हुई नयी आंटी ने कहा वाह बेटा क्या सलीका और शिष्टाचार है तुममें। मैं तुरंत एकदम टाईट होकर खड़ा होकर बोला कि आंटी यह सब दिखावा है। न आज इसका कोई मोल है न कोई पूछ रहा है। मगर आंटी का प्रलाप जारी रहा। तब मैंने उनसे पूछा कि आपके यहां कोई बड़ा थैला होगा। तो एक साथ कईयों ने पूछ किस लिए। इस पर मैं बोल पड़ा कि आंटी के घर के सारे लोगों का दिल तो इस थैले में बंद हैं और अभी जो आपलोग के दिल को ले जाने के लिए भी तो एक थैला चहिए न। इस पर पूरे घर में हंसी फैल गयी। सब पेट पकड़ पक़ड़ कर हंसने में लगी रही। थोडी देर में चाय आ गयी। फिर आंटियों ने बताया कि हमलोग यहां करीब 200 साल से रह रहे है। धंधा कैसा है तुम जानते ही हो, मगर अब इससे बाहर निकलना भी चाहें तो यह सरल नहीं हैं। अपने घर की बेटियों को दिखाया और बताया किस तरह पुलिस की सख्ती के कारण यह धंधा काफी मंद सा हो भी गया है। इस घर की आंटियों ने भी बताया कि केवल चादर और रखैल कहो या साथी वाला ही रिश्ता मान लो कि हर घर में रौनक और हंसी मजाक है।
बसई गांव के ज्यादातर घरों में आज भी चादर और साथी कहे या रखैल वाला रिश्ता ही मुख्य है। मगर लड़कियों की लगातार बढ़ती मांग के चलते आगरा शहर में देह के धंधे का कारोबार भी खूब चमक रहा है।
बसई की लड़कियों समेत शौकिया तौर पर भी इस धंधे में उतर रही युवतियों के कारण भी रंग रूप पहिचान छिपाने से इस धंधे का पूरा नक्शा ही बदल गया है। और इनकी चमक के पीछे बसई जैसे परम्परागत गांवों की चमक धुंधली होती पड़ रही है।
बसई की देवियों के दर्शन करके जब हमलोग बाहर निकले तो शाम के साढ़े चार बज चुके थे। खुद पर लज्जित होते हुए जब मैं पुलिसचौकी पर पहुंचा तो आगरा के मेरे सारे लोकल दोस्त नेताओं की फौज पूरे आराम से मेरा इंतजार कर रही थी। मैंने व्यग्रता से कहा चलो यार कुछ खाते पीते हैं। आपलोग को बड़ा कष्ट उठाना पड़ा होगा। मेरी बात सुनकर चौकी इंचार्ज चंद्रशेखर सिंह समेत मेरे सारे दोस्त हंस पड़े। मैं भौचक्का सा देखता रहा कि क्या माजरा है। यादव जी की कोठी से बार-बार खाने के लिए फोन आने पर सबों को इंचार्ज ने खाना खिलाया और पिछले छह घंटे से चाय और सिगरेट के बेरोकटोक दौर को झेलता रहा। इतने लंबे उबाऊ इंतजार के बाद भी मेरे तमाम मित्रों के चेहरे पर न कोई शिकन थी और ना ही शिकायत थी। और जब हमलोग बसई से बाहर निकले तो आगरा के मेरे सारे मित्र बहुत सारे पुलिस वालों के पक्के यार बन चुके थे। अलबत्ता लखनऊ से ही यादव साहब ने मेरे लिए मिलकर ही जाने का ही फरमान जारी कर दिया था। एक दिन आगरा में रूकना पडा। अगले दिन पांच साल के बाद दोपहर में मिले बगैर दिल्ली लौटना मुझे भी ठीक नहीं लगा और सहारनपुर की बहुत सारी बातों यादों को आगरा में याद करके हमलोग कई घंटे तक बहुत मस्त रहे।

1 thought on “कोठे पर “रखैल” और “चादर ” प्रथा

  1. आज के समय मै भी अनील अनुप जैसे पत्रकार समाज की व्यथा की खोज कर जन मानस से सांझा कर युग के बदलाव और शरीर के सौदागरो को यह यकीन दिलाना की ऐसी वफा भी है कही !!!!!!

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